December 18, 2012

पंजाबी कहानी



साग की कटोरी
- बलबीर सिंह मोमी
हिन्दी अनुवाद- सुभाष नीरव

जब वह मुझे एलिवेटर में मिली तो उसके हाथ में दो थैले थे जिनमें ताजा साग, मूलियाँ और हरे प्याज थे। उसकी आयु बेशक साठ से ऊपर की रही होगी, पर सुर्ख दिपदिपाता चेहरा और सुगठित शरीर देखकर वह नौजवान लड़कियों से भी तगड़ी प्रतीत होती थी। मुझे यह अंदाज लगाने में देर न लगी कि यह माई किसी फॉर्म में दिहाड़ी करके लौटी थी और अक्सर पंजाबी स्त्री-पुरुष जो फॉर्मों में सेब तोडऩे या प्याज-मूलियाँ उखाडऩे का काम करते हैं, वे शाम को लौटते समय अपने खाने के लिए सब्जियों के झोले भर लाते हैं और मालिक बुरा नहीं मानते। अपितु कई मालिक तो अपने वर्करों को स्वयं ही घरों के लिए सब्जी आदि ले जाने को कह देते हैं। कई पंजाबी तो वर्षभर के लिए टमाटर या हरी मिर्चें  फ़्रिज़ में सर्दियों के लिए फ्रीज़ कर लेते हैं।
कैनेडा में फॉर्म की ताजा सब्जी का अपना ही एक स्वाद और नशा है। अब तो पंजाबी घरों में लोग सालभर का साग पकाकर फ्रीज़ कर लेते हैं। मालिक दस डॉलर की बकट बेचते हैं, पर साग खुद तोड़ना पड़ता है और फाल के दिनों में टरांटो के आस-पास सरसों के खेतों में साग तोड़ऩे वाले पंजाबियों की भरमार लग जाती है।
मेरा मन कर रहा था कि इस माई से कहूँ कि खेतों में से तोड़ा साग मुझे दे दे, पर मैं साग कैसे पकाऊँगा, इस बारे में सोचकर मैंने मुँह नहीं खोला। मैं उसके साथ बात साझी करने के लिए सोच ही रहा था कि उसने खुद ही मुझसे पूछ लिया, आप इसी बिल्डिंग में रहते हैं ?
मैंने हाँ में उत्तर देते हुए कहा, मैं सातवें फ्लोर पर 701 नंबर अपार्टमेंट में रहता हूँ।
मैं भी सातवें फ्लोर पर 719 नंबर में रहती हूँ। मेरे साथ मेरी बेटी रहती है और घरवाला भी। बेटा अभी लुधियाना के करीब एक गाँव में रहता है। उसको इमिग्रेशन नहीं मिली।
अभी उसने बात पूरी नहीं की थी कि सातवीं मंजिल आ गई और हम एलिवेटर में से बाहर आ गए। बात को आगे बढ़ाते हुए उसने मुझसे पूछा, देखने में तो तुम पढ़े लिखे लगते हो। मुझे एक चिट्ठी पढ़वानी है, पढ़ दोगे?
जरूर पढ़ देंगे। पर साथ ही मैं अपने मन की बात को रोक न सका, जब से इंडिया से इधर आया हूँ, सरसों का साग नहीं खाया। अगर कहीं साग की एक कटोरी मिल जाए तो पंजाब याद आ जाएगा।
लो, यह तुमने कौन सी बात कही। मैं साग बनाकर लाऊँगी तेरे लिए, पर इतवार को। साथ ही अंग्रेजी की चिट्ठयाँ भी।
ठीक है, मैं चिट्ठयाँ पढ़ कर सब कुछ बता दूँगा। और हम अपने अपने अपार्टमेंट्स की ओर चले गए।
मुझे कैनेडा में आए यद्यपि तीन वर्ष हो गए थे, पर मुझे कहीं काम नहीं मिल सका था। दरअसल, मैं पढ़ा-लिखा था और इंडिया में बढिय़ा और आरामदेह नौकरी करके आया था। यहाँ कैनेडा में मुझसे सख्त और भारी काम नहीं होता था। मुझे जहाँ काम मिलता था, वहाँ काम वाले ही मुझे धीमा काम करने के कारण हटा देते या मैं स्वयं ही मुश्किल काम न कर सकने के कारण छोड़ देता। मेरी पढ़ाई के हिसाब से मुझे काम मिलता नहीं था। कैनेडा वाले इंडिया की पढ़ाई को मानते नहीं थे। इसलिए, अक्सर मैं उदास रहता और इंडिया लौट जाने की सोचता रहता था।
इतवार को मेरे डोर पर दस्तक हुई। जब मैंने दरवाजा खोला तो बाहर वही एलिवेटर वाली माई साग की बड़ी-सी कटोरी लिये खड़ी थी। मैंने उसे अन्दर आने के लिए कहा। उसने अन्दर आ कर साग की कटोरी डॉयनिंग टेबल पर रख दी। साथ ही, पॉलीथीन में लपेटी मक्की की रोटियाँ भी टेबल पर रख दी।
हम डॉयनिंग टेबल के पास ही कुर्सियों पर बैठ गए और उसने मेरे सामने अंग्रेजी में लिखीं कई चिट्ठियाँ रख दी जो इमिग्रेशन विभाग की ओर से आई थी। ये पत्र इमिग्रेशन विभाग ने उसको ही लिखे थे और पत्रों से ही मुझे पता लगा कि उसका नाम बलवंत कौर था। इन पत्रों से यह पता चलता था कि उसके बेटे को इमिग्रेशन देने का केस रद्द कर दिया गया था ; क्योंकि उसकी उम्र 21 वर्ष से ऊपर थी, वह विवाहित था और उसके बच्चे भी थे। जब यह सारी बात बलवंत कौर को बताई तो उसकी आँखें भर आईं। उसके दिल में बेटे के लिए बड़ा प्यार था और वह किसी भी तरकीब से बेटे को कैनेडा में लाना चाहती थी। मैंने उसे बताया कि कैनेडा के इमिग्रेशन कानून के अनुसार वह नहीं आ सकता।
बलवंत कौर ने कोई उपाय खोजने के लिए मुझसे कहा। उसने यह भी बताया कि लुधियाना के करीब गाँव में उनके पास जमीन-जायदाद भी अच्छी है और वह हर महीने अपने बेटे को दस हजार रुपये शराब पीने के लिए भेजा करती है। उसने यह भी बताया कि उसका बेटा शराब पीने का आदी है और उससे अपने बेटे का बिछोह सहन नहीं होता। वह उड़कर बेटे के पास पहुँच जाना चाहती थी या किसी भी तरीके से उसको कैनेडा ले आना चाहती थी। उसने बताया कि बेटे की खातिर वह यहाँ फॉर्म में नौ डॉलर प्रति घंटा के हिसाब से काम करती है। सप्ताह में छह दिन 60 घंटे काम करती है और पाँच सौ डॉलर से अधिक का चैक हर सप्ताह घर लाती है। सर्दियों में जब फॉर्म बन्द हो जाते थे तो उसको बेरोजगारी की इंश्योरेंस मिलती थी और आर्थिक तौर पर वह ठीक-ठाक थी। जब उसने मुझसे पूछा कि मैं क्या करता हूँ और कितने पैसे कमाता हूँ तो वह यह सुनकर हैरान रह गई कि पढ़ा-लिखा होने के बावजूद मैं पाँच डॉलर प्रति घंटा पर सिक्युरिटी की नौकरी करता हूँ। उसने गिला-सा करते हुए कहा, तू किधर का पढ़ा-लिखा है फिर। मैं अनपढ़ होकर तेरे से ज्यादा पैसे कमा रही हूँ।
जब उसने मुझसे अपने बेटे को कैनेडा लाने के ढँग के विषय में पूछा तो मैंने अपनी समझ के अनुसार बताया कि एजेंट पाँच लाख रुपया लेते हैं और नकली पासपोर्ट पर लोगों को कैनेडा पहुँचा देते हैं। बाकी, जैसा कि तुमने बताया है कि तुम्हारी लड़की के कोई औलाद नहीं है, वह अपने भाई का एक बच्चा गोद लेकर उसके बच्चे को कैनेडा में बुला सकती है।  प्रतिप्रश्न में उसने गोद लेने का तरीका पूछा।
मैंने बताया कि उसको हिन्दुस्तान जाकर बच्चा उसके असली माँ-बाप की सहमति से गोद लेना होगा और फिर 14 साल की उम्र से पहले-पहले बच्चा स्पांसर होकर कैनेडा पहुँचना चाहिए। यदि वह स्वयं नहीं जा सकती तो उसके द्वारा किसी को पावर आफ एटार्नी भेज कर भी बच्चा गोद लिया जा सकता है। पावर आफ एटार्नी किसी भी वकील से बनवाई जा सकती है। उसने बताया कि उसे मेरी बताई दोनों बातें ठीक लगी हैं। वह अपनी बेटी के साथ सलाह करके दुबारा मेरे पास आएगी। इतना कहकर वह चली गई। उसके चले जाने के बाद मैंने साग के साथ रोटियाँ खाईं। उसने साग में मक्खन डाल रखा था और साग और मक्की की रोटियाँ मुझे बहुत स्वाद लगी थीं। एक तरह से वह  साग की एक कटोरी के बदल मेरे से सलाह-मशवरा कर गई थी।
कुछ दिन बाद वह अपनी लड़की को संग लेकर आई। लड़की बहुत बढिय़ा अंग्रेजी बोलती थी और बड़ी तीखी लग रही थी। देखने में भी वह कैनेडियन स्त्रियों की तरह लगती थी। उसने कुरेद-कुरेद कर बच्चा गोद लेने के बारे में मुझसे प्रश्न किए और ऐसे एजेंटों की जानकारी भी माँगी जो पैसा लेकर व्यक्ति को कैनेडा मँगवाते थे। उसने स्वयं ही बताया कि उसका अपने पति से डायवोर्स का केस चल रहा था और शीघ्र ही उसको तलाक मिलने वाला था। तलाक लेने की उसने खास वजह नहीं बताई थी। उसने कैनेडियन स्टाइल में सिर के बाल कटवा रखे थे और जीन्स पहन रखी थी। उसकी उम्र 30 के करीब होगी और उसका अपना कोई बच्चा नहीं था।
सारी बातचीत के बाद यह कयास लगाना कठिन नहीं था कि वह भी माँ की तरह अपने भाई को कैनेडा में देखना चाहती थी। मैंने उससे पूछा कि तुम इतनी बढिय़ा इंग्लिश बोलती हो, फिर तुम्हारी माँ ने अंग्रेजी की चिट्ठियाँ मुझसे क्यों पढ़वाईं। उसने तुरन्त उत्तर दिया कि उसको इंग्लिश बोलनी और समझनी तो खूब आती थी, पर इंग्लिश लिखना-पढऩा उसे अधिक नहीं आता था। मेरा मन हो रहा था कि उस लड़की से तलाक लेने का कारण पूछूँ पर बात आरंभ करने का कोई ढंग नहीं मिल रहा था।
फिर वे दोनों चली गईं। फिर एक लम्बे समय तक कोई मुलाकात नहीं हुई। कभी-कभार एलिवेटर में कुछ पल की मुलाकात हो जाती। मुलाकात बहुत संक्षिप्त और भेदभरी होती। मैं इसे जिन्दगी का एक हिस्सा ही समझता और इस संबंध में गहरे न सोचता।
फिर पता चला कि उन्होंने यह अपार्टमेंट छोड़ दिया था और माल्टन में मकान खरीद कर माँ-बेटी रहने लगे थे। अब मुझे उनका नया फोन नंबर भी नहीं पता था और न ही कभी उनकी ओर से कोई फोन आया था। एलिवेटर में मिलने का अवसर तो अब न के बराबर था; क्योंकि वे बिल्डिंग ही छोड़ गए थे। धीरे-धीरे मैं भी उन्हें भूल गया।
करीब दो वर्ष से अधिक का समय हो गया था। मैं किसी मित्र को रिसीव करने के लिए पियर्सन इंटरनेशनल एअरपोर्ट के वेटिंग लॉन्ज में बैठा था और उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। फ्लाइट लैंड कर चुकी थी, पर मुसाफिर अभी बाहर आने शुरू नहीं हुए थे। इमिग्रेशन और कस्टम में उलझे हुए थे और कुछ अपने सामान की प्रतीक्षा कर रहे थे।
मेरा मित्र तो अभी नहीं आया था, पर विवाह वाले वस्त्रों में एक जवान स्त्री सामने से आ रही थी जिसने हाथों में लाल चूड़ा पहन रखा था और माथे पर टीका लगा हुआ था। पैरों में चाँदी की पायल पहन रखी थी उसके पहरावे से उसके विवाहित होने के सभी आसार नजर आ रहे थे। उसके संग करीब 35 वर्षीय एक आदमी था जो दुबला-पतला था। उसने थ्री-पीस सूट पहन रखा था। उसकी चाल से पता चलता था कि वह शराबी था और उसने उस वक्त भी अच्छी-खासी पी रखी थी और वह लडख़ड़ा रहा था। वह उसे अपनी बाँह का सहारा देकर बाहर ला रही थी और एक हाथ से सामान वाली ट्राली धकेल रही थी। जब वह मेरे करीब आई तो मैंने उसे पहचान लिया। यह तो उसी साग वाली माई की लड़की थी ; जिसने कभी अपने पति से तलाक की बात मुझसे कही थी। जब उसकी और मेरी आँखें परस्पर मिलीं तो उसने मुँह फिराकर यह दर्शाने की कोशिश की कि वह मुझे नहीं जानती। फिर भी, जब वह मेरे पास से गुजरने लगी तो मैंने पूछ ही लिया, इंडिया से आ रहे हो ?
उसने शर्मिन्दा-सा होकर कहा, हाँ जी, मीट मॉय हसबैंड...।
मैंने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया, पर उसने हाथ आगे न किया। शायद, अधिक नशे में था या उसको इस बारे में कोई ज्ञान नहीं था। अभी हम एक दूसरे की ओर देख ही रहे थे कि साग की एक कटोरी देकर कैनेडियन इमिग्रेशन की जानकारी लेने वाली माई भी आ गई जो इतने वेग में थी कि उसने दौड़कर उस व्यक्ति को अपनी बाँहों में कस लिया और उसका माथा चूमते हुए बोली, शुक्र है... आ गया मेरा बेटा। कितने सालों से मैं तेरा राह देख रही थी। मेरी तो आँखें ही पक गई थीं।
मैं हतप्रभ था। कैनेडियन इमिग्रेशन लेने के लिए लोग कैसे-कैसे हथकंडे अपनाते हैं। मैं अभी यह सोच ही रहा था कि तभी मुझे मेरा मित्र अपना ब्रीफकेस उठाये बाहर आता दिखाई दिया जिसे रिसीव करने मैं एअरपोर्ट आया था।

संपर्क: बलबीर सिंह मोमी
17 Donaldson Drive, Brampton,
Ont. L6Y 3H1, Canada, PH: 905-455-3229,
Cell: 416-949-0706,
Email: momi@rogers.com
संपर्क: सुभाष नीरव
372, टाइप-4, लक्ष्मीबाई नगर
नई दिल्ली-110023
टेलीफोन नंबर : 09810534373

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