December 18, 2012

प्रेरक कथा



दो नगीने
किसी शहर में एक रब्बाई (यहूदी पुजारी) अपनी गुणवती पत्नी और दो प्यारे बच्चों के साथ रहता था।  एक बार उसे किसी काम से बहुत दिनों के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा. जब वह दूर था तब एक त्रासद दुर्घटना में उसके दोनों पुत्र मारे गए।
ऐसी दु:ख की घड़ी में रब्बाई की पत्नी ने खुद को बड़ी मुश्किल से सँभाला. वह बहुत हिम्मती थी और ईश्वर में उसकी आस्था अटूट थी. लेकिन उसे यह चिंता थी कि रब्बाई के लौटने पर वह उसे यह दुखद समाचार किस प्रकार देगी। रब्बाई स्वयं बहुत आस्थावान व्यक्ति था लेकिन वह दिल का मरीज़ था और पूर्व में अस्पताल में भी भर्ती रह चुका था. पत्नी को यह आशंका थी कि वह यह सदमा नहीं झेल पाएगा।
पति के आगमन की पूर्व संध्या को उसने दृढ़तापूर्वक प्रार्थना की और शायद उसे अपनी समस्या का कोई समाधान मिल गया। अगली सुबह रब्बाई घर पहुँच गया। बड़े दिनों के बाद घर वापसी पर वह पत्नी से गर्मजोशी से मिला और लड़कों के बारे में पूछा। पत्नी ने कहा- उनकी चिंता मत कीजिए। आप नहा-धोकर आराम करें।
कुछ समय के बाद वे भोजन करने के लिए बैठे। पत्नी ने उससे यात्रा के बारे में पूछा। रब्बाई ने उसे इस बीच घटी बातों की जानकारी दी और कहा कि ईश्वर की दया से सब ठीक हुआ। फिर उसने बच्चों के बारे में पूछा।
पत्नी कुछ असहज तो थी ही, फिर भी उसने कहा- उनके बारे में सोचकर परेशान मत होइए। हम उनकी बात बाद में करेंगे। मैं इस वक्त किसी और उलझन में हूँ, आप मुझे उसका उपाय बताइए। रब्बाई समझ रहा था कि कोई-न-कोई बात जरूर थी। उसने पूछा- क्या हुआ? कोई बात तो है जो तुम्हें भीतर-ही-भीतर खाए जा रही है। मुझे बेखटके सब कुछ सच-सच बता दो और हम साथ बैठकर ईश्वर की मदद से उसका हल जरूर निकाल लेंगे।
पत्नी ने कहा- आप जब बाहर थे तब हमारे एक मित्र ने मुझे दो बेशकीमती नगीने एहतियात से सहेजकर रखने के लिए दिए। वे वाकई बहुत कीमती और नायाब नगीने हैं! मैंने उन जैसी अनूठी चीज और कहीं नहीं देखी है। अब वह उन्हें लेने के लिए आने वाला है और मैं उन्हें लौटाना नहीं चाहती। मैं चाहती हूँ कि वे हमेशा मेरे पास ही रहें। अब आप क्या कहेंगे?
तुम कैसी बातें कर रही हो? ऐसी तो तुम नहीं थीं? तुममें यह सांसारिकता कहाँ से आ गयी? रब्बाई ने आश्चर्य से कहा।
सच यही है कि मैं उन्हें अपने से दूर होते नहीं देखना चाहती। अगर मैं उन्हें अपने ही पास रख सकूँ तो इसमें क्या बुरा है? पत्नी ने कहा।
रब्बाई बोला- जो हमारा है ही नहीं उसके खोने का दु:ख कैसा? उन्हें अपने पास रख लेना तो उन्हें चुराना ही कहलाएगा न? हम उन्हें लौटा देंगे और मैं यह कोशिश करूँगा कि तुम्हें उनसे बिछुडऩे का अफसोस नहीं सताए। हम आज ही यह काम करेंगे, एक साथ।
ठीक है जैसा आप चाहें। हम वह सम्पदा लौटा देंगे और सच यह है कि हमने वह लौटा ही दी है। हमारे बच्चे ही वे बेशकीमती नगीने थे। ईश्वर ने उन्हें सहेजने के लिए हमारे सुपुर्द किया था और आपकी गैरहाजिरी में उसने उन्हें हमसे वापस ले लिया। वे जा चुके हैं....
रब्बाई ने अपनी पत्नी को भींच लिया और वे दोनों अपनी आँसुओं की धारा में भीगते रहे। रब्बाई को अपनी पत्नी की कहानी के मर्म का बोध हो गया था। उस दिन के बाद वे साथ-साथ उस दु:ख से उबरने का प्रयास करने लगे। (पाउलो कोएलो के ब्लॉग से) हिन्दी नेस्ट

2 Comments:

Asha Mor said...

कहानी बहुत मार्मिक है।

सुधाकल्प said...

मर्म को छूती हुई प्रेरक कथा ।

लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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