March 23, 2012

बाथ टब की होली

-रचना श्रीवास्तव

... यहाँ अपने देश जैसी बात है कहाँ दोस्तों, घर के बाहर खेला तो शिकायत होगी और जो लीजिंग ऑफिस के लोग है न वो जुर्माना कर देंगे। होली के दिन फटका (चूना) लग जायेगा। ...और घर के अंदर खेलें तो कार्पेट गंदा होगा और उसकी सफाई ख़ुद से तो होगी नहीं किसी को बुलाना होगा और उसके लिए देने होंगे आपनी गाढ़ी कमाई के कीमती डॉलर... तो क्या किया जाए ...।
अपने देश से यहाँ आ के बहुत कुछ पाया पर इस बहुत कुछ पाने में जो खोया वो बहुत कुछ से बहुत ज्यादा था। अपने देश जैसी बात तो यहाँ है नहीं विशेष कर जब बात हो त्यौहारों की। सब कुछ जैसे छोटा हो जाता है एक जगह में सिमट जाता है। आप सोच रहे होंगे की मैं अचानक ये क्या रोना लेके बैठ गई। जानते है अभी होली आई थी आई थी न... अरे भाई आई थी मैं इस बात को बात बार- बार क्यों कह रही हूँ आप के लिये नहीं ख़ुद को यकीन दिला रही हूँ की हाँ यहाँ भी आई थी होली। मंै आप को बताना चाहती हूँ कि मैं एक संवेदनशील लड़की हूँ और हर चीज मैं संवेदनाओं के साथ हास्य भी ढूँढ लेती हूँ अब आप सोचेंगे कि मैं क्या कहना चाहती हूँ आप पढ़ते रहिये मै बताती जा रही हूँ अरे रुक गए नहीं- नहीं, रुकिए नहीं पढ़ते रहिये, हाँ तो होली आई यहाँ पर यानी डलस में। यहां होली सिकुड़ के मन्दिर के प्रांगण में भले ही सिमट जाती है लेकिन वहाँ मेला -सा लग जाता है। फिर भी अपने देश वाली बात कहाँ... वहां तो रंग भी लगाया जाता है तो एक दूसरे को पूछ- पूछ कर ...क्यों भाई रंग लगा दूँ, यदि हाँ तो लगा दिया यदि नहीं पूछा और रंग लगा दिया और खुदा न खास्ता उसको रंग से अलर्जी हुई तो बस आप की होली के रंग में भंग हो सकता है।
होली के दिन यहाँ आनंद बाजार भी लगता है, ये मुझको बहुत पसंद है खूब खाओ... अलग- अलग पकवान... पर जानते हैं मैं जहाँ रहती हूँ डेनटन में वहां से मन्दिर 50 मिनट की ड्राइव पर है, अब इतनी लम्बी दूरी तय कर के बच्चों को ले कर जाओ फिर रंग लगाओ वह भी पूछ -पूछ कर। है न कितनी मेहनत का काम... ऐसा नहीं है कि मैं गई नहीं हूँ, मैं गई हूँ तभी तो आपको ये सब बता रही हूँ तब मेरे साथ मेरी बेटी ही थी। अब इन छोटू महाराज के आने के बाद तो थोड़ा और मुश्किल हो गया। ...तो मैंने सोचा कि क्यों न इस बार घर में ही होली मनाई जाये। अब सोच तो लिया पर कहाँ किस जगह खेलूं ये बहुत बड़ी समस्या आ गई। आप हँस रहे है ? कह रहें होंगे की भाई घर है, वहीं खेलो, सड़क है वहां खेलो इतना सोचने की क्या बात है। हूम... यहाँ अपने देश जैसी बात है कहाँ दोस्तों, घर के बाहर खेला तो शिकायत होगी और जो लीजिंग ऑफिस के लोग हंै न वो जुर्माना कर देंगे। होली के दिन फटका (चूना) लग जायेगा। ...और घर के अंदर खेलें तो कार्पेट गंदा होगा और उसकी सफाई ख़ुद से तो होगी नहीं किसी को बुलाना होगा और उसके लिए देने होंगे आपनी गाढ़ी कमाई के कीमती डॉलर... तो क्या किया जाए ...। फिर नजर गई रेस्टरूम पर यानी की बाथरूम पर। बस फिर क्या था हम घुस गए बाथटब में । खूब रंग लगाया एक दूसरे को। बच्चों को भी मजा आया, क्योंकि आज के दिन तो अपने घर पर माँ खुद घर को गंदा करने को कहती थी। खूब रंग उछाला गया। थोड़ा डर तब भी था दीवारों का। उसके बाद बाथ टब में पानी भरा गया उसमें रंग डाला गया और उसमें डुबकी लगाई गई। मेरी बेटी तो बहुत खुश थी। कहती है की आइ लाइक कलर बाथ... तो कलर बाथ के बाद साफ पानी से नहाकर सभी बाहर आ गये....और ऐसे हुई हमारी बाथ टब की होली...।
पर एक बात बताऊँ जब अपने देश भारत में रंग खेलते थे तो बाद में बहुत नींद आती थी उसी तरह से बाथ टब होली के बाद भी खूब नींद आई। दोस्तों यदि आपके पास अपना घर है तो आप बैक यार्ड में होली खेल सकते हैं, पर नहाना भी वहीं पड़ेगा क्योंकि रंग में भीगे हुए आप घर के अंदर नहीं जा सकते वरना कार्पेट खराब होगा। तो अच्छा है की मेरी तरह बाथ टब की होली खेल कर ही होली का भरपूर मजा लिया जाए... जानते हंै, मैं चाहती थी कि होली की मस्ती को बस यहीं पर खत्म करके आराम करूँ। मगर इसके आगे तो और भी बहुत कुछ था... शाम को घर पर एक छोटी-सी पार्टी रखी थी। खाना तो पहले से ही बना लिया था। पूड़ी- कचौरी तलनी थी। पर भइया यहाँ का घर है तलने से पहले बहुत इंतजाम करने पड़ते हंै -खिड़की खोलो महक सोखने वाली मोमबत्ती जलाओ, तब जाकर तलो वरना आने वालों को परेशानी होगी, और आपके घर में खाने की खुशबू भर जायेगी। सब हो गया लोग आ गये। हँसी ठहाकों के साथ गपशप करते करते थोड़ी रात हुई तो हमको अपनी आवाज धीमी करना पड़ी, क्योंकि पड़ोसियों तक हमारी आवाज नहीं पहुँचना चाहिए.... क्या अपने देश में हम कभी ऐसा सोचते हैं कि पड़ोस में रहने वाले को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए... हम तो अपने घर के मालिक होते हैं जितनी मर्जी होगी उतना शोर मचाएंगे। और तो और लाउड स्पीकर लगा कर शोर मचाएंगे। किसी की परीक्षा है या कोई बीमार है, हमारी बला से खाना खाने के बाद मंैने घर आए सभी मेहमानों का मजाकिया टाइटिल देकर उनका खूब मजाक उड़ाया और जाते- जाते सबको एक टीका लगाकर कहा बुरा न मानो होली है... तो ऐसी रही भारत से हजारों किलोमीटर दूर अमरीका के डलस शहर की होली.....कभी आपका भी होली खेलने का मूड हो तो आ जाइये... अगली होली पर...

संपर्क: डलस, यू एस ए ,Email- rach_anvi@yahoo.com

2 Comments:

KAHI UNKAHI said...

परदेश जा कर अपने देश की छोटी-छोटी चीजें, चाहे वह अच्छी हो या बुरी, कितना याद आती है, यह रचना जी की इन यादों को पढ़ कर साफ़ पता चलता है...। इन प्यारी खुशनुमा यादों को हमारे साथ बाँटने के लिए रचना जी का आभार और बधाई भी कि आखिरकार वे होली खेल तो पाई...।

ऋता शेखर मधु said...

वाह!हमें तो पढ़कर बहुत मजा आया...बाल्टी से रंग नहीं डाली गई...बाथ टब में होली खेली गई|भई, कुछ तो हुआ.

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