June 05, 2010

'लैला' ओ लैला कैसी तू लैला...

हिन्दी फिल्म का यह बहुचर्चित गीत लैला ओ लैला कैसी तू लैला हर कोई चाहे तुझसे मिलना अकेला... आज भी बड़े चाव से सुना जाता है। पर पिछले दिनों आने वाले लैला नाम के तूफान से तो चारो तरफ खौफ का वातावरण छा गया था, उससे मिलने की चाहत करना तो दूर की बात नाम सुनकर लोग खौफ खाने लगे थे।
भले ही पिछले दिनों आने वाले इस भयानक तूफान लैला के कमजोर पडऩे से सबकी सांस में सांस आ गई थी और एक भयानक तबाही से हम बच गए थे। पर एक सवाल तो आपके मन में भी आता होगा कि आने वाले इन तूफानों के इस तरह खूबसूरत नाम आखिर किस आधार पर रखे जाते हैं?
दरअसल 'तूफानों की आसानी से पहचान करने और इसके तंत्र का विश्लेषण करने के लिए मौसम वैज्ञानिकों ने उनके नाम रखने की परंपरा शुरू की है। अब तूफानों के नाम विश्व मौसम संगठन द्वारा तैयार प्रक्रिया के अनुसार रखे जाते हैं।' गौरतलब है कि बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के ऊपर बनने वाले तूफानों के नाम 2004 से रखे जाने लगे हैं। विश्व मौसम संगठन ने आईएमडी को हिन्द महासागर में आने वाले तूफानों पर नजर रखने और उसका नाम रखने की जिम्मेदारी सौंपी है।'
इसी परंपरा के तहत लैला का भी नाम पड़ा। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार 'लैला का नाम पाकिस्तान ने भारतीय मौसम विभाग को सुझाया है। फारसी में लैला का मतलब काले बालों वाली सुंदरी या रात होता है।
क्षेत्रीय विशेषीकृत मौसम केंद्र होने की वजह से आईएमडी भारत के अलावा 7 अन्य देशों बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, थाइलैंड तथा श्रीलंका को मौसम संबंधी परामर्श जारी करता है। 'आईएमडी ने इन देशों से साल दर साल हिंद महासागर और अरब सागर में आने वाले तूफानों के लिए नाम की लिस्ट मांगी थी। इन देशों ने अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम के अनुसार नामों की एक लंबी लिस्ट आईएमडी को दी है। अब तक ये देश तूफानों की पहचान करने के लिए 64 नाम दे चुके हैं, जिसमें से 22 का उपयोग हो चुका है।' इसी लिस्ट के हिसाब से हिंद महासागर में आने वाले तूफान का नाम 'लैला' रखा गया । आपको यह भी बता दें कि अब जब अगला तूफान आएगा तो उसका नाम होगा- बांदू। यह नाम श्रीलंका ने सुझाया है।
गौरतलब है कि अमेरिका में तूफानों को नाम देने की प्रक्रिया 1953 में शुरू हुई थी।
मोरीस वेस्ट के जीवन का सार
संपूर्ण मानव बनने में सब कुछ लगा देना पड़ता है। इसलिए बहुत ही कम मनुष्य ऐसे होते हैं जिनमें इतना कुछ करने का प्रबोध या साहस हो?... सुरक्षा की तलाश को एकदम छोड़कर, मनुष्य को दोनों बाहें फैला कर जीवन के जोखिम को अपना लेना पड़ता है। मनुष्य को पीड़ा के अस्तित्व को अनिवार्य अंग के रूप में स्वीकार कर लेना होता है। शक और अंधकार को ज्ञान पाने का भुगतान मानना पड़ता है। संघर्ष में दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ- साथ जिंदगी और मौत के हर नतीजे को भी बेहिचक तुरंत स्वीकार करने की क्षमता भी चाहिए होती है।

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