August 20, 2009

जहां छात्र वाइन बनाना सीखते हैं

जहां छात्र वाइन  बनाना सीखते हैं
जब बात स्कूल में पढ़ाए जाने वाले पसंदीदा विषयों की होती है तो कौन सी बात दिमाग में आती है। गणित विज्ञान, भाषा या फिर कुछ और। लेकिन जर्मनी के लाउखा जिमनेशियम स्कूल में छात्रों का पसंदीदा विषय है वाइन बनाना। जहां वाइन बनाने को एक विषय के तौर पर 1997 से पढ़ाया जा रहा है। यहां वाइन बनाने के लिए छात्रों को अंगूर की खेती के लिए तैयारियां करनी होती हैं। उन्हें अंगूर की बेलों की छंटाई और मैदान की घास साफ करनी पड़ती है। अंगूर की खेती अप्रैल और सितंबर के बीच होती है। जिस अंगूर के खेत में लाउखा स्कूल के बच्चे काम करते हैं, वह असल में फ्राइबुर्ग नाम के एक छोटे से क़स्बे के एक होटल का है। वाइन बनाने की यहां सैंकड़ों साल पुरानी परंपरा रही है। इसी बात ने प्रभावित किया हांस पेटर क्नोप्से को जो कभी रसायन विज्ञान पढ़ाया करते थे। उन्होंने ही 1997 में इस स्कूल में वाइन बनाने को विषय के तौर पर पढ़ाने की शुरुआत की। वह कहते हैं, 'अगर आपका संबंध ऐसे ऐतिहासिक और पुराने इलाक़े से है तो आपको वाइन बनाने के बारे में पता होना चाहिए।' इस विषय को नौंवी क्लास में लिया जा सकता है और 10 वीं की पढ़ाई पूरी होने तक तो यह अनिवार्य ही है। इस तरह का अनोखा विषय न सिर्फ छात्रों के लिए एक चुनौती होता है बल्कि क्लास टीचर बेटिना वार्नर को भी पढ़ाने से पहले खासी तैयारी करनी पड़ती है। वह बताती हैं, 'मुझे जीवविज्ञान से जुड़ी उन बहुत सारी बातों के बारे में भी पढऩा पड़ा जिन्हें पहले मैं बिल्कुल नहीं जानती थी। अंगूर की बेल की कैसे कांटछांट होती है, किस तरह वह पैदा होती है और कैसे उसकी देखभाल करनी होती है। मुझे अंगूर और वाइन के रासायनिक तत्वों के बारे में भी पढऩा पड़ा। मुझे इसमें अच्छा खासा समय लगाना पड़ा।' रसायन विज्ञान के अलावा जो विषय वाइन बनाने से जुड़ा हुआ है वह है अर्थशास्त्र। दरअसल 11वीं क्लास में अर्थशास्त्र पढऩे वाले छात्रों को साल भर का एक प्रोजेक्ट कराया जाता है जिसमें वाइन की मार्केटिंग और इसके प्रचार से जुड़े पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है। इस प्रोजेक्ट की बदौलत ही इस बार जो रेड वाइन बनी है वह सिर्फ छात्रों के पैदा किए अंगूरों से बनी है। पिछले सालों की तरह इलाक़े के दूसरे किसानों के अंगूर शामिल नहीं हैं। इसीलिए अर्थशास्त्र की क्लास ने वाइन का नाम और इसकी बोतल का डिजाइन भी खुद ही तय किया है। इसका नाम उन्हीं क्नोप्से के नाम पर रखा गया है जिन्होंने वाइन को एक विषय के तौर पर पढ़ाना शुरू किया। क्नोप्से लीबलिंग यानी क्नोप्से की डार्लिंग। इस उत्साह का नतीजा है कि इस स्कूल में पढऩे वाले कुछ छात्रों ने आगे वाइन की पढ़ाई की या फिर इसी क्षेत्र में अपना करियर बनाया। इस बीच स्कूल के मौजूदा छात्र इस बात से खुश है कि स्थानीय लोग उनकी बनाई वाइन से खुश हैं। 
बीटे दूसरी बार मां बने 
महिलाओं के लिए यह राहत की बात है कि अब मां बनने का कष्ट सिर्फ स्त्रियों के हिस्से में नहीं आएगा। पुरुषों द्वारा मां बनने की शुरुआत हो चुकी है। अमेरिकी नागरिक थॉमस बीटे ने पिछले वर्ष एक बच्ची को जन्म देकर पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं। 35 वर्षीय बीटे ने पिछले दिनों ओरिगन के बेंड में अब अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया है जो बेटा है। इस तरह उन्हें दो बार मां बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बीटे की पत्नी नैंसी दोनों बच्चों की देखभाल करेंगी। दरअसल बीटे एक महिला थे लेकिन बाद में उन्होंने अपना लिंग परिवर्तित करा लिया। जब उन्हें पता चला कि उनकी पत्नी नैंसी मां नहीं बन सकती तो उन्होंने खुद मां बनने का फैसला किया। पिछले साल बीटे मां बने थे तो उनकी दाड़ी वाली तस्वीरें एक सनसनी बन गई थीं।

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष