Friday, August 29, 2008

कृषि

खुशहाली के इंतजार में धान का कटोरा
- चन्द्रशेखर साहू
केन्द्र के फैसले के मुताबिक एक नवंबर 1957 को अस्तित्व में आए मध्यप्रदेश से 'छत्तीसगढ़ नवंबर 2000 को अलग हो गया। आठ बरस बीत गए। कई प्रकार के प्रश्न मन में कौंध रहे हैं कि यदि अब भी छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ वासियों की समस्याओं को मूल रूप से समझा न गया और वर्षों से छत्तीसगढ़ में अभाव में जीने वालों की पीड़ाओं के निराकरण को प्राथमिकता न दी गयी, तो छत्तीसगढ़ राज्य बनाने का औचित्य जिन उद्देश्यों को लेकर किया गया है क्या वह पूरा हो पायेगा? ऐसे कितने यह प्रश्न है जो इस नये राज्य के अस्तित्व में आने के बाद भी अनुत्तरित हैं। क्या हम अब भी इन प्रश्नों के उत्तर तलाशेंगे, ताकि यहां के अवरूद्ध विकास की गति उन्मुक्त होने के साथ-साथ नक्सलवाद की विभिषिका का भी सामाजिक समाधान अपने-आप हो जाये।

दरअसल प्रश्न यह है कि छत्तीसगढ़ राज्य में खुशहाली किसके लिए चाहिए? उनके लिए जो केवल छत्तीसगढ़ के नाम पर दिखावा व कुछ भी खेल करते हैं और सदैव सत्ता की चाशनी में डूबे हुए हैं। अथवा वे जो वन क्षेत्र व दुर्गम इलाकों में रहते हुए विकास के पथ से कोसों दूर हैं। वास्तव में इनके लिए ही तो चाहिए खुशहाली। मौजूदा छत्तीसगढ़ के चित्र में अकाल, बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी और पलायन ही लोगों की नियति से जुड़ हुए हैं। राज्य में विकास का एजेन्डा तय करते समय इन सब बिन्दुओं को केन्द्र में क्यों नहीं रखा जाता? यह चर्चा इसलिए भी जरुरी है कि बरस- दर- बरस राज्य बनने के जश्न और सरकार बनाने की आपाधापी में ऐसी वास्तविकताओं का दरकिनार होना नितांत संभव है। छत्तीसगढ़ विविध प्रकार के वन, जल, जीवजंतु और खनिजों से ओतप्रोत अंचल है। जिसके बारे में कहा जाता है जमीन के भीतर तो अमीरी है पर जमीन के ऊपर गरीबी है। लगभग 1100 मिलीलीटर से लेकर 1700 मिलीलीटर के बीच वर्षा वाला यह क्षेत्र न केवल विविधताओं से भरा है बल्कि 207, 34 करोड़ घन मीटर प्रतिवर्ष वर्षा जल प्राप्त होने के बावजूद सूखे से ग्रसित है। यही बड़ी चुनौती राज्य के लिए सबसे पहली है। तभी तो अकाल मुक्त छत्तीसगढ़ की कल्पना साकार हो सकेगी।

'धान का कटोराÓ के रूप में देश के आर्थिक नक्शे में पहचाने जाने वाले छत्तीसगढ़ का कुल भौगोलिक क्षेत्र 14.4 मिलियन हेक्टेयर में फैला है इसी तरह आबादी भी एक करोड़ 96 लाख को पार करते हुए 2 करोड़ को छू रही है। यहां गांवों की संख्या 20 हजार है तो छोटे बड़े 95 नगरीय क्षेत्र हैं। छत्तीसगढ़ में कुल जनसंख्या के, करीब 40 फीसदी लोग आदिवासी व अनुसूचित जाति वर्ग के हैं। वैसे भारत के अलग आदिवासी संस्कृति वाले बस्तर में कुल आबादी के 63.3 तथा सरगुजा में 53.6 प्रतिशत आदिवासी निवास करते हैं जबकि संभागीय मुख्यालय वाले रायपुर और बिलासपुर सहित 12 जिलों में पिछड़े वर्ग की बहुलता है। समूचे छत्तीसगढ़ में कोई 51 फीसदी आबादी पिछड़े वर्गों की कहलाती है।

छत्तीसगढ़ अपने साल वनों के लिए जाना जाता है। कुल वन क्षेत्र 36 फीसदी हिस्से में साल वन आज भी विद्यमान हैं। दूसरा स्थान सागौन के वनों का है। इसके अलावा बांस साजा, सरई, बीजा, अर्जुन, शीशम तथा बबूल बहुतायत से हैं। इसी से वन उत्पादों में छत्तीसगढ़ इमारती लकड़ी के उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है। बस्तर की इमली पूरे दक्षिण भारत की आवश्यकता को बहुत हद तक आपूर्ति करता है। बीड़ी उद्योग में लगने वाला तेंदूपत्ता भी वन राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत है। इसी के साथ अन्य लघु वनोपज पर बड़ी तादाद में लोग आजीविका के लिए आश्रित रहते हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ के वन से बहुत से फायदे तो गिनाये जा सकते हैं किंतु यह कहना आसान नहीं कि राज्य बनने के इतने बरस बाद भी वन विनाश को रोकने और पर्यावरण को सुधारने के साथ बरसात को पुन: लौटाने का आश्वासन बनेगा।

कई योजनाकारों का मानना है कि छत्तीसगढ़ राज्य देश में खनिज राज्य के रूप में उभर सकता है क्योंकि यहां 1386 करोड़ टन कोयला, 180 टन लौह अयस्क, 60 करोड़ टन डोलोमाइट, 17 करोड़ टिन अयस्क, 4.1 करोड़ टन बाक्साइट और चुने के पत्थर (लाइमस्टोन) व ग्रेनाइट के असमित भंडार हैं। सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि वनवासी क्षेत्र मैनपुर-देवभोग में उच्च स्तर की हीरे की खदान हैं जिसके सर्वेक्षण व पूर्वेक्षण में कई बड़ी कंपनियों की दिलचस्पी है। यहीं पर विश्व प्रसिद्ध अलैक्टजेनराइट जैसा बहुमूल्य पत्थर मिलता है जिसकी तस्करी के रास्ते अभी बंद नहीं हुये हैं। अन्य कीमती खनिजों में सोने के अतिरिक्त कोरेन्डम, गारनेट, रुबी, मानिक आदि की उपलब्धता भी है। यहां तक की आणविक खनिजों का भी पर्याप्त भंडार होने की पुष्टिï हो चुकी है। सभी प्रकार के खनिजों के होने के बावजूद शासकों की तदबीर से यहां की तकदीर और तस्वीर को बदला क्यों नहीं गया? यह प्रश्न स्वाभाविक है। संभव है यही कारक छत्तीसगढ़ राज्य की आकांक्षा को बलवती बनाने में सहायक सिद्ध हुई हो। पर अब तो नीति-निर्धारकों और योजनाकारों को रेखांकित करना होगा की राज्य के विकास में इस प्रकार की खनिज संपदा का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं।

जल संपदा की दृष्टिï से छत्तीसगढ़ क्षेत्र में 30.44 लाख हेक्टेयर मीटर धरातलीय जल सतह पर उपलब्ध है। इसमें वर्षा जल का योगदान सर्वाधिक है। यानी कोई 20 मिलीयन हेक्टेयर वार्षिक बारिश का पानी इसमें शामिल है। उसका 25 फीसदी भाग भी उपयोग में नहीं आ रहा। भूमिगत उपलब्धता भी प्रतिवर्ष 60 लाख क्यूबिक मीटर है जिसका उपयोग 5-6 प्रतिशत ही हो पाता है। जबकि राष्‍ट्रीय औसत 23 प्रतिशत है। पश्चिम मध्यप्रदेश में 56.3 प्रतिशत भूमिगत जल का उपयोग हो रहा है।

एक आंकलन के अनुसार अकेले रायपुर जिले में नदी नालों की लंबाई 3 हजार कि.मी. है। अंचल की संजीवनी नदी महानदी के बहाव का अधिकांश क्षेत्र यहां है। इसकी अनेक सहायक नदियां हैं जैसे शिवनाथ, मांड, पैरी, हसदेव, सौंडूर, खारुन व जौंक, ये सब नदियां मिलकर महानदी को जीवनदायनी नदी में तब्दील करती हैं, फिर भी यहां की धरती प्यासी है। पीने के पानी के अभाव से हर साल लोग पीडि़त रहते हैं। ऐसे प्राकृतिक संपदा के होते हुए भी दूषित पानी से कितने लोग हर वर्ष काल कवलित होते हैं इसका हिसाब कौन देगा?

औद्योगिक तीर्थ भिलाई, कोरबा, जैसे स्थान छत्तीसगढ़ में स्थित हैं। सीमेंट उत्पादन का बहुत केन्द्र विकसित हो चुका है। देश के कुल उत्पादन का 20 फीसदी सीमेंट एक ही अंचल में होता है। बैलाडीला का लौह अयस्क जापान को आधुनिक तकनीकी राष्टï्र बनाने में पूरक सिद्ध हुआ है। बिजली का उत्पादन अकेले कोरबा में 2 हजार मैगावाट से अधिक है और विद्युत के अलावा जल विद्युत पैदा करने की संभावनाएं यहां काफी हैं। तब भी प्रति व्यक्ति विद्युत खपत सबसे कम छत्तीसगढ़ में है। मध्यप्रदेश के कुल 15 लाख पंप कनेक्शन में मात्र 1 लाख पंप कनेक्शन यहां है। उद्योगों की एक श्रृंखला खड़ी होने के बावजूद बेरोजगारी यहां की बड़ी ही विकराल समस्या है।

आखिरी छोर पर खड़े व अंधेरों से घिरे लोगों की आशंका यह है कहीं ऐसा न हो कि समृद्धि की दस्तक मात्र कुछ संपन्न जनों तक ही सिमटी रह जाये और छत्तीसगढ़ वासी अपने गांवों और वनों में दलित और उपेक्षित ही रह जाएं। उसे पता ही नहीं कि कब 36गढ़ राज्य बन गया है और उसका आलोक कुछ लोगों तक ही सिमट कर रह गया। जब तक आम जनों तक तेजी से छत्तीसगढ़ के नवनिर्माण का आलोक नहीं पहुंचता तब तक छत्तीसगढ़ की सार्थकता कैसे सिद्ध हो पाएगी?

यह सही है कि राजनीति और अफसरशाही का चरित्र बदलना कठिन है लेकिन अच्छे-बुरे लोग तो सभी क्षेत्रों में होते हैं। ऐसी दशा में नये ऊर्जावान लोग विकास का तानाबाना बुनें, यह सहज अपेक्षा पालना कोई अतिरेक नहीं। यही बिंदु इस अंचल के विकास की भावना लेकर कार्य करने वाले अधिकारियों, कर्मियों की नियुक्ति पर लागू करने की आवश्यकता है क्योंकि राजनीतिकबाज अपना उल्लू सीधा करने के लिए कोई भी मुद्दा उछाल सकते हैं। अत: ऐसे तत्व न पनपने पाएं यह सावधानी रखना लाजमी होगा। छत्तीसगढ़ की भूमि रत्नगर्भा है। ईब व अन्य नदियों के रेत में सोने के कण हैं तो देवभोग-मैनपुर की एक लंबी पट्टी अपने में बेशकीमती हीरों को समेटे हुए है। अपार जल राशि और पर्याप्त जनशक्ति, विकास की धुरी बन सकता है। इसलिए प्राथमिकताओं का निर्धारण करते समय यह गौर करना सामयिक होगा कि पंजाब और हरियाणा में हरितक्रांति से स्वत: स्फूर्त होकर औद्योगिक क्रांति जिस प्रकार फलित हो सकी, वैसा यहां भी हो सके छत्तीसगढ़ की संस्कृति मौलिक होने के साथ विशिष्ट है। यहां हर प्रकार के औपचरिक संबंधों का महत्व है। गोवर्धन, महाप्रसाद, गंगाजल, भोजली, मितान जैसे अटूट संबंध एक बार बनने के बाद आजीवन बने रहते हैं।

समरसता, सौहार्द, सरलता यहां सर्वत्र व्याप्त है, केवल सजगता इस बात की चाहिए कि कहीं राजनीति के घोड़े बेलगाम दौड़ते हुए छत्तीसगढ़ की प्रगति को अवरुद्ध न कर दें।

1 Comment:

Priyanka said...

Good articles.Keep it up.

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