December 18, 2015

अनकही

 समाज का दर्पण... 
- डॉ. रत्ना वर्मा
 मासिक पत्रिका उदंती का प्रकाशन 2008 अगस्त में जब प्रारंभ किया गया था तब इसकी विषयवस्तु की रूपरेखा बनाते समय उदंती को सामाजिक सरोकारों की एक विचारवान् पत्रिका के रूप में सामने लाया गया, जिसमें समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों के साथ मानव जीवन को प्रभावित करने वाले रोजमर्रा के विषयों को प्रमुखता से शामिल किया गया। कला, संस्कृति, पर्यटन, पर्यावरण, जैसे विषयों को मुख्य विषय बनाकर उदंती की शानदार शुरूआत हुई थी। उदंती की पहचान जब छत्तीसगढ़ से बाहर दूसरे प्रदेशों और और देश के विभिन्न हिस्सों में बनने लगीतब उदंती के पाठकों के साथ साहित्य से जुड़े मित्रों ने आग्रह किया कि साहित्य भी समाज का ही हिस्सा है और इसमें साहित्य की प्रमुख विधाओं के लिए भी कुछ जगह होना चाहिए। विचार करने पर पाया गया कि बात बिल्कुल सही है जब साहित्य को समाज का दर्पण माना गया है, तो उदंती को इस दर्पण से विमुख कैसे रखा जा सकता है। बस फिर क्या था धीरे-धीरे उदंती में साहित्य की विभिन्न विधाओं यथा कहानी, कविता, गीत ग़ज़ल के साथ व्यंग्य,लघुकथाओं का भी समावेश किया जाने लगा। इस परिवर्तन की अच्छी प्रतिक्रिया भी मिली, इस तरह उंदती को एक सम्पूर्ण पत्रिका का दर्जा मिल गया।
जैसा कि आप सब जानते ही हैं उदंती अपने प्रकाशन के प्रारंभ से ही वेब www.udanti.com पर भी नियमित रूप से प्रकाशित हो रही है ; जिसका परिणाम यह है कि उदंती ने हिन्दी के क्षेत्र में काम करने वाले और हिन्दी साहित्य में अपनी पहचान बना चुके न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में रहने वाले हिन्दी के साहित्याकर और हिन्दी के पाठकों ने उदंती को सराहा और हर बार कुछ नया, कुछ विशेष करने के लिए प्रोत्साहित किया।
इसी के साथ उदंती के अंकों में समय- समय पर विभिन्न विषयों पर विशेष स्तंभ और विशेष अंक देने की शुरूआत भी हुई। पर्व त्योहारों में दीपावली, होली आदि के समय विशेष अंक तो प्रकाशित होते ही रहे हैं, साथ में पर्यावरण, प्रदूषण, लोक कला, संस्कृति, परम्परा को लेकर भी कई अंक संयोजित किए गए।  इस बीच साहित्य के कुछ विशेष स्तंभ और अंक भी प्रकाशित हुए जैसे कालजयी कहानियों का स्थंभ, 21वीं सदी के व्यंग्यकार स्तभ, और बाल साहित्य पर विशेष अंक। इन अंकों को विशेष सराहना मिली। उदंती के अंकों के लिए वैविध्यपूर्ण रचनाओं के चयन में भिन्न- भिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने हमेशा ही आगे बढ़कर सहयोग किया है, सबकी आभारी हूँ और विश्वास है आगे भी उनका सहयोग और साथ बना रहेगा।
हमारे देश में कहानीकारों की एक लम्बी सूची है ,जिनमें से कुछ प्रसिद्ध कहानियों  को उदंती के प्रत्येक अंक में सँजोने का प्रयास किया था। विगत सौ वर्षों की बेहद लोकप्रिय एवं ऐतिहासिक महत्त्व की कहानियों में से कुछ का चुनाव बहुत कठिन है; अत: ऐसी कहानियों को चुनने का प्रयास किया; जिनका महत्त्व सब स्वीकारते हैं। सन् 2010 में  हिन्दी की यादगार कहानी के अंतर्गत कुछ प्रसिद्ध कहानियों का सिलसिलेवार प्रकाशन हुआ, जिसका संयोजन छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ कहानीकार डॉ. परदेसी राम वर्मा ने किया।  इस स्तंभ में उन्होंने देश के15 प्रसिद्ध कथाकारों की कहानियों का चयन किया था।  उदंती के इस छोटे से अंक में सभी 15 कहानियों को समेटना तो मुश्किल है ; अत: शेष बची कहानियों को आगामी किसी अंक में देने का प्रयास किया जाएगा।
प्रत्येक कहानीकार अपनी कहानी में अपने देश काल और समय के अनुसार समाज के किसी न किसी पक्ष को छूता है। इस अंक में शामिल प्रत्येक कहानी भी अपने समय को तो दर्शाती ही हैं, आज भी उनकी प्रासंगिता कम नहीं हुई है।  आशा है पाठकों को हमारा यह प्रयास भी पसंद आएगा।                                                

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लेखकों से... उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।
माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। माटी संस्था कई वर्षों से बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से उक्त गुरूकुल के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (U.K.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर, रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी, रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से स्कूल जाने में असमर्थ बच्चे शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होंगे ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेंगे। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ.ग.) मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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