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Jan 1, 2026

उदंती.com, जनवरी - 2026

वर्ष -18, अंक -6

मुदित नया साल

ओस भीगी धरा, किरनों के पाँव

उतरा है सूरज, अपने इस गाँव।

पत्तों से छनकर, आई है धूप

निखरा है प्यारा, धरती का रूप।

शरमाती कलियाँ, मुस्काते फूल

बाट में बिछाए, घास के दुकूल।

तरुवर पर पाखी, देते हैं ताल

द्वार पर खड़ा है, मुदित नया साल। 

                  - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

इस अंक में 

अनकहीः बौद्धिक स्वतंत्रता अभी बाकी है... - डॉ. रत्ना वर्मा

आलेखः वंदे मातरम् की गौरव गाथा  - प्रमोद भार्गव

प्रकृतिः आते हैं नभ से जल के मेहमान - रविन्द्र गिन्नौरे

दोहेः सूरज आने को हुआ - हरेराम समीप

संस्मरणः अयोध्या से वाराणसी - उमंग और ऊर्जा भरते घाट - सुदर्शन रत्नाकर

यादेंः नव वर्ष - एक उत्सव वाला दिन - डॉ. जेन्नी शबनम

आलेखः शोर में डूबता जीवन : हेडफोन की आदत... - संध्या राजपुरोहित

लघुकथाः चिप - मीनू खरे

व्यंग्यः नये साल में लालबुझक्कड़ फिर मिल गए - गिरीश पंकज

व्यंग्यः शुभकामनाओं की दहशत - विनोद साव

लघुकथाएँः 1. सफाई, 2. लीडर - अनुवाद: सुकेश साहनी

लघुकथाः दुर्गंध - सुकेश साहनी

कविताः परिवार : सात कविताएँ - जयप्रकाश मानस

कहानीः बोझ - डॉ. योगिता जोशी

लघुकथाः खुशफहमी -  हसन जमाल

किताबेंः छंद विधान एवं सृजन - डॉ . कविता भट्ट

कविताः बचपन -  प्रगति गुप्ता

प्रेरकः पेंसिल का संदेश

अनकहीः बौद्धिक स्वतंत्रता अभी बाकी है ...

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

पिछले दिनों एक्सप्रेस समूह के संस्थापक रामनाथ गोयनका की स्मृति में दिए गए अपने व्याख्यान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि ‘भारत की शैक्षिक और सांस्कृतिक नींव को खोखला करने के लिए मैकाले द्वारा किए गए अपराध को 2035 में 200 वर्ष पूरे हो जाएँगे, अतएव आने वाले दस सालों में गुलामी की इस औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने के राष्ट्रीय संकल्प की जरूरत है।’ उनके इस कथन को केवल राजनीतिक वक्तव्य की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, बल्कि  हम देशवासियों के लिए यह चिंतन और विचार करने का समय है, कि क्या हम इस मानसिक गुलामी में ही जीते रहना चाहते हैं या कि अपनी संस्कृति अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते हैं। 

यह तो आप सब जानते ही हैं कि मैकाले की शिक्षा का उद्देश्य एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना था, जो अपने ही अतीत को पिछड़ा, अपनी भाषा को हीन और अपनी संस्कृति को अवैज्ञानिक समझने लगे। हुआ भी वही, इस शिक्षा प्रणाली ने हमें रोजगार तो दिया, हम कुशल कर्मचारी तो बन गए; लेकिन सजग नागरिक नहीं बन सके। परिणामस्वरूप, हमने ज्ञान को केवल नौकरी, रोजगार और पैसा कमाने का जरिया माना; लेकिन इसके साथ ही अपने ही जीवन-मूल्यों को कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया। यही वजह है कि आज हम तकनीकी रूप से तो बहुत आगे निकल गए  हैं; लेकिन सामाजिक रूप से असंवेदनशील बन गए हैं। हम वैश्विक बाज़ार के लिए तो तैयार हैं; लेकिन अपने समाज की समस्याओं के प्रति उदासीन हैं। यह सब उसी शिक्षा का परिणाम है, जो हमें अपने परिवेश से काट देती है।

मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने सबसे गहरा आघात हमारी भाषाओं पर किया। अंग्रेज़ी बोलना प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया और  अपनी ही मातृभाषा को बोलने में झिझक महसूस होने लगी। हम अपने बच्चों को गर्व से कहते हैं- अंग्रेज़ी बोलो; लेकिन  यह कभी नहीं कहते- अपनी भाषा को जानो। नतीजा यह हुआ कि नई पीढ़ी अपने साहित्य, लोककलाओं, दर्शन और इतिहास से कटती चली गई। भाषा के साथ ही सांस्कृतिक स्मृति भी धूमिल होती गई। इतना ही नहीं मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने धर्म को अंधविश्वास और संस्कृति को रूढ़ि के रूप में प्रस्तुत किया। परिणामस्वरूप, हमने अपने पर्व, उत्सव, परंपराएँ और जीवन-पद्धति को पुराना और ग़ैर-आधुनिक मान लिया। पश्चिमी जीवनशैली की नकल को ही  प्रगति समझ लिया। 

विडंबना यह है कि जिन समाजों की नकल हम कर रहे हैं, वे तो अपने सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने में हमसे कहीं अधिक जागरूक और सजग हो गए हैं, जबकि हम अपने ही संस्कारों को बोझ समझने लगे। आप किसी भी दूसरे देश में चले जाइए, वहाँ पहले अपनी ही भाषा में बातचीत की जाती है। जब सामने वाला नहीं समझता तब या तो दुभाषिए की मदद ली जाती है या फिर यदि उन्हें अंग्रेजी आती है, तो वे टूटी फूटी अंग्रेजी से काम चलाते हैं; लेकिन उन्हें कभी इसकी वजह से हीनता का आभास नहीं होता; पर हमारे यहाँ यदि हम अंग्रेजी नहीं जानते तो हम हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं। इतना ही नहीं राजनीतिक मंचों पर भी वे अपनी ही भाषा में वक्तव्य देंगे, दुभाषिया ही उनकी सहायता करते है; लेकिन हम अपनी बोली भाषा को बोलने में छोटा महसूस करते हैं मानो हमसे कोई अपराध हो गया हो।

भले ही हमने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली हो; पर आज भी मानसिक रूप से गुलाम बने हुए हैं। हमारी सोच तो अब भी उधार की ही है। हम अपने ही परखे और माने हुए  ज्ञान पर संदेह करते हैं और विदेशी मान्यताओं को सहज स्वीकार कर लेते हैं। यह  एक प्रकार की गुलामी ही तो है। यह गुलामी तब और गहरी हो जाती है, जब हम अपने बच्चों को भी वही मानसिकता सौंप देते हैं। बिना प्रश्न किए वही पाठ्यक्रम, वही मूल्य और वही दृष्टिकोण आगे बढ़ते रहता है।

अब प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी शिक्षा की दिशा बदलने के लिए तैयार हैं? क्या हम ज्ञान को रोजगार से आगे जीवन-दृष्टि से जोड़ना चाहते हैं? नई शिक्षा नीति इस दिशा में एक प्रयास है; लेकिन नीति से अधिक जरूरी है मानसिक परिवर्तन। जब तक शिक्षक, अभिभावक और समाज मिलकर यह स्वीकार नहीं करेंगे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार और पैसे कमाना नहीं, चरित्र निर्माण भी है, तब तक परिवर्तन अधूरा रहेगा।

अतः हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो आधुनिक हो; लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी हो। जो विज्ञान और तकनीक सिखाए; लेकिन साथ ही दर्शन, साहित्य और नैतिकता भी, जो वैश्विक दृष्टि दे; लेकिन स्थानीय चेतना को मिटाए नहीं। भारतीय ज्ञान, परंपरा, उपनिषद, बौद्ध दर्शन, भक्ति आंदोलन, लोक साहित्य, ये सब केवल अतीत नहीं, बल्कि आज भी प्रासंगिक जीवन-दृष्टियाँ हैं। इन्हें शिक्षा का हिस्सा बनाना पिछड़ापन नहीं, आत्मसम्मान है।

राजनीतिक स्वतंत्रता तो हमने प्राप्त कर ली; लेकिन बौद्धिक स्वतंत्रता अभी पानी बाकी है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली को समाप्त करने का अर्थ पाठ्यक्रम बदलना नही; बल्कि सोच बदलना है। प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया यह आह्वान हमें याद दिलाता है कि आने वाले दस वर्ष केवल विकास के नहीं, आत्म- निर्माण का होना चाहिए। यदि हम सचमुच मानसिक गुलामी से मुक्त होना चाहते हैं, तो हमें अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और ज्ञान परंपरा को हेय नहीं, गौरव का विषय बनाना होगा; क्योंकि जो समाज अपने अतीत से कट जाता है, उसका भविष्य भी उज्ज्वल नहीं हो सकता।

आलेखः वंदे मातरम् की गौरव गाथा

- प्रमोद भार्गव

वंदे मातरम् को भारत की शाश्वत संकल्पना बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर वर्ष भर चलने वाले स्मरणोत्सव का शुभारंभ विशेष डाक टिकट और सिक्के के विमोचन के साथ किया। प्रधानमंत्री ने वंदे मातरम् की गौरव गाथा को विभिन्न उपमाओं- अलंकरणों से स्पंदन देते हुए इससे जुड़े इतिहास के एक काले पन्ने को खोलने के साथ कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की विभाजन कारी मानसिकता का खुलासा किया। उन्होंने कहा कि ‘आजादी की लड़ाई में वंदे मातरम् की भावना ने पूरे राष्ट्र को प्रकाशित किया था, लेकिन दुर्भाग्य से 1937 में इस गीत के महत्त्वपूर्ण पदों को उसकी आत्मा के एक हिस्से को अलग कर दिया गया था। जिस भाव से वंदे मातरम् के टुकड़े किए गए थे, कालांतर में उसी भाव ने विभाजन के बीज बो दिए थे।’ अतीत में इस गीत की मूल रचना के साथ जो भी खिलवाड़ किया गया हो, किंतु यह सच्चाई है कि आजादी की लड़ाई में इस गीत की अहम भूमिका रही है।    


बंकिम चंद्र चटर्जी के बांग्ला भाषा में लिखे उपन्यास ‘आनंद मठ’ से राष्ट्रगीत के रुप में स्वीकारा गया यह गीत कोई मामूली गीत नहीं है। भारत को उसकी व्यापक राष्ट्रीयता की पहचान और स्वाभिमान इसी गीत से प्राप्त हुए। नागरिक सभ्यता की विरासत, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानव सेवा के मूल्यों के उत्स इसी गीत के समवेत स्वर की उपज हैं। अंग्रेजों के विरुद्ध भिन्न जातीय और धर्म-समुदायों को संगठित करने के अभियान में इसी गीत की भूमिका बुलंद थी। तय है, वंदे मातरम् क्रांति के स्वरों में नींव का पत्थर था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की रक्त धमनियों में विद्रोह की उग्र भावना इसी गीत की देन है। 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन को देशव्यापी धरातल इसी गीत के बूते मिला था। और वह यही आंदोलन था, जिसमें गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज के फौजियों ने भी इसी गीत को गाते हुए मातृभूमि की बलिवेदी पर प्राण न्यौछावर किए। 

14 अगस्त 1947 की मध्य-रात्रि में जब देश आजाद हो रहा था, तब इस मंत्र-गीत का गायन श्रीमती सुचेता कृपलानी ने किया और वहाँ उपस्थित लोग इस गीत के सम्मान में गीत खत्म न हो जाने तक खड़े रहे। 15 अगस्त 1947 को जब स्वतंत्रता का सूर्योदय हो रहा था, तब आकाशवाणी पर पंडित ओंकार नाथ ठाकुर ने इसे बड़े ही रोचक ढंग से गाया। आखिरकार 24 अगस्त 1948 को जन-गण-मन के साथ इस गीत को भी राष्ट्र गीत की प्रतिष्ठा मिली। लेखक और दार्शनिक युगद्रष्टा होते हैं, इसलिए बंकिम बाबू ने इस गीत को लिखे जाने के वक्त ही अपनी दिव्य-दृष्टि से अनुभव कर लिया था कि यह गीत राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनकर लोकप्रियता के शिखर चूमेगा; इसीलिए उन्होंने इसे बांग्ला भाषा में न लिखते हुए संस्कृत में लिखा। मूल और संपूर्ण गीत की केवल नौ पंक्तियाँ बांग्ला में हैं। इस गीत का जो संपादित अंश राष्ट्र गीत के रूप में स्वीकार किया गया है, वह केवल आठ पंक्तियों का है।

वंदे मातरम् को इस्लाम विरोधी जताया जाता रहा है। जब कांग्रेस ने इसे प्रार्थना गीत के रूप में स्वीकार किया था, तब भी इसका विरोध हुआ था। 1937 में कांग्रेस कार्यकारिणी ने आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इसमें मौलाना आजाद, पंडित नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस जैसे प्रखर संस्कृति मर्मज्ञ सदस्य थे। समिति को जिम्मेदारी सौंपी गई थी कि वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर से विचार-विमर्श कर वंदे मातरम् के संबंध में दो टूक सलाह दें। समिति द्वारा रवीन्द्रनाथ से परामर्श के बाद जो प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया, उसके उपरांत कांग्रेस कार्यकारिणी ने फैसला लिया कि हरेक राष्ट्रीय व सार्वजनिक सभा में वंदे मातरम् के केवल दो पद गाए जाएँ। ऐसे अवसरों पर भारत विभाजन के जनक मोहम्मद अली जिन्ना भी इस गीत को आदर के साथ खड़े होकर गाया करते थे। तय है, गीत पर विवाद का समाधान स्वतंत्रता से पहले ही हो चुका था। 

बाद में देश -विभाजन के लिए जिम्मेदार मुस्लिम लीग के नेताओं ने जरूर वंदे मातरम् को बुतपरस्ती, अर्थात मूर्तिपूजा मानते हुए इसका विरोध किया। इस बहाने लीगियों ने अल्पसंख्यकों को खूब उकसाया। नतीजतन 1938 तक कांग्रेस के जो प्रमुख मुस्लिम नेता इस गीत की राष्ट्रीय गरिमा का ख्याल रखते चले आ रहे थे, वे भी दबी जुबान से इसका विरोध करने लगे। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप बहुसंख्यक हिंदू और सिख हठपूर्वक इस गीत की महिमा के बखान में लगे रहे। बाद में साझा सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के नजरिये से उर्दू के उदारवादी कवियों व राजनीतिकों ने वंदे मातरम् का अनुवाद ‘ऐ मादर, तुझे सलाम करता हूँ’ किया, अर्थात् हे माता, तुझे प्रणाम करता हूँ। मुल्क को गुलामी से आजाद कराने की इस इबादत में गलत क्या है? अरबी फारसी के अनेक कवियों ने भी देश को ‘माँ’ कहकर संबोधित किया है। लिहाजा राष्ट्र के प्रति अपनी भावनाओं व उद्गारों को प्रचलित रूपकों अथवा प्रतीकों में प्रकट करना मूर्तिपूजा या बुतपरस्ती कतई नहीं है। वंदे मातरम् एक मौलिक रचना है, इसकी व्याख्या धर्म नहीं, केवल साहित्य के संदर्भ में होनी चाहिए। इसे यदि कोई सांसद या विधायक इस्लाम विरोधी जताता है, तो उसका मकसद धर्म के बहाने राजनीतिक रोटियाँ सेंकना है, जो अलगाववादी राजनीति की संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक है।

खुद बंकिम चन्द्र ने लिखा है - ‘हिन्दू होने पर ही कोई अच्छा नहीं होता है, मुसलमान होने पर कोई बुरा नहीं होता और न ही मुसलमान होने पर कोई अच्छा होता है या हिन्दू होने पर कोई बुरा होता है। अच्छे बुरे दोनों जातियों में हैं। गोया, निर्वाचित चंद मुसलिम प्रतिनिधि इस्लाम के बहाने जिस राष्ट्रीयता का अपमान करते हैं, उसी राष्ट्रीयता के सम्मान में अन्य मुस्लिम प्रतिनिधि सुर में सुर मिलाते हैं। ऐसे ही चंद सिरफिरे मुस्लिमों ने आजाद हिंद फौज के नारे, ‘जय हिंद’ का भी विरोध किया था, जब दैनिक अखबार ‘डान’ ने वंदे मातरम् की आलोचना की तो महात्मा गांधी को कहना पड़ा, ‘वंदे मातरम् कोई धार्मिक नारा नहीं है, यह विशुद्ध राजनीतिक नारा है।’ यही नारा था, जिसने सोये हुए भारत को जगाने का काम करके, आजादी हासिल कराई थी।

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 9981061100

प्रकृतिः आते हैं नभ से जल के मेहमान

 - रविन्द्र गिन्नौरे 

    प्रवासी पक्षियों का आगमन बदलते मौसम की सूचना सुखद जलवायु के साथ होता है। हर बरस हजारों मील की यात्रा करके पक्षी भारत सहित दूसरे देशों में सर्दियों में इसलिए आते हैं कि यहाँ का मौसम उनके लिए अनुकूल है। ऐसे पक्षियों की मूल भूमि का तापमान काफी गिर जाता है, जहाँ उन्हें अपना भोजन जुटाने के साथ अनुकूल वातावरण नहीं मिलता। विश्व स्तर पर प्रवास करने वाले पक्षियों के अपने निर्दिष्ट स्थान हैं। नियमित रूप से साल दर साल पक्षी प्रवास कर अपना निवास बनाकर प्रजनन वहीं करते हैं जहाँ उनका भोजन भी उपलब्ध रहता है।

   सदियों से पक्षियों का प्रवास चल रहा है, जिसे मानव ने बहुत बाद में जाना। चार दशक पूर्व तक इन पक्षियों का शिकार काफी होता रहा। शिकार के कारण पक्षियों ने अपनी जगह भले बदली परंतु प्रवास करना नहीं छोड़ा। पक्षियों की संख्या में कमी जरूर होती थी, परंतु उस खतरनाक स्थिति में नहीं पहुँचती थी कि इनकी प्रजाति ही विलुप्त हो जाए। बढ़ते प्रदूषण के कारण पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ खतरे में पड़ गई हैं। बदलते मौसम और फसल चक्र में परिवर्तन के कारण प्रवासी पक्षी अपनी निर्धारित ठौर से भटकने को मजबूर हो गए हैं।

    तूफान और बाढ़ जैसी विभीषिका लगातार होने के कारण पक्षियों के प्रवास में बाधा पड़ती है। वैसे प्राकृतिक घटनाओं का आभास पक्षियों को पहले ही हो जाता है। ऐसे स्थिति में पक्षी तूफान के बाद, प्राकृतिक स्थिति निर्मित होते ही आ जाते हैं। 

      भारत में शरद ऋतु आते ही कुररी पक्षी (arctic tern) उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव के लिए उड़ान भरता है और वसंत आने पर प्रजनन करने अपने घर लौट आता है। यही कोई 35 हजार किलोमीटर की खतरों से भरी तूफानी यात्रा करके हर साल सफ़र करता है कुररी। आश्चर्य है कि कुररी पक्षी दो विपरीत ध्रुवों को जोड़ता है।

        सर्दियों के मौसम में खंजन भी आता है। तुलसी दास रामचरित मानस में लिखते हैं, 

'जानि सरद रितु खंजन आए, 

पाइ समय जनु सुकृत सुहाए।' 

           यह हमारे पुण्यों का सुफल है कि शरद ऋतु में खंजन आए। खंजन हर साल 5000 किलोमीटर दूर साइबेरिया, मंगोलिया आदि से हिमालय पार करके आते हैं। जो देश के जलाशयों को सुंदर तथा जीवंत बनाते हैं।

 खूबसूरत प्रवासी पक्षी-   रंग बिरंगे खूबसूरत अदा लिए तरह तरह के पक्षी नम भूमि में मनोरम दृश्य प्रस्तुत करते हैं। स्वेंसन बाज (Swainsons's hawk) उत्तर-पश्चिमी अमरीका से चल कर अर्जेंटाइना पहुँचते हैं। खंतिया हंसक (shoveller) यूरेसिया से भारत तथा अन्य देशों में प्रवास करते हैं। लाल वारिरंक (red knot) कनाडा के ध्रुवीय क्षेत्रों से दक्षिण अमेरिका के दक्षिण कोने पेटागोनिया तथा तियेरा दैल फ्यूएगो में प्रवास करते हैं। ये प्रवासी पक्षी अपनी ख़तरनाक यात्रा के दौरान भूमध्य रेखा क्षेत्र के सदाबहार वनों को पार करते हैं। किन्तु, वहाँ रुकते नहीं ? क्योंकि पक्षी अपने गृह क्षेत्रों के समान ही प्राकृत वास तथा आहार पाना चाहते हैं। इस लिए ही अलास्का जैसे शीत प्रधान क्षेत्र में ध्रुव कूजिनी (arctic warbler) भूमध्यरेखीय फिलीपींस जैसे ग्रीष्म वर्षा के क्षेत्र में प्रवास करती है।     

  आहार और आश्रय के लिए यात्रा पक्षियों के लिए मनोरंजन नहीं है। उनका प्रवास तो जीवन-मरण की यात्रा है। जो मौसम के अनुसार, आहार-शून्य होते प्रजनन क्षेत्र से पर्यावास के लिए साहसिक अभियान के साथ उड़ान भरते है। जब भी पक्षी के गृह क्षेत्र में आहार का 'अकाल' पड़ना शुरू होता है, पक्षियों को विशाल साहसिक उड़ान भरने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

    वास्तव में पृथ्वी पर जितने भी जीव हैं, उनमें खोजने, घूमकर खोजने की सहजवृत्ति बराबर कार्य करती है। इसी सहजवृत्ति के कारण मानव सारी पृथ्वी पर फैले। प्रवास करने वालों की खोज या तो ऐसे आवास की होती है, जहाँ उन्हें बेहतर या घर जैसा माहौल मिल सके, जहाँ वे अपने घर जैसे आहार-शून्य मौसम में निर्भर रह सकें। पक्षियों को फल और कीट तो हमेशा रूचिकर लगते हैं। उनके शावकों को प्रचुर मात्रा में प्रोटीन भरे कीट भी जरूरी होते हैं। अपने शावकों को वे भरपूर मात्रा में कीट मिले! संभवतः इसीलिए वयस्क पक्षी फलाहारी भी हो जाते हैं।

मौसम और जलवायु-

उत्तरी गोलार्द्ध में जब उत्तरी क्षेत्र में अत्यधिक ठंड पड़ती है, तब दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करें तो पहले समशीतोष्ण तथा बाद में भूमध्यरेखीय गर्म जलवायु मिलती है और उड़ते  रहें तो दक्षिणी गोलार्द्ध की ग्रीष्मकालीन भूमध्यरेखीय उष्ण जलवायु मिलती है। इससे भी और आगे उड़ते रहने पर समशीतोष्ण जलवायु मिलती है।

   अतएव अधिकतर पक्षी प्रवास उत्तर-दक्षिण दिशाओं में होते हैं। जैसे अभी तक की जानकारी के अनुसार पोइड क्रेस्टेड ककू दक्षिण अफ्रीका से मानसून आते ही भारत में प्रवास के लिए आते हैं जो वर्षा ऋतु पश्चात् लौट जाते हैं। चातक पक्षी अपने प्रवास क्षेत्र में प्रजनन करते हैं। यह उस नियम का अपवाद है, जिसमें माना जाता है कि प्रवासी पक्षी अपने गृह क्षेत्र में ही प्रजनन करते हैं; लेकिन इन्हें प्रजनन क्षेत्र में शावकों के साथ पालन के लिए पूरा समय नहीं मिलता। इस समस्या के हल के लिए मादा चातक अपना अंडा दूसरे पक्षी के घोंसले में देकर निश्चिंत हो जाती है।

     पक्षियों के प्रवास मार्ग का निर्धारण पर्वत श्रृंखलाओं, सागर तटों, हवाओं की दिशा, नदियों तथा विकास प्रक्रिया आदि से होता है। आहार की सुलभता, शिकारी पक्षियों, जानवरों तथा मनुष्यों से सुरक्षा तथा लाखों पक्षियों के ठहरने के स्थान भी प्रवास मार्ग का निर्धारण करते हैं। यथा संभव हवा की दिशा के अनुकूल उड़ना ही पक्षियों के लिए लाभकारी होता है। हवा का वेग उनके वेग में जुड़कर उनके यात्रा वेग को बढ़ाकर उनकी यात्रा समय कम कर देता है।

भारत में आने वाले प्रवासी पक्षी -

     भारत में प्रवास करने वाले पक्षियों में ग्रेट व्हाइट पेलिकन जो मुख्य रूप से यूरोप और मध्य एशिया से आते हैं इन्हें असम और उत्तर प्रदेश में देखा जाता हैं। द रफ, यूरोप और साइबेरिया से आते हैं यह उत्तर प्रदेश और त्रिपुरा जाते हैं। ब्लूथ्रोट अलास्का से राजस्थान के भरतपुर पहुंचते हैं।ग्रेटर फ्लेमिंगो अफ्रीका और यूरोप से आकर गुजरात के पक्षी अभयारण्यों में विचरण करते हैं। द गैडवाल यूरोप और उत्तरी अमेरिकी से मध्यप्रदेश और ओडिशा की ओर जाते हैं। स्पॉटेड रेडशैंक आर्कटिक और यूरोप आकर हरियाणा के जलाशयों में रहते हैं। रोजी पेलिकन यूरोप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में ठहरते हैं। ब्लू-टेल्ड, बी-इटर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया से आते हैं, जिन्हें दक्षिण भारत की नमभूमि में देखा जा सकता हैं। साइबेरियन सारस (साइबेरियन क्रेन): पश्चिमी साइबेरिया से आते हैं जो भरतपुर नेशनल पार्क की शोभा बढ़ाते हैं। यूरेशियन स्पैरोहॉक ज्यादातर उत्तरी एशिया, यूरोप, साइबेरिया और टुंड्रा क्षेत्रों से लंबा सफर करके भारत में आते हैं और मार्च तक भारत में रहते हैं।

छत्तीसगढ़ में आने वाले प्रवासी पक्षी- 

   छत्तीसगढ़ में सर्दियों के मौसम में कई प्रवासी पक्षी आते हैं जो हजारों किलोमीटर का लंबा सफर तय करके यहाँ डेरा डालते हैं। प्रमुख प्रवासी पक्षियों में गार्गनीज़, टफ्टेड डक, साइबेरियन स्टोनचैट, ब्लैक स्वान, कार्लोलाइन डक, क्रिस्टेड डक, मस्कोवी डक आदि शामिल हैं। इसके अलावा, गिधवा परसदा, बारनवापारा में दुर्लभ मलार्ड पक्षी आने लगे हैं, जो यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका के ठंडे इलाकों से आते हैं। सरगुजा संभाग में पाइड एवोसेड और मार्श हैरियर जैसे  विदेशी प्रवासी पक्षियों का भी आगमन होता है। धमतरी जिले में यूरोप, रूस, अमेरिका, साइबेरिया और अन्य दूर देशों से कई प्रवासी पक्षी आते हैं जैसे पैसेफिक गोल्डन प्लोवर, व्हिम ब्रेल, डनलीन, रिवर लैपविंग और टैमनिक स्टींट।ये पक्षी छत्तीसगढ़ के जंगलों, जलाशयों और दलदली इलाकों में प्रजनन और प्रवास करते हैं, जिससे प्रदेश की जैव विविधता समृद्ध होती है।    

    छत्तीसगढ़ वन विभाग और स्थानीय लोग अब पक्षी संरक्षण के लिए जागरूक हुए हैं। 

छत्तीसगढ़ के प्रवासी पक्षी- गार्गनीज़, टफ्टेड डक, साइबेरियन स्टोनचैटब्लैक स्वान, कार्लोलाइन डक, क्रिस्टेड डक, मस्कोवी डकमलार्ड (दुर्लभ प्रजाति) पाइड एवोसेड, मार्श हैरियर पैसेफिक गोल्डन प्लोवर, व्हिम ब्रेल, डनलीन, रिवर लैपविंग, टैमनिक स्टींट आदि हैं। छत्तीसगढ़ प्रवासी पक्षियों की विविधता जैविक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। 

       पक्षियों के आगमन से तालाब, झील का इलाका चहचहाहट से गूँज उठता हैं। मनमोहक पक्षियों को निहारने का आनन्द हर साल आता है सर्दियों में।

ravindraginnore58@gail.com

दोहेः सूरज आने को हुआ

 
- हरेराम समीप

1

आग लगी साहित्य में, बढ़ती जाए आँच 

जलते शब्दों को अगर, बाँच सके तो बाँच

2

शब्द खो रहे मायने, दिल खो रहे उसूल 

नई सोच की आँख में, भरी जा रही धूल

3

किया हुआ है आजकल, शब्दों ने विद्रोह

 लिखता हूँ कविता मगर, लिख जाए व्यामोह

4

जहाँ मिले घर में जगह, रह लेतीं चुपचाप 

ये साहित्यिक पुस्तकें, ज्यों बूढ़े माँ-बाप

5

जिस दिन दृढ़ विश्वास से, खड़े हो गए आप

तभी ख़त्म हो जाएगा, सदियों का संताप

6

अभी सफ़र लम्बा बहुत, तू मत खोज पड़ाव

पौधा बढ़कर पेड़ हो, तब तो देगा छाँव

7

जीवन जीने के लिए, लड़ना है हर हाल

पर्वत से आती नदी, बनकर वाटरफाल

8

जिसको अपने आप पर, है पूरा विश्वास

रहती है हर युद्ध में, जीत उसी के पास

9

अँधियारे की जंग से, पीठ दिखा मत भाग

पत्थर से पत्थर रगड़, पैदा होगी आग

10

चला गया जाने कहाँ, वही युवा आवेश

कब से उसकी खोज में, घूम रहा है देश

11

एक छोर पर जिंदगी, मौत दूसरे छोर

इन दोनों के बीच में, तनी साँस की डोर

12

सब अगवानी कर रहे, पंछी, नदी, पहाड़

सूरज आने को हुआ, तम के खोल किवाड़

13

करे धूप से सामना, आँधी से मुठभेड़

बेलिबास होता नहीं, कभी आस का पेड़

14

उसने रखी सहेजकर, बची-खुची उम्मीद

रोते-रोते सो गई, फिर आँखों में नींद

15

तुझे मिलेगी वह खुशी, पूरी होगी खोज

आशा की उँगली पकड़, चलता चल हर रोज़

16

मन की कंदीलें जलीं, भरने लगा उजास

अवसादी परिवेश में, लौट रही फिर आस

17

दुनिया भर से आपको, अगर चाहिए प्यार

भीतर-बाहर माँज लो, अपना यह किरदार

18

यूँ तो था वह उम्र भर, मामूली मज़दूर

लेकिन वो हर पल रहा, ओछेपन से दूर

19

घर की खिड़की बंद रख, कभी न जाना भूल

यह अंधड़ का दौर है, भर जाएगी धूल

20

केवल सुखदायी नहीं, होते सारे ख़्वाब

संग रहें उद्यान में, काँटे और गुलाब


यात्रा संस्मरणः अयोध्या से वाराणसी- उमंग और ऊर्जा भरते घाट

- सुदर्शन रत्नाकर 










आठ बज कर पाँच मिनट पर हवाई जहाज़ ने पट्टी पर दौड़ना शुरू किया और फिर जैसे ही उसने उड़ान भरी। पीछे का सब कुछ छूटता गया। मन अयोध्या की ओर उड़ता गया। चार दिन पहले ही भाई का फ़ोन आया, हम सब यानी हरबंस भाई-सविता भाभी, भाभी के भैया, मधु भाभी एवं बहन संतोष और मैं सुबह आठ बजे नई दिल्ली एयरपोर्ट से एयर इंडिया की फ्लाइट से अयोध्या जा रहे हैं। न करने और सोचने की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी।सच ही कहते हैं, जब ईश्वर ने दर्शन के लिए बुलाना हो तो, ऐसे ही कार्यक्रम बनते हैं।श्री राम के दर्शन करने की सोच मात्र से ही मन में भरी प्रफुल्लता से चार दिन व्यतीत हो गए और अब हवाई जहाज़ अपनी गति से गंतव्य की बढ़ रहा है। 

  दस बजे जब हवाई जहाज़ ने लैंड किया और अयोध्या की उस पावन धरा, भारत के जनमानस के नायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने जन्म लिया था, पर पाँव रखते ही आँखें खुशी से सजल हो गईं।

अयोध्या का एयरपोर्ट छोटा है ; लेकिन श्रीराम की अत्यंत सुंदर पेंटिंग्स ने मन मोह लिया।एयरपोर्ट से बाहर निकले तो भाई के मित्र के द्वारा भेजे गए कर्मचारियों ने फूलों के गुलदस्ते देकर हमारा स्वागत किया। दो गाड़ियों से हम सभी होटल रामायणा की ओर अग्रसर हुए। प्रखर- जिसने सारे ट्रिप की रूपरेखा बनाई थी, हमें रास्ते में बताता  गया। अयोध्या नाम तो सबके हृदय में बसा है; लेकिन अभी तक एक छोटा सा शहर ही था, विकास के नाम पर कुछ अधिक नहीं हुआ था पर अब वही शहर चमचमाती सड़कों, नए-नए बने होटलों और इमारतों से इठला रहा है। इठलाए भी क्यों न, रंग रूप तो बदला ही है, सदियों की प्रतीक्षा के बाद भगवान राम का भव्य मंदिर जो बना है, जिसे देखने देश से ही नहीं, विदेशों से भी श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। 

   होटल एयरपोर्ट से दस मील की दूरी पर है। औपचारिकताएँ पूरी करके हमने नाश्ता किया। एक बजे हमें मंदिर में जाना है, जो होटल से कुछ ही दूरी पर है। गाड़ी अंदर तक नहीं जातीं, लेकिन पूर्व आज्ञा-पत्र ले रखा है। संकरी गलियों से लोगों की भीड़ से बचते हुए हम आगे बड़े और मंदिर के द्वार से थोड़ी दूरी पर उतरे। हमारे और हमारे आराध्य के बीच बस थोड़ी ही दूरी थी। भैया और दीदी के लिए व्हीलचेयर ली। वहीं माथे पर राम-नाम का तिलक लगा कर हम  खुशी के अपार सागर में डूबे ऊबड़- खाबड़ रास्ते से आगे बढ़े।

 अगला रास्ता हमें सीढ़ियों से तय करना था। यह अंतिम पड़ाव था। लगभग साठ सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद हम उस भव्य मूर्ति के सामने खड़े थे। जिसका दर्शन करने हम आए थे। लग रहा था, जैसे वे आँखें हमें देख रही हैं, उनसे निकलती लौ और मूर्ति की आभा देखकर इतनी भाव विभोर हो उठी कि आँखें नम हो गईं और फिर आँसू बहने लगे। भाई की भी वही स्थिति थी। वह भी बहुत भावुक है। श्रद्धालुओं की बहुत लम्बी पंक्ति थी इसलिए अधिक समय तक रुक नहीं सकते थे। सबके लिए सुख-शांति माँगते हुए,  आगे बढ़े और उतनी ही सीढ़ियाँ उतर कर नीचे आ गए; लेकिन मन तो जैसे पावन -पवित्र होकर वहीं छूट गया था। राम मंदिर के तदोपरांत, राम दरबार देखने गए, दशरथ महल, कनक भवन राम और सीता के दर्शन करके आँखें तृप्त हों गईं।

वापस होटल पहुँचे तो चार बज गए थे। थोड़ी देर आराम करने के बाद हनुमान गढ़ी देखने के लिए निकले। हनुमानगढ़ी एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन हनुमान मंदिर है। कहा जाता है भगवान राम ने हनुमान जी को अयोध्या की रक्षा का भार दिया था तथा उन्हें अयोध्या में निवास करने का आदेश दिया था। यहाँ की सीढ़ियाँ पुरानी और बहुत ऊँची है। हनुमान चालीसा पढ़ते हुए किसी तरह पहुँच ही गए। हनुमान जी की सजग आँखें सच में नगर की सुरक्षा में सचेत थीं।

   सरयू नदी हम  सायंकाल में रौशनी में देखना चाहते थे। देव दीवाली के कारण लाखों लोगों ने सरयू में स्नान किया था। इस समय भी अपार भीड़ थी। छह बजे हम लता मंगेशकर चौक पहुँचे। मधुर स्वर लहरियों से वातावरण गुंजायमान हो रहा था। लता मंगेशकर चौक से जैसे-तैसे करके सीढ़ियाँ उतरकर नीचे घाट पर पहुँचे। दीये वहीं मिल रहे थे। सभी ने जलते दीपक सरयू की लहरों पर छोड़ दिए। जगमग करते और भी सैंकड़ों दीपक लहरों के साथ लहराते हुए आगे बढ़ रहे थे मानों आसमान में सितारे टिमटिमा रहे हों। 

ऊपर आकर पुल से सरयू नदी की दूसरी ओर आ गए, जहाँ कई मंदिर हैं: लेकिन हम केवल, नागेश्वर नाथ मंदिर ही देख पाए। यह शिव जी का अत्यंत प्राचीन मंदिर है। दर्शन करने के बाद लता मंगेशकर चौक, जहाँ बहुत बड़े आकार की वीणा बनी हुई है। वहाँ कुछ देर ठहरें और  चित्र लिए।

दूसरे दिन हमने वाराणसी के लिए प्रस्थान करना था। सुबह नाश्ता लेकर दस बजे हमने सड़क मार्ग से यात्रा प्रारंभ की। रास्ते में रुकते हुए हमने यात्रा का पूरा आनंद लिया हमारे साथ ड्राइवर सोनू ,अंजनी और ब्लैक कामांडो शर्मा जी थे, जो हर स्थान के बारे में बताते हुए  जा रहे थे, राजनीति पर भी खूब चर्चा करते रहे। अंजनी बीस-बाइस वर्ष का बड़ा चुस्त और संस्कारी लड़का है। उसने बताया कि वह हनुमान जी का परम भक्त है, उसे हमेशा यह एहसास होता है कि वे उसके साथ हैं। वह सुबह एक घंटा नियम से पूजा करता है। किसी दिन किसी विशेष कारण से पूजा नहीं कर पाता, तो उस दिन कहीं भी जाते हुए रास्ते में उसे हनुमान जी का कोई न कोई मंदिर अवश्य दिख जाता है।

      जब वाराणसी पहुँचे अँधेरा, हो गया था।सँकरी सड़कें जगह-जगह रास्ते में लगा जाम और रेंगती हुई गाड़ियाँ। बैठे-बैठे थकान होने लगी थी। होटल द. एच.एच.आई (होटल हिन्दुस्तान इंटरनेशनल) तक पहुँचने में ही बहुत समय लग गया। रिसेप्शन पर अभी पहुँचे ही थे कि लिफ्ट से सात- आठ सुंदर -सी महिलाएँ एक जैसी साड़ियाँ पहने हुए निकलीं। हमें देखते ही उन्होंने हाथ जोड़कर नमस्ते की। उनके  हाथों में मेंहदी लगी हुई थी। हमारे जवाब देने पर उन्होंने ने बताया कि वे शिकागो से हैं। जब मधु भाभी ने बताया कि वे भी शिकागो सें आई हैं, तो ख़ुश हो गई। अच्छा लगा कि विदेशी हमारी संस्कृति, हमारी परम्पराओं को अपना रहे हैं। अयोध्या में भी विदेशियों को भारतीय वेशभूषा में माथे पर राम-नाम का तिलक लगाए मंदिर परिसर में घूमते हुए और श्री राम के दर्शन करते हुए देखा था।

  यह शाम हमने होटल में ही संगीत सुनते हुए, बातचीत करने में बिताई। अगली सुबह का कार्यक्रम अभी अनिश्चित था कि कब शुरू होगा।  सुबह हम तैयार हो ही रहे थे कि भाई के पास शर्मा जी का फ़ोन आ गया कि तैयार रहें, वे नौ बजे आ जाएँगे। नाश्ता लेकर हम जाने के लिए ई रिक्शा से निकले; क्योंकि श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर तक कार नहीं जा सकतीं। मंदिर के बाहर ही व्हील चेयर मिल गई और छोटे रास्ते से अंदर जाने की आज्ञा भी। मंदिर के बाहर ही एक दुकान से प्रसाद की टोकरी ली, वहीं जूते उतारे और अपने-अपने फ़ोन और बैग जमा करवाए, गेट नंबर चार से मंदिर परिसर में प्रवेश किया। पहले मंदिर तक जाने का रास्ता छोटी-छोटी गलियों से होकर जाता था; लेकिन अब खुले गलियारे बन गए हैं, जिससे लोगों के आवागमन में सुविधा हो गई है।

 गलियारे में जाते ही सबसे पहले ज्ञानवापी मस्जिद दिखाई दी, जो मंदिर के एकदम साथ है। इस समय चारों ओर से बंद किया हुआ है। सिक्योरिटी प्रक्रिया के पश्चात हम एक बड़े से दालान में पहुँचे, जहाँ शिव जी को समर्पित विश्वनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिसके दर्शन मात्र से आत्मा को शुद्धि मिलती है। सम्राट विक्रमादित्य ने इसका निर्माण करवाया था, जबकि वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण 1780 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। 

   यहाँ भी हमें सुविधा से दर्शन गए। शिवलिंग से छू कर गेंदे के फूलों का हार जब पुजारी ने पहनाया तो मन गद्गद हो गया। लगा भोले नाथ की कृपा के फूल बरस रहे हैं। हर हर महादेव के नारों की आवाज़ से सारा वातावरण गूँज रहा था। पंक्तियों में लगे हज़ारों दर्शनार्थियों की श्रद्धा देखते ही बन रही थी। यह आस्था ही तो मनोबल बढ़ाती है।     

 वाराणसी के अन्य मंदिरों में भैरव मंदिर, श्री अन्नपूर्णा मंदिर, श्री दुर्गा माता मंदिर, सारनाथ मंदिर हैं। अन्नपूर्णा मंदिर, देवी अन्नपूर्णा को समर्पित मंदिर है। किंवदंती के अनुसार एक बार जब पृथ्वी पर अन्न की कमी हो गयी, तब माँ पार्वती ने माँ अन्नपूर्णा के रूप में अवतार लिया और पृथ्वी लोक पर अन्न उपलब्ध कराकर समस्त मानव जाति की रक्षा की थी। वहाँ से हमें चावल और रुद्राक्ष का प्रसाद मिला, जो हमने सम्भाल कर रख लिया।

   होटल में  थोड़ी देर विश्राम करने के पश्चात् हम प्रमुख बौद्ध स्थल सारनाथ मंदिर देखने के लिए निकले, जो वाराणसी से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिसमें कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल हैं।

   जैसे ही हमने प्रांगण में प्रवेश किया, सबसे पहले हमें सुसज्जित वह स्थान दिखाई दिया, जहाँ महात्मा बुद्ध अपने पहले पाँच शिष्यों के सम्मुख बैठे ,उन्हें प्रवचन दे रहे हैं। उसके बाद धर्मचक्रों को घुमाते हुए परिक्रमा की। इसके सामने ही वह वृक्ष है, जिसकी एक शाखा  श्रीलंका से लाकर यहाँ लगाई गयी थी। मंदिर में प्रवेश करते ही भगवान बुद्ध की शांत भाव से बैठे अत्यंत सुंदर प्रतिमा के दर्शन मात्र से ही मन में अपार शांति छा गई। मंदिर की दीवारों पर महात्मा बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित मनोहारी पेंटिंग्स वातावरण को और भी आकर्षक बनाती हैं। स्वच्छ और शांत वातावरण को छोड़कर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी। पर अभी हमें धूमेक स्तूप भी देखना था। विशाल प्रांगण में बने इस स्तूप का निर्माण सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व करवाया था।

    जिसे देखकर आश्चर्य हुआ और मन उनके आगे नत मस्तक हो गया, जिनके हाथों ने इसे बनाया था। गाइड ने बताया कि मुग़ल शासकों ने इसके एक हिस्से को तोड़कर देखा था कि कहीं इसमें सोना तो नहीं भरा हुआ। बाद में 1930 में इस हिस्से की मरम्मत की गई, जो अलग दिखता है।

     मंदिर से बाहर निकलकर थोड़ी ख़रीददारी की। लौटने का समय हो हो गया था। साढ़े छह बजे गंगा -आरती आरंभ हो जाती है इसलिए विश्राम न करके सीधे गंगा घाट की ओर बढ़े। रास्ते में शर्मा जी ने हमें ढाबे पर ले गए। जहाँ की चाय लाजवाब होती है, अदरक डालकर बनायी गई चाय  कुल्हड़ में पिलाते हैं। मैं तो चाय नहीं पीती; लेकिन सभी ने इस चाय का आनन्द उठाया। 

  एक पुल को पार करते हुए शर्मा जी ने बताया कि इस पुल का नाम अंधा पुल है। एक अँधे भिखारी की मृत्यु के बाद उसके पास से आठ करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे, जिससे इस पुल का निर्माण करवाया गया था और इसका नाम अंधा पुल रखा गया।     

   छह बजे हम अस्सी घाट पहुँचे, जहाँ से पचास सीढ़ियाँ उतरकर हमें नीचे जाना था। सीढ़ियाँ पुरानी और बहुत ऊँची हैं। सोचकर ही घबराहट होने लगी कि इतनी सीढ़ियाँ चढ़कर वापिस भी आना है। अधिक परेशानी तो भैया और दीदी को थी। उन दोनों को हाथ पकड़कर नीचे उतरना पड़ा। अभी तो परेशानी शेष थी। कठिन प्रक्रिया  के बाद जैसे तैसे बोट पर पहुँचे और इसके साथ ही सारी थकान, सारी कठिनाइयाँ भूल गईं, जब गंगा की लहरों से अठखेलियाँ करती बोट आगे बढ़ी। लगभग सभी घाट जगमगाती रोशनी से सजे हुए थे। कुल अट्ठासी घाट हैं, जहाँ पूजा और स्नान किया जाता है; लेकिन मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट श्मशान घाट हैं, जो विशेष रूप से दाह संस्कार के लिए उपयोग किए जाते हैं। यहाँ दिन-रात शवों को जलाया जाता है । मान्यता है कि जिसका शव यहाँ जलाया जाता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह आस्था और विश्वास है, जो सदियों से चला आ रहा है, शेष जाने वाली आत्मा तो बता नहीं पाती।

     दशाश्वमेध सबसे प्राचीन घाट है, जहाँ पर प्रसिद्ध गंगा आरती का आयोजन होता है। हमारी बोट जब वहाँ पहुँची, तो आरती चल रही थीं। अद्भुत, अलौकिक दृश्य। अभी तक सुनते आए थे, अब सामने खड़े सुन और देख रहे थे। अचम्भित तो होना ही था। एक अनूठी आभा का जैसे संचार होने लगा था।  नीचे गंगा की लहरें, ऊपर खुला आसमान, शीतल हवा के झोंकों का स्पर्श और चमकता पूरा चाँद, जो हमारे साथ-साथ चल रहा था। हृदय में उमंग और तन-मन तनाव रहित। सांसारिक बंधनों में रहकर, क्या यह मोक्ष नहीं था? यही तो था, चाहे क्षणिक था।               

   आठ नवम्बर आज वाराणसी में अंतिम दिन था। आराम से सोकर उठे। नाश्ता लेकर ग्यारह बजे चैक आऊट किया। हमारी दिल्ली की वापसी की फ्लाइट छह बजे की थी, जो चालीस मिनट विलंब दिखा रही थी। हमारे पास पर्याप्त समय था; लेकिन भीड़ आज भी बहुत थी। लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डे पर पहुँचने में समय लगेगा। रास्ते में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय भी देखना था, जो एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रतिष्ठित केन्द्रीय विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना पंडित मदन  मोहन मालवीयजी ने 1916  में की थी। इसका उद्देश्य पारंपरिक भारतीय ज्ञान और आधुनिक शिक्षा को जोड़ना था। विश्वविद्यालय का मुख्य परिसर साढ़े पाँच किलोमीटर में फैला हुआ है। सब कुछ देखने में हमें कार से भी आधा घंटा लग गया।

    ढाई बज गए थे। अभी हमें लंच भी लेना था। खाने के बाद एक बार फिर से सबने अदरक वाली कुल्हड़ की चाय का आनंद लिया। हवाई अड्डे पर सभी औपचारिकताएँ पूरी करने के बाद पता चला- फ्लाइट सवा आठ बजे उड़ान भरेगी। प्रतीक्षा के अतिरिक्त क्या कर सकते थे। घर तो लौटना था। ट्रिप की अच्छी-अच्छी बातों के बारे में बातचीत करते हुए हमने उस प्रतीक्षा का भी आनंद लिया।

सम्पर्कः ई-29, नेहरु ग्राउंड, फरीदाबाद 121001, मोबा. 9811251135

यादेंः नव वर्ष एक उत्सव वाला दिन

 - डॉ. जेन्नी शबनम
नव वर्ष की प्रतीक्षा पूरे वर्ष रहती है। नव वर्ष एक उत्सव वाला दिन है। हालाँकि समय कितनी तीव्रता से बीत रहा है, यह भी याद दिलाता है। यों लगता है मानो अभी-अभी तो नया साल आया था, इतनी जल्दी बीत गया। 31 दिसम्बर की रात जैसे ही घड़ी की सुई 12 पर पहुँचती है, हम सभी पूरे उल्लास के साथ एक दूसरे को नव वर्ष की शुभकामनाएँ देते हैं। जैसे ही क्रिसमस आता है, नव वर्ष के आगमन का जोश भर जाता है। नव वर्ष के पहले दिन क्या-क्या करना है इसकी योजना बनती है व तैयारी होने लगती है। 

समय के साथ नव वर्ष मनाने का चलन और शुभकामनाएँ देने का प्रचलन दोनों में बहुत तेजी से बदलाव हुआ है। मेरे बचपन में 31 दिसम्बर की रात का कोई महत्त्व न था। तब न टेलीविज़न था, न मोबाइल, न हर घर में टेलीफोन। 31 दिसम्बर की रात में आजकल के जैसा जश्न नहीं होता था। 1 जनवरी की भोर से नव वर्ष की शुरुआत होती थी। इस दिन कोई सपरिवार पिकनिक पर जाता, तो कोई घर पर मित्रों और परिवार के साथ सुस्वादु भोजन का आनन्द लेता था। अपनी-अपनी इच्छा और क्षमता के अनुसार हर कोई इस दिन को मनाता था। जब से टी.वी. आया तब से नव वर्ष की पूर्व संध्या पर कोई-न-कोई कार्यक्रम अवश्य होता है। अगर कोई योजना न बन सकी तो टी.वी. देखकर मनोरंजन करना भी आदत में शुमार होता गया।    

संचार माध्यमों के प्रसार, बाज़ारी करण और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण पर्व, त्योहार और उत्सव मनाने का रूप बदल गया है। पर्व, त्योहार, उत्सव इत्यादि में धूमधाम शोभनीय है; परन्तु अशिष्टता अशोभनीय है। इन दिनों पूजा, पर्व, त्योहार, अनुष्ठान, व्रत, उत्सव इत्यादि में फूहड़पन देखने को मिलता है। चाहे विवाह समारोह हो या कोई आयोजन या मूर्ति विसर्जन, लाउडस्पीकर या डीजे पर अश्लील गाना-नाचना फैशन बन गया है। धार्मिक आयोजन हो, तो समाज के नियम को न मानना और कानून को तोड़ना अधिकार बन गया है। भले इसमें लोगों की जान चली जाए। जश्न मनाने में उत्साह और उमंग होता ही है; परन्तु दूसरे के अधिकार का हनन कर उत्सव मनाना अनुचित है। 

नव वर्ष हो या कोई खास दिन उत्सव मनाना ही चाहिए। मेरी इच्छा होती है कि साल का हर दिन किसी-न-किसी विशेष दिन को समर्पित कर देना चाहिए, ताकि सालों भर हम सभी अपने कार्य के साथ उत्सव भी मनाते रहें। नव वर्ष के आगमन के उपलक्ष्य में हर जगह कुछ-न-कुछ विशेष आयोजन होता है। बच्चों और युवाओं में तो खास उत्साह रहता है। ठण्ड का मौसम, सजे बाज़ार, जगमग रोशनी, विशेष पकवान से सुगन्धित रेस्तराँ, छुट्टी की धूम, बच्चे-जवान-बूढ़े प्रसन्नचित्त। उपहार के लेने-देने के चलन के कारण सामान पर विशेष छूट। भीड़-भाड़, शोरगुल, मदिरापान, स्वादिष्ट भोजन, नाच-गान, मस्ती भरा माहौल... घड़ी की सुई 12 पर, जोर से हल्ला, पटाखे की गूँज, तालियों की गड़गड़ाहट। कितनी सुन्दर रात और सुहानी भोर! आनन्दित मन से एक दूसरे के गले मिलकर शुभकामना देते लोग। हर फोन की घण्टी बजती और लोग अपनों से बात करते। इस तकनीक ने जीवन में खुशियाँ भर दी हैं। वीडियो कॉल पर अपनों को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है; दूरी नहीं खलती। पूरी रात मस्ती- भरी और भोर में सुखकर नींद। 

मेरे बच्चे जब तक छोटे रहे क्रिसमस, नव वर्ष, वैलेंटाइन डे, बर्थडे, दीवाली इत्यादि ख़ूब मनाया। मेरे पति के संस्थान में नव वर्ष की पूर्व संध्या पर बहुत बड़ी पार्टी होती थी। सारी रात खाना-पीना, गाना-बजाना, नाचना, पटाखे फोड़ना इत्यादि होता था। घर में मैं और मेरी बेटी शुद्ध शाकाहारी हैं। दीवाली मेरा प्रिय त्योहार है; क्योंकि इस दिन दीपों की जगमग और हर घर में शाकाहारी पकवान बनता है। बाहर से शाकाहारी रेस्तराँ से खाना आए तो ही मन से खाती हूँ, केक भी एगलेस खाती हूँ। शुद्ध शाकाहार, कर्णप्रिय संगीत, मनचाहे तरीक़े से नाचना-गाना, हँसी-मज़ाक, ठहाके, खेलना, अलाव तापना इत्यादि किसी ख़ास दिन के आयोजन में करना मेरा पसन्दीदा कार्य है, जिसे मैं प्रसन्न मन से करती हूँ। 

मुझे अपने बचपन से बड़े होने तक का अधिकतर नया साल मनाना याद है। मेरी पढ़ाई भागलपुर के क्रिश्चन स्कूल से हुई है। प्राइमरी स्कूल में क्राफ़्ट के क्लास में अन्य चीज़ों के अलावा कागज़ का क्रिसमस ट्री बनाना सीखा। हाई स्कूल में मेरा स्कूल 19 दिसम्बर को क्रिसमस की छुट्टी अर्थात् बड़े दिन की छुट्टी के लिए बन्द होता था। क्रिसमस से नव वर्ष के पहले दिन तक छुट्टी वाला माहौल। मुझे साल के पहले दिन का इन्तिज़ार सबसे अधिक इस कारण रहता था कि आज से कॉपी पर नया साल लिखना है। लिखने की आदत बचपन से रही है। पूरे घर को साफ़ करना, पुराना कैलेण्डर फाड़ना और नया टाँगना। जाने कितना आनन्द आता था इन छोटे-छोटे कामों में। हम बच्चों को पता चला था कि साल का पहला दिन जैसा बीतता है वैसा ही पूरा साल बीतेगा। सुबह-सुबह उठकर नहाना, घर साफ़ करना, कुछ अच्छा खाना बनाना, सिनेमा देखना, पढ़ना-लिखना इत्यादि ताकि सालभर ऐसा ही दिन बीते। बच्चा मन कितना सच्चा होता है, बिना तर्क कुछ भी मान लेता है।

जब तक मेरे पापा जीवित रहे, एक जनवरी को घर में पापा-मम्मी के सहकर्मी और मित्र आते, भोज होता, नियत समय पर वे जाते और हम लोग अपने-अपने कार्य में मगन। हाँ! मेरे घर में सुबह से गाना ज़रूर बजता रहता था, चाहे रेडियो या रिकॉर्ड प्लेयर। पापा की मृत्यु के बाद हमारा कुछ वर्ष बिना किसी त्योहार और उत्सव के बीता। जब मैं कॉलेज में पढ़ने लगी और पापा के गुजरे काफी वर्ष हो गए थे, तब मुझे सिनेमा देखने का चस्का लग गया। हर एक जनवरी को मम्मी को जबरन सिनेमा देखने के लिए ले जाती। छुट्टी की भीड़ के कारण हॉल में टिकट खरीदना जंग जीतने जैसा होता था; मैं जंग भी जीतती और सिनेमा भी देखती। 

मेरे जीवन का कुछ समय शान्तिनिकेतन में बीता है। वर्ष 1991 में पहली जनवरी को मैं अपनी एक मित्र के साथ घर से बाहर निकली नव वर्ष मनाने। कहीं कुछ नहीं, रोज़ की तरह सब कुछ शान्त। मैंने किसी से पूछा कि नव वर्ष के अवसर पर कहीं कुछ क्यों नहीं हो रहा है। तब पता चला कि बंगाल में अंग्रेज़ी तिथि से नहीं; बल्कि हिन्दी तिथि से नव वर्ष मनाते हैं। सुबह खिचड़ी बना-खाकर निकली थी, रात को दही चूड़ा खाकर नव वर्ष मना लिया। 

वर्ष 2000 में मेरी बेटी का जन्म हुआ। मेरा मन था कि वह मिलेनियम बेबी हो। इस कारण डॉक्टर से पहली जनवरी तय करने को कहा; परन्तु सिजेरियन सात तारीख़ से पहले सम्भव नहीं था। नव वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के वसंत विहार के एक होटल में दलेर मेंहदी का प्रोग्राम था, जिसका टिकट हम लोगों ने लिया। हालाँकि कभी भी बच्चे के जन्म की सम्भावना थी; इसलिए भीड़ में जाना हितकर नहीं और उस पर ठण्ड बेशुमार। फिर भी मैं गई। मेरे पति के परिवार के लोग और मेरी माँ भी गईं। मैं और मेरी माँ भीड़ में बाक़ी सबसे अलग हो गए। मेरा बेटा अपने चाचा के साथ था, इसलिए मुझे चिन्ता नहीं थी। हमारे पास न फ़ोन, न पैसे। इतनी धक्का-मुक्की थी कि मैं अपने पेट को बचाने के कारण न घुस सकी, न खाना खा सकी, न कार्यक्रम देख सकी। किसी अनजान से मोबाइल माँगकर पति को फ़ोन किया। अंततः लौटी और साल का पहला दिन अपोलो अस्पताल में बीता।  

लन्दन कई बार गई हूँ, पर वर्ष 2014 के क्रिसमस और नव वर्ष पर पहली बार गई थी। पूरा शहर खूबसूरती से सजा हुआ। रंगीन लाइट, जगमग रास्ते, रोड के ऊपर रंगीन लाइट की झालरें। 31 दिसम्बर की रात थेम्स नदी के किनारे आतिशबाजी होती है और बिग बेन की घंटी बजती है। शो का टिकट पहले से लेना होता है, जिसका पता हमें नहीं था। मैं अपने दोनों बच्चों के साथ गई। वहाँ तक पहुँचने के सारे रास्ते बन्द थे। एक पुलिस वाले ने बताया कि सिर्फ टिकट वाले जा सकते हैं, जो अब ख़त्म हो चुका है। वहाँ के रास्ते ऐसे हैं कि दूर से भी कुछ नहीं दिख सकता। हमने एक पिज़्ज़ा वाले की दूकान पर खड़े होकर पिज्जा बनाना सीखा और पिज्जा खाकर लौट आए। हाँ! 12 बजते ही आतिशबाजी की आवाज़ें सुनाई पड़ीं और आसमान में थोड़ी-सा आतिशबाजी देख सकी। लन्दन शहर की जगमग ख़ूबसूरती का ख़ूब आनन्द लिया।  

वर्ष 2021 के 31 दिसम्बर को मैं अकेली थी। नव वर्ष में पहली बार अकेली थी; क्योंकि बेटी बंगलोर में पढ़ाई कर रही है। मेरी माँ का इस वर्ष ही देहान्त हुआ था, तो मैं बहुत दुःखी रहती थी। मेरी एक मित्र की बेटी को पता चला कि मैं अकेली हूँ, तो वह आ गई। बाहर से खाना मँगाकर हमने पार्टी की। एक जनवरी की सुबह वह चली गई, उसका ऑफिस खुला था। मैं सिनेमा हॉल में जाकर सिनेमा देख आई। कई साल ऐसा हुआ है कि मैं अपने जन्मदिन पर अकेली होती हूँ। कई बार मेरी बेटी सिनेमा का टिकट ऑनलाइन बुक कर देती है। मैं ख़ुद को तोहफ़ा देती हूँ, सिनेमा देखती हूँ, काफ़ी पीकर आती हूँ। कभी मन किया तो किसी शाकाहारी रेस्तराँ में जाकर कुछ खा लेती हूँ। उत्सव मनाने का यह मेरा अपना तरीक़ा है। 

मेरे बच्चे जब स्कूल पास कर गए, तब से उनकी दुनिया बहुत विस्तृत हो गई। नव वर्ष हो या जन्मदिन, दोस्तों के साथ मनाना उन्हें पसन्द है। एक दिन घर वालों के साथ और एक दिन दोस्तों के साथ। नव वर्ष, जन्मदिन, पर्व-त्योहार बच्चों के साथ मनाना अच्छा लगता है; परन्तु समय के साथ बच्चों से दूरी और बदलाव को मन ने अब स्वीकार कर लिया है। सभी साथ हों, तो हर दिन खास हो जाता है। वे दूर रहें तो फ़ोन इस दूरी को मिटा देता है, पर कमी तो महसूस होती है। बेटा अपने परिवार में मस्त और बेटी अपने दोस्तों के साथ। अब 31 दिसम्बर की रात 12 बजे अपने दोनों बच्चों को शुभकामना देकर नए वर्ष का स्वागत करती हूँ। अब न कोई योजना बनाती हूँ, न मन में बहुत उत्साह रह गया है पूर्व की भाँति। धीरे-धीरे उम्र के साथ मन घट रहा है और मैं स्वयं में सिमट रही हूँ। सिनेमा देखने का सिलसिला अब भी जारी है; परन्तु उम्र और परिवार के कारण अब इसमें अंतराल आ जाता है। शायद समय और उम्र जीवन से उत्साह को धीरे-धीरे मिटाता जाता है, ताकि वृद्ध होने के अकेलेपन की तैयारी शुरू हो जाए।      

हर नया वर्ष ढेरों यादों और उम्मीदों के साथ आता है। साल के पहले दिन मन उल्लास और उमंग से भर जाता है। भविष्य के लिए फिर से सपने सजने लगते हैं। अतीत के दुःख को भूलकर एक नई आशा के साथ नव वर्ष का स्वागत करते हैं। फिर धीरे-धीरे समय के प्रवाह में नव वर्ष का उत्साह खोने लगता है और जीवन सुख-दुःख के साथ बीतने लगता है; पुनः नए वर्ष की प्रतीक्षा में। परन्तु बीच-बीच में पर्व-त्योहार मन में उमंग जगाए रखता है। जीवन ऐसा ही है। सच है, यदि पर्व-त्योहार न हो तो इंसान कर्तव्यों और कामों की भीड़ में राहत का अनुभव कैसे करें। 

नव वर्ष का प्रथम दिन समय और जीवन के बीतने और परिवर्तन को याद दिलाता है। एक नया दिन, नया साल और जीवन से एक और वर्ष सरक जाता है। जीवन पथ पर आनंदमय सफ़र के लिए नई ऊर्जा के संचार के साथ ऊष्मा, जोश, जुनून, हौसला और जीवन्तता का होना आवश्यक है। नव वर्ष में जीवन्तता और मानवता से पूरा संसार सुन्दर और चहचहाता रहे, यही आशा है। 

नव वर्ष मंगलमय हो!

आलेखः शोर में डूबता जीवन

हेडफोन की आदत और बिगड़ता स्वास्थ्य

- संध्‍या राजपुरोहित 

आधुनिक जीवन की गति इतनी तीव्र हो चुकी है कि व्यक्ति अपने ही भीतर सिमटने लगा है। हेडफोन आज हर उम्र के हाथ में दिखते हैं सड़क पर चलते हुए, बस में बैठे या रात की नीरवता में मोबाइल स्क्रीन के सामने। संगीत, पॉडकास्ट, गेम या रील यह सब अब हमारे कानों की दुनिया में स्थायी रूप से बस चुके हैं। पर क्या हम यह समझ रहे हैं कि यह सुविधा धीरे-धीरे हमारे स्वास्थ्य, व्यवहार और संवेदनशीलता को निगल रही है?

तकनीक ने मनुष्य के जीवन को अत्यंत सुविधाजनक बना दिया है। मोबाइल, लैपटॉप और इंटरनेट ने हमें आपस में जोड़ा है, दुनिया को हमारी हथेली पर ला खड़ा किया है। परंतु इस सुविधा के साथ एक अदृश्य खतरा भी धीरे-धीरे हमारे स्वास्थ्य को घेरे में ले रहा है और वह है हेडफोन का बढ़ता उपयोग। आज हेडफोन आधुनिक जीवन का प्रतीक बन चुके हैं। चाहे यात्रा हो या व्यायाम, ऑनलाइन क्लास हो या दफ्तर की मीटिंग, हर उम्र का व्यक्ति इनसे जुड़ा है। यह आवश्यकता धीरे-धीरे एक आदत में और फिर लत में बदलती जा रही है। भारत सहित पूरी दुनिया में हेडफोन का बाजार लगातार बढ़ रहा है।

कभी गाँवों में पत्तों की सरसराहट, पक्षियों की चहचहाहट और बहते पानी की ध्वनि मन को शांति देती थी। आज इन प्राकृतिक स्वरों की जगह इलेक्ट्रॉनिक बीट्स ने ले ली है। हमारी पीढ़ी वह संगीत सुन रही है जो सुकून नहीं देता, बल्कि उत्तेजना पैदा करता है। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ शोर अब मनोरंजन नहीं, बल्कि निर्भरता बन चुका है। आज जब हर जगह तेज़ आवाज़ों का साया फैला है, तब यह समझना जरूरी है कि यह “मौन खतरा” हमारी पीढ़ी को भीतर से कमजोर कर रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक अन्‍य रिपोर्ट के अनुसार, विश्व भर में लगभग एक अरब से अधिक युवा प्रतिदिन अत्यधिक आवाज़ में संगीत सुनने के कारण भविष्य में सुनने की क्षमता खोने के खतरे में हैं। भारत में भी यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। 2024 की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, शहरी युवाओं में से लगभग 78 प्रतिशत प्रतिदिन चार घंटे से अधिक समय तक हेडफोन का उपयोग करते हैं। कई विद्यार्थी और किशोर तो दस-दस घंटे तक इनसे जुड़े रहते हैं। दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि शहरी युवाओं में लगभग 15 प्रतिशत लोग आंशिक सुनने की समस्या से जूझ रहे हैं, जिसका मुख्य कारण हेडफोन का अत्यधिक उपयोग है।

दिनभर कानों में गूँजती आवाज़ें, न केवल श्रवण तंत्र को क्षतिग्रस्त करती हैं बल्कि मस्तिष्क पर निरंतर दबाव भी डालती हैं। यही कारण है कि आजकल 'साइलेंस' का अर्थ ही बदल गया है हम शोर के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि बिना आवाज़ हमें बेचैनी घेर लेती है।

डॉक्टरों का मानना है कि लंबे समय तक हेडफोन में तेज़ संगीत सुनने से श्रवण नाड़ी को स्थायी हानि पहुँचती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति को 'टिनिटस' (कानों में निरंतर घंटी या आवाज़ की अनुभूति) जैसी समस्या हो सकती है। धीरे-धीरे सुनने की क्षमता कम होती जाती है, और व्यक्ति को अपने आसपास की ध्वनियाँ धुंधली लगने लगती हैं। इस समस्या की भयावहता यह है कि इसका प्रभाव धीरे-धीरे होता है,  न दर्द, न कोई स्पष्ट लक्षण, बस एक अदृश्य मौन जो भीतर घर करता चला जाता है।

कान मानव शरीर का अत्यंत संवेदनशील अंग है। इसकी अंदरूनी झिल्ली और नसें तेज़ ध्वनि के प्रति अत्यंत नाजुक होती हैं। जब हम लगातार 85 डेसिबल से अधिक ध्वनि पर संगीत सुनते हैं, तो धीरे-धीरे ये नसें क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। 100 डेसिबल पर केवल पंद्रह मिनट सुनना भी हानिकारक हो सकता है, जबकि 120 डेसिबल की ध्वनि, जो कई हेडफोन और नाइट क्लबों में सामान्य मानी जाती है, कुछ ही मिनटों में स्थायी हानि पहुँचा सकती है। 

हेडफोन का यह शोर केवल कानों तक सीमित नहीं है; यह मन और व्यवहार तक पहुँच चुका है। जो ध्वनि हमें सुकून देती थी, वही अब हमें बाहरी दुनिया से काटने लगी है। बातचीत कम हो रही है, आत्मीय संबंधों में दूरी बढ़ रही है, और हर व्यक्ति अपने छोटे-से डिजिटल संसार में कैद होता जा रहा है। एक ओर तकनीक हमें जोड़ने का दावा करती है, वहीं यह हमें हमारे आसपास के लोगों से दूर कर रही है। “वर्चुअल कनेक्शन” के इस युग में वास्तविक संवाद का अभाव सबसे बड़ा मौन संकट बनकर उभरा है।

लंबे समय तक ईयरबड्स कान में लगाए रखने से कानों में हवा का आवागमन रुक जाता है। यह नमी और बैक्टीरिया के पनपने का कारण बनता है, जिससे फंगल या बैक्टीरियल संक्रमण बढ़ने की संभावना रहती है। कानों में खुजली, दर्द, सूजन या मवाद जैसी समस्याएँ आज के युवाओं में आम हो चुकी हैं। तेज़ बीट्स वाले संगीत से मस्तिष्क की तरंगें लगातार उत्तेजित रहती हैं, जिससे ध्यान की एकाग्रता और स्मरण शक्ति दोनों प्रभावित होती हैं। 

हेडफोन का असर शरीर के अन्य हिस्सों पर भी दिखाई देने लगा है। ब्लूटूथ या वायरलेस हेडफोन के लंबे उपयोग से सिरदर्द, चक्कर और थकान की शिकायतें आम हो गई हैं। मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन पर झुककर बैठने से गर्दन और कंधों में जकड़न बढ़ जाती है। लगातार ध्वनि के संपर्क में रहने से न केवल एकाग्रता में कमी आती है, बल्कि बच्चों और किशोरों में व्यावहारिक चिड़चिड़ापन भी देखा जा रहा है। सड़क सुरक्षा की दृष्टि से भी यह खतरनाक प्रवृत्ति है। 

परिवहन मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, भारत में हर वर्ष लगभग पंद्रह सौ से अधिक दुर्घटनाएँ ऐसी होती हैं जिनमें हेडफोन लगाए व्यक्ति चेतावनी संकेत या हॉर्न नहीं सुन पाते। रात में हेडफोन लगाकर संगीत सुनना या वीडियो देखना भी नींद की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करता है। जब मस्तिष्क को विश्राम की आवश्यकता होती है, तब लगातार ध्वनि तरंगें उसे सक्रिय रखती हैं। इससे गहरी नींद नहीं आती और व्यक्ति सुबह थका हुआ महसूस करता है। धीरे-धीरे यह आदत तनाव, चिड़चिड़ापन और स्मरण शक्ति की कमजोरी का कारण बन जाती है।  

भारत का बदलता शहरी परिदृश्य इस समस्या की जद में है। मेट्रो, बस, पार्क, जिम हर जगह लोग अपने-अपने संगीत संसार में खोए दिखाई देते हैं। भीड़ में रहकर भी एकांत का यह रूप सामाजिक दूरी को बढ़ा रहा है। यह स्थिति विशेष रूप से ग्रामीण अंचलों व आदिवासी समाज में देखने को मिल रही है , जहाँ जो समाज मूल रूप से सामुदायिक ध्वनियों पर आधारित समाज है-गीत, नृत्य, पर्व-त्योहार, वाद्ययंत्र और समूह-प्रदर्शन इसकी सांस्कृतिक धुरी हैं। लेकिन बदलती तकनीक के साथ हेडफोन, विशेषकर युवाओं में, “स्टाइल” और आधुनिक पहचान का प्रतीक बन गए हैं। 

पिछले पाँच–सात वर्षों में सस्ते स्मार्टफोन और डेटा पैक ने इस प्रवृत्ति को और इन इलाकों में तेज़ किया है। अब स्कूल-कॉलेज जाने वाले छात्रों के साथ-साथ खेतों में काम करते समय, चराई पर जाते हुए या गाँव के रास्तों पर चलते हुए भी युवक-युवतियाँ हेडफोन लगाए दिखाई देते हैं। यह बदलाव केवल एक उपकरण का उपयोग नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक संक्रमण का संकेत है, जिसमें निजी मनोरंजन सामुदायिक ध्वनि-संस्कृति पर हावी होता जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप न सिर्फ सामाजिक संवाद कमजोर पड़ रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का स्थानीय संगीत और सांस्कृतिक मूल्यों से स्वाभाविक जुड़ाव भी कम होता जा रहा है।

वहीं दूसरी ओर ऑनलाइन शिक्षा और मोबाइल गेम्स ने बच्चों को भी हेडफोन से जोड़ दिया है। आठ से चौदह वर्ष की आयु में जब उनकी श्रवण शक्ति और मानसिक विकास पूर्ण रूप से नहीं होता, तब तेज़ आवाज़ और लंबे उपयोग का प्रभाव कई गुना अधिक होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि बच्चे प्रतिदिन एक घंटे से अधिक हेडफोन का उपयोग करें, तो सुनने की क्षमता में गिरावट, ध्यान की कमी और व्यवहारिक असंतुलन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

अब समय है कि हम इस अदृश्य खतरे को समझें और अपनी संवेदनशीलता को पुनः जगाएँ। संगीत सुनें, पर अपने कानों और मन की सुनने की क्षमता को न खोएँ, क्योंकि जीवन की असली धुन वही है जो हम अपने आस-पास के लोगों, प्रकृति और स्वयं से जुड़कर सुनते हैं।

सम्प्रति - 20 वर्षो से शिक्षा एवं विकास के क्षेत्र में कार्यरत है। वर्तमान में आदिवासी अंचल में शिक्षकों व आदिवासी बच्‍चों के साथ जीवन कौशल शिक्षा कार्य से सम्‍बद्ध है। 

 stat.ujjain@gmail.com  मो: 9479514722

लघुकथाः चिप

 - मीनू खरे

   “दो घण्टे हो गये हैं चैटिंग करते!”

“तुमसे बात करता हूँ, तो किसी दूसरी ही दुनिया में चला जाता हूँ!मन करता है तुम्हें चिप बनाकर फ़िट कर लूँ अपने आप में..जब चाहूँ चिप ऑन,चैट शुरू …”

“चिप बेशक बना लो; लेकिन जैसे आज स्टाफ़ रूम में मुझे देख रहे थे सबके सामने वैसी गहरी निगाहों से मत देखा करो प्लीज़! मेरा दिल धड़कने लगता है!”

“इतनी मुश्किल ज़िन्दगी में भी इतने कोमल एहसास! इसीलिए तुम सबसे अलग हो!”

“अब फ़ोन रखो”

“ नहीं तुम रखो”

“क्यों?”

“ तुमसे दूर होता हूँ, तो लगता है जान निकल जाएगी! टुकड़ों में नहीं अब तुम्हें पाना चाहता हूँ पूरा!”

“नही ! इट हैज़ टू बी अ प्लेटोनिक लव ओनली! पवित्र…पॉयस.. दोस्तीनुमा प्रेम !”

“इतनी इंटिमेसी में यह दूरी ठीक है?”

“ यही तो ठीक है! तुम मैरिड हो!”

“नही! देखना एक दिन मेरा चाहा ही होगा!”

“नहीं! तुम मैरिड हो!”

“तो क्या हुआ! तुम सिर्फ़ मेरे लिए बनी हो!”

“और तुम?”

“…”

“बोलो”

“क्या बोलूँ? तुम सब जानती हो।”

“तुम इतनी देर चैट करते हो, तो मिसेज़ कुछ कहती नही?”

“वो सो गई हैं।”

“क्या उन्हें हमारे बारे में सब बता दिया है?”

“नहीं तो! क्या है हमारे बीच जो किसी को बताऊँ!”

आगे कभी चैट नही हो सकी। चिप करप्ट हो गयी थी।

व्यंग्यः नये साल में लालबुझक्कड़ फिर मिल गए


 - गिरीश पंकज

पिछले साल भी उनके दर्शन हुए थे। इस बार फिर हो गए। मुझे देखते ही वह यादों में खो गए। मुस्कुराते हुए बोले, "हम पिछली बार मिले थे भोले और हमने कहा था, ये करेंगे, वो करेंगे। दुनिया से हम नहीं डरेंगे, तो इस बार भी हम दुनिया से नहीं डरेंगे और जबरदस्त काम करेंगे।"

हम खुश हुए कि नाकारा लोगों की जमात के कुख्यात  सदस्य लालबुझक्कड़ जी इस वर्ष कुछ-न-कुछ तो गुल ज़रूर खिलाएँगे।

हमने पूछ लिया, "क्या करेंगे, इसका खुलासा तो करो!"

वह बोले, "हम प्यार में पड़ गए हैं इस वर्ष। तो बस यही करेंगे।"

मैंने चौंकते हुए कहा, "अरे, यह अचानक लवेरिया कैसे हो गया?। पिछले दिनों तुमको मलेरिया हुआ था। उससे उबरे तो लवेरिया हो गया?"

वह बोले, "मलेरिया के कारण ही लवेरिया हुआ है। बीमार पड़े थे और फेसबुक पर नज़रें गड़ाए हुए थे। तभी एक बुजुर्ग टाइप की जवान महिला ने मेरे इनबॉक्स में आकर कह दिया –‘आई लव यू’, तो हमने भी कह दिया- ‘आई लव यू’…और बस, प्रेम की गाड़ी चल पड़ी।"

मैंने पूछा, "वह रहती कहाँ है ", तो लालबुझक्कड़ जी ने कहा, " झुमरी तलैया में रहती है। उससे मिलने भी अब जाना है। मुझको बुला रही है।"

मैंने हँसते हुए कहा, " बंधु! यह फेसबुक वाली लव स्टोरी अकसर बड़ी फर्जी निकल जाती है, इसीलिए होशियार रहो…सावधान रहो…सतर्क रहो, वरना बेड़ा गर्क हो जाएगा। लाखों रुपये का चूना लगेगा और जीवन नरक हो जाएगा। आजकल बहुत से शातिर पुरुष स्त्री बनकर सोशल मीडिया के जरिए ठगी का कारोबार करते रहते हैं। कहीं यह भी कोई ठग न हो। सावधान रहना।"

मेरी बात सुनकर लालबुझक्कड़ भड़क गए और कहने लगे, "लगता है, आप मेरी लव स्टोरी से जल रहे हैं। आप तो सूखे बरगद हैं; लेकिन हम तो अभी तक हरे-भरे पेड़ हैं। इसमें मोहब्बत के फल लगेंगे-ही-लगेंगे। उसके चक्कर में जब-जब बोलती है, कुछ पैसे भेजते जाता हूँ।"

मैंने कहा, "लेकिन पिछले साल तुम्हारा किसी रामकली से चक्कर चल रहा था, मगर इस बार झुमरीतलैया की कथकली के साथ चक्कर चला रहे हो। यह कौन-सा गुल खिला रहे हो? असलियत तो पता कर लो कि वो लड़की है या लड़का। फर्जी आईडी बनाकर लोग साइबर क्राइम भी कर रहे हैं। बचके रहना रे बाबा, बचके रहना!"

लालबुझकक्ड कुछ सोचने लगे और बोले, "आपने तो  मुझे कन्फुजिया दिया। मुझे संकट में डाल दिया। मैं सोच रहा था कि इस साल एक नया रिश्ता परवान चढ़ेगा। मौजाँ-ही- मौजाँ- होग:, लेकिन अब तो लगता है, इस परवान से सावधान रहना होगा।"

मैंने कहा, "कभी झुमरीतलैया वाली से फोन पर बात हुई क्या?"

लालबुझक्कड़ बोले, "बात तो नहीं हुई, बस संदेशों का आदान-प्रदान होता रहता है।"

मैंने हँसकर कहा, "एक बार फोन से बात करके तो देखो। आवाज लड़की की निकल रही है या लड़के की। तब स्पष्ट हो जाएगा।"

लालबुझक्कड़ ने मुंडी हिलाई और चैट बॉक्स से ही फोन कर दिया। घंटी जाती रही। किसी ने फोन नहीं उठाया।  लालबुझकक्ड को शक होने लगा कि मामला फर्जी है। जिसे अति उत्साह में अपनी प्रेयसी समझ रहे थे, वह तो कोई बड़ा वाला ठग है।

 लालबुझक्कड़ ने मैसेज किया कि रूपसी, अपनी तस्वीर तो भेजो। लेकिन रूपसी (या रूपसा…?) ने अपनी तस्वीर नहीं भेजी। अब तो लाल बुझक्कड़ को कंफर्म हो गया इन बॉक्स में टपकने वाला कोई फर्जी आदमी है। जो अब तक उसे जम कर चूना लगाता रहा।

उसकी असलियत जानकर लालबुझक्कड़ तनाव में आ गए और कहने लगे, "मेरी लव स्टोरी का तो द ऐंड हो गया है। अब यह साल कैसे बीतेगा? मेरी राशि में तो नए साल में सुंदर-सुंदर घटनाओं का योग लिखा था।"

  मैंने उसे सांत्वना देते हुए कहा – ‘‘बच्चू, पिछले साल भी तुमने कुछ खास नहीं किया; लेकिन इस साल तो  कुछ ऐसा करके दिखाओ कि तुम्हारे घर वाले तुम पर गर्व करें। लवेरिया का चक्कर छोड़ो, वरना चूना लगता रहेगा। इसलिए बेहतर है कि बेरोजगार संघ के पदाधिकारी बने रहने के बजाय छोटा-मोटा कोई काम कर लो। हमारे प्रधानमंत्री की सीख मान लो और पकौड़ा बेचने का काम ही करने लग जाओ। साथ में चाय-ठेला लगा लो। जब से चाय वाला प्रधानमंत्री बना है, चाय वाले अपने आप को किसी प्रधानमंत्री से कम नहीं समझते।"

लालबुझक्कड ने कहा, "यह आपने बिल्कुल सही फरमाया। अब हम किसी से चोंच लड़ाने के पहले उससे मोबाइल में  गोठिया लेंगे। उसका चेहरा भी देख लेंगे। कहीं कोई बुढ़िया, जवान होने का नाटक करके हमको गेम तो नहीं दे रही।"

"मतलब यह कि तुम सुधरोगे नहीं।" हम भी हँसकर बोले, "अब तू नहीं और सही और नहीं और सही का फार्मूला अपना रहे हो? लगे रहो मुन्ना भाई! तुम होगे कामयाब एक दिन! लेकिन कुछ काम तो करो!"

लाल बुझक्कड़ ने कान खुजाते हुए कहा, "कुछ सोच तो रहा हूँ कि कुछ करूँ; लेकिन क्या करूँ, कैसे करूँ, यह समझ नहीं आ रहा है।"

इतना बोलकर वह  खुद ही जोर-से हँसे। हम समझ गए कि ये महोदय इस साल में कुछऊ ना करेंगे। हमने लाल बुझक्कड़ को नमस्ते किया और अपनी राह चल पड़े।

व्यंग्यः शुभकामनाओं की दहशत

 - विनोद साव

सर्दी की सुबह की नर्म धूप, चाय की चुस्की और अख़बार- तीनों की ‘कॉकटेल’ बनाकर रसास्वादन करते हुए मैं अपने आँगन में खड़ा ही हुआ कि थोड़ी देर में ‘हैप्पी न्यू-इयर’ की हुंकार सुनाई दी। मैं चौंक गया। सिर उठाकर जब सामने देखा तो पड़ोसी साहू जी को पाया। वे अपने अहाते से हाथ उठाकर मुझे नए साल की शुभकामना का सिग्नल दे रहे थे- तब याद आया कि आज नए साल का पहला दिन है।

ओह! नया साल फिर आ गया। अभी-अभी तो पिछले साल को झेला है और पेला है। कल रात ही उसे टरकाया है। अब फिर एक नया साल फिर कोई नया झमेला होगा। फिर नई समस्याओं की शुरुआत होगी। मुझे याद आ गए बीते पिछले कुछ साल जो हर साल कुछ नहीं तो नई सरकार लेते आए थे। हर साल एक नई सरकार और साल के जाते-जाते सरकार भी चली जाती- फिर नया साल आता और अपने साथ नई सरकार लाता। टीवी में दिखाए जाने वाले किसी चमचमाते साबुन के विज्ञापन की तरह ‘अब लक्स नहीं... न्यू-लक्स’। वैसे ही आने वाला नया साल कहता- ‘अपनें चाहने वालों के लिए पुरानी नहीं... नई सरकार... नए साल का नया उपहार।।। हमारी न्यू-सुपर सरकार। जनता की दरकार पर नई सरकार। नई सरकार की नई पेशकश- सौ दिनों में महँगाई हटाए... बेजा कब्जे पर पट्टा दिलवाए... पब्लिक सेक्टर को प्राइवेट बनवाए। ऋण माफ़ी कराए, लगान माफ़ी कराए और सबकी जन्म-शताब्दी मनाए। इस तरह हर साल के शुरू होने के साथ ही नए आश्वासन, नई घोषणाएँ, नई परियोजनाएँ के वे सब्ज बाग दिखाते, देशप्रेम की बात करते। ऐसा लगाता कि ‘राम राज आ रहा है पर हमें रावण राज भी नसीब नहीं हुआ। कहते हैं- रावण की लंका सोने की थी।’ रावण की प्रजा सुखी थी पर यहाँ तो हर साल राष्ट्र के नाम संदेशों में वे देश की जनता को अपनी प्यार भरी शुभकामनाएँ देते और साथ में साल भर हमें- बढ़ती बेरोजगारी चढ़ती महँगाई, गरीबी-भूखमरी और दंगों की सौगात देते। अब हर शुभकामना संदेशों के बाद मन में दहशत समाने लगता है... किसी अज्ञात आशंका से मन काँपने लगता है।

आजकल शुभकामनाओं से मैं परहेज करने लगा हूँ। इनसे मुझे अपच सी होने लगी है। आज फिर एक नए साल का पहला दिन है। दिन भर नए साल की मुबारकबाद देने वालों का तांता लगा रहेगा। हैप्पी न्यू इयर की रट लगाने वालों का हमला होगा। यह सोचकर मैं ऊपर से नीचे तक सिहर उठा। मन शुभकामनाओं के खौफ से भर उठा। इस पड़ोसी साहू के बच्चे ने भी सबेरे- सबेरे मूड-ऑफ कर दिया। अगल-  बगल वालों का चैन-सुख छीनकर आखिर उसने अपना पड़ोसी धर्म निभा ही दिया।

जिस दिन भी कोई मेरे सुखद जीवन या उज्ज्वल भविष्य के लिए अपनी शुभकामनाएँ देता है मैं घबरा उठता हूँ। ऐसा लगता है जरूर कहीं पर कुछ गड़बड़ होने वाला है। मुझे किसी साजिश का अन्देशा होता है। शुभकामना देने वाला किसी षड्यंत्रकारी सा लगता है। मेरे खिलाफ चलाए जाने वाले किसी कुचक्र का भान होता है। मुझे चाणक्य सूत्र याद आने लगता है - ‘यदि कोई अति-सौजन्य दिखा रहा तो या अतिशय औपचारिकता पूरी कर रहा हो तो वह संदेह जनक है।’ जरूर उसके पीछे कोई राज है। इनसे बचने का प्रयास करें।’ मैं इन थोपी गई शुभकामनाओं पर चिंतन करने लग जाता हूँ कि क्या जरूरत है किसी की बेरोक- टोक शुभकामनाओं की। मैं अच्छा खासा और भला- चंगा हूँ। हर रोज बिना वजह अपनी ड्यूटी पर चला जाता हूँ। जिसके एवज में सरकार से भरी- पूरी तनख्वाह वसूल लेता हूँ। बीवी-बच्चों की तरफ से सब खैर है। ऑफिस वाले सहकर्मियों की भी मेहरबानी है जो मुझ जैसे साहित्यानुरागी को झेल रहे हैं। बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद, इष्ट-मित्रों की कृपा और महिलाओं की दया- मया भी मेरे कंधों पर है। स्थिति भले ही थोड़ी तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है इसलिए मैं किसी की मुबारकबाद का मोहताज नहीं हूँ। ऐसे में किसी पड़ोसी द्वारा सवेरे-सवेरे मेरे अहाते में शुभकामना संदेश फेंक देना मुझे ‘काग-दोष’ देखने जैसा जान पड़ता है। सब ठीक- ठाक चल रहा था कि उनकी शुभकामनाओं की बिल्ली ने रास्ता आड़ काट दिया। ये शुभकामनाएँ मुझे वैसे ही कचोटती हैं, जैसे देश की जनता को राष्ट्र के नाम संदेश।

पता नहीं इन शुभकामनाओं का ग्रह-नक्षत्र मेरे साथ ठीक क्यों नहीं बैठता है? जब भी कोई देता है तो बस कहीं न कहीं कोई अनिष्ट हुआ समझो, फिर वह पूरा दिन मुझे हर सम्भावित अनिष्ट को नाकाम करने की कोशिश में बिताना पड़ता है। मैं हर महत्त्वपूर्ण दिन में लोगों से मिलने- जुलने में कतराने लगा हूँ। पता नहीं किसके मुँह में क्या निकल जाए। किसी की ग्रीटिंग कोई गारंटी-कार्ड तो है नहीं फिर आजकल गारंटी- वारंटी देने वाले कौन से पक्के हैं। ये कम्बख्त डाक वाले भी मेरी रचना की स्वीकृति तो लाते नहीं। यदि कहीं छप भी गई तो भेजी गई पत्रिका को गोलगप्पड़ कर जाते हैं और ये ग्रीटिंग कार्ड फेंक जाते हैं।

दिमाग में उठे ख्यालात और दिन में बनी ग्रंथियाँ तजुर्बों से ही पक्के होते हैं। मैंने कई बार ये पाया है कि ‘टैम- कुटैम’ जब भी हमारे तथाकथित कृपालुओं ने लोगों को शुभकामनाएँ दी तो उसका ‘रिएक्शन’ ही होता है। वे निरपेक्षता की बात करते तो इधर सापेक्षता का घनत्व अपने उफान पर होता है। वे सत्य-अहिंसा- परमोधर्म: का उपदेश देकर यह जताते हैं कि ‘उपदेश सदैव सुनने वालों के लिए होते हैं। कहने वालों के लिए नहीं।’ इधर हिंदी-चीनी भाय- भाय की गुहार लगाते और उधर बॉर्डर पर लोग गोलियों की धाँय- धाँय सुनाते। हिन्दू- मुस्लिम-सिक्ख- ईसाई आपस में है भाई-भाई के नारे ‘आपस में हैं सब दंगाई’ में तब्दील हो जाते हैं। राम की मंगलकामना, रहीम की मुबारकबाद और रजिंदर का नया-साल दी मुबारक सब कुछ धरा का धरा रह जाता है। अंतरात्मा की आवाज हवा हो जाती है। तब वे नए सिरे से शुभकामना देने के प्रयास में लग जाते हैं। नए प्रयोग काम में लाते हैं। उन पर शुभकामना देने का फितूर सवार होता है। वे कौमी-एकता, क्रॉस-कंट्री-रेस, एकता पर्व और सर्वधर्म सम्मलेन मनाकर शुभकामना देने के नए-नए हथकंडे तलाशते हैं और देश रसताल की ओर जाता हुआ यह साबित कर देता है कि केवल कोरे नारों व खोखली दुआओं के भरोसे स्थायित्व का आ पाना संभव नहीं है।

देश की और मेरी दशा एक समान है। देश के शुभचिंतकों ने जैसी देश की दशा बनाई वैसे ही मेरे हितैषी मुझे नहीं बख्शते हैं। अब तो इनके भय से अपने बच्चों का जन्मदिन और अपनी शादी की सालगिरह मनाने की हिम्मत नहीं होती। ऐसे मौके पर किसी एक इष्ट का हम सुमिरन करते हैं तो पूरे इष्ट मित्रों का कुनबा हमारे दरवाजे पधारता है। कभी इम्तिहान के दिनों में भी उनके ‘विश यू आल द बेस्ट’ के नारे मेरे मार्क्स घटाते रहे और मेरी उत्तर-पुस्तिका का तापमान कभी- कभी शून्य तक भी उतर जाता। प्रैक्टिकल में मिलने वाले मार्क्स मुझे अक्सर इम्प्रेक्टिकल करार करते रहे। बेरोजगारी का ये आलम होता कि कभी- कभार कोई इंटरव्यू कॉल मिल भी जाता तो इन्टरव्यू दिलाने वाले मेरे दूसरे साथी अपनी शुभकामना मुझे दे देते और बदले में मेरी नौकरी वे ले लेते। ले-दे के आज मेरे सारे जीवन की पूंजी एक अदद नौकरी मुझे मिल गई है तो यहाँ भी मुझसे ज्यादा प्रैक्टिकल मेरे शुभकामना दाता मेरी प्रमोशन खुद हड़प लेते हैं।

ऐसी कई कड़वी घुटों को पीने के बाद अपने शुभचिन्तकों से किनारा करने लगा हूँ।

“आज ऑफिस नहीं जाना है क्या?” की मेरी वामायी आवाज ने मेरी चिंतन प्रक्रिया को भंग किया तो देखा कि इस नए साल के पहले ही दिन मैं ऑफिस के लिए लेट हो चुका हूँ। इस लेट लतीफी के कारण बॉस की शुभकामना अब रूखे स्वर में सुननी पड़ेगी। आज सबेरे पड़ोस में मिलने वाली शुभकामना की दहशत से मन भर गया। सोचा कि इस पड़ोसी को पकड़कर दो-चार शुभकामनाएँ  मैं भी जमा दूँ ; लेकिन ‘दिल के अरमां आँसुओं में बह गए।’ और उधर वे चिल्ला- चिल्लाकर मुझे सुना रहे हैं ‘साल नया अब आया हो, जियो मेरे राजा।’

सम्पर्कः मुक्तनगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़) 491 001, मो. 9009884014 

खलील जिब्रान की दो लघुकथाएँ

 अनुवाद: सुकेश साहनी

1. सफाई 

दार्शनिक ने गली के सफाईकर्मी से कहा, "मुझे तुम पर दया आती है, तुम्हारा काम बहुत ही गंदा है।"

मेहतर ने कहा, "शुक्रिया जनाब, लेकिन आप क्या करते हैं?"

प्रत्युत्तर में दार्शनिक ने कहा, "मैं मनुष्य के मस्तिष्क उसके कर्मो और चाहतों का अध्ययन करता हूँ।"

तब मेहतर ने गली की सफाई जारी रखते हुए मुस्कराकर कहा, "मुझे भी आप पर तरस आता है।"

2. लीडर 

पवित्र नगर की तलाश में जाते हुए मेरी मुलाकात एक दूसरे यात्री से हुई, मैंने उससे पूछ लिया, "पवित्र नगर पहुँचने का सही रास्ता यही है क्या?"

उसने कहा, "मेरे पीछे-पीछे चले आओ, चौबीस घंटों के भीतर तुम पवित्र नगर पहुँच जाओगे।"

मैं उसके पीछे चल पड़ा। हम दिन-रात चलते रहे, कई दिन बीत गए, पर हम पवित्र नगर नहीं पहुँचे।

तभी अप्रत्याशित बात हुई,  वह मुझ पर बरस पड़ा; क्योंकि मैं जान गया था कि उसे पवित्र नगर के रास्ते के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

लघुकथाः दुर्गंध

- सुकेश साहनी

उस बूढ़े का झुर्रियोंभरा चेहरा आँसुओं से तर है। वह अजय को अपनी बीमार पत्नी की मृत्यु के बारे में बताते हुए बच रही दवाइयाँ और इंजेक्शन वापस ले लेने के लिए कहता है। अजय मेरी ओर देखता है। वह हाल ही में नौकरी पर लगा है, इसलिए निर्णय नहीं ले पाता। मुझे उसकी इस आदत से ख़ुशी होती है। मैं उसकी मदद के लिए उसके पास जाता हूँ। बूढ़े की दवाओं पर निगाह डालते ही मुझे अपनी दुकान का नकली माल- पहचानने में देर नहीं लगती।

"बाबा, माफ़ करो!" मैं कहता हूँ, "बिका हुआ माल वापस नहीं होगा, अगर चाहो तो इसके बदले में दूसरी दवाई दे सकता हूँ।"

बूढ़ा फिर गिड़गिड़ाता है और आशाभरी नज़रों से मेरी ओर ताकता है। अजय भी आँखों ही आँखों में मुझसे बूढ़े की सिफ़ारिश करता है।

"तुमसे कहा न, जाओ। हमें काम करने दो!" मैं सख्ती से कहता हूँ और बूढ़ा सिर झुकाए दुकान से बाहर निकल जाता है।

"सर! उसकी बीवी मर गई है।" अजय को मेरे व्यवहार से ठेस लगती है। "हो सकता है उसे रुपयों की सख्त ज़रूरत हो..."

"अजय, तुम सोचते बहुत हो!" मैं नरमी से कहता हूँ, "हम तुम्हारी तरह सोचने लगे तो कर चुके दुकानदारी!"

वह उदास कदमों से ग्राहकों के लिए दवाइयाँ निकालने लगता है। मैं उसकी परिस्थितियों पर ग़ौर करता हूँ। लंबी बेरोज़गारी के बाद उसे यहाँ नौकरी नसीब हुई और क्षयरोग से पीड़ित पत्नी अस्पताल में पड़ी है। मुझे लगता है, वह जल्दी ही मेरे मुताबिक ढल जायेगा। मैं वापस अपनी कुर्सी पर आ जाता हूँ।’’

कोई ग्राहक अजय से कैशमीमो के लिए ज़िद कर रहा है। "देखिए, कैशमीमो अभी छप रहे हैं।" अजय मेरे कहे अनुसार ग्राहक को बताता है।

"आप सादे कागज़ पर ही बनाकर स्टैंप लगा दीजिए।" ग्राहक अभी भी अड़ा हुआ है।

"हमारा टाइम खराब मत करो,"मैं उठकर उसके हाथ से दवाएँ छीन लेता हूँ, "जहाँ से तसल्ली हो, वहाँ से खरीद लो!"

"सर!" खरीदार के दुकान से जाते ही अजय ने मेरी आँखों में झाँकते हुए पूछता है, "क्या हम  नकली दवाएँ बेचते हैं?"

"देखो, तुम फिर सोचने लगे,"मैं उसे बड़े प्यार से समझाता हूँ, "जितनी भी सेल तुम्हारे हाथों हो रही है, उसका बीस प्रतिशत तुम्हें तनख्वाह के अलावा मिलेगा। तुम्हारे व्यवहार से हमारी प्रतिदिन की सेल काफ़ी बढ़ गई है। मैं मेहनती लोगों की बहुत कद्र करता हूँ।"

"मैं यह काम नहीं कर पाऊँगा।" पहली बार बिना 'सर' सम्बोधित किए उसके बर्फीले शब्द मेरे कान में पड़ते हैं।

"मैं तुम्हें- तुम्हें अपनी बीमार पत्नी के बारे में तो सोचना चाहिए... " -मैं कहता हूँ और फिर अपनी कमज़ोर और फटी-फटी आवाज़ पर ख़ुद ही हैरान रह जाता हूँ।

वह बिना मेरी ओर देखे अपना टिफिन उठाता है और दृढ़ कदमों से दुकान से बाहर निकल जाता है।

मैं हैरानी से उसे जाते हुए देखता रह जाता हूँ। काउंटर पर ग्राहक इकट्ठे हो जाते हैं। अजय का चेहरा मेरी आँखों के आगे से हटाये नहीं हटता। मैं सिर झटककर दवाएँ निकालने लगता हूँ। जल्द ही मैं पसीने से नहा जाता हूँ। पसीने और दवाइयों की मिली-जुली दुर्गन्ध से दिमाग़ भन्ना जाता है। मैं हैरानी में डूब जाता हूँ , ऐसी दुर्गन्ध पहले तो कभी महसूस नहीं हुई!