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Mar 14, 2014

शिक्षा हर नारी का अधिकार

शिक्षा हर नारी का अधिकार

- डॉ. प्रीत अरोड़ा
आज लगातार टी.वी. चैनलों और अखबारों की सुर्खियों में नारी के साथ हो रहे हादसों को देखकर मन व्यथित हो रहा है। नारी सरेआम  घर और बाहर दोनों जगह शोषित हो रही है। चाहे कितने ही संस्थाएँ बना दी जाए या नारी के हक लिए आन्दोलन किए जाएँ कहीं भी स्थिति में सुधार होता नज़र नहीं आ रहा। हम प्रत्येक वर्ष महिला-दिवस बहुत धूमधाम और खुशी से मनाते हैं पर उस नारी-वर्ग की खुशियों का क्या जो अशिक्षा के कारण अपने मानवीय अधिकारों से वंचित महिला-दिवस के दिन भी गरल के आँसू पीती है। ऐसे समाज में पुरुष स्वयं को शिक्षित, सुयोग्य एवं समुन्नत बनाकर नारी को अशिक्षित, योग्य एवं परतंत्र रखना चाहता है। शिक्षा के अभाव में भारतीय नारी असभ्य, अदक्ष अयोग्य, एवं अप्रगतिशील बन जाती है। वह आत्मबोध से वंचित आजीवन बंदिनी की तरह घर में बन्द रहती हुई चूल्हे-चौके तक सीमित रहकर पुरुषों की संकीर्णता का दण्ड भोगती हुई मिटती चली जाती है। पुरुष नारी को अशिक्षित रखकर उसके अधिकार तथा अस्तित्व का बोध नहीं होने देना चाहता। वह नारी को अच्छी शिक्षा देने के स्थान पर उसे घरेलू काम-काज में ही दक्ष कर देना ही पर्याप्त समझता है। मेरा मानना है कि अगर नारी को शोषण और अत्याचारों के दायरे से मुक्त होना है तो सबसे पहले उसे शिक्षित होना होगा; नही तो तब तक स्थिति ज्यों की त्यों ही बनी रहेगी। यहाँ शिक्षा का अर्थ केवल अक्षर ज्ञान से  नहीं, अपितु शिक्षा का अर्थ जीवन के प्रत्येक पहलू की जानकारी से है व अपने मानवीय अधिकारों का प्रयोग करने की समझ से है। इसके साथ ही साथ नारी को दो मोर्चोंपर भी मुख्य रूप से संघर्ष करना होगा। एक मोर्चा तो परम्परागत व्यवस्था में अपनी भूमिका निभाते हुए स्वाधीनता तथा अधिकारों की माँग के लिए योजनाबद्ध प्रयास करने से सम्बन्धित है ;जबकि दूसरे मोर्चे द्वारा उस मानसिकता को बदलना है, जो उसे आज भी भोग्या मानकर शोषण करना चाहता है। तभी सही अर्थों में नारी शिक्षित कहलाएगी और अत्याचार के दलदल से बाहर निकलकर खुले आसमान में विचरण कर पाएगी।
सम्पर्क: मकान नं. 405, गुरुद्वारे के पीछे, दशमेश नगर, खरड़
जिला- मोहाली पंजाब-140301 फोन 08054617915, Email- arorapreet366@gmail.com

Mar 10, 2013

समाज को नया दृष्टिकोण अपनाना होगा



समाज को नया दृष्टिकोण अपनाना होगा
- डॉ. प्रीत अरोड़ा
आज भारत विश्व के विकासशील देशों में अग्रणी माना जाता है। जहाँ औद्योगिक क्षेत्र से लेकर सामाजिक क्षेत्र की दशा व दिशा दोनों में ही अत्यधिक परिवर्तन हुआ है। परन्तु प्रश्न उठता है कि आज भी समाज की संकीर्ण सोच में आखिर कितना परिवर्तन आया है? विडम्बना तो यह है कि आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक स्त्री पीडि़त, शोषित, प्रताड़ित एवं काम-वासना का शिकार बनती हुई आई है। यह सत्य है कि पितृसत्तात्मक सत्ता के वर्चस्व के कारण नारी का जीवन सदैव प्रतिबंधित रहा है। पितृसत्तात्मक समाज में नारी का मनोबल कानून व व्यवस्था आदि पर पुरुषों का कब्जा होता है जहाँ वह नियम, कायदे, कानून, परम्परा, नैतिकता, आदर्श, न्याय एवं सिद्धांत द्वारा नारी- जीवन को नियत्रिंत करने की प्रक्रिया का निर्माण करते हैं और इस तरह वे नियंत्रण करके नारी- वर्ग पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहते हैं जिसके फलस्वरूप शुरू होता है-शोषण का घिनौना सिलसिला।
 शोषण ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा पितृसत्तात्मक समाज विजयी घोषित होकर नारी को अबला, पददलित व पराश्रित बना सकता है। इसलिए आज समाज में नारी के साथ होने वाला दैहिक, मानसिक, आर्थिक व शैक्षणिक शोषण का सिलसिला दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। आज कहने को तो नारी ने जीवन की सभी परिभाषाएँ बदल दी हैं। वह जीवन में निरर्थक से सार्थक बनकर परीक्षाओं व प्रतियोगिताओं में स्वयं को सशक्त भी सिद्ध कर रही है। यहाँ तक कि वह अपने पाँवों पर खड़ी होकर स्वाभिमानी जीवन भी व्यतीत कर रही है इसी कारण वर्ष 2001 को नारी सशक्तीकरण के नाम से भी घोषित किया गया है परन्तु इतिहास गवाह है कि नारी- समाज का अत्याचारों द्वारा प्रताडि़त होने के सिलसिले में तेजी से इज़ाफा हो रहा है। आज की स्वतंत्र नारी भारतीय समाज की संकीर्ण सोच के समक्ष हर नजरिये से परतंत्र बना दी जाती है। जहाँ उस नारी द्वारा अपने अधिकारों के लिए चलाई गई हर मुहिम भी दम तोड़ती नज़र आती है।
 आज भी महिला पढ़ी लिखी हो अथवा अनपढ़, गृहकार्य में दक्ष गृहस्वामिनी हो या चहारदीवारी लाँघकर अपने कन्धों पर दोहरा भार उठाने वाली परन्तु उसके प्रति समाज का दृष्टिकोण क्रूर ही नज़र आता है। ऐसे में उसे पुरुष सन्दर्भ के द्वारा ही पत्नी, माँ, बहन व बेटी का दर्जा ही प्राप्त होता है, इसके अतिरिक्त उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं माना जाता।
 आज की नारी चाहे घर की चारदीवारी के भीतर हो या घर से बाहर कार्यक्षेत्र में, शोषण का दबदबा हर जगह कायम होता जा रहा है। दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार किसी सभ्य समाज का उदाहरण प्रस्तुत नहीं करता। इस घिनौनी घटना ने पूरे भारतवर्ष को दहला कर रख दिया। न जाने अभी और कितनी मासूमों की जान ली जाएगी। आज समाज में नारी को बुरी दृष्टि से देखना, छेड़छाड़, यौन-उत्पीडऩ व अपहरण जैसी दर्दनाक घटनाएँ अखबारों व टी.वी. चैनलों पर चर्चा का विषय बनती जा रही हैं। पर क्या कहीं इन बढ़तीं वारदातों को विराम मिल रहा है? दु:ख तो इस बात का है कि नारी- शोषण की असहनीय पीड़ा को मूक साधिका बनकर सहन करने को विवश हो जाती है। कई बार हिम्मत करके वह कानून के कटघरे में इन्साफ के लिए गुहार तो लगाती है परन्तु  पितृसत्तात्मक समाज में कानून व्यवस्था कमजोर होने के कारण अत्याचारी दरिंदे सरेआम रिहा हो जाते हैं और शोषण का अगला इतिहास रचते हैं।
कहीं न कहीं नारी के साथ होने वाले शोषण के पीछे एक बड़ा कारण परिवार में ही लिंग- भेदभाव करना, लड़कियों की पराया धन के रूप में मान्यता इत्यादि मानसिकता भी है। फलस्वरूप उसे वह सारे सुअवसर प्राप्त नहीं होते जिससे उसका बौद्धिक व नैतिक विकास सुचारू रूप से हो सके। आज भी पारिवारिक परिवेश के अन्तर्गत ऐसे कई हजारों उदाहरण मिल जाएँगे जहाँ पुरुष कदम-कदम पर नारी से सहयोग की अपेक्षा करता है जिसके कारण नारी की अपनी खुशियाँ, इच्छायें  और अभिव्यक्तियाँ पारिवारिक कल्याण और सुख शान्ति के नाम पर गौण हो जाती हैं। आज भी आए दिन लड़की के ससुराल वालों की अतृप्त माँगों के पूरे न होने पर विवाहिता को जलाने या आत्महत्या करने की कोशिश जैसी घटनाएँ सुनी- सुनाई जाती हैं परन्तु प्रताडऩा का यह सिलसिला कहीं थमता नज़र नहीं आता। जहाँ आज अत्याचारों से पीडि़त घरेलू नारी की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है वहीं कार्यक्षेत्र में कामकाजी नारी भी शोषण के चक्रव्यूह में फँसी नज़र आ रही है। कई बार कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत भी नारी पुरुष के निर्भीक वर्चस्व, स्वार्थपरता व पितृसत्तात्मक शक्ति के कारण भयावह जीवन व्यतीत करती है। उसे कार्यक्षेत्र में प्रतियोगी, सहयोगी व बॉस जैसे पुरुषों के व्यग्यं- उपहास एवं बदनाम व्यवहार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यदि हम एक नज़र पिछड़े इलाकों और ग्रामीण समाज पर भी डालें तो वहाँ नारी की स्थिति और भी दयनीय है। पिछड़े इलाकों और ग्रामीण समाज में नारी को प्रत्येक क्षेत्र में कमज़ोर मानकर मानसिक रूप से विखंडित किया जाता है। आज भी वहाँ नारी को घर की दासी, विलासिता की वस्तु और सन्तान पैदा करने का यंत्र माना जाता है। नारी को पुरुष के समान स्वतंत्र चिन्तन की छूट नहीं दी जाती है इसका प्रमुख कारण है कि भारतीय समाज कुण्ठाओं और वर्जनाओं से भरपूर समाज है जहाँ आज भी अनेकानेक प्रकार की सामाजिक कुरीतियाँ व रूढिय़ाँ बरकरार है।                
 पितृसत्तात्मक समाज नारी के अधिकारों पर विविध वर्जनाओं व निषेधों का पहरा बिठा चुका है। जहाँ समाज की रूढ़िवादी परम्पराओं से मुक्ति पाना इतना आसान नहीं दिखता। अगर हम आज के पढ़े-लिखे व सभ्य समाज की संकुचित अवधारणा से मुक्ति पाने के लिए शिक्षा को एक मात्र हथियार माने तो वह भी किस हद तक सफल सिद्ध हुआ है? मैं मानती हूँ कि शिक्षा के अभाव में नारी असभ्य, अदक्ष, अयोग्य एवं अप्रगतिशील बन जाती है। परन्तु सच तो यह भी है कि आज सबसे ज्यादा कामकाजी व पढ़ी- लिखी नारी के साथ ही शोषण के हादसे हो रहे हैं। शिक्षित होकर भी नारी खुलेआम प्रताडऩा का शिकार होती है।
हर साल आठ मार्च को 'महिला दिवसकी दुहाई देकर अनेक सम्मेलन , सगोष्ठियाँ व जलसे निकाले जाते हैं। अखबारों व पत्रिकाओं में नारी- विशेषांक निकाले जाते हैं परन्तु समाज की सोच में कितने प्रतिशत परिवर्तन होता है। इसका अन्दाज़ा दिनदहाड़े होने वाली वारदातों से लगाया जा सकता है, चूंकि  सबके पीछे एक बड़ा कारण हमारे समाज की संकीर्ण सोच है और जब तक सोच में बदलाव नहीं आएगा तब तक ऐसे ही शोषण का चक्र अपने भीतर न जाने कितनी नारियों की दासता को समेटता चला जाएगा। हम सिर्फ और सिर्फ कठपुतली बनकर टी.वी. चैनलों, अखबारों व किताबों में वारदातों के किस्से पढ़ते एवं देखते रहेंगें। इसलिए आज आवश्यकता है समाज को अपनी संकीर्ण सोच में बदलाव लाकर एक नया दृष्टिकोण अपनाने की जिससे भारतीय सामाजिक व्यवस्था में भी बदलाव आएगा और नारी अपने समस्त अधिकारों से परिचित होकर समाज व परिवार में सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सकेगी।



लेखक के बारे मेः जन्म- 27 जनवरी, शिक्षा- एमए हिंदी पंजाब विश्वविद्यालय से। मृदुला गर्ग के कथा-साहित्य में नारी-विमर्श पर शोध-कार्य। अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन व अनुवाद। आकाशवाणी व दूरदर्शन के कार्यक्रमों तथा साहित्य उत्सवों में भागीदारी, हिंदी से पंजाबी तथा पंजाबी से हिंदी अनुवाद। देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं व समाचार-पत्रों में नियमित लेखन।


 संपर्क: मकान नम्बर- 405, गुरूद्वारे के पीछे, दशमेश नगर,खरड़, जिला- मोहाली, पँजाब-140301,फोन नं. 08054617915
Email- arorapreet366@gmail.com

Oct 27, 2012

बुढ़ापा



                      बुढ़ापा 
- डॉ. प्रीत अरोड़ा
मानवता की असली पहचान उसका दूसरों के साथ प्रेम, सद्भावना व आत्मीयता से व्यवहार करना है, परन्तु जब बात बुजुर्गों की होती है तो हम अपने इस व्यवहार को क्यों भूल जाते हैं ? जो माता-पिता अपना पूरा जीवन हमें सफल बनाने और लालन-पालन करने में समर्पित करते हैं और जब दायित्व निभाने का हमारा समय आता है तो हम अपने दायित्व से मुँह क्यों मोड़ लेते हैं? हम क्यों यह भूल जाते हैं कि अगर आज हम अपने बुजुर्गों के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार कर रहे हैं तो हमारी भावी पीढ़ी हमारे साथ न जाने कैसा व्यवहार करेगी?
आज आपको अपने जीवन का आँखों देखा सच बता रही हूँ, हमारे साथ ही पड़ोस में वर्मा जी का परिवार रहता था। वर्मा जी के परिवार में उनकी पत्नी मधु, दो बेटे-बहुएँ ,पोते- पोतियों  व दादी रहती थी। वर्मा जी स्वयं रेलवे में उच्च पद पर आसीन थे और उनके बेटे भी सरकारी कर्मचारी थे। आर्थिक रूप से सुसम्पन्न इस परिवार में किसी चीज की कमी न थी। अगर कमी थी तो शायद सिर्फ अच्छी सोच व संस्कारों की। परिवार में जहाँ प्रत्येक सदस्य एशो-आराम की जिन्दगी व्यतीत कर रहा था वहाँ दादी की किस्मत में घर के पिछले बरामदे में बना कच्चा- पक्का कमरा ही था। जिसमें दीवारों पर सीलन, बदबू व गंदगी से दम घुटता था। दादी के पति रमेश जी की मृत्यु के बाद उनकी पेंशन से ही दादी अपना गुजर करती थी परन्तु दादी के नाम जमीन-जायदाद काफी थी। दादी ने मुझे बताया था कि उन्हें इस कोठरी में भी सिर्फ इसलिए रखा गया है क्योंकि सभी की नजर उनकी जायदाद पर है और अगर उनके पास अच्छी खासी जायदाद न होती तो आज वे सड़कों पर या किसी ओल्ड ऐज होम में अपना जीवन बिता रही होतीं।
दादी सारा दिन चारपाई पर बैठी अपनी अंतिम सांसों के लिए भगवान से दुहाई मांगती रहती थी। चूंकि यह जिंदगी भी किसी नरक भोगने से कम न थी। अक्सर वर्मा जी की घर से दादी के रोने की आवाजें आया करती थी क्योंकि बात- बात पर दादी से मारपीट करना उनके लिए आम बात थी। यहाँ तक कि दादी को खाने के नाम पर सूखी व मोटी रोटी और पानी जैसी दाल ही नसीब होती थी। परन्तु ममता की प्रतिमूर्ति दादी उसे भी राजभोग समझकर खाती थी। हद तो तब हो गयी जब पैसों के पीछे अंधे हुए वर्मा जी ने दादी को खाने में जहर मिलाकर खिला दिया और जब वर्मा जी के परिवार को सजा मिलने की बारी आई तो उन्होंने पैसों और रुतबे के बलबूते पर अपने इस घिनौने अपराध को भी छुपा लिया
यह कड़वा सच हमारे समाज के अनगिनत घरों की कहानी बनता जा रहा है। आखिरकार पैसा ही अंधकार बनकर रिश्तों की गरिमा को ग्रहण लगा रहा है। दादी के जीवन की यह कड़वी घटना आज भी मेरे दिल को दहला देती है।
हमारे सामाज में ओल्ड ऐज होम की गिनती भी लगातार बढ़ती जा रही है और सच मानिए कभी आप ओल्ड ऐज होम के दरवाजे पर जाकर खड़े होंगे तो देखेंगे की वहाँ बूढ़ें माता- पिता की सुनी आँखों  से उभरते हजारों सवाल आपको दिखाई देंगे जिनका जवाब हमारे पास न होगा कि आखिर किस अपराध की सजा उन्हें दी जा रही है? क्या उनका अपराध यह था कि उन्होंने माँ-बाप बनकर आपना दायित्व निभाया? परन्तु दु:ख इस बात का है कि बच्चे अपने माता- पिता को ओल्ड ऐज होम का दरवाजा दिखाकर अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाते हैं। हम भारतीय समाज में रहते हुए अक्सर सँस्कारों की बात करते हैं और भगवान की पूजा करके अपनी आस्था प्रकट करने की आदर्शवादी बातें सीखते-सिखाते हैं। मैं तो यह कहूँगी कि अगर आप अपने माता-पिता को मौत के घाट धकेलकर भगवान की पूजा करके या संस्कारों की बड़ी- बड़ी बातें करके स्वयं को इंसान मानते हैं तो यह इन्सानियत के नाम पर कलंक हैं क्योंकि हमारे माता-पिता में ही साक्षात् भगवान का रूप निवास करता है। तो हमारा पहला कत्र्तव्य बनता है कि हम अपने माता-पिता का सत्कार करें। हमारे माता-पिता के अधिकार अगर हम उन्हें नहीं देंगे तो कौन देगा? इसलिए हमारा, हमारे कानून व हमारे समाज का यह दायित्व है कि वे बजुर्गों के साथ हो रहे इसे अमानवीय व अभ्रद्र व्यवहार को रोकें। हम अपने बुजुर्गों का आदर- सम्मान करते हुए उन्हें परिवार व समाज में वह स्थान दें जिसके हकदार वे हैं। अगर बुजुर्गों के साथ हो रहे ऐसे दुव्र्यवहार का सिलसिला नहीं रुका तो वह दिन दूर नहीं जब इस चक्रव्यूह में फँसने की अगली गिनती हमारी होगी तो आइए प्रण लें...
'बुजुर्गों से करें प्यार यही है
समृद्ध सुखी जीवन का आधार।
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