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Jun 1, 2026

कविताः गर्मी सबको सता रही है

  - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव 

आसमान से आग बरसती

तपिश धरा को जला रही है,

आकुल-व्याकुल जड़-चेतन सब

गर्मी सबको सता रही है।

 

बिजली पानी के संकट से

महानगर तक जूझ रहे हैं,

जननायक महलों में बैठे

नई पहेली बूझ रहे हैं,

उनके तरण ताल के अंदर

एक जलपरी नहा रही है।

 

नहीं मिलेगी चाय किसी को

भाभी शरबत बना रही हैं,

दोपहरी में अम्मा सबको

पना आम का पिला रही हैं,

प्यासी गौरैया आँगन में

फुदक-फुदक फड़फड़ा रही है।


जेठमास में सूरज दादा

दादागीरी दिखा रहे हैं,

जो भी दिखे सामने उस पर

लू के हंटर चला रहे हैं,

दादी जी लू से बचने के 

सौ-सौ नुस्खे बता रही हैं।

  

बजा-बजा घंटी गलियों में

अनवर कुल्फी बेच रहा है,

माथे पर बह रहा पसीना

बार-बार वह पोंछ रहा है,

लिये एक कुल्फी मजदूरिन

दो बच्चों को चटा रही है।

 

नए आँकड़े तापमान के

रोज- रोज चढ़ते जाते हैं,

ए सी में बैठे साहब जी

चिंतित बहुत नजर आते हैं,

गर्मी में बाहर मत निकलो

टी वी एंकर बता रही है।

Oct 1, 2025

कविताः ज्योति का उत्सव मनाएँ

  - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव






इस तरह प्रिय 

ज्योति का उत्सव मनाएँ।


द्वार, देहरी पर बनाकर

अल्पनाएँ,

इंद्रधनु के रंग से

उनको सजाएँ

करें स्वागत-

परिजनों-अभ्यागतों का

लोकमंगल हित करें

शुभ प्रार्थनाएँ।


टाँग लें 

सुंदर कन्दीलें

निज गवाक्षों पर

झरें जिनसे

रोशनी के 

मन्द मृदु निर्झर

देखने को

ज्योति का

यह पर्व अनुपम

गगन के तारे

धरा पर उतर आएँ।


झिलमिलाती 

झूमती-सी

झालरें विद्युत् लड़ी की

जगमगाते दीपकों से

कर रही हों

जुगलबंदी- सी

और फुलझड़ियों से

झरते फूल झर- झर

झर- झरर

बाँचते हों ज्यों कथा

उल्लास की।


मनहरण इस रागिनी के

साथ हम भी

चलो कोई गीत सुमधुर

गुनगुनाएँ

दूर करने को सघन तम

इस धरा का

एक दीपक नेह का

हम भी जलाएँ।

May 2, 2025

चिंतनः नैतिक मूल्यों का ह्रास और वर्तमान समाज

 - डॉ.  शिवजी श्रीवास्तव

चतुर्दिक् नैतिक मूल्यों का ह्रास वर्तमान समाज की एक बड़ी समस्या है। जैसे-जैसे भौतिक सभ्यता का विकास हो रहा है; वैसे-वैसे समाज में सदाचरण का लोप होता जा रहा है। गलाकाट स्पर्धा के इस युग में व्यक्ति के अंदर प्रेम, दया, करुणा, सहिष्णुता, परोपकार, सेवा संयम इत्यादि गुणों का अभाव होता जा रहा है। झूठ और स्वार्थपरता सदाचार को हाशिये में धकेलने का प्रयास कर रहे हैं । किसी भी यह समाज के लिए शुभ लक्षण नहीं है क्योंकि सदाचार से ही समाज में प्रेम और सौहार्द का विकास होता है तथा सर्वत्र शान्ति का साम्राज्य स्थापित होता है। व्यक्ति और समाज दोनों के उत्थान का मूल मंत्र सदाचार के पालन में निहित है। सदाचार के महत्त्व को अध्यापक पूर्णसिंह जी के इन शब्दों में भली-भाँति समझा जा सकता है, "आचरण की सभ्यता का देश ही निराला है। उसमें न शारीरिक झगड़े हैं, न मानसिक, न आध्यात्मिक। न उसमें विद्रोह है, न जंग ही का नामोनिशान है और न वहाँ कोई ऊँचा है, न नीचा। न कोई वहाँ धनवान है और न ही कोई वहाँ निर्धन। वहाँ प्रकृति का नाम नहीं, वहाँ तो प्रेम और एकता का अखंड राज्य रहता है।"

निःसंदेह यह एक आदर्श समाज की संकल्पना है मूर्त रूप में यह तभी साकार हो सकती है जब प्रत्येक व्यक्ति सदाचरण के मार्ग का अनुसरण करे किन्तु सबके आचरण इसके विपरीत प्रतीत हो रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने कलियुग के लक्षण बताते हुए लिखा है- 'झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।।' गोस्वामी तुलसीदास की यह भविष्यवाणी आज चरितार्थ होती प्रतीत हो रही है चतुर्दिक् झूठ का बोलबाला हो रहा है। ऐसे कठिन समय में सदाचार के मार्ग पर चलना किसी कठिन साधना से कम नहीं है।

लोगों का प्रश्न हो सकता है कि ऐसे विपरीत समय में हम सदाचार के गुणों को कैसे विकसित करें? इसका सबसे सरल सूत्र है सत्संग करना और सद्ग्रंथों का पाठ करना। यहाँ सत्संग का अर्थ धार्मिक भजन-पूजन न होकर सज्जनों की संगति से है। सत्संग और स्वाध्याय की सीढ़ी, व्यक्ति को सहज रूप में सदाचार की ओर ले जाती है। सदाचार से ही व्यक्ति के अंदर परोपकार की वृत्ति बलवती होती है और परोपकार से समाज में परस्पर एक दूसरे का भला करने का भाव जाग्रत होता है जिससे समाज में समरसता बढ़ती है और सुव्यवस्था स्थापित होती है। यह कार्य कठिन अवश्य है पर दुर्लभ नहीं है। थोड़े प्रयासों से यह कार्य सुगमता से किया जा सकता है। प्रत्येक विवेकवान व्यक्ति का दायित्व है कि अपने आचरण से सदाचार-संवर्धन में अपना योगदान देते रहें।

निरंतर सत्य के पथ पर चलने वाले व्यक्ति के हृदय में परोपकार और करुणा का भाव इस प्रकार रच-बस जाता है की वह अनजाने में भी किसी के अहित का भाव नहीं ला सकता। सदाचार की सुगंध सुवासित पुष्पों की सुगंध की भाँति आत्मा में रची-बसी रहती है जो सम्पूर्ण परिवेश को महकाती रहती है। सदाचार व्यक्ति के व्यक्तित्व से किस प्रकार प्रस्फुटित होता है इस संदर्भ में स्वामी विवेकानंद के जीवन का एक प्रसंग उल्लेखनीय है। स्वामी विवेकानंद को अमेरिका जाना था, उनके गुरु स्वामी रामतीर्थ जी भौतिक देह का परित्याग कर चुके थे अतः वह गुरुमाता शारदा देवी जी से आशीर्वाद लेने गए। गुरुमाता रसोई में थीं। विवेकानंद जी ने कहा- “माँ मैं धर्म की बात लेकर अमेरिका जाना चाहता हूँ, आप आशीर्वाद दीजिए मैं सफल हो सकूँ।” उन्होंने रसोई के अंदर से ही विवेकानंद को ऊपर से नीचे तक देखा और बोलीं- “सोचकर बताऊँगी।” विवेकानंद हतप्रभ हुए पुनः निवेदन किया –“माँ, सिर्फ शुभाशीष चाहता हूँ, आपकी मंगलकामना चाहता हूँ कि मैं जाऊँ और सफल होऊँ।” शारदा देवी ने पुनः उन्हें गौर से देखा और कहा- “ठीक है, सोचकर कहूँगी।” विवेकानन्द अवाक से खड़े रह गए। उन्होंने सोचा भी न था कि गुरुमाता आशीर्वाद देने में भी सोच-विचार करेंगी। उन्होंने कभी ऐसा देखा भी न था कि आशीर्वाद भी किसी ने सोच कर दिए हों। वे चुपचाप वहीं खड़े रहे। गुरुमाता खाना बनाती रहीं, अचानक कुछ सोच कर वे बोलीं- “नरेंद्र, सामने जो छुरी पड़ी है वह उठा लाओ।” सामने पड़ी हुई छुरी विवेकानन्द उठा लाए और गुरुमाता के हाथ में दी, छुरी हाथ में लेते ही वे हँसी और विवेकानन्द के लिए आशीर्वादों की वर्षा करते हुए बोलीं- “जाओ नरेंद्र, अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त करो, तुम्हारे द्वारा सबका मंगल ही मंगल होगा।” छुरी लेकर आशीर्वाद देने के बीच का संबंध विवेकानन्द को समझ नहीं आया, उन्होंने संकोचपूर्वक पूछा- “माँ, इस छुरी उठाने में और आपके आशीर्वाद देने में कोई संबंध है क्या?” शारदा देवी पुनः हँसीं –“हाँ, गहरा संबंध है, मैं देख रही थी कि छुरी तुम मुझे किस प्रकार देते हो, तुम उसकी मूठ पकड़ते हो या फलक पकड़ते हो, मूठ मेरी तरफ करते हो या फलक मेरी ओर करते हो साधारण तौर पर व्यक्ति मूठ पकड़ता है और फलक देने वाले की ओर करता है; पर तुमने छुरी का फलक पकड़कर मूठ मेरी ओर किया है।”

विवेकानंद ने आश्चर्य से देखा उन्होंने सचमुच फलक ही पकड़ा था। शारदा देवी ने आगे कहा- “तुमने ऐसा इसलिए किया नरेंद्र; क्योंकि तुम्हारे अंदर करुणा का भाव है, मैत्री का भाव है। तुमने फलक हाथ से पकड़ा और मूठ मेरी ओर किया, तुम्हारे अंदर सहज रूप से ही ये भाव है कि कहीं फलक से मुझे चोट न लग जाए, तुमने अपनी नहीं मेरी चिंता की। फलक पकड़ने से तुम्हें चोट लग सकती थी पर तुमने अपनी फिक्र नहीं की, तुमने मेरी चिंता में अपने को असुरक्षा में डाला। अब मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूँ कि जाओ तुमसे विश्व कल्याण होगा क्योंकि तुम सहज भाव में भी दूसरे का हित ही सोचोगे, इतनी करुणा इतनी मैत्री के भाव वाला व्यक्ति ही दूसरों का कल्याण कर सकता है।”

प्रत्यक्षतः यह बात छोटी लगती है किन्तु महत्त्वपूर्ण है। इससे स्पष्ट होता है कि सत्संग और सद्ग्रन्थों के प्रभाव से व्यक्ति के व्यक्तित्व में अद्भुत परिवर्तन होता है, वह मनसा-वाचा-कर्मणा सदाचार का अनुगामी हो जाता है। सदाचार से उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही समाज कल्याण के भाव से परिपूर्ण हो जाता है। यहाँ यह भी स्मरण रखना होगा कि सदाचार ऊपर से ओढा जाने वाला गुण नहीं है, इसका अभिनय नहीं किया जा सकता, कोई भी व्यक्ति दिखावे का आचरण करके सदाचारी नहीं बन सकता। यह एक सतत चलने वाली साधना है जो शनैः-शनैः व्यक्तित्व का परिमार्जन करते हुए उसे सात्त्विकता के उच्च सोपान तक ले जाती है और सात्त्विक लोग ही समाज को सन्मार्ग कि ओर ले जाने में समर्थ होते हैं। ■

Oct 1, 2022

आलेखः ढाई आखर सिखाने वाले कवि कबीर

 - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

आज हम कबीर के जन्म के लगभग सवा छह सौ वर्षों बाद उनको याद कर रहे हैं, उनके साहित्य का मूल्यांकन कर रहे हैं, वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता तलाश रहे हैं तो इसलिए कि कबीर एक अद्भुत कवि हैं, उनकी कविताओं में जीवन का सार तत्त्व छुपा है। कबीर ही ऐसे कवि हैं जो लोगों को हर अवसर पर याद आते हैं। हमें क्रांति की बात करनी हो, तो कबीर याद आते हैं, शांति की बात करनी हो तो भी कबीर याद आते हैं, समाज में रहने का सलीका सीखना हो या ईश्वर से निकटता स्थापित करनी हो तो भी कबीर ही राह दिखाते हैं। कबीर हमें हर अँधेरे के खिलाफ एक प्रकाश स्तम्भ की भाँति खड़े नजर आते हैं।

कबीर के काव्य में विलक्षण विरोधाभास है, एक ओर वे इतनी सहज साखियाँ रचते हैं, जो किसी अनपढ़ के लिए भी सहजग्राह्य हैं यथा -

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।

जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप।।

इसी के साथ वे इतनी जटिल उलटबांसियों की रचना करते हैं, जिसकी व्याख्या में बड़े-बड़े ज्ञानिजन भी सोचने के लिए विवश होते हैं यथा-

एक अचम्भा देखा रे भाई, ठाड़ा सिंह चरावै गाई,

पहले पूत पीछे भई माई, चेला के गुरु लागे पाई

जल की मछली तरुवर ब्याई, पकड़ बिलाई मुर्गी खाई।

दरअसल कबीर का समय बड़ा अराजक समय था,वे हर प्रकार की अव्यवस्था और रूढ़ियों के विरुद्ध सतत संघर्षरत रहकर विरोधों में जीते हुए विरोधों के मध्य ही मार्ग  निकालते रहे। वे अपनी कविताओं के माध्यम से विद्रोह का बिगुल भी फूँकते रहे और शांति की रागिनी भी बजाते रहे। उनकी कविताओं की जितने आयामों से व्याख्या की जाए कम है।

कबीर सत्य के शोधक हैं पर वे सत्य की ओर उस मार्ग से जाने का निषेध करते हैं जो परम्परागत हैं । वह मार्ग आडम्बरों से भरा है। पंडितों द्वारा बताए गए मार्ग को कबीर झूठा बतलाते हैं-

पण्डित, वाद बदन्ते झूठा,

राम कह्या दुनिया गति पावै खाण्ड कह्या मुख मीठा।

×××××××

नर के साथ सुआ हरि बोले, हरि परताप न जानै

जो कबहूँ उड़ि जाए जंगल में, बहुर न सूरतै आनै।

   कबीर की दृष्टि में पंडित जन केवल उलझाते हैं, किताबी ज्ञान बतलाते हैं। किताबों को पढ़कर कभी सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता सच्चे ज्ञान का आधार तो प्रेम है-

पोथी पढ़- पढ़ जग मुआ, पण्डित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पण्डित होय।।

   कबीर प्रेम पढ़ने की बात करते हैं जो व्यक्ति प्रेम के तत्त्व को जान लेगा वह ईश्वर के मर्म को जान लेगा। संसार मे दो धर्मों के मध्य झगड़े भी इसीलिए हैं कि कोई  मर्म को समझने का कोई प्रयास नही करता-

अरे, इन दोउन राह न पाई

हिन्दू कहे मोह राम पियारा, तुरक कहे रहमाना

आपस मे दोऊ लरि- लरि मूए  मरम न कोऊ जाना।

लड़ने का कारण स्पष्ट है किसीने भी मर्म को नहीं जाना है। ये मर्म क्या है? यही कबीर जीवन भर समझाते रहे,वह मर्म है प्रेम करने की कला। प्रेम ही ईश्वर से साक्षात्कार कराता है, प्रेम ही समाधि की अवस्था तक ले जाता है। उस प्रेम को सीखने की ही आवश्यकता है।प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है।

   प्रेम शब्द कहने में जितना सरल है जीवन में उतारने में उतना ही कठिन है । प्रेम को पढ़ने से ही सारा पांडित्य सारा ज्ञान अन्तस् में उतर आता है। यूँ तो संसार में हर कोई प्रेम करने के दावे करता है-स्त्री से प्रेम, संतान से प्रेम, धन-संपत्ति से प्रेम पर संसार में चलने वाले इस प्रेम को कबीर प्रेम नहीं मानते।वे स्पष्ट कहते हैं-

प्रेम प्रेम सब कोउ कहै, प्रेम न चिन्हे कोई।

जा मारग हरि जी मिले, प्रेम कहावै सोई।।

या फिर

प्रीत बहुत संसार मे, नाना विधि की सोय

उत्तम प्रीति सो जानिए, हरि नाम से जो होय।।

   स्पष्ट है जिस मार्ग से ईश्वर का साक्षात्कार हो जाए, वही प्रेम है। ईश्वर से प्रेम ही उत्तम प्रेम है। ईश्वर के नाम से प्रेम करना ही सच्चा प्रेम है, ये प्रेम जीवन मे बहुत कठिनाई से आता है।

 संसार से प्रेम और ईश्वर से प्रेम में अंतर ये है कि सांसारिक प्रेम बाँधता है और ईश्वरीय प्रेम मुक्त करता है। संसार का प्रेम अधिकार माँगता है,अहंकार बढ़ाता है। लोग संसार मे अपनी वस्तुओं से प्रेम करते है ,अपने पद से अपनी हैसियत से प्रेम करते हैं या अपने सगे-सम्बन्धियों से प्रेम करते हैं। यह प्रेम चाहे जड़ वस्तुओं से हो या चेतन से अपने साथ मैं और मेरा का भाव ले कर आता है। मेरा मकान, मेरी जमीन, मेरा पद, मेरी सम्पत्ति, मेरी स्त्री, मेरा पुत्र इत्यादि। जहाँ 'मैं' आता है वहाँ बीच मे माया आ जाती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है-

मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहि बस कीन्हें जीव निकाया।।

..अर्थात ये मैं हूँ ये मेरा है यही माया है। सारे जीवों को इसने अपने अधीन कर रखा है।

कबीर इसी माया को  बीच से हटाने की बात करते हैं। इसी 'मैं' को मारने की बात करते हैं। जब तक 'मैं' रहेगा, अहंकार विलीन नहीं होगा तब तक प्रेम के घर मे प्रवेश नही  मिलेगा-

यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं।

सीस उतारे भुइँ धरे सो पैठे इहि माँहिं।।

  प्रेम के घर मे प्रवेश की यही शर्त है कि अपने सिर को उतार कर जमीन पर रख दो। अहंकार मिटा दो। द्वैत भाव समाप्त कर दो। जब अहंकार मिटेगा, द्वैत समाप्त होगा तो अंदर प्रेम आएगा। ये प्रेम ही परमात्मा होगा। गीता में भगवान कृष्ण ने भी कहा है- 'सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज'- सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण मे आओ...परमात्मा को पाने के लिए सारे सांसारिक धर्मों को छोड़ना पड़ता है।

प्रेम का अर्थ माँगना नहीं अपने को दे देना होता है। प्रेम समर्पण करता है अपने को प्रिय की सत्ता में विलीन कर देता है। अल्लामा इकबाल ने भी लिखा है-

मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे।

 कि दाना ख़ाक में मिलके गुलो- गुलज़ार होता है।

...अर्थात् बिना स्वयं को मिटाए प्रेम के राज्य में प्रवेश नहीं हो सकता। प्रेम का अर्थ ही है अपने को मिटा देना। क्योंकि जहाँ दो की भावना होती है वहाँ याचना होती है, कामना होती है, आकर्षण होता है, तृष्णा होती है, अधिकार-लिप्सा होती है;  पर प्रेम नहीं होता। प्रेम में द्वैत नहीं होता,  हृदय में या तो संसार का प्रेम रहेगा या ईश्वर का। दोनों एक साथ नहीं रह सकते; इसीलिए कबीर प्रेम की गली को बहुत सँकरी बतलाते  हैं-

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं

प्रेम गली अति साँकरी जामें दो न समाहिं।

  प्रश्न है कि प्रेम का अधिकारी कौन है, तो उसके लिए कबीर कोई विभाजन नहीं करते। प्रेम पाने के लिए कबीर परम्परा से चले आ रहे सारे बंधनों को नकारते हैं। हिन्दू-मुस्लिम, ऊँच-नीच, जाति-वर्ण जैसे किसी बंधन को वे नहीं मानते। प्रेम के साम्राज्य में हर वह व्यक्ति प्रवेश कर सकता है जो अहंकार छोड़ सकता  हो-

प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ ले जाय।।

   कबीर तो चाहते हैं कि हर व्यक्ति को प्रेम में हो जाना चाहिए बिना प्रेम के जीवन मुर्दे के समान है-

जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान।

जैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिनु प्रान।।

परमात्मा के इस प्रेम को प्राप्त करने के लिए किसी कर्मकांड, किसी व्रत-उपवास किसी तीर्थ-तप को भी अवश्यक नहीं मानते।उनके ईश्वर का स्पष्ट उद्घोष है-

मोको कहाँ ढूँढता बन्दे मैं तो तेरे पास में

××××××

न मैं कौनो क्रिया करम में, न जप तप उपवास में।

   ईश्वर हृदय में विद्यमान है जरा -सा अहंकार विसर्जित करने की देर है ईश्वर मिल जाएगा। अहंकार विसर्जन या प्रेम करने की कला गुरु सिखाते हैं, पर सीखने की ललक स्वयं पैदा करनी होती है-

गुरु गोविन्द तो एक है, दूजा यह आकार।

आपा मेट जीवित मरै, तो पावै करतार।।

  गुरु के सामने भी अहंकार लेकर नही जा सकते। गुरु भी तभी मिलता है जब ईश्वर कृपा करता है-

ज्ञान प्रकास्या गुरु मिला,  सो जनि बीसर जाइ।

जब गोविंद कृपा करी,तब गुर मिलया आइ।।

      ईश्वर तभी कृपा करेगा जब प्रेम आएगा।

हृदय में प्रेम आने के बाद सहज समाधि की अवस्था मिल जाती है वही परमानन्द की अवस्था है। इस अवस्था मे आने के बाद कुछ पाने की लालसा शेष नही रहती। सहज समाधि में पहुँचे व्यक्ति को हर समय हर कार्य मे ईश्वर की उपस्थिति की अनुभूति रहती है। यही ढाई आखर सीखने का रहस्य है। ढाई आखर सीखने के बाद कुछ और सीखने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

Mar 1, 2022

किताबें- छन्द-साधना की अनुपम कृति ‘छन्द-विधान एवं सृजन’

 -डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

समीक्ष्य कृति- छन्द-विधान एवं सृजन: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु', प्रथम संस्करण: 2022, मूल्य-220₹, प्रकाशक- अयन प्रकाशन, जे-19 / 39 राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

कविता की गेयता और लयबद्धता ही उसे दीर्घजीवी और जन-जन के कंठों की शोभा बनाती है, कविता में यह गुण ‘छंद’ से आता है। छन्दों का ज्ञान कराने हेतु संस्कृत साहित्य में अनेक पिङ्गल ग्रंथों की रचना की गई। हिन्दी में भी छन्द-शास्त्र पर ग्रंथ लेखन की परंपरा जारी रही। वर्तमान में भी अधिकारी विद्वानों द्वारा इस विषय पर सतत लेखन हो रहा है, इसी परम्परा में प्रख्यात साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ द्वारा रचित ‘छन्द-विधान एवं सृजन’ एक महत्त्वपूर्ण कृति है। इस कृति में श्री हिमांशु जी ने परम्परागत प्रसिद्ध भारतीय छन्दों के साथ ही पिछले कुछ दशकों में तेजी से लोकप्रिय हुए जापानी छन्दों-हाइकु, ताँका, सेदोका और चोका जैसे छन्दों की रचना-प्रक्रिया से भी अवगत कराया है। वस्तुतः छन्द-विधान एक गणित है, गणित को सरल ढंग से समझाना श्रेष्ठ गुरु द्वारा ही सम्भव है। यह कार्य हिमांशु जी ने बहुत सुंदर ढंग से किया है।

कृति में दो अध्याय हैं-1 -छन्द-विधान (प्रवेश) एवं 2-छन्द-विधान (विस्तार)। प्रथम अध्याय प्रवेश के अंर्तगत ‘छन्द की आवश्यकता’ में वे स्पष्ट कहते हैं- ‘मेरा मत है- यदि काव्य की आवश्यकता है, तो छन्द की भी आवश्यकता है, निराला जैसे छन्द के बन्धन को तोड़ने वाले दिग्गज छन्द के ही नहीं संगीत के भी जानकार थे।’ उन्होंने अज्ञेय जी के वक्तव्य द्वारा स्पष्ट किया कि प्रयोगवादी कवियों ने भी छन्द एवं कविता की आंतरिक लय को सुरक्षित रखा, किंतु वर्तमान में छन्दों से मुक्ति के नाम पर कविता रचने वाले अनेक कवि, कविता के इस गुण की उपेक्षा करते हैं।

‘हिमांशु’ जी ने छन्द को बहुत ही सरल ढंग से परिभाषित किया है- “छन्द वर्ण, मात्रा के साथ यति, गति, लय के अनुशासन का वह सार्थक संयोजन है, जो भावानुभूति को अभिव्यक्ति प्रदान करता है।” इसी के साथ मात्रा, यति और गति का अर्थ स्पष्ट करते हुए मात्रा की गणना करने की विधि, वर्णिक छन्दों में गण की आवश्यकता एवं गणों को सहज ढंग से समझाते हुए प्रमुख मात्रिक एवं वर्णिक छन्दों को सुगम उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया गया है। ‘हिमांशु’ जी ने छन्दों के उदाहरणों के रूप में प्रसिद्ध कवियों को ही उद्धृत नहीं किया, अपितु सर्वथा नए कवियों की कविताएँ भी सम्मिलित की हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि आज भी अनेक कवि छन्द रचना के प्रति सजग हैं।

कृति का दूसरा अध्याय-छन्द-विधान (विस्तार) कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। इस अध्याय में कविता के रूप-विन्यास की विशद चर्चा की गई है। लेखक की दृष्टि में छंद रहित कविता का जीवन क्षणिक होता है, अतः काव्य के चिरस्थायित्व हेतु छन्द आवश्यक है। छन्द के साथ ही यति, गति, बलाघात, अन्तर्यति की समझ भी अनिवार्य है, इनके अभाव में मात्रा-गणना ठीक होने उपरांत भी पद में या तो कवित्व का अभाव रहता है या कविता दोषपूर्ण हो जाती है। इस दोष से बचने हेतु ‘पद-विन्यास’, ‘अर्थ-विन्यास’, ‘विशिष्ट शब्द-प्रयोग’, ‘तुकान्तता में सावधानी’, ‘उच्चारण और मात्रा’ शीर्षकों के अंतर्गत काव्य-रचना की बारीकियों को उदाहरणों द्वारा समझाया गया है।

प्रायः नए अभ्यासी मात्रा गणना तो सही रखते हैं; फिर भी छन्द त्रुटिपूर्ण रहता है, उसका कारण होता है लघु-गुरु के क्रम का ध्यान न रखना। ऐसे अभ्यासियों को समझने के लिए इस अध्याय में ‘छन्द विचार’ और ‘छन्द-बोध’ के अंर्तगत समान मात्राओं वाले छन्दों को लेकर उनके मध्य के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट किया गया है, उदाहरणार्थ ‘पद्धरि छन्द’ और 'चौपाई' दोनों में ही 16-16 मात्राओं के चार चरण होते हैं; पर दोनों में जो सूक्ष्म अंतर है उसे नए अभ्यासियों को समझना आवश्यक है। यथा-

चुपचाप खड़ी थी वृक्ष पाँत। सुनती जैसे कुछ निजी बात॥

उसमें से उठता गन्ध धूम। श्रद्धा ने वह मुख लिया चूम॥

16-16 मात्राओं के चरणों वाला यह छन्द चौपाई क्यों नहीं है? ये प्रश्न करके लेखक ने उत्तर भी दिया है-'चौपाई के चरणान्त में दो लघु या एक गुरु जरूर होते हैं। दो गुरु भी हो सकते हैं। यहाँ चरणान्त में गुरु-लघु है जिसका चौपाई में निषेध है।'

इतना ही नहीं इसके पश्चात ही ‘छन्द-बोध’ के अंतर्गत छन्द के शब्दों का क्रम बदलकर स्पष्ट किया कि मात्राएँ पूर्ण होने पर भी त्रुटि कहाँ हो सकती है। इस प्रकार के अनेक छन्दों के सही स्वरूप को उदाहरणों द्वारा समझाया गया है, निःसन्देह इस विधि से समझने पर छन्दों के अध्येताओं को कोई भ्रम नहीं रहेगा और वे उसके सही स्वरूप को समझ सकेंगे। 

इस अध्याय में ‘छन्द-अभ्यास’ के अंतर्गत दिए हुए छन्दों को पढ़कर उनमें सही छन्द या त्रुटिपूर्ण छन्द की पहचान करके उन्हें कारण सहित स्पष्ट करना है। यह अभ्यास काव्य-प्रेमी / जिज्ञासुओं को काव्य-रचना हेतु सजग दृष्टि प्रदान करेगा। यह अभ्यास कार्य जापानी छन्दों के विवेचन के पश्चात भी दिया गया है। निःसन्देह छन्द सीखने के इच्छुक काव्यानुरागियों एवं छात्रों के लिए यह उपयोगी कृति है। इस संक्षिप्त कृति में हिमांशु जी ने छन्द-शास्त्र को जिस सहज ढंग से समझाया है वह अनुपमेय है। सहज भाषा-शैली और सरल उदाहरणों के माध्यम से छन्दों का ज्ञान देने वाली यह कृति छन्द सीखने वालों के लिए सहज-ग्राह्य एवं उपयोगी सिद्ध होगी।

Jan 1, 2022

किताबें : भाव जगत को झंकृत करता; लम्हों का सफर

-डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

समीक्ष्य कृति- लम्हों का सफर, कवयित्री- डॉ. जेन्नी शबनम. पृष्ठ संख्या- 112, संस्करण-प्रथम 2020, मूल्य- ₹120/- प्रकाशक-हिन्द युग्म ब्लू,सी-31, सेक्टर 20, नोयडा (उ.प्र.)- 201301

 
    
डॉ. जेन्नी
शबनम की काव्य-कृति
'लम्हों का सफर'..संवेदनशील अनुभव-यात्रा को कविता में अभिव्यक्त करती हुई कृति है।सात शीर्षकों में विभक्त इस पुस्तक का हर शीर्षक जीवन का एक यादगार लम्हा है...एक एक लम्हे की अपनी कई कहानियाँ है,कवयित्री ने विविध लम्हों की विविधअनुभूतियों को बड़े सलीके से कविताओं में पिरोया है।

प्रथम खण्ड -'जा तुझे इश्क हो'की कविताएँ प्रेम की घनी अनुभूति की, प्रेम करने की,और प्रेम में होने की कविताएँ हैं।'प्रेम करने' में और 'प्रेम में होने' में बड़ा फ़र्क है,जो प्रेम में होता उसका समग्र व्यक्तित्व प्रेममय होता है,..'क्या बन सकोगे एक  इमरोज'.. में इमरोज के प्रेम के माध्यम से इसी भाव को बहुत खूबसूरती से व्यक्त किया गया है-'..ये उनका फ़लसफ़ा था/एक समर्पित पुरुष/जिसे स्त्री का प्रेमी भी पसन्द है/इसलिए कि वो प्रेम में है।'इसी खण्ड की कविता 'जा तुझे इश्क हो' में भाषा की व्यंजना चमत्कृत करती है शायद ही कभी किसी ने किसी को ये शाप दिया होगा कि 'जा तुझे इश्क हो'

  दूसरे खण्ड 'अपनी कहूँ'- में कवयित्री ने अपनी उन अनुभूतियों/पीड़ाओं को अभिव्यक्ति दी है, जो निजी होते हुए भी प्रत्येक संवेदनशील मन की हैं,यथा 'मैं भी इंसान हूँ' कविता में हर नारी  मन की पीड़ा देखी जा सकती है-'मैं एक शब्द नहीं,

एहसास हूँ, अरमान हूँ/साँसें भरती हाड़-मांस की,मैं भी जीवित इंसान हूँ।'..'बाबा,आओ देखो!तुम्हारी बिटिया रोती है' -कविता में व्यक्त निजी पीड़ा भी हर उस व्यक्ति की है जिसने अल्प वयस में अपने पिता को खोया हो। इस खण्ड में प्रबल अतीत-मोह भी है, बड़ी होती हुई स्त्री बार-बार अतीत में लौटती है और वहाँ से स्मृतियों के कुछ पुष्प ले आती है।

   तीसरे खण्ड 'रिश्तों का कैनवास' की कविताएँ नितांत निजी रिश्तों के इर्द गिर्द बुनी गई हैं, पर ये 'निजी' होते हुए भी सभी को अपनी लगती हैं।'उनकी निशानी' सहेज कर रखी गई पिता की पुरानी चीजों की कविता है, इसमे बड़ी खूबसूरती से पिता को याद किया गया है।पिता के न रहने पर माँ की वेदना को 'माँ की अन्तः पीड़ा' में व्यक्त किया गया है।'इसी प्रकारअपने पुत्र एवं पुत्री के विविध जन्मदिवसों पर रची विविध कविताओं में कोरी भावाकुलता नहीं है; अपित कुछ उपदेश/शिक्षाएँ है जो हर युवा के जीवन-रण में संघर्ष के लिए अनिवार्य हैं।

   चौथे खण्ड 'आधा आसमान'- में समाज मे स्त्री की स्थिति/पीड़ा द्वंद्वों और वेदनाओं को स्वर मिले हैं। ये कविताएँ गम्भीर प्रश्न भी उपस्थित करती हैं।'मैं स्त्री हूँ' 'फॉर्मूला','झाँकती खिड़की',

'मर्द ने कहा','बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' इत्यादि नारी नियति और समाज के दुहरे मानदंडों की कविताएँ हैं।

    अगले खण्ड'साझे सरोकार'में सामाजिक विषमताओं और मूल्यहीनता की चिंताएँ हैं।' शोषण और शोषक के चरित्र, नैतिक मूल्यों के ह्रास की चिंता, वर्तमान के प्रति आक्रोश और विद्रोह भी कई कविताओं में देखा जा सकता है, 'भागलपुर दंगा' (24.10.1989)'कवयित्री के

जीवन में आए भयानक दुःस्वप्न की तरह है उसकी भयावहता को भी उन्होंने इस कविता में व्यक्त किया है। इसी पीड़ा को 'हवा अब खून-खून कहती है' कविता में भी देखा जा सकता है।

  संग्रह के छठवें खण्ड 'जिंदगी से कहा सुनी' तथा अंतिम सातवें खण्ड 'चिंतन'  की कविताएँ कहीं दार्शनिक भाव-बोध के प्रश्नों के उत्तर तलाशने की चेष्टा करती हैं तो कभी वैराग्य भाव और कभी अवसाद ग्रस्त होते मन के द्वंद्व को चित्रित करती हैं। गूढ़ विषयों के चयन और जटिल मनःस्थितियों के चित्रण के कारण इन कविताओं में उलझाव अधिक है सहजता कम,कुछ कविताओं के तो शीर्षक भी जटिल हैं, यथा- 'देह, अग्नि, और आत्मा...जाने कौन चिरायु','अज्ञात शून्यता',इत्यादि।

  समग्रतःभाव-जगत को झंकृत करते इस उत्कृष्ट संग्रह के एक अंश से ही अपनी बात को विराम देता हूँ- 'अपने-अपने लम्हों के सफ़र पर निकले हम/वक्त को हाज़िर नाज़िर मानकर/अपने हर लम्हे को यहाँ दफ़न करते हैं/चलो अब अपना सफ़र शुरू करते हैं।'

   Email. Shivji.sri@gmail.com

Jun 5, 2021

किताबें- जापानी काव्य-शैलियों की विशिष्ट कृति- ‘तीसरा पहर’

 -डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

तीसरा पहर (ताँका-सेदोका-चोका संग्रह): रामेश्वर काम्बोजहिमांशुमूल्य-100/-, पृष्ठ: 80, संस्करण-2020; प्रकाशक-अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नई दिल्ली-110030

   श्री रामेश्वर काम्बोजहिमांशुका नवीन काव्य संग्रहतीसरा पहरजापानी काव्य-शैलियों का महत्त्वपूर्ण संग्रह है जिसमें 150 ताँका,132 सेदोका एवम 44 चोका संकलित हैं। जापानी काव्य-शैली हाइकु हिन्दी -जगत् में पूर्णतः प्रतिष्ठित विधा है, किन्तु ताँका और सेदोका से हिंदी पाठक अपेक्षाकृत कम परिचित है, इस दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण कृति है, इस कृति से पाठक को इन काव्य-रूपों का परिचय मिलता है। हिंदी साहित्य-जगत् इस बात से परिचित है कि श्री काम्बोज जी जितने श्रेष्ठ साहित्यकार हैं, उतने ही श्रेष्ठ व्यक्तित्व के धनी हैं। व्यक्ति रूप में अत्यंत उदार, सहृदय एवं भावुक प्रकृति के हैं, ये प्रकृति उनके काव्य में भी प्रतिबिम्बित होती है। इस काव्य-संग्रह में उनकी भावाकुलता, सामाजिक मूल्यों/आदर्शो के प्रति प्रतिबद्धता, समाज मे बढ़ती स्वार्थपरता, प्रेम के ऐकांतिक आदर्श प्रेम से आध्यात्मिक प्रेम तक की यात्रा जैसे अनेक विषयों की रचनाएँ संकलित हैं।

     कवि स्वाभाविक रूप से भावुक एवं संवेदनशील होते हैं, संवेदना जितनी सघन होती है, वेदना की अनुभूति उतनी ही तीव्र होती है, इसी वेदना से कविता का सृजन होता है.. काम्बोज जी भी प्रकृति से अत्यंत सहज एवं भावुक हैं।तीसरा पहरमें उनकी सहजता,भावाकुलता एवं वेदना की सघन अनुभूति को सर्वत्र देखा जा सकता है,कवि की वेदना प्रथम ताँका में ही अभिव्यक्त हो जाती है-किसे था पता/ये दिन भी आएँगे/अपने सभी/पाषाण हो जाएँगे/चोट पहुँचाएँगे।’..कवि की पीड़ा यह भी है कि उसे संसार में सदा ही छला गया है-नींद से जगे/सपना टूट गया/कल जो मिला/पल में रूठ गया/अपना कहें/हम किसको भला/साथ जो चला/उसने ही था छला...’(चोका-सपना टूट गया)...।

     कवि ने अपनी भावाभिव्यक्ति के लिए शिल्प अवश्य जापानी चुना है; पर भाव-भूमि एवं चेतना विशुद्ध भारतीय है। उदात्त भारतीय चेतना से संचालित कवि का अंतस्  दर्द देने वालों को भी प्रेम ही देता है-वे दर्द बाँटें/बोते रहे हैं काँटे/हम क्या करें?/बिखेरेंगे मुस्कान/गाएँ फूलों के गान।उनकी समस्त रचनाओं में इस उदात्त प्रेम एवं परोपकार के भाव को देखा जा सकता है।उनका स्पष्ट कथन है-'ओ मेरे मन/तू सभी से प्यार की/आशा न रख/पाहन पर दूब/कभी जमती नहीं।

    स्वार्थी जगत् के मध्य कवि का आकुल मन सच्चे प्रेम की खोज में है,यह तलाश पूर्ण होती भी है-थके पाँव थे/दूर-दूर गाँव थे/सन्नाटा खिंचा/लगा कुछ न बचा/कि आप मिल गए।’..

   कवि की दृष्टि व्यापक है। उन्हें लगता है- सांसारिक सम्बन्ध जहाँलेन-देनके व्यापार से संचालित है, वहीं प्रकृति एवं मूक प्राणी निःस्वार्थ एवं आत्मीय भाव से मनुष्य के साथ जुड़े हैं, ‘दो बूँद जल/कटोरी का हैं पीते/बैठ मुँडेर/मधुर गीत गाते/शीतल कर जाते/’.....तथा-नीम की छाँव/जोड़ लेती है रिश्ता/उतरे जब/जीवन- पथ पर/शिखर दुपहरी।’..कवि की दृष्टि में सृष्टि में मानव से इतर सारे प्राणी अपने साथ किए उपकार के प्रति कृतज्ञ भाव रखते हैं-पक्षी चहकें/आकर नित द्वार/रिश्ता निभाएँ/मुट्ठी भर दाना पा/मधुर गीत गाएँ।

   ‘तीसरा पहरकी समस्त रचनाएँ आकुल मन की व्यथा,वेदना एवं आत्मिक प्रेम की खोज की भाव-भूमि पर रची गई रचनाएँ हैं, जिनमें सांसारिक स्वार्थपरता एवं छल-प्रपंच से उपजा आक्रोश भी है;  किन्तु कवि निराश नहीं है, उसके अंतस् का भाव सकारात्मक है-‘आग की नदी/युग बहाता रहा/झुलस गया प्यार/वाणी की वर्षा/सबने की मिलके/हरित हुई धरा।’..

   भाषा एवं बिम्ब की दृष्टि से भी यह एक उत्कृष्ट काव्य-कृति है।कवि ने सर्वथा नवीन उपमान चुने हैं- यथा-मन अधीर/द्रौपदी के चीर-सी/बढ़ गई है पीर/डूबी है सृष्टि/मिला न कोई छोर/तुम्ही जीवन डोर।’...इसी प्रकार रूपक से युक्त बिम्ब एवं भाषा का एक चित्र दृष्टव्य है-मन-पाटल/झरी हर पाँखुरी/शूल ही बचे/धूल-भरी साँझ हस/अब कोई क्या रचे।’...

    ‘तीसरा पहरकी हर रचना अनुपम है, संक्षिप्त समीक्षा तो सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। सम्पूर्ण कृति का रसास्वादन उसके समग्र पाठ से ही सम्भव है। निःसन्देह साहित्य के इतिहास में 'तीसरा पहर' जापानी काव्य-शैलियों की एक विशिष्ट कृति के रूप में रेखांकित की जाएगी।

Email-  shivji.sri@gmail.com

Apr 5, 2021

पुस्तकः भारतीय मिट्टी की सोंधी महक से सुवासित- ‘प्रवासी मन’

  -डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

प्रवासी मन (हाइकु -संग्रह)- डॉ. जेन्नी शबनम, पृष्ठ- 120, मूल्य-240 रुपये, प्रकाशक-अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नई दिल्ली-110030, संस्करण- 2021

   ‘प्रवासी मनडॉ. जेन्नी शबनम का प्रथम हाइकु संग्रह है, जिसमें उनके 1060 हाइकु संकलित हैं। संग्रह का वैशिष्ट्य हाइकु की संख्या में नही अपितु उसके विषय-वैविध्य और गम्भीर अभिव्यक्ति में है। डॉ. सुधा गुप्ता जी के हस्तलिखित शुभकामना संदेश एवं प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोजहिमांशुजी द्वारा लिखित भूमिका ने इसे और भी विशिष्ट बना दिया है। विषय की दृष्टि सेप्रवासी मनका फलक बहुत व्यापक है,उसमे प्रकृति एवं जीवन विवध रंगों के साथ उपस्थित हैं।  संग्रह में विविध ऋतुएँ अपने विविध मनोहर या कठोर रूपों के साथ चित्रित हैं कहीं प्रकृति के सहज, यथावत् चित्र हैं –

झुलसा तन/झुलस गई धरा/जो सूर्य जला।

....कहीं प्रकृति, उद्दीपन, मानवीकरण, आलंकारिक, उपदेशक इत्यादि रूपों में दिखलाई देती है-

पतझर ने / छीन लिए लिबास / गाछ उदास

शैतान हवा / वृक्ष की हरीतिमा / ले गई उड़ा।

हार ही गईं / ठिठुरती हड्डियाँ / असह्य शीत।

      भारतीय संस्कृति में प्रकृति और उत्सव का घनिष्ट सम्बंध है, प्रत्येक ऋतु के अपने पर्व हैं, उन पर्वो के साथ ही परिवार एवं  समाज के विविध रिश्ते जुड़े हैं, ये पर्व / उत्सव मानव मन  को उल्लास अथवा वेदना की अनुभूति कराते हैं, जेन्नी जी ने प्रकृति और जीवन के इन सम्बन्धो को अत्यंत सघनता एवं  सहजता से चित्रित किया है। दीपावली, होली, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी जैसे सांस्कृतिक पर्वों के साथ ही स्वतन्त्रता दिवस, गाँधी जयन्ती जैसे राष्ट्रीय पर्वों के सुंदर चित्र भी  प्रवासी मनमें विद्यमान हैं। प्रायः ये पर्व जहाँ स्वजनों के साथ होने पर आनन्द प्रदान करते हैं, वही उनके विछोह से अवसाद देने लगते हैं यथा..रक्षा-बंधन का पर्व जहाँ बहिनों के मन मे उल्लास की सृष्टि करता है...

चुलबुली सी / कुदकती बहना / राखी जो आई।

वहीं, जिनके भाई दूर हैं उन बहनों के मन में वेदना भर देता है-भैया विदेश / राखी किसको बाँधे / राह निहारे। ...ऐसी ही वेदना होली में भी प्रिय से दूर होने पर होती है-बैरन होली / क्यों पिया बिन आए / तीर चुभाए।

  शायद ही ऐसा कोई सांस्कृतिक उत्सव या परम्परा हो, जिस ओर जेन्नी जी की दृष्टि न गई हो। स्त्री के माथे की बिंदी सौभाग्यसूचक होती है, तीज का व्रत करने से सुहाग अखण्ड होता है, पति की आयु बढ़ती है जैसे लोक विश्वासों पर भी सुंदर हाइकु हैं। कवयित्री ने प्रेम, विरह, देश प्रेम, हिंदी भाषा की स्थिति, भ्रष्टाचार, नारी नियति, किसानों की व्यथा जैसे महत्त्वपूर्ण सामयिक विषयों पर भी प्रभावी हाइकु लिखे हैं, उनकी दृष्टि से कोई विषय अछूता नही रहा।

    कवयित्री को मनोविज्ञान का भी अच्छा ज्ञान है, अनेक रिश्तों / सम्बन्धों के मनोभावों को  उन्होंने सूक्ष्मता से उभारा है। माँ की ममता, बहन का स्नेह, का प्रेम, एकाकीपन के दंश, जैसे तमाम मनोभावों के जीवन्त हाइकु के साथ ही उन्होंने जीवन की अनेक विडम्बनाओं के सशक्त चित्र अंकित किए हैं।  

    मानव जीवन की अनेक विडम्बनाओं में वृद्धावस्था सबसे बड़ी विडंबना है, उसके अपने अवसाद हैं, कष्ट हैं। उन कष्टों से जूझने की मनःस्थिति और मनोविज्ञान पर भी संग्रह में बेजोड़ हाइकु हैं, था- उम्र की साँझ / बेहद डरावनी / टूटती आस।

वृद्ध की कथा / कोई न सुने व्यथा / घर है भरा।

दवा की भीड़ / वृद्ध मन अकेला / टूटता नीड़।

वृद्धों की मनःस्थिति पर हिंदी में इतने सशक्त हाइकु शायद ही किसी और ने लिखे हों।  

      प्रवासी मन की भाषा में लाक्षणिकता, एवं व्यंजना के साथ ही सजीव एवं  प्रभावी बिम्ब देखने को मिलते हैं यथा-

उम्र का चूल्हा / आजीवन सुलगा / अब बुझता।

धम्म से कूदा / अँखियाँ मटकाता / आम का जोड़ा।

आम की टोली / झुरमुट में छुपी / गप्पें हाँकती।

भाषा मे लोक जीवन एवं  अन्य भाषा के प्रचलित शब्दों का प्रयोग भी सहजता से हुआ है-

फगुआ बुझा / रास्ता अगोरे बैठा / रंग ठिठका।

रंज औ ग़म / रंग में नहाकर / भूले भरम।

  संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि कवयित्री की कविता की शैली अवश्य जापानी है परप्रवासी मनभारतीय मिट्टी की सोंधी महक से सुवासित एवं रससिक्त है।

 सम्पर्कः 2, विवेक विहार, मैनपुरी (उ.प्र.)- 205001, Email-: shivji.sri@gmail.com

Nov 3, 2020

कविता- दीपावली मनाएँ कैसे

 - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

अभी दशानन मरा नहीं है

प्रियवर, दीप जलाएँ कैसे

दीपावली मनाएँ कैसे? 

उन्मादी उन्मुक्त निशाचर

अट्टहास करते,हर पल छिन।

जनकसुता बंदिनी अभी तक,

काट रहीं दुःख के दिन,गिन- गिन।

अब भी कई अहल्याओं के ,

छल से होते चीर-हरण।

शबरी अब तक बाट जोहती,

कब आएँगे रघुनन्दन।

 

राजपथों पर भी दामिनियाँ 

डरी- डरी- सी चलती हैं

नरपशुओं की गिद्ध दृष्टि से

अपनी लाज बचाएँ कैसे.

प्रभु जी ,घर अब जाएँ  कैसे?

 

पुतले फूँकें, दीप जलाएँ,

सदियों की परिपाटी है।

किन्तु अभी तक  रावण की

अगणित छायाएँ बाकी हैं।

इतिहासों के काले पन्ने

ये छायाएँ खोल रही हैं

विद्वेषों की विषम कालिमा,

वर्तमान मे घोल रही हैं।

 

आओ हम सब मिलकर सोचें

असफल इन्हें बनाएँ कैसे,

इतना कलुष मिटाएँ कैसे।

दूर धरा से तम हो सारा,

ऐसे दीप जलाएँ कैसे?

Aug 13, 2020

चंद्रशेखर आजाद के इकलौते चित्र की अंत:कथा (जयन्ती पर विशेष)

चंद्रशेखर आजाद के इकलौते चित्र की अंत:कथा
-डॉ. शिवजी श्रीवास्तव
       चंद्रशेखर आजाद भारतीय क्रांतिकारियों के इतिहास के एक ऐसे चमकदार नक्षत्र हैं ,जिनके प्रकाश से युगों-युगों तक क्रांतिचेता युवक प्रकाश ग्रहण करते रहेंगे। 23 जुलाई 1906 को म.प्र. के झाबुआ जिले के भाबरा में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे चंद्रशेखर अपनी किशोरावस्था से ही भारतीय स्वतंत्रता के महासमर में कूद गए थे। उनके शौर्य की गाथाएँ आज भी प्रत्येक देशभक्त के अंदर ऊर्जा का संचार करती हैं। चंद्रशेखर आजाद का नाम लेते ही आँखों के सामने एक छवि उभरती है, नंगे बदन,कमर पर धोती बाँधे हुए, कंधे पर जनेऊ और बाएँ हाथ से दाहिनी ओर की मूँछ उमेठते हुए एक बलिष्ठ देहयष्टि वाले तेजस्वी नवयुवक की।... जहाँ कहीं उनकी मूर्ति भी स्थापित है, वहाँ भी उनकी इसी छवि को मूर्तिमान किया गया है। वस्तुतः चंद्रशेखर आजाद की यही एकमात्र उपलब्ध तस्वीर है, जो उनके जीवन काल मे खींची गई थी; और इस तस्वीर की भी एक कहानी है।
     इंटरनेट पर इस तस्वीर के संदर्भ में अनेक विवरण उपलब्ध है;  किंतु वे पूरा सच बयान नहीं कर रहे। इस तस्वीर के पीछे का सच आजाद जी के अभिन्न साथी रहे प्रसिद्ध क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर जी से मुझे सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था डॉ. माहौर भी प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे, साण्डर्स के वध में वे आजाद जी के सहयोगी रहे थे, भुसावल बमकाण्ड में उन्हें जेल में भी रहना पड़ा था, आजादी के बाद उन्होंने छूटी हुई पढ़ाई को पुनः प्रारम्भ किया तथा हिन्दी विषय से एम.ए.,पी-एच.डी, वं डी. लिट्. तक की उपाधियाँ अर्जित करके बुंदेलखंड महाविद्यालय झाँसी में हिन्दी के प्रोफेसर हो ग थेजिस वर्ष मैं एम.ए. का विद्यार्थी था ,वे सेवानिवृत्ति के पश्चात् अतिथि प्राध्यापक के रूप में पढा रहे थेमुझे भी एक वर्ष उनसे पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ वे मेरे पिता के अच्छे मित्र भी थे; अतः मेरे घर भी उनका प्रायः आगमन होता था हम लोगों के अनुरोध पर वे आजाद जी से जुड़े संस्मरण अकसर सुनाया करते थे एक बार इस चित्र का रहस्य भी उन्होंने ही बतलाया था।
 झाँसी में मास्टर रुद्रनारायण का घर क्रांतिकारियों की शरणस्थली था, वहाँ क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकें भी हुआ करती थीं। काकोरी-काण्ड के पश्चात् फरारी के दिनों में चंद्रशेखर आजाद लंबे समय तक झाँसी में मास्टर रुद्रनारायण के घर पर रहे माहौर जी की आजाद जी से यहीं भेंट हुई थी, फिर धीरे-धीरे वे आजाद जी के विश्वस्त साथी बन गए। आजाद जी झाँसी-ओरछा मार्ग पर सातार के जंगलों में  एक संन्यासी के रूप में अज्ञातवास में भी रहे। उस अज्ञातवास हेतु मास्टर रुद्रनारायण ने उन्हें हरिशंकर नाम दिया था। लगभग डेढ़ वर्ष आजाद जी वहाँ साधु बनकर एक कुटिया बनाकर रहे, उन्होंने वहाँ के गाँव के बच्चों को शिक्षा भी दी, इन जंगलों में चंद्रशेखर आजाद ,भगवान दास माहौर, सदाशिवराव मलकापुरकर आदि के साथ निशानेबाजी एवं  गुरिल्ला युद्ध का अभ्यास भी करते रहे; किंतु किसी को ये ज्ञात नहीं हो सका कि साधु हरिशंकर वही आजाद जी हैं ,जिन्हें पूरी ब्रिटिश पुलिस पागलों की तरह  तलाश कर रही है।
    इस दौरान मास्टर रुद्रनारायण के घर पर भी उनका आना जाना रहा। रुद्रनारायण बहुत अच्छे चित्रकार, मूर्तिकार एवम फोटोग्राफर थे। उन दिनों तक आजाद जी की कोई तस्वीर थी ही नहीं, इसीलिवे पुलिस की नरों से भी बचे रहते थे, उन्हें कोई पहचानता नहीं था। आजाद जी अपनी फोटो खिंचवाते भी नहीं थे, मास्टर रुद्रनारायण एवं उनकी पत्नी ने कई बार उनसे फ़ोटो खिंचवाने का आग्रह किया; पर उन्होंने हमेशा इनकार कर दिया। आजाद जी को आशंका थी कि अगर कभी भी फ़ोटो किसी प्रकार पुलिस के हाथ लगा, तो उन्हें पहचाना जा सकता है।
    एक दिन आजाद जी मास्टर रुद्रनारायण के घर पर थे, सुबह स्नान करके वे स्नानागार से बाहर आए, तो श्वेत धोती कमर से लपेटी हुई थी, कंधे पर जनेऊ था ही, वे अपने बाल काढ़ते हुए कोई देशभक्ति का तराना गुनगुना रहे थे, मास्टर रुद्रनारायण ने अचानक कैमरा उठाया और बोले-पंडिज्जी, आजआपकी छवि बिल्कुल अलग लग रही है एक फोटो खींच लूँआजाद जी ने टालते हुए कहा-अरे, नहीं, ऐसे नंगे बदन... रुको मैं कुर्ता तो पहन लूँ... मास्टर रुद्रनारायण रुकना नही चाहते थे, उन्होंने कहा-ऐसे ही अच्छे लग रहे हो, कुर्ता रहने दो।'....आजाद जी बोले- अच्छा नहाने से मूँछें बेतरतीब हो गई हैं, इन्हें तो ठीक कर लूँ- कहते हुए उन्होंने एक ओर मूँछ ठीक करके दूसरी मूँछ उमेठना शुरू की... मास्टर रुद्रनारायण सशंकित थे कि कहीं आजाद जी का मन अचानक बदल न जाए, उन्होंने चट से उस क्षण की मुद्रा को ही कैमरे में कैद कर लिया....
बस वही आजाद जी की एकमात्र अकेली तस्वीर थी, जो उनके जीवन काल मे खींची गई थी। मास्टर रुद्रनारायण जी ने आजाद जी के इस चित्र को उनके जीवन काल मे किसी को नहीं दिखलाया, उनके बलिदान के बाद ही इसे सार्वजनिक किया। ...यतस्वीर इतिहास की महत्त्वपूर्ण धरोहर बनी। उसके बाद उनकी जितनी तस्वीरें या मूर्तियाँ बनाई गईं , सब इसी के आधार पर बनाई गईं। आजाद जी की एक और दुर्लभ तस्वीर भी प्राप्त होती है ,जिसमें वह मास्टर रुद्रनारायण की पत्नी और उनकी दो बेटियों के साथ बैठे हैं, यह एक पारिवारिक चित्र हैवह मास्टर रुद्रनारायण ने कब और किन स्थितियों में खींचा, इसका विवरण नहीं मिलता, किंतु आजाद जी की पहचान के रूप में वही इकलौता चित्र अमर हो गया, जिसकी चर्चा माहौर जी ने की।
      आजाद जी की जयंती पर उनके उसी चित्र को सामने रखकर उनका भावपूर्ण स्मरण करते हुए उनके एक पसंदीदा शेर के साथ ही उन्हें नमन करता हूँ-
‘दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे।
  आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।’
     उनके साथ ही उनकी छवि को जन-जन तक पहुँचाने वाले मास्टर रुद्रनारायण को नमन, अपने गुरु डॉ. भगवानदास माहौर को नमन।