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Jul 11, 2010

मार्निंग वॉक का फंडा

मार्निंग वॉक का फंडा
- विनोद साव
'जिन्दगी तो दौड़धूप का दूसरा नाम है।' पहले वे दार्शनिक भाव से बोले। .. जब दौडऩा है तो अकेले क्यूं... पत्नी को भी साथ रखिए क्योंकि पति और पत्नी गृहस्थी की गाड़ी के दो चक्के हैं और इसे चलाने के लिए दोनों चक्कों का दौडऩा जरुरी है।'
आजकल मार्निग वॉक की भागम- भाग है। सेहत बनाने और मांसपेशी दिखाने का फैशन है। मैक्सी के अन्दर बीवी है तो चार साल का बेटा फुलपेंट में डूबा है और पिताश्री उतर आए हैं हाफपेंट पर। तीनों का बरमूडा ट्रायेंगल है। बरमूडा पहने वे पत्नी और बच्चे के साथ दौड़े जा रहे थे। ओलम्पिक में जैसे किसी विजेता धावक के पीछे पत्रकार दौड़ते हैं मैंने उनके पीछे दौड़ लगाते हुए कहा कि 'सर! आखिर आपके मार्निग वॉक का फंडा क्या है? हर रोज आप पत्नी व बच्चों के साथ दौड़ लगाते हैं?'
'जिन्दगी तो दौड़धूप का दूसरा नाम है।' पहले वे दार्शनिक भाव से बोले। .. जब दौडऩा है तो अकेले क्यंू... पत्नी को भी साथ रखिए क्योंकि पति और पत्नी गृहस्थी की गाड़ी के दो चक्के हैं और इसे चलाने के लिए दोनों चक्कों का दौडऩा जरुरी है।' अब वे गृहस्थ मुद्रा में आ गए थे।
'... फिर साथ में यह तीसरा चक्का क्यों।'' मैंने उनके बेटे की ओर इशारा करते हुए कहा।
'बेटा स्टेपनी है.. जब एक चक्का पंचर हो जाता है तब स्टेपनी काम में आती है।' अब वे घोर व्यावहारिकता में उतर आए थे। कहने लगे 'रोज सबेरे दौड़ लगाकर सेहत बनाने का हमारा उद्देश्य भूख बढ़ाना है। आपको आश्चर्य होगा कि हमारे सुखद दाम्पत्य जीवन का मुख्य आधार 'मुर्गा' है।'
'लेकिन आदमी के सुखद दाम्पत्य जीवन से भला एक मुर्गे का क्या संबंध है!' मैंने चौकते हुए पूछा।
'संबंध है साहब संबंध है.. अब देखिए मेरी बीवी मुर्गा बहुत अच्छा बनाती है। जिस दिन वह लजीज मुर्गा बनाती है उस दिन हमारे दाम्पत्य संबंध मधुर हो उठते हैं। जिस दिन मुर्गा बनाने में देरी हुई या मुर्गा ठीक नहीं बना तो हम दोनों के बीच मुर्गा लड़ाई शुरु हो जाती है। हम रोज सबेरे दो मील दौड़ लगाते हैं ताकि हमें ज्यादा से ज्यादा भूख लगे और हम ज्यादा से ज्यादा मुर्गा खा सकें।' यह कहते हुए उन्होंने अपनी पत्नी की ओर किसी मुर्गे की तरह प्यार से गर्दन उठाकर देखा तो पत्नी फुदकती हुई समर्पण भाव से निहाल हो उठी। ये उसी सूत्र का परिणाम था जिससे यह नारा बना है कि सुखद दाम्पत्य जीवन के दो आधार पत्नी का समर्पण और पति का प्यार। जाहिर है सुखद दाम्पत्य जीवन जीना उनके मार्निग वॉक का फंडा था।
अब इधर दाम्पत्य जीवन का एक दूसरा दृश्य है जिसमें आजकल उनका आहार नियंत्रण चल रहा है। पहले धूम्रपान नियंत्रण चल रहा था फिर मद्यपान नियंत्रण सम्पन्न हुआ। कुछ दिनों बर्थ कंट्रोल पर रहेे। इस तरह के अनेक नियंत्रणों को साधने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि उनके पीछे उनकी पत्नी पड़ गई थी। पत्नी को हरदम लगा करता था कि उसका पति हरफनमौला है और वह कभी भी नियंत्रण से बाहर हो सकता है। इसलिए रोज सबेरे नहा धोकर पति के पीछे पड़ जाना उसने अपना प्रथम कर्तव्य माना था।
पति को प्रात: उठाकर उसके पीछे अपना कुत्ता दौड़ा देना ताकि कुत्ता जब तक भोंकता रहे तब तक पति दौड़ता रहे। घर आने पर उसे लहसून की कलियां चबाने के बाद पांच गिलास पानी पीने को देना। हाजत रफा के लिए नस गुड़ाखू की जगह नीम के दतौन पकड़ा देना। इस कड़वी हिदायत के साथ कि 'देखो.. तुम नीम के ये दतौन लो और जा बैठो। इसे चबा चबाकर इसके कड़वे रस का पान करते रहोगे तो सारे कीड़े बाहर आ जाएंगे।' बाहर निकलते तक बारह इंची नीम की काड़ी बस दो इंच रह जाती है।
पत्नी की हिदायत जारी थी 'चाय बिना दूध के पीयो तो गैस की शिकायत बन्द। चाय छोड़कर जंवारा रस पीयो तो और अच्छा है। मालूम है यह ग्रीन ब्लड है। सुबह के गरमा- गरम नाश्ते को भूल जाओ और अंकुरित मूंग व चने चबाओ। भोजन में पूड़ी पराठा का हल्ला छोड़ो और सूखी रोटी पर धावा बोलो। पुलाव तो क्या चावल भी न खाओ तो तुम्हारी सेहत के लिए ठीक रहेगा। भात खाकर पेट निकालकर कौन सा तीर मारोगे। फिर तुम जानते हो कि ये पेट कहां- कहां आड़े नहीं आता।
गेहूं हमारा मित्र है। सारा जीवन रोटी सब्जी खाकर गुजार सकते हो। अरे आदमी को क्या चाहिए? दो वक्त की रोटी बस..। मारवाड़ी सूखी रोटी खाकर करोड़ीमल बन जाता है और एक तुम हो कि खा- खाकर भुक्कड़ हुए जा रहे हो। जब देखो तब खाने पीने के नाम से घर में हंगामा मचाये रखते हो। जैसे इस दुनियां में तुम खाने के लिए ही जिन्दा हो। अरे तुम्हारा पेट है कि कब्रिस्तान... न जाने अब तक वहां कितने मुर्गे दफन हो गए हैं।
वे जब भी सुबह सोकर उठते हैं लगता है वे घर में नहीं किसी थियेटर में खड़े हों जहां पत्नी की दी हुई हिदायतें डिजीटल साउन्ड में गूंज रही हैं। उसने टीवी चालू किया। सामने बाबा टांगदेव थे। जैसे उनकी पत्नी के कहने पर आए हों। इसके पहले वाले बाबाओं का रोल खत्म हो गया आजकल सब ओर इन्ही बाबा की जय है। हर छह महीने में एक नया गुरु तैयार हो जाता है। यूज एंड थ्रो का जमाना है पुराने गुरु गुड़ गोबर हो गए अब सामने नया गुरु घण्टाल है। उसने कातर दृष्टि से टीवी के एक भक्त को देखा जो शोभा यात्रा में जयजयकार करते चले जा रहे थे। उनके मुंह से निकला 'कहां जा रहे हो? अरे मिलेगा क्या? बाबाजी की पादुका!' भक्त ने मुस्कुराकर कहा 'वह भी मिल जायगा अगर बाबाजी की कृपा हो।'
वे आंखे बन्द कर शांतमुद्रा में बैठ गए थे। या तो प्राणायाम की तैयारी थी या फिर रेकी का आव्हान वे कर रहे थे। आंखें खुलीं तो सामने मैं खड़ा था उनके शुभचिन्तकों में से एक।
सुना है हड्डियों को मजबूत करने के लिए बहुत से लोग पाया पी रहे हैं।' मैंने कहा।
'यह क्या बला है?' उन्होंने दयनीय होते हुए पूछा।
'पाया यानी..बकरे की टांग का रस।' मैंने खुलासा किया।
'यहां मुर्गे की टांग तो नसीब नहीं हो रही है और तुम बकरे की टांग अड़ा रहे हो।' वे तैश में थे। संभवत: इस तैश के पीछे उनका आहार नियंत्रण था। आदमी जब ज्यादा आदर्श पर चलता है तब कई कुण्ठाएं जन्म लेती हैं।
नीचे बरमूडा और ऊपर टी-शर्ट थी जो पत्नी ने उनके जन्मदिन पर उपहार दिया था उन्हीं के पैसों से। उसने प्रतिवाद भी किया था पत्नी की इस फिजूल खर्ची पर 'नीचे पहनने के लिए मेरे पास लोअर, लूंगी, पाजामा, टॉवेल और जांघिया है। अब और क्या- क्या तुम मुझे पहनाओगी?' तब पत्नी ने एक रहस्यमय मुस्कान के साथ कहा था 'बरमूडा में तुम ज्यादा यंग लगोगे।'
'यार इन बीवियों को पति नहीं एक केयरटेकर चाहिए जो घोड़े जैसा शक्तिशाली हो और कुत्ते जैसा वफादार।' उसने मेरी ओर समर्थन की आस में देखा।
'तुम्हारा टॉमी आज दिख नहीं रहा है।' मैंने कुत्ते की चर्चा होने पर उनके कुत्ते को याद किया।
'टॉमी की सर्विसिंग हो रही है। मतलब नहलाई धुलाई।' उन्होंने बतलाया 'नहाने के बाद मेरे साथ सलाद खाएगा।' उसने पत्नी के काटे हुए सलाद पर अंकुरित मूंग व चने छिड़कते हुए कहा।
'क्या तुम्हारे साथ- साथ टॉमी का नानवेज भी बन्द हो गया?' मैंने जैसे उसकी दुखती रग पर हाथ फेरा। उसने दर्द को जज्ब करते हुए कहा 'हां! टॉमी को आजकल खीरा ककड़ी दिया जा रहा है। भूख में वह कुछ भी खाने के लिए ललचता है।' उसकी आवाज में मायूसी थी जैसे वे टॉमी की नहीं अपनी बात कह रहे हों। उनकी पत्नी बाहर आ गई थी हाथ में एक प्लेट थी जिसमें केले और पपीते के छिलके थे। उसने पत्नी की ओर हैरत से देखा 'यह क्या अब तुम मुझे ये छिलके भी खिलाओगी!'
'यह तुम्हारे लिए नहीं टॉमी के लिए है।' पत्नी ने स्पष्ट कर उसे शान्त किया। उनकी पत्नी ने मुझे नमस्कार करते हुए कहा 'हमारा टॉमी अब शुद्ध शाकाहारी हो रहा है।'
'पर भाभीजी .. टॉमी तो फ्लेश इटिंग एनीमल है ग्रास इटिंग नहीं... यानी मांसाहारी जीव है और आप..?' मैंने कहा।
बीच में टोकते हुए उनकी पत्नी ने कहा 'ऐसा कुछ नहीं है.. जैसा संस्कार डालोगे जीव वैसा हो जाता है।' अबकी बार थोड़े कर्मकाण्डी स्वर गूंजे थे। फिर अपने पति की ओर इशारा कर उसने कहा 'ये भी तो फ्लेश इटिंग एनीमल थे टॉमी की तरह .. अब इन्हें भी शाकाहारी बना रही हूं। यानी इनको और टॉमी को .. दोनों को। अरे शाकाहारी जानवर मांसाहारी जानवरों से ज्यादा बड़े और ताकतवर होते हैं। जैसे हाथी, दरियाई घोड़ा और जिराफ। और मांसाहारियों की तरह पीठ पीछे से हमला नहीं करते बल्कि सामने से आक्रमण करने का साहस करते हैं। मैं इनको और टॉमी दोनों को साहसी बना रही हूं। और फिर देखिये आप रोज सबेरे ये दोनों कैसी दौड़ लगाते है। ये है हमारे मार्निंग वाक का फंडा।' उनकी पत्नी ने जोर से आवाज लगाई जैसे कि उन्होंने कोई नारा गुंजाया हो।
'सुना है आप पचास के हो गए?' मार्निग वाक के समय किसी सहृदयी की आवाज सुनाई दी।
हां भई .. हो तो गए।' मैंने तेज चाल चलते हुए उसंास भरी।
'मैं भी चालीस का हो गया हूं।' वे दौड़कर हांफते हुए करीब आए और बधाई पाने की चाहत से मुझे देखा।
'यार बधाई हो।' मैंने भी उन्हें भांपते हुए कहा कि 'आजकल चालीस भी बहुत होता है हो.., इस जमाने में आपने चालीस पूरे कर लिए यानी मैदान मार लिया।' सबेरे सबेरे मैदान में उकडूं बैठे लोगों की ओर हमने एक साथ देखा।
'नई तो क्या!' वे उत्साह से भर गए फिर बोले 'आज की भागमभाग जिन्दगी में न जाने किस दिन हार्ट-अटैक हो जाय। चढ़ती महंगाई में आप क्या खाओगे और कितनी कैलोरी पाओगे, बढ़ते प्रदूषण में न जाने कब दम घुट जाय।' उन्होंने हवा में आती शराब खाने की बदबू से अपनी नाक ढंकते हुए कहा।
'ये लो आपने शैतान का नाम लिया और शैतान आ धमका, अब तो हवाएं भी हमारी नहीं रहीं। जहां मुट्ठी भर धूप, थोड़ा सा आसमां और ताजा हवा की किल्लत हो जाए वहां तो चालीस पार कर लेना ही एक बड़ी उपलब्धि है। ऐसे लोगों का तो हेल्थ क्लबों और योग शिविरों में सम्मान किया जाना चाहिए और उनके अभिनंदन पत्र में यह लिखा जाना चाहिए कि किन गुणों के सागर होने के कारण चालीस पूरे कर लेने के बाद भी उनका चालीसा नहीं उठा।' मेरा चालीसा पाठ पूरा हो चुका था उनकी दौड़ पूरी हो चुकी थी। हम अपनी अपनी दिशाओं की ओर मुड़ चले थे। यह था उनके मार्निंग वॉक के फंडे पर मेरा फंडा।
पता- 'सिद्धार्थ' मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़- 491001
मोबाइल- 9907196626
ई-मेल- vinod.sao1955@gmail.com
21 वीं सदी के व्यंग्यकार स्तंभ के आयोजक विनोद साव
20 सितंबर 1955 को दुर्ग में जन्मे विनोद साव समाजशास्त्र विषय में एम.ए.हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र में सहायक प्रबंधक हैं। मूलत: व्यंग्य लिखने वाले विनोद साव अब उपन्यास, कहानियां और यात्रा वृतांत लिखकर भी चर्चा में हैं। उनकी रचनाएं हंस, पहल, ज्ञानोदय, अक्षरपर्व, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य में भी छप रही हैं। उनके दो उपन्यास, चार व्यंग्य संग्रह और संस्मरणों के संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन है। उन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं। वे उपन्यास के लिए डॉ. नामवरसिंह और व्यंग्य के लिए श्रीलाल शुक्ल से भी पुरस्कृत हुए हैं।
उदंती में प्रति माह प्रकाशित 21वीं सदी के व्यंग्यकार स्तंभ का आयोजन विनोद साव के प्रयासों से ही संभव हो सका। इस सदी के सक्रिय व्यंग्यकारों को तलाश कर उन्होंने व्यंग्य की आगे की संभावनाओं को तलाशने की कोशिश की है। उनकी यह कोशिश पूरी हो पाई या नहीं इसे तो हमारे सुधी पाठक और व्यंग्य-समीक्षक ही ठीक-ठीक बता पाएंगे। विनोद जी अब इस स्तंभ को और अधिक खींचने के मूड में नहीं हैं अत: इसका समापन हम विनोद जी के व्यंग्य 'मॉर्निंग वॉक का फंडा' से कर रहे हैं। विनोद जी की खासियत है कि वे बोलते बतियाते हुए व्यंग्य करते हैं जिनमें हास्य का पुट भी होता है और मुद्दे की गंभीरता भी। प्रस्तुत व्यंग्य में उन्होंने आधुनिक जीवन शैली में हो रहे परिवर्तन पर हास्य- व्यंग्य की हल्की फुहार तो छोड़ी ही है साथ ही उस बाजारवाद पर गहरा कटाक्ष किया है जहां सेहत के नाम पर लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
-संपादक

Jun 5, 2010

सावधान! मैं आत्मकथा लिख रहा हूँ

सावधान! मैं आत्मकथा लिख रहा हूँ
- रामेश्वर वैष्णव
इसमें मैं अपने बारे में कम और तुम्हारे बारे में ज्यादा लिखूंगा क्योंकि यह मेरी आत्मकथा है। इतना ज्यादा लिखूंगा कि तुम्हारे शरीर पर वस्त्र, चरित्र में उज्वलता और व्यवहार में कुटिलता जरा भी नहीं बच पायेगी। तुम लोगों ने मुझे वस्त्रहीन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मेरे निष्कपट व्यवहार में हजारों छल छिद्र निकाले तथा मेरी तमाम सदाशयता को दुष्टता का पर्याय बताया, अब मेरी बारी है।
मेरे अशुभचिंतकों, छद्म दोस्तों एवं अन्य प्रकार के दुश्मनों। सावधान हो जाओ मैं आत्मकथा लिख रहा हूं इसमें मैं अपने बारे में कम और तुम्हारे बारे में ज्यादा लिखूंगा क्योंकि यह मेरी आत्मकथा है। इतना ज्यादा लिखूंगा कि तुम्हारे शरीर पर वस्त्र, चरित्र में उज्वलता और व्यवहार में कुटिलता जरा भी नहीं बच पायेगी। तुम लोगों ने मुझे वस्त्रहीन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मेरे निष्कपट व्यवहार में हजारों छल छिद्र निकाले तथा मेरी तमाम सदाशयता को दुष्टता का पर्याय बताया, अब मेरी बारी है।
तुम लोगों ने हकीकत को लिखा, मेरी कमजोरियों पर प्रकाश डाला तथा मेरी घोषित नीचता का संक्षेप में वर्णन किया, मैं तो कल्पनाशील व्यक्ति हूं मैं तुम्हारे चरित्र में ऐसी ऐसी कमजोरियां ढूंढ निकालूंगा जिसका तुम्हें भी पता नहीं है। मेरे पास शब्द भंडार है वो किस दिन काम आयेगा तुम्हारी मामूली चूक को भी नीचता सिद्ध करने में मेरा जवाब नहीं होगा। मैं तुम्हारी स्वाभाविक नीचता को इतने विस्तार से शब्दबद्ध करूंगा कि तुम्हारे खार खाये हुए पड़ोसी तुमसे करबद्ध प्रार्थना करेंगे कि बिना उनके सहयोग के तुम स्वेच्छा से स्वर्गीय हो जाओ।
दरअसल मैंने अपनी लेखनी का आज तक दुरुपयोग नहीं किया हालांकि तुम लोग इस बात को कभी नहीं मानोगे, क्योंकि मेरी उदारकुटिलता से परिचित हो। अब सोचता हूं थोड़ा-मोड़ा दुरुपयोग कर ही डालूं आज तक सदुपयोग करके तुम्हारा क्या उत्खनन कर लिया सो, आत्मकथा लिखना मेरी मजबूरी है। तुम्हारी दुष्टता का सविस्तार वर्णन मुझे आटोमेटिकली सज्जन पुरुष सिद्ध कर देगा, थोड़ा बहुत तो मैं वैसे भी हूं, मगर तुम्हारी तरह उसे मैग्नीफाइ करने की कला मुझमें नहीं है। तुम तो अपने भीतर हजारों गुण ढूंढ निकालते हो अपनी सज्जनता का इतनी निर्दयता से बखान करते हो कि लोग तुम्हें सज्जन स्वीकारने के लिए विवश हो जाते हैं। दरअसल तुम्हारी सारी उपलब्धियां लोगों को विवश करके ही हासिल हुई हैं। मैं तुम्हारी हकीकत इतनी सज्जनतापूर्वक सामने लाऊंगा कि लोग तुम्हें दुर्जन मानने के लिए सहर्ष विवश हो जायेंगे।
तुम कम्बख्तों ने अपने खड़तूस छाप कार्यक्रमों में मेरी भरपूर उपेक्षा की है, मैं ऐसा नहीं करुंगा, तुम लोगों को भव्यतम कार्यक्रम में सादर आमंत्रित करूंगा, सम्मानित करवाऊंगा और मेरे सम्मान में कुछ बोलने के लिए विवश करुंगा, लेकिन जब तुम बोलोगे तो लोग जान जायेंगे कि तुम अव्वल दर्जे के बेवकूफ हो। तुम अपनी ही हंसी उड़वाने केलिए मेरे द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमों में स्वतंत्र होगे। इस स्वतंत्रता का तुम जितना उपयोग करोगे उतना ही ज्यादा स्वयं को मेरा गुलाम घोषित करोगे। यह सारा आयटम मेरी आत्मकथा का विषय रहेगा। मेरे लाखों पाठक यही समझेंगे कि मैंने तुम्हें भरपूर सम्मान दिया मगर तुम लोग अपनी कुटिलता के कारण सरेआम वस्त्रविहीन हो जाओगो। मेरी आत्मकथा इतनी रोचक होगी कि लोग पढऩे के लिए मजबूर हो जाएंगे। पूरी पढऩे के बाद मेरी ऊटपटांग मान्यताओं को स्वीकारने लगेंगे और आखिर में तुम तमाम लोग मेरी उपेक्षा को अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल मानने लग जाओगे। यही तो मेरे लेखन की विशेषता है। एक बार जो मजबूर हुआ वो हमेशा मजबूर होने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा। समीक्षक लिखेंगे कि मेरा लेखन समग्र तौर पर मुक्ति के लिए है, जबकि ऐसा लिखने के लिए वे स्वयं मजबूर होंगे। मैं अपने जीवन के रहस्यों को इतनी सफाई से खोलूंगा कि मेरे बारे में लोग निश्चित तौर पर कोई धारणा बना ही नहीं पायेंगे, तुम लोगों को हमेशा यह अफसोस रहेगा कि मुझे समझने में तुमने बड़ी गलती की, अरे मैं खुद को नहीं समझ पाया हूं तो तुम क्या खाक समझोगे।
मेरी आत्मकथा तुम लोगों के लिए तो खतरनाक होगी ही, उन लोगों के लिए भी खतरनाक होगी जिनसे मेरे संबंध मधुर रहे। महिलाएं कृपया गौर से पढें। मैं जानता हूं अपनी खूबसूरती के बल पर उन्होंने मुझे बौद्धिक नहीं रहने दिया, मुझसे लाभ उठाने के चक्कर में उन्होंने मुझे अक्सर घनचक्कर बनाए रखा। उन सभी बातों का खुलासा करने के लिए ही तो मैं आत्मकथा लिख रहा हूं। साहित्य के क्षेत्र में लोगों ने वाह-वाह कर बुद्धू बनाया, नौकरी में हांव-हांव कर बुद्धू बनाया और पारिवारिक जीवन में हवा- हवा कर बुद्धू बनाया अब मेरी बारी है, मैं आत्मकथा लिख कर यही काम करुंगा।
मेरे घोषित किस्म के दुश्मनों और अघोषित टाइप के दोस्तों ने मुझे हानि पहुंचाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी, अब वे स्वयं बाकी नहीं रह पायेंगे। लेखनी के दुरुपयोग का श्रेष्ठ उदाहरण होगी मेरी आत्मकथा। हालाकि जितने लोगों ने आत्मकथाएं लिखी हैं उनके बारे में भी ऐसा ही कुछ कहा जाता है। दरअसल आत्मकथा लेखन अपने खिलाफ फैलाए गए अफवाहों एवं साजिशों का बौद्धिक स्पष्टीकरण होता है।
संपर्क - 62/699 प्रोफेसर कॉलोनी, सेक्टर-1, सड़क-3, रायपुर- 492001 (छत्तीसगढ़) मोबाइल नं. 98274 79678
व्यंग्यकार के बारे में ...
रामेश्वर वैष्णव छत्तीसगढ़ी और हिन्दी दोनों में लिखते हैं। वे गीत, गजल और व्यंग्य लिखते हैं। इन विधाओं पर उनके दस संग्रह छप चुके हैं। वे छत्तीसगढ़ी फिल्मों के गीतकार हैं और लगभग दस फिल्मों के लिए उन्होंने गीत लिखे हंै। वे लोकमंचों के लिए भी गीत लिखते हैं। उन्हें कुल जमा दस सम्मान मिल चुके हैं। साहित्य और लोकमंच की उनकी दीर्घ साधना को देखते हुए विगत दिनों दुर्ग में प्रतिष्ठित 'समाजरत्न' पतिराम साव सम्मान से अलंकृत किया गया। वे डाक तार विभाग के सेवानिवृत सहायक प्रबंधक हैं। दरअसल रामेश्वर वैष्णव मंचों के प्रसिद्ध हास्य कवि हैं जिसका प्रभाव उनकी व्यंग्य रचनाओं पर भी देखने को मिलता है। उनमें व्यंग्य के निर्वहन के लिए हास्य का आग्रह प्रबल है। वे अपनी रचनाओं में हास्य-विनोद के घोर पक्षधर जान पड़ते हैं। वे व्यवस्था की हास्यास्पद स्थितियों पर हास-परिहास करते हैं। प्रस्तुत है उनकी ऐसी ही एक रचना 'सावधान! मैं आत्मकथा लिख रहा हूं।' इसके माध्यम से उन्होंने आत्म मुग्धता से भरे ऐसे अहमन्य व्यक्तित्वों का उपहास किया है जो दूसरों पर आरोप और आक्षेप लगाने की नीयत से अपनी आत्मकथाएं लिखते हैं।
- विनोद साव

May 24, 2010

व्यंग्य ऊपर व्यंग्य


-  अख़्तर अली
अब ये मेरी आन बान और शान का मामला हो गया था। एक अलिखित रचना मुझे चिढ़ा रही थी, कह रही थी लो मैं ये रही, क्षमता है तो मुझे रच लो।
मैं श्रीलाल शुक्ल के व्यंग्य उपन्यास राग दरबारी पर हाथ रख कर प्रतिज्ञा करता हूं कि जब भी लिखूंगा व्यंग्य लिखूंगा व्यंग्य के अलावा और कुछ नहीं लिखंूगा। आप मेरे व्यंग्य की क्षमता का अनुमान मेरे इस वक्तव्य से लगा सकते हैं कि मैं अपने व्यंग्य गुरू शरद जोशी की कसम खाकर कहता हूं कि सबसे श्रेष्ठ व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई हैं।
मेरी हार्दिक इच्छा थी कि मैं भी परसाई जी के स्तर की रचना लिखंू, शरद जोशी वाले तेवर की रचना लिखूं, लेकिन लाख कोशिश के बावजूद भी मेरी कलम से आज तक ऐसी कोई रचना नहीं लिखा सकी जो देश और दुनिया की तो छोडि़ये मेरे पड़ोसी को भी यह अहसास नहीं करा सकी कि उसके पड़ोस में जो व्यक्ति उसे सुबह शाम सलाम करता है वह एक व्यंग्यकार है। आखिर अपनी इस असफलता का ठिकरा मैं किस के सिर पर फोडू? किसी किसी के सिर पर तो फोडऩा ही होगा क्योंकि मैं जिस देश का नागरिक हूं वहां असफलता की जिम्मेदारी स्वयं के सिर पर लेने की परम्परा नहीं है। अब मेरे सामने यह एक विकराल समस्या है कि एक अच्छी व्यंग्य रचना लिख पाने के लिये मैं किसको जिम्मेदार बताऊं? अगर मैं हाकी का खिलाड़ी होता तो सारा दोष गिल जी के सिर पर थोप देता, उनका सिर इतना विशाल है ही इसलिये कि जो चाहे अपनी नाकामयाबी का ठिकरा उनके सिर पर फोड़ता फिरे। अब तो गिल बाबा भी इसके इस कदर आदी हो गये हैं कि देश में कही भी ऐसा वैसा कुछ होता है और कोई इसकी जवाबदारी लेने में हिचकिचाता है तो ये झट से अपना सिर आगे कर देते हैं और कहते हैं मैं हूं ना! इसके बदले में बाबा जी और कुछ नहीं चाहते, उनके लिये यही काफी है कि किसी तरह उनका सिर देश के काम जाये।
मेरे को तो बिलकुल समझ नहीं रहा है कि अपनी इस असफलता का जिम्मेदार मैं किसको ठहराऊं? मैंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोडी थी, डायरी पेन से लैस मैं एक अच्छी व्यंग्य रचना लिखने के लिये बेताब था लेकिन हर बार ऐसा महसूस होता था कि कही कोई है जो मेरे अहसास को सुला रहा है, कोई व्यंग्य का दुश्मन मेरे पीछे पड़ा हुआ है जो नहीं चाहता कि व्यंग्य का बाजार भाव ऊपर उठे। आखिर वह कौन है? एक दो कवियों पर मुझे शक हुआ था लेकिन मैं चुप रहा क्योंकि ये लोग अक्सर गोष्ठियों का आयोजन करते रहते हैं। अब साहित्य के समन्दर में रह कर आयोजकों से तो बैर नहीं लिया जा सकता ? मेरे को परेशान देख कर एक दिन हवलदार लफड़ाप्रसाद ने पूछ ही लिया कि परेशानी क्या है? हमने अपनी दास्तां सुनाई तो वे कहने लगे बस इतनी सी बात है कि आप अपनी असफलता का ठिकरा किसके सिर फोड़े ? इसमें परेशान होने की क्या बात है अरे हमसे पहले पूछ लिये होते तो इस वक्त इतने टेंशन में होते। ये सब चिन्ता छोड़ो और पत्रकार वार्ता आयोजित कर के साफ- साफ कह दो कि तमाम कोशिशों के बावजूद भी व्यंग्य नहीं लिख पा रहा हूं इसके पीछे दाउद इब्राहिम का हाथ है। बड़ा गजब का हाथ है भई, भाई का। इनका हाथ अगर एक बार हाथ में जाये तो फिर कभी उस हाथ को इस हाथ से जाने मत देना। इस हाथ में असीम संभावनाए हैं, पुलिस विभाग की लाज इन्हीं हाथों में है। पुलिस विभाग को भाई का हाथ इतना प्यारा है कि वह उन्हीं के हाथों में अपना भविष्य देखती है। जब से पुलिस को भाई के हाथ का सहारा मिला है वह भाई की गर्दन पकडऩा ही भूल गई है। हवलदार लफड़ाप्रसाद तो अपना मशविरा देकर निकल लिये लेकिन मेरे को यह स्वीकार नहीं हुआ। ये बैठे बिठाये मैं अच्छी मुसीबत में फंस गया। व्यंग्य लिखा भी नहीं रहा है और लिख पाने की कोई सार्थक वजह भी नहीं है। अब मैं अपनी इस असफलता पर कैसे पर्दा डालंू, साहित्यिक बिरादरी में कैसे बात बनाऊं कि क्यों लिख नहीं पा रहा हूं। अगर मैं सरकार में होता तो कह देता कि इसके पीछे पाकिस्तान का हाथ है। बिना सरकार में
शामिल हुए मैं ऐसा कह ही नहीं सकता क्योंकि अपना दोष पाकिस्तान के मत्थे मढऩे का अधिकार केवल सरकार के पास है निजी क्षेत्र को अभी यह अधिकार प्राप्त नहीं है।
आखिर क्या किया जाये? अब मेरे पास दो ही रास्ते बचते हैं या तो किसी तरह भी कोशिश करके एक अदद व्यंग्य लिख ही दिया जाये या फिर लिख पाने की जांच की जाये कि आखिर ऐसा हो क्या गया कि दो पेज की एक रचना भी नहीं लिखा पा रहा हूं। परेशान देख एक प्रकाशक मित्र ने कहा भी कि इतना परेशान होने से तो बेहतर है कि किसी अन्य लेखक की एक दो रचना चुरा कर थोड़े शब्द आगे पीछे कर के रचना तैयार कर दो जब तुम्हारे अच्छे दिन लौट आएंगे तो धन्यवाद के साथ अपनी एक दो रचना उसको दे देना हिसाब बराबर हो जायेगा। ये मशविरा मेरे समझ में नहीं आया। दूसरे की रचना को अपने नाम से कैसे प्रकाशित कर सकते हैं। मेरा निर्णय सुनकर प्रकाशक को आश्चर्य हुआ कहने लगे यहां तो लोग दूसरे की रचनाओं को लेकर पूरा संग्रह निकलवा लेते हैं और तुम को एक रचना मारने में इतनी परेशानी हो रही है। तुम्हारा तो भगवान ही मालिक है।
अब ये मेरी आन बान और शान का मामला हो गया था। एक अलिखित रचना मुझे चिढ़ा रही थी, कह रही थी लो मैं ये रही, क्षमता है तो मुझे रच लो। मैंने तय कर लिया कि मैं उन कारणों का पता लगाऊंगा जिनकी वजह से मैं अपने आदर्श परसाई जी की भांति लिख नहीं पा रहा हूं। बस फिर क्या था मैं अपनी इस मुहिम में जुट गया। सूखे को गीला किया गीले को सुखाया। सपाट में गड्ढा किया गड्ढे को सपाट किया। सिले हुए को फाड़ा, फटे हुए को सिया। बहुत तीन पांच किया तब बात मेरी समझ आई कि आखिर मामला क्या है? क्यों मैं एक अदद रचना के लिये तरस रहा हूं। मैंने पूरे मामले की गहराई से जांच किया और जब पूरी तरह संतुष्ट हो गया तब अपना मुंह खोला। मैं कम से कम समय में लिख पाने का कारण लेखक बिरादरी तक पहुंचा देना चाहता था कि लेखन में असल में कौन बाधक बना हुआ है? यह एक संस्पेंस फिल्म की तरह मामला हो गया था हम क्या- क्या सोचते रहे और हत्यारा एक ऐसा व्यक्ति निकलता है जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। बिलकुल ऐसा ही मेरे व्यंग्य लेखन के साथ भी हुआ है। इसको ही कहते हैं घर में लगी है आग घर के चिराग से। मेरे लेखन में बाधा कोई और नहीं बल्कि मेरे द्वारा चुनी गई सरकार थी। यह इस लोकतांत्रिक सरकार का ही किया धरा काम है जो एक व्यंग्यकार अपने को लिख पाने में असमर्थ महसूस कर रहा है। यह तो सरासर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। यदि विपक्ष को यह मालूम हो जाये तो इसी बात पर वह सरकार का घेराव करे, सदन का बहिष्कार करे, मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग करे। यह इतना गंभीर मामला है कि इसके विरोध में नगर बंद तो क्या बल्कि समूचा प्रदेश बंद कराया जा सकता है, स्कूल, कालेज, बाजार, बैंक सब बंद।
सरकार के काम करने का ये क्या तरीका है? सरकार तो हम व्यंग्यकारों के साथ जरा भी सहयोग नहीं कर रही है। सरकार का अगर यही ढंग रहा तो एक दिन व्यंग्य लेखन दम तोड़ देगा। प्रदेश और केन्द्र दोनों सरकारों का यही हाल है। सरकार तो परसाई के समय थी, उसे कहते है सरकार। उस सरकार ने परसाई जी को भरपूर सहयोग दिया। आखिर व्यंग्य लेखन के लिये क्या सामग्री चाहिये? एक मामला चाहिये, उस पर रचना लिखने के लिये दो तीन दिन का समय चाहिये, सम्पादक तक पहुंचाने के लिये दो दिन और अतिरिक्त मिलने चाहिये इतना होने के बाद एक व्यंग्य रचना पाठकों तक पहुंचती है। उन दिनों सरकारी लफड़े कितने कलात्मक अंदाज में होते थे कि देखते ही बनता था, मानो हर लफड़ा फूंक- फूंक कर किया गया हो। एक कांड होता, उसपे परसाई जी व्यंग्य लिखते, वह अखबारों में छपता, लोगों में उसकी चर्चा होती, परसाई जी को उसका पारिश्रमिक प्राप्त हो जाता, वे एक दो दिन थोड़ा सुस्ता लेते तब कहीं जाकर उस समय के मंत्री दूसरा लफड़ा करते थे। इसे कहते हैं लेखक का सम्मान। लेकिन आज वैसे मंत्री कहां? अब तो सारे लफड़े प्रति मिनट के दर से हो रहे हैं। व्यंग्यकार परेशान हैं। एक मामले में लिखने का सोचता है तब तक दूसरा लफड़ा हो जाता है। कागज कलम हाथ में लेता है तब तक तीसरा मामला सामने जाता है। अभी पहला अक्षर लिखने वाला ही रहता है कि खबर आती है कि चौथा केस पकड़ में आया है। अगर पहले मामले में लिख कर सम्पाद तक रचना पहुंचाओ तब तक इतने केस हो चुके रहते हैं कि इस मामले को सम्पादक भूल चुका होता है और उसे यह रचना बेहद बासी और रसहीन लगती है। उसको लगता है कि रचना लेखक के मुंह पर मार दे। लेकिन वह लेखक की इतनी तो इज्जत करता ही है कि रचना मुंह पर नहीं मारता सिर्फ रद्दी की टोकरी में डालता है। वैसे कुछ सम्पादक ऐसे भी हैं जिन्हें रद्दी की टोकरी में लेखक का मुंह ही नजर आता है और कुछ लेखक ऐसे हैं जिन्हें सम्पादक के मुंह में रद्दी की टोकरी दिखाई देती है वे कहते है टोकरी में रचना डाल आया हूं छप गई तो छप गई... व्यंंग्य रचना के साथ ऐसा ही होता है।
अगर सरकार व्यंग्य लेखन के सूर्य को अस्त होने से बचाना चाहती है तो उसको इस बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिये और कुछ आवश्यक कदम उठाने चाहिये। ऐसा है भाई साहब कि ताली दोनों हाथ से बजती है। अगर मंत्रीग आपका सहयोग कर रहे हैं तो व्यंग्यकारों को भी चाहिये कि वो भी अपनी तरफ से सहयोग बनाये रखें। अगर उनकी कोई रचना चर्चित होती है और चारो तरफ से बधाई आने लगती है तो व्यंग्यकार बंधुओं को भी चाहिये कि वो उस मंत्री का जिसके विभाग की मेहरबानी से व्यंग्य लिखना संभव हुआ है उसको धन्यवाद देना भूलें।
अगर सरकार मेरे सुझाव पर अमल करती है तो मेरे को पूरी उम्मीद है कि एक बार फिर से व्यंग्य लेखन धारदार हो जायेगा और पाठकों को फिर से अच्छी रचनाए पढऩे को मिलेगी।
संपर्क- सुधीर रोड लाईन्स मार्ग, आमानाका, रायपुर मो: 09826126781
व्यंग्यकार के बारे में ...
अखत अली व्यंग्य की एक प्रतिवेशी विधा नाटक से जुड़े हैं। उन्होंने मंटो और परसाई जैसे दिग्गज लेखकों की रचनाओं का नाट्य रुपांतरण भी किया है। साहित्य की इतर विधाओं में नाटक एक ऐसी विधा है जिसमें व्यंग्य की बड़ी दरकार होती है। व्यंग्य की मारक शक्ति नाटक को एक अतिरिक्त गरिमा देने के साथ उसे और भी प्रभावोत्पादक बनाती है। नाटक में व्यंग्य से लबरेज संवाद उसके दर्शक दीर्घा पर केवल गहरे प्रभाव छोड़ते हैं साथ ही व्यवस्था पर बड़े मारक प्रहार भी करते हैं। नाटक में अखतर अली की सक्रियता उसके व्यंग्य के संवादों को सहज ग्राह्य बनाते हैं। अखतर ने अपनी प्रस्तुत रचना 'व्यंग्य ऊपर व्यंग्य में' व्यंग्य की सामयिकता को लेकर सवाल खड़े किए हैं जिसमें यह भी प्रमाणित होता है कि अखबारी व्यंग्य रचनाओं की उम्र कितनी अल्पकालीन होती है। आज की राजनीति में हो रहे तेज उठापटक के बीच घटनाक्रम इतनी तेजी से बदल जाते हैं कि व्यंग्य रचना के प्रकाशित होने से पहले ही रचना की प्रासंगिकता खत्म हो चुकी होती है। यह आज ढेरों की संख्या में लिखे जा रहे घटनोत्तर व्यंग्य और उसके समय की क्षुद्र राजनीति जिसमें हथकण्डे भी उसी तीव्रता से बदल रहे हैं इन दोनों पर व्यंग्यकार ने एक साथ प्रहार किया है। उनकी रचना में उर्दू की कथा रस की परम्परा है। अखतर की रचनाओं को पढ़ते समय सहसा ही इब्ने इंशा, मुस्तबा हुसैन और लतीफ घोंघी के कहने की अदा एक साथ याद आती हैं। सम्प्रति अखतर अली क्वालिटी फाउन्ड्री इंडस्ट्रीज, रायपुर में सेवारत हैं। - विनोद साव