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Aug 1, 2026

दो नवगीतः

 - रमेश गौतम 

1. गाँव की पगडंडियाँ

गीत

गाँव पर लिखो तो

दंश भी लिखना समय के।

 

किस तरह

पाटे गए हैं ताल

छीनी धूप छाया

घेरते ही  जा  रहे  हैं

गाँव की अनमोल काया

अश्व रुकते

ही कहाँ अब

लालची इस दिग्विजय के।

 

हम बहुत लिखते रहे

हल, बैल

खेतो की कथाएँ

लिख नहीं पाए नगर

होती हुई अंतर्व्यथाएँ

कुछ कहो

इन चुप्पियों के छंद,

कुछ टूटे हृदय के।

 

चल रही

बैसाखियों पर

गाँव की पगडंडियाँ हैं

खुल गईं  सीमेन्ट  की

कच्चे घरों में मंडियाँ है

हाशिए पर

शब्द फेंके हैं

सभी अनुनय-विनय के।

2. उजालों का झरना

धुंध जाओ

छोड़ कर आकाश सारा

अब सुबह की गोद में सूरज रहेगा।

 

तोड़ डाला

मौन व्रत अब आइनों ने

बोलना सीखा

डरे सहमे दिनों ने

धूप ने

खोले अधर काँपा कुहासा

फिर उजालों का यहाँ झरना बहेगा।

 

ज़िंदगी ने आज

अपना मूल्य आँका

हर हिमानी देह में

अंगार टाँका

जाल पिघलेगा

हमारी ही तपन से

मछलियों का तन मछेरों से कहेगा।

 

बस्तियाँ, पगडंडियाँ

या हो घना वन

बाँध ली सामर्थ्य

तो होगा अभय मन

भाल पर

जब बिंब

दिनकर का दमकता

तन भला क्यों तामसी चाबुक सहेगा।

Nov 1, 2024

नवगीतः महानगर

  -   रमेश गौतम


गौरैया भी

एक घोंसला रखले

इतनी जगह छोड़ना

महानगर।


खड़े किए लोहे के पिंजरे

हत्या कर

हरियाली की,

इतने निर्मम हुए कि

गर्दन काटी

फिर खुशहाली की;


पहले प्यास बुझे

हिरनों की

तब अरण्य से नदी मोड़ना

महानगर।


माटी के आभूषण सारे

बेच रहे हैं सौदागर

गर्भवती

सरसों बेचारी

भटक  रही है अब दर–दर

गेहूँ–धान

कहीं बस जाएँ तो

खेतों की मेड़ तोड़ना

महानगर।


फसलों पर

बुलडोजर

डोले

सपने हुए हताहत सब

मूँग दले छाती पर

चढ़कर

बहुमंजिली इमारत अब

फुरसत मिले कभी तो

अपने पाप–पुण्य का

गणित जोड़ना

महानगर।


Nov 6, 2023

कविताः जले ज्योति

  - रमेश गौतम

जले ज्योति ऐसी यहाँ, दमक उठे आकाश ।

वैभवपतियों तक रहे, सीमित नहीं प्रकाश ।।

 

सच है केवल रोशनी, किस्से दर्ज हजार ।

एक किरण से हारता, तम का कारागार ।।

 

एक-एक दीपक जले, फैले जग उजियार।

बढ़े रात-दिन चौगुना, दीपक का परिवार।।

 

उतनी कठिन उपासना, जितनी काली रात।

दीपक के संघर्ष में, लाख टके की बात ।।

 

बरी हुआ तम खेलकर, दुराचार का खेल।

मिली रोशनी को यहाँ, जीवन भर की जेल ।।

 

अँधियारा चाकू लिये, करता बन्द जुबान ।

फिर चोरों की भीड़ में, दीपक लहूलुहान ।।


बोएँ मन के खेत में, उजियारे के बीज।

शरत् पूर्णिमा-सी लगे, हर तन की दहलीज । ।


 जले नए संदर्भ में, अब मावस के दीप।

हर द्वारे पर रोशनी, आकर धरें महीप।।


नई रोशनी की बने, फिर ऊँची मीनार ।

इठलाए दीपावली, पहन नौलखा हार ।।

 

अँधियारे के राज में, सपने होते राख।

दीपक तेरे हाथ में, उजियारे की साख ।।

 

वंचित रहे न तनिक भी, श्रमजीवी की प्यास।

बस थोड़ी सी रोशनी, कच्चे घर की आस ।।


Aug 1, 2023

दोहे: 1. आजादी



  




 - रमेश गौतम 

आजादी का आज तक, कब समझे मन्तव्य। 

याद रहे अधिकार बस, भूल गए कर्तव्य।।


चक्रव्यूह कितने रची, छोड़ो कितने तीर। 

महानाट्य रचते रहे, अभिमन्यू -से वीर।।


हम हो जाएँ विहग से, आजादी आकाश। 

मिलकर भरें उड़ान फिर, तोड़े माया-पाश।।


नगर ढिंढोरा पीटते, करते जिन्दाबाद।

समझें ना जनतंत्र का, अब तक अनहद नाद।।


सुख-दुख बाँटो परस्पर, छोड़ो वाद-विवाद। 

आजादी के मूल में, है मानवतावाद।।


मिले पसीने को यहाँ, पूरा उसका दाम। 

आजादी के शेष हैं, ऐसे अभी मुकाम।।


अधिकारों को जब मिले, कर्तव्यों का चूर्ण। 

तब होगी जाकर कहीं, आजादी सम्पूर्ण।।


रखनी थी जनतंत्र की, हमें ठोस बुनियाद। 

तानाशाही के लिए, नहीं हुए आजाद।।





2. सत्ता

रहे राजसी ही सदा, सत्ता के सोपान। 

अधर बीच लटके हुए, लोकतंत्र के प्रान।।


रण-कौशल में निपुण हैं, सारे सत्ताधीश।

गठबंधन बेमेल कर, काटें जनमत-शीश।।


सब कुछ इसके हाथ में, धन वैभव अधिकार। 

बस सत्ता के पास में, होता नहीं विचार।।


जो भी आता टाँगता, बदलावों के चित्र। 

किन्तु व्यवस्था का कभी, बदला नहीं चरित्र।।


चुप्पी पर सौगात है, सच बोले तो जेल। 

सत्ता खिड़की खोलकर, देखे अपना खेल।।


दुष्कर्मों पर डालता, पर्दा विधि-विधान। 

सत्ताधारी की हनक, करती है हैरान।।


बिना भेद सबको सदा, देती रोटी दाल। 

सत्ता के जन से तभी, मिलते हैं सुरताल।।


आते हैं जो द्वार पर, लिए वोट की चाह। 

बन जाते जनतंत्र में, वे ही तानाशाह।।


सम्पर्कः रंगभूमि, 78 बी संजय नगर बरेली- 243005 (उ. प्र.)


May 15, 2020

अम्मा

अम्मा  

रमेश गौतम
‘‘अम्मा, थोड़ी खीर और लाओ,’’ प्रिसिपल ने कहा, ‘‘थोड़ा राजमा, चावल भी ले आना।’’
गेम्स टीचर ने चटकारे लिये, हिन्दी टीचर ने पूरी कचौड़ी और पालक पनीर की फरमाईश की तो इंगलिश टीचर ने डकार लेते हुए आइसक्रीम लाने को कहा ।
अम्मा बहुत हैरान और परेशान उनकी सेवा में जुटी थी ।
अम्मा का मन रो रहा था कि बाल दिवस पर ऐसा क्यों होता है। बच्चों को भूलकर अपना ही पेट भरने में लगे है। पुरानी नौकरानी थी तो बच्चों से सम्बंधित सभी बातों और स्कूली गतिविधियों की अच्छी समझ थी, सारे बच्चे भी उन्हें अम्मा कहते थे। वह थी भी ममतामयी । आठवें तक पढ़ी लिखी अम्मा अब अकेली ही थी । पति को मरे बीस साल हो गए, बच्चा कोई हुआ नहीं, स्कूल के बच्चे ही उनके बच्चे थे। मन में गुस्सा भरे इधर से उधर भाग रही थी, बच्चों का दिन भी बच्चों के लिए नहीं होता । सुबह से बच्चों की प्रतियोगिताएँ हो रही हैं । कोई फैन्सी ड्रेस में, कोई खेल कूद में, कोई आर्ट में और कोई भाषण प्रतियोगिता में अपना हुनर दिखा रहा है । निर्णायकों के लिए चाय नाश्ता सब कुछ है पर बच्चों के भूख की किसी को चिंता नहीं, अब लंच पहले करने बैठ गए, अम्मा बेचैन हो गईं । उन्होंने सोचा नौकरी रहे या न रहे, कुछ तो करना ही होगा । उन्होंने युवा चपरासी को पास बुलाया-‘‘मुकेश बेटा धर्म संकट में हूँ, मदद करो।’’
अम्मा के रुआँसे चेहरे को देखकर मुकेश घबरा गया । अम्मा ने उसे हमेशा अपना बेटा समझा सो बहुत मानता था उन्हें, ‘‘अम्मा बोलो तो क्या हुआ?’’
‘‘बेटा, सारे टीचर लंच ले रहे है और बच्चे पंडाल में भूखे बैठे है, मुझे उनकी बहुत चिंता हो रही है ।’’
अम्मा की बाते सुनकर मुकेश भी व्याकुल हो गया ।
‘‘तुम स्टाफ का खाना देखो, मैं बच्चों को आर्ट रूम में ले जा रही हूँ, वही कमरा भोजनालय के निकट है, चुपचाप उन्हें खाना खिला दूँगी फिर जो होगा देखा जाएगा ।’’
अम्मा का दृढ़ निश्चय देख मुकेश का भी हौसला बढ़ा, ‘‘ठीक है अम्मा, आप जाओ बाकी मैं सँभाल लूँगा।’’
अम्मा ने सब बच्चों को ड्राइगरूम में ले जाकर हाथ धुलवाए, फिर भोजन परोसा। छोटे बच्चों को अपने हाथ से पहला कौर खिलाया तो सारे बच्चे चींख पड़े, ‘‘अम्मा, हमें भी अपने हाथ से खिलाओ हमें भी मुझे भी…’’
सारे बच्चों ने खाना खा लिया, अब अम्मा का चित्त शांत था न कोई डर न कोई आशंका ।
‘‘बाय-बाय अम्मा!’’  खिलखिलाते बच्चे बाहर निकल गए ।
मोबा- 9411470604

Dec 12, 2019

पाँखुरी नोची गई

1-पाँखुरी नोची गई

 - रमेश गौतम 

फिर सुनहरी
पाँखुरी नोंची गई
फिर हमारी शर्म से गर्दन झुकी ।

फिर हताहत
देवियों की देह है
फिर व्यवस्था पर
बहुत सन्देह है
फिर खड़ी
संवदेना चौराहे पर
फिर बड़े दरबार की साँसे रुकी ।

फिर घिनौने क्षण
हमें घेरे हुए
एक गौरैया गगन
कैसे छुए
लौटती जब तक नहीं
फिर नीड़ में
बन्द रहती है हृदय की धुकधुकी ।

फिर सिसकती
एक उजली सभ्यता
फिर सभा में
मूक बैठे देवता
मर गई है
फिर किसी की आत्मा
एक शवयात्रा गली से जा चुकी ।

फिर हुई है
बेअसर कड़वी दवा
फिर बहे कैसे
यहाँ कुँआरी हवा
कुछ करो तो
सार्थक पंचायतों में
छोड़कर बातें पुरानी बेतुकी ।

2-सजल चित्र

  शब्द की

तूलिका से बनाए गए
गीत अनुभूतियों के सजल चित्र हैं
जब उदासी गहन
चीरती है हृदय
देह से खींचता
प्राण निर्मम समय
तब अनायास
संजीवनी की तरह
गीत ही सिद्ध होते परममित्र हैं
आँसुओं के सदा ही
कथानक हुए
हर गली पाँव
संवेदना के छुए
आचरण अक्षरों का
सुवासित हुआ
गीत करुणा-कलित नैन का इत्र हैं
ओढ़कर आवरण
सब गले से लगे
चार रिश्ते नहीं
ढूँढ पाए सगे
पारदर्शी कथा
कागजों पर लिये
नेह की व्यंजना
गीत ही तो यहाँ राम–सौमित्र हैं

3-महानगर!


गौरैया भी
एक घोंसला रखले
इतनी जगह छोड़ना
महानगर।
खड़े किए लोहे के पिंजरे
हत्या कर
हरियाली की,
इतने निर्मम हुए कि
गर्दन काटी
फिर खुशहाली की;
पहले प्यास बुझे
हिरनों की
तब अरण्य से नदी मोड़ना
महानगर।
माटी के आभूषण सारे
बेच रहे हैं सौदागर
गर्भवती
सरसों बेचारी
भटक रही है अब दर–दर
गेहूँ–धान
कहीं बस जाएँ तो
खेतों की मेड़ तोड़ना
महानगर।
फसलों पर
बुलडोजर
डोले
सपने हुए हताहत सब
मूँग दले छाती पर
चढ़कर
बहुमंजिली इमारत अब
फुरसत मिले कभी तो
अपने पाप–पुण्य का
गणित जोड़ना
महानगर।

4- मैं अकेला ही चला हूँ  


मैं अकेला ही चला हूँ
साथ लेकर बस
हठीलापन

एक ज़िद है बादलों को
बाँधकर लाऊँ यहाँ तक
खोल दूँ जल के मुहाने
प्यास फैली है जहाँ तक
धूप में झुलसा हुआ
फिर खिलखिलाए
           नदी का यौवन             

सामने जाकर विषमताएँ
समन्दर से कहूँगा
मरुथलों में हरीतिमा के
छन्द लिखकर ही रहूँगा
दर्प मेघों का
विखण्डित कर रचूँ मैं
बरसता सावन

अग्निगर्भा प्रश्न प्रेषित
कर चुका दरबार में सब
स्वाति जैसे सीपियों को
व्योम से उत्तर मिलें अब
एक ही निश्चय
छुएँ अब दिन सुआपंखी
सभी का मन

सम्पर्कः रंगभूमि, 78–बी, संजय नगर, बरेली-243001

Mar 15, 2016

तीन नवगीत

                           
  -रमेश गौतम 

1
हमारे गाँव में
कब से
ठगों के काफिले ठहरे

नमन कर सूर्य को
जब भी
शुरू यात्राएँ  करते हैं
अजब दुर्भाग्य है
अपना
अँधेरे साथ चलते हैं

विसंगति सुन
नहीं सकते
यहाँ सब कान हैं बहरे

चिरागों से
खुली रिश्वत
हवाएँ रोज लेती हैं
सभाएँ रात की
दिन को
सजा-ए-मौत देती हैं

यहाँ दफ़ना
दिए जाते
उज़ाले अब बहुत गहरे

हथेली देखकर
कहना
बहुत टेढ़ी लकीरे हैं
सुना तक़दीर
के किस्से
कलेज़े रोज़ चीरे हैं

निकल सकते
नहीं बाहर
बड़े संगीन हैं पहरे।

2

देवदूत
कैसे उपलब्ध हो
छाँव तनिक
राजा के छत्र की
जप-तप-व्रत

मंत्र-तंत्र
पूजागृह- प्रार्थना
माथे न टाँक सके
उज्ज्वल संभावना
अधरों न धर पाईं
सीपियाँ
एक बूँद स्वाति नक्षत्र की

भूल गए कच्चे घर
गाँव, गली-गलियारे
बूढ़ी परछाईं के
साँझ ढले
तन हारे
एक-एक साँस
तके आहटें
परदेसी बेटे के पत्र की ।

फूल नहीं
खिलते हैं परजीवी बेल में
टूटी मर्यादाएँ
चौसर के खेल में

कौरव कुल समझेगा
क्या, भला
परिभाषा नारी के वस्त्र की।

चुन-चुनकर भेजा था
खोटे दिन जाएँगे
मरुथल की
गोदी में
बादल कुछ आएँगे
देख-देख टूटीं
सब भ्रांतियाँ
दृश्यकथा
संसद के सत्र की।

3
मान जा मन
छोड़ दे
अपना हठीलापन

बादलों को कब
भला पी पाएगा
एक चातक
आग में
जल जाएगा
दूर तक वन
और ढोता धूप
फिर भी तन

मानते
उस पार तेरी हीर है
यह नदी
जादू भरी ज़ंज़ीर है

तोड़ दे
प्रण
सामने पूरा पड़ा जीवन

मर्मभेदी यातना में
रोज मरना
स्वर्णमृग का
मत कभी
आखेट करना
मौन क्रंदन
साथ होंगे
बस विरह के क्षण।


लेखक के बारे में- शिक्षा- एम. ए. हिन्दी साहित्य, जन्म- 28 सितम्बर 1948, जन्म: जनपद पीलीभीत (उ.प्र.),अध्यापक पद से सेवा निवृत्त।  लेखन/ प्रकाशन: नवगीत, लघुकथा, बाल कविताएँ, विविध विषयों पर लेख, समीक्षा व पत्रकारिता लेखन, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन जिनमें उल्लेखनीय कथादृष्टि, लघुकथा फोल्डर अन्वेषण कविता फोल्डर, माया भारती पत्रिका, तितली (बालपत्रिका) आर्यपुत्र आदि। अनेक सम्मान एवं पुरस्कार। स्थायी निवास: रंगभूमि, 78- बी, संजय नगर, बाईपास, बरेली- 243005 (उ.प्र.) दूरभाष- 0581- 2303312, मो.- 09411470604