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Jun 12, 2009

इकबाल बानोः जिनकी आवाज जख्म भरने का काम करती थी

इकबाल बानोः 
जिनकी आवाज जख्म भरने का काम करती थी
- नाजिम नकवी
पता नहीं कितनों को ये इल्म है कि इकबाल बानों की पैदाइश इसी दिल्ली में हुई। दिल्ली घराने के उस्ताद चांद खान ने उन्हें शास्त्रीय संगीत और लाइट क्लास्किल म्यूजिक में प्रशिक्षित किया। पहली बार उनकी आवाज को लोगों ने ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली से सुना।
पाकिस्तान से कोई ताज़ा ख़बर है?... ज़रूर कोई बुरी ख़बर होगी। याद नहीं पिछली बार कब इस मुल्क से कोई अच्छी ख़बर सुनने को मिली थी। करेले जैसी ख़बरें वो भी नीम चढ़ी कि उनपर अफ़सोस करने के लिये न तो दिमाग़ के पास फ़ालतू-दिमाग़ रह गया है और न दिल के पास वो धड़कनें जो आंसू में ढल जाती हैं। नहीं दोस्त ये वाक़ई बुरी ख़बर है... और फिर जो कुछ मोबाइल पर कहा गया वो वाक़ई यक़ीन करने वाला नहीं था। इक़बाल बानों नहीं रहीं।
हंसी कब ग़ायब हो गई, बेयक़ीनी कब यक़ीन में बदल गई, पता ही नहीं चला। एक ऐसे मुल्क में जहां ख़तरनाक ख़बरें रोज़मर्रा की हक़ीक़त बन चुकी हैं। जहां मौत तमाशा बन चुकी है वहां इक़बाल बानों की मौत ने उस आवाज़ को भी हमसे छीन लिया जो ज़ख्म भरने का काम करती थी, जो रूह का इलाज थी। 'दश्ते तन्हाई में ऐ जाने जहां जिंदा हैं'  फ़ैज़ की ये नज़्म अगर सुननेवालों के दिलों में जि़ंदा है तो इसकी एक बड़ी वजह इक़बाल बानों की वो आवाज़ है जो इसका जिस्म बन गई। बहरहाल ये सच है कि 21 अप्रैल 2009 को इकबाल बानो अपने चाहने वालों को ख़ुदा हाफिज़ कहके हमेशा-हमेशा के लिये रुख़सत हो गईं। और इसी के साथ ठुमरी, दादरा, खय़ाल और गज़़ल की एक बेहतरीन खिदमतगार एक न मिटने वाली याद बन कर रह गई।
'हम देखेंगे, लाजि़म है कि हम भी देखेंगे... हम देखेंगे' यूनिवर्सिटी के ज़माने से लेकर अब तक जब कभी ये नज़्म गायी गई, बदन में सिरहन दौड़ा गई। कई बार टेप की हुई आवाज़ में इसे सुना और साथ ही सुनीं वो हज़ारों तालियां जो लय के साथ-साथ गीत को ऊंचा और ऊंचा उठाती रहीं। मेरी इस बात से आप भी सहमत होंगे कि इस नज़्म के अलावा शायद ही कभी किसी और गीत को जनता का, श्रोताओं का, दर्शकों का इतना गहरा समर्थन कभी मिला हो, हमने तो कभी नहीं देखा-सुना हालांकि सब कुछ देखने-सुनने का कोई दावा भी हम नहीं करते। अवाम की आवाज़ में हुक्मरानों के खिलाफ़ पंक्ति दर पंक्ति व्यंग्य की लज़्ज़त महसूस करना और ताली बजाकर उसके साथ समर्थन का रोमांच जिन श्रोताओं की यादों का हिस्सा है उन्हें इक़बाल बानो की मौत कैसे खल रही होगी इसका अंदाज़ा हम लगा सकते हैं।
पता नहीं कितनों को ये इल्म है कि इकबाल बानों की पैदाइश इसी दिल्ली में हुई। दिल्ली घराने के उस्ताद चांद खान ने उन्हें शास्त्रीय संगीत और लाइट क्लासिकल म्यूजि़क में प्रशिक्षित किया। पहली बार उनकी आवाज़ को लोगों ने ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली से सुना। विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया। अगर इजाज़त हो तो ये कहना चाहूंगा कि हमारे पास दो बेगम अख्तर थीं, विभाजन में हमने एक पाकिस्तान को दे दी। 1952 में, 17 साल की उम्र में उनकी शादी एक ज़मींदार से कर दी गई। इक़बाल बानो की इस शर्त के साथ कि उनके शौहर उन्हें गाने से कभी नहीं रोकेंगे। ताज्जुब है कि मौसिकी के नाम पर, एक इस्लामी गणराज्य में, एक शौहर अपने वचन के साथ अंत तक बंधा रहा और इक़बाल बानो की आवाज़ के करिश्में दुनिया सुनती रहीं।
1957 से वो संगीत की अपनी प्रस्तुतियों के द्वारा लोकप्रियता की सीढियां चढऩे लगीं। और जल्दी ही फ़ैज़ के कलाम को गाने की एक्सपर्ट कही जाने लगीं। प्रगतिशील आंदोलन के बैनर तले जब भी, कहीं भी, कोई भी आयोजन हुआ तो इक़बाल बानो की आवाज़ हमेशा उसमें शामिल रही। हर ख़ास और आम ने इस आवाज़ को सराहा, उसे दिल से चाहा। (हिन्द युग्म.com)