मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।
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Jul 5, 2014

आपके पत्र

जनोपयोगी अंक


अप्रैल 2014 का अंक आज ही प्राप्त हुआ। धन्यवाद!
इस बार का अंक बहुत उपयोगी लगा। विशेषकर रक्त कुण्डली और पर्यावरण विषयक आलेखों के कारण यह अंक जनोपयोगी हो सका। पाठकीय प्रतिक्रिया संलग्न है -
प्रतिक्रिया- 1.              
 संपादकीय आलेख - झोलाछाप डॉक्टरों की गिरफ़्त में ....
प्रदेश में ही नहीं, पूरे देश में झोलाछाप डॉक्टर्स के गिरोह कार्यरत हैं जो आम आदमी की जि़न्दगी की कीमत पर अपनी तिजोरियाँ भर रह हैं। इस समस्या के कई विचारणी बिन्दु हैं; यथा-
1- क्या राज्य सरकारें इस गिरोह को स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने का अपराधी मानती हैं? यदि हाँ, तो अभी तक इस अपराध को समाप्त करने के लिए क्या उपाय किए गये? कई वर्ष पूर्व छ.ग. शासन के आदेश से   झोलाछाप डॉक्टर्स का सर्वेक्षण कर उसके प्रतिवेदन शासन और समीपस्थ थाने को उपलब्ध करवाये गये, जिसका परिणाम यह हुआ कि सर्वेक्षण करने वाले सरकारी अधिकारी झोलाछाप गिरोह के दुश्मन बन गये, दूसरी ओर एक भी झोलाछाप के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हो सकी। पता चला कि विधिशास्त्र में इस गिरोह पर कार्यवाही करने के लिए कोई धारा ही नहीं है। अलबत्ता इस छीछालेदर के तुरंत बाद झोलाछाप गिरोह के सदस्यों ने, अपने नाम वाले, पहले की अपेक्षा लगभग चार गुने बड़े साइन बोर्ड बनवाकर चौराहे पर लगवा दिए। क्या राज्य सरकारों को इस विषय में गम्भीर होने की आवश्यकता नहीं है? क्या विधि शास्त्र में ऐसी किसी धारा का प्रावधान नहीं किया जाना चाहिये जिसके अंतर्गत ऐसे गिरोहों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही किया जा सकना सम्भव हो सके ?
2- वर्तमान शिक्षा, तकनीकी सुविधाओं की सहज उपलब्धता और आधुनिकता के इस माहौल में क्या स्वयं आम जनता का यह उत्तरदायित्व नहीं है कि वह ऐसे गिरोहों से बचकर रहे?
3- प्रतिबन्धित औषधियाँ झोलाछाप लोगों को इतनी सहजता से क्यों उपलब्ध हो जाती हैं? शासन के औषधि निरीक्षण एवं नियंत्रण विभाग की क्या भूमिका है?
4- औषधि निर्माता बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मेडिकल रिप्रजेंटेटिव्स और झोलाछाप के बीच एक अघोषित समझौता इन$फोर्सड है। इन कम्पनियों को केवल पैसा चाहिये, जिसके लिए झोलाछाप गिरोह की एक बहुत बड़ी भूमिका है। भारत सरकार के पास ऐसी कोई नियामक व्यवस्था नहीं है जो औषधि-निर्माता कम्पनियों को इस अनैतिक व्यापार में संलिप्त होने से रोक सके। 
हम यह मानते हैं कि हमारी बहुत सी समस्यायों के लिए हम स्वयं भी बहुत बड़े उत्तरदायी हैं। जब सरकारें हमारे हितों की उपेक्षा करने वाली हों तो अपने हितों की रक्षा हमें स्वयं करनी चाहिये। जबकि होता यह है कि हम कुएँ में कूदने के लिए सदा ही तैयार रहते हैं ...और यह प्रतीक्षा करते रहते हैं कि हमें कूदने से रोकने के लिए सरकार कोई सख़्त कानून बनाए, क्योंकि अंतत: हमारी रक्षा का दायित्व सरकार का है।
प्रतिक्रिया 2-                                         
   हीर जी की नज़्में
हीर जी की रचनाओं के बारे में कुछ भी कहना मेरे लिए बड़ा मुश्किल है। वे एक चर्चित और ख्यातिनाम रचनाकार हैं। उनकी रचनाओं को उदंती में प्रकाशित देखकर अच्छा लगा। निश्चित ही इससे उदंती गौरवान्वित हुई है। श्रेष्ठ साहित्यिक रचनाओं का सम्मान करके उदंती प्रकाशन की नवीन ऊँचाइयों को स्पर्श कर रही है।
प्रतिक्रिया 3- शब्दों के मसीहा और उनकी कालजयी कहानी
प्रतिक्रिया से परे। केवल एक स्मित ..आनन्दपूरित!
प्रतिक्रिया 4- हिन्दी व्यंग्य में वाचिक परम्परा के लेखक 
मैं के.पी. साहब को तबसे पढ़ रहा हूँ जब मैं कक्षा सातवीं का विद्यार्थी हुआ करता था। घर में आने वाली धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाओं के साथ ही के.पी. साहब ने भी अपने व्यंग्य लेखों के माध्यम से अपने एक नन्हे पाठक के मन में स्थान बना लिया था ...जो अभी भी यथावत है।
प्रतिक्रिया 5- इस अंक के सभी लेख स्तरीय, पठनीय और प्रशंसनीय रहे। पत्रिका की उन्नति के लिए हमारी नित्य शुभकामनायें!  

 - डॉ. कौशलेन्द्र,
kaushalblog@gmail.com

Feb 2, 2014

आपके पत्र


मौलिकता का अहसास

उदंती का वेब संस्करण के पिछले कुछ अंकों पर सरसरी नज़र डालने का मौका मिला। प्रकाशन, सामग्री व गेटअप, मुद्रण आदि सभी दृष्टिकोणों से पत्रिका ने प्रभावित किया। अनकही, लोकपर्व, कलाकार, परम्परा, प्रेरक, पूजापर्व जैसे स्तंभों के अन्तर्गत प्रकाशित रचनाएँ मौलिकता का अहसास कराती हैं। सभी अंकों पर संपादक की पकड़ और मेहनत साफ झलकती है। पत्रिका के उज्जवल भविष्य के लिये मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
             - किशोर श्रीवास्तव(संपादक-समाज कल्याण, भारत सरकार)

सुन्दर अंक
वेब पत्रिका उदंती का दिसम्बर अंक पढ़ा। खूबसूरत साज सज्जा के साथ पठनीय सामग्रियों का चयन उत्कृष्टता को बनाए हुए है। सामयिक विषय पर आपका लेख पढऩा अच्छा लगा। निरन्तर अग्रसर रहते हुए पत्रिका अपना कलेवर यूँ ही बनाये रखे, हार्दिक शुभकामनाएँ!
                  -जेन्नी शबनम, Jenny.Shabnam@gmail.com

प्रकृति और संगीत
डॉ. अरविन्द गुप्ते का लेख, पक्षी क्यों गाते हैं, बहुत सारी जानकारी समेटे हुए है। अनुपम मिश्र जी का लेख-तलाश अपनी जड़ों की समस्याओं की पूरी पड़ताल करने वाला है। रेखा मैत्र की कविताएँ और चेखव की कहानी मर्मस्पर्शी हैं। सचमुच उदंती गागर में सागर है। छोटे से कलेवर में सारी सामग्री स्तरीय और रोचक!
             -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' rdkamboj@gmail.com

तेजाब हमलों के खिलाफ़ मुहिम
अनकही एक मानवीय फैसला  में आपने बिल्कुल सही मुद्दा उठाया है।  इसी प्रकार आठ साल पहले लक्ष्मी दिल्ली में बुकस्टोर जहाँ वो काम किया करती थीं, काम पर जाने के दौरान उस पर किसी ने तेजाब उड़ेल दिया था। कानपुर के रहने वाले आलोक दीक्षित जो पेशे से पत्रकार हैं की मुलाकात लक्ष्मी से तेजाब हमलों को रोकने की एक मुहिम के दौरान हुई और फिर वे एक-दूसरे को पसन्द करने लगे। अब ये दोनों दिल्ली के पास एक इलाके में रहते हैं और दोनों तेजाब हमलों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। उनकी इस मुहिम से तेजाब हमलों के शिकार लगभग 50 पीडि़ताएँ जुड़ी हुई हैं। लक्ष्मी इस मुहिम का चेहरा है, जो एसिड अटैक की पीडि़तों को मदद और आर्थिक सहायता मुहैया कराती है। 
     - सुजाता साहा, रायपुर
प्रयास
प्रेरक कथा आखरी सफ़र दिल को छू गई। मानवीय संवेदनाएँ जो आजकल मर चुकी हैं इस कथा को पढ़कर पुन: जागृत होंगी। मुख पृष्ठ पर प्रकाशित पूर्वा खिचरिया की फोटोग्राफी लाजवाब है।
        - डॉ. अशोक चन्द्राकर, रायपुर


Dec 14, 2013

आपके पत्र

मौलिकता का अहसास

उदंती के वेब संस्करण के माध्यम से पिछले कुछ अंकों पर नज़र डालने का मौका मिला। प्रकाशन सामग्री व गेटअप, मुद्रण आदि सभी दृष्टिकोणों से पत्रिका ने प्रभावित किया। अनकही, लोकपर्व, कलाकार, परम्परा, प्रेरक, पूजापर्व जैसे स्तंभों के अंतर्गत प्रकाशित रचनाएँ मौलिकता का अहसास कराती हैं। सभी अंकों पर संपादक की पकड़ और मेहनत साफ झलकती है। पत्रिका के उज्ज्वल भविष्य के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
 - किशोर श्रीवास्तव, नई दिल्ली , kishorsemilen@gmail.com

बसंत साहू की कला को नमन

उदंती के अक्टूबर नवम्बर अंक में प्रकाशित बसंत साहू के सभी चित्र बहुत ही सुंदर हैं!  इस अनूठे कलाकार के साहस तथा उनकी लगन को नमन! उनके साथ हुए हादसे के बारे में पढ़कर जितना दु:ख हुआ उतनी ही प्रसन्नता उनके द्वारा बनाए गये चित्रों को देखकर हुई! दुख व कठिनाइयों- भरे दुर्गम रास्ते में आगे क़दम बढ़ाकर अपनी मंजि़ल तक पहुँचने का नाम ही असली मायनों में 'जीना’कहलाता है... इसका जीता-जागता प्रमाण बसंत साहू हैं! उनका परिचय कराने व उनके बनाए चित्रों को साझा करने का आभार! 
इसी अंक में विजयादशमी पर कृष्ण कुमार यादव का लेख 'जहाँ होती रावण की पूजा’ में इतनी उपयोगी तथा रोचक जानकारी देने के लिए धन्यवाद। हिमांशु जी की सभी कविताएँ बहुत ही सुंदर संदेश लिये हुए दिल में उतर गईं! काश! ऐसा हर कोई सोच ले तो किसी की देहरी पर, किसी के दिल में कभी अँधेरे टिक न पाएँगे! हर दिल में बस उजियारा ही उजियारा होगा!

पूरा जीवन दर्शन

दीपावली पर हिमांशुजी की चार कविताएँ जिसमें-
उम्र भर रहते नहीं हैं, संग में सबके उजाले।
दूर उजालों की बस्ती है, पथ में भी अंधियार बहुत है।
अँधियारे से आगे देखो सूरज है उजियार बहुत है।
नहीं गगन छू पाए तो क्या मन का ही विस्तार बहुत है।
आदमी है आदमी तब, जब अंधेरों से लड़े।
सब एक से बढ़कर एक। ये भाव, ये पंक्तियाँ अपने में पूरा जीवन दर्शन समाए हुए हैं। बस जरुरत है तो इसे समझ कर इसको अमल में लाने की....
                                                                         -मंजु मिश्रा

अलग तरह की पत्रिका

पत्रिका प्राप्त हुई बहुत ही अच्छी है। हमारे छत्तीसगढ़ के त्योहार के विषय में आपने बहुत अच्छी जानकारी दी है। यह अपने आप में अलग तरह की पत्रिका हैं। आपने मेरे भावों को बहुत ही सुंदर ढंग से अपने लोगो तक पहुँचाया है। इसके लिए धन्यवाद एवं शुभकामनाएँ । आप इसी तरह अपने लेखन कार्य को आगे बढ़ाते रहें ताकि समाज को सही दिशा मिले।

                     -बसंत साहू, basantartist@gmail.com

Oct 22, 2013

आपके पत्र

अज्ञानता का बोझ ढोती जनता
आपकी मासिक पत्रिका 'उदंती´  के सितंबर,  2013  अंक में आपका संपादकीय 'बाबाओं का गोरखधंधा´  के लिए साधुवाद! हमारी आस्था अंधविश्वास में कैसे और क्यों तब्दील होती है? इस सवाल के जवाब को आपने जिस तरह से बताया है, वह हम सबको इस अँधेरे से लडऩे के लिए प्रेरित करता है। यूँ सदैव की भाँति उदंती के सितम्बर 2013  अंक में प्रकाशित सभी रचनाएँ सामायिक और प्रभावी हैं। सभी लेखकों को बधाई!
  अपने देश में सत्संग के बहाने बोलने में माहिर कुछ तथाकथित बाबा अथवा प्रवचनकर्ता आम जनता को वर्षों से लूट रहे हैं।  इनमें से कुछ तो करोड़ों की संपदा के मालिक हैं ; क्योंकि इनके तथाकथित भक्तों की संख्या लाखों में है, इन पर कार्रवाई करने में पुलिस मजबूर दिखती है और नेता मेहरबान।  ताज्जुब होता है कि ये देश को किसी भी आफत से बचाने में आज तक कोई चमत्कार नहीं कर पाए हैं।  इनमें से कुछ तो गृहस्थ हैं और इनके बच्चे भी इनके सहारे ऐश कर रहे हैं।
समाज के प्रत्येक जागरूक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह समाज को लूटने वालों का विरोध करे। सबसे बड़ा सत्संग है अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन ईमानदारी से करना।  जो लोग अपने पारिवारिक, सामाजिक, और कार्य से जुड़ी जिम्मेदारियों को निष्ठा और लगन से निभाते हैं और सत्य का साथ देने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, उन्हें किसी सत्संग में जाने की जरूरत नहीं है। अगर समय नहीं बीत रहा हो तो अपने आसपास ऐसे सामाजिक कार्यों से जुड़ें जिनसे आम लोगों और जरूरतमंदों को  लाभ होता हो; राहत मिलती हो। 
याद रखिये कबीर दास जी अपने परिवार को अपने परिश्रम से पालते थे, दान पात्र के चंदे से नहीं! बहरहाल, टीवी  चैनलों पर जब आम जनता  ऐसे  'ढोंगी बाबाओं´  के विज्ञापनों को देखती है तो वह यह नहीं जान पाती कि  इन प्रसारणों के लिए ये पाखंडी भारी रकम अदा करते हैं।  देश की जनता यह मानती है कि  टीवी चैनलों में आने वाला व्यक्ति कोई साधारण व्यक्ति नहीं होता है। फलस्वरूप, भेड़  चाल का मुहावरा  चरितार्थ हो उठता है और लोग अधिकाधिक संख्या में इनके जाल में फँसने के लिए बेताब हो उठते हैं। दरअसल, टीवी चैनलों को पहले तो इस तरह के विज्ञापनों से बचना चाहिए अन्यथा उन्हें जनता को यह जरूर बताना चाहिए कि जो कुछ  दिखाया जा रहा है, वह एक विज्ञापन है और उन्हें उसके लिए पैसे मिलते हैं। यूँ भारतीय दंड सहिंता के अनुसार ठगी में सहयोग देना भी एक अपराध है।  काश, हमारा मीडिया अपने  सामाजिक उत्तरदायित्व को निभाने  में सक्षम होता और धन अर्जित करने के लिए इस तरह  के विज्ञापनों को  नकार पाता।
 उत्तर प्रदेश  में  इस वर्ष  तीन जनवरी की रात को जिस तरह लोग जलजले और पत्थरों में तब्दील होने के ख़ौफ़ से घरों से बाहर टहलते रहे, वह इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि अभी भी हमारी जनता अज्ञानता का बोझ  ढो रही  है।  हमारे टीवी चैनल दिन भर ऐसी खबरों पर अपनी रोटियाँ सेंकते रहते हैं।  यदि  समाज में  गुंडागर्दी पर अंकुश नहीं लगता तो हम पुलिस को कोसते हैं।  हमारा मीडिया यदि यूँ ही निष्क्रिय बना  रहेगा तो हमारी जनता का एक बहुत बड़ा हिस्सा अज्ञानता से उपजे और नकली बाबाओं द्वारा टीवी के निजी चैनलों के माध्यम से फैलाये जा रहे अंधविश्वासों का बोझ ढ़ोती रहेगी।
               -सुभाष लखेड़ा, नई दिल्ली


 सटीक संपादकीय
उदंती के सितम्बर अंक में अनकही से सम-सामयिक विषय पर सटीक संपादकीय तथा अभयारण्य में उदंती पर अच्छी जानकारी  देने के लिए आपको बधाई।                                                                           - देवेन्द्र प्रकाश मिश्र             dpmishra7@gmail.com


बाल संसद - अद्भुत प्रयास
सितम्बर अंक में प्रकाशति आलेख बाल संसद- प्राथमिक शिक्षा से लोकतंत्र का प्रशिक्षण बहुत ही अद्भुत प्रयास है। सराहना के लिए शब्दों की कमी महसूस हो रही है। इन्ही तरह के प्रयास बालकों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने मैं सहायक होंगे। इसी तरह प्रेरक के अंतर्गत क्षमादान का मूल्य - यह विषय मन के कष्ट पूर्ण किंतु फिर भी मीठे अनुभवों की याद दिलाते हुए मन में उदारता का भाव को प्रगाढ़ करता है।                                                                                                                                                                         -माधवी 

 बाबाओं के कच्चे चिट्ठे
उदंती के सितम्बर अंक में पुण्य स्मरण लाला जी के चले जाने का अर्थ -बहुत मार्मिक बन गया है। हिन्दी दिवस युवा वर्ग की चेतना बनाने का संघर्ष-सुधा ओम ढींगरा ने विदेशी में हिन्दी के लिए किए जा रहे प्रयासों की सार्थक जानकारी दी है। डॉ. ढींगरा स्वयं भी इस पावन यज्ञ को आगे बढ़ा रहीं हैं। परदेशी राम वर्मा का यात्रा-संस्मरण बहुत रोचक है। अनकही में सम्पादक जी हर बार की तरह बहुत गहरी बातें कह गईं। बाबाओं पर भरोसा करना खुद को ठगे जाने के लिए प्रस्तुत करना है। चेलों और बाबाओं के कच्चे-चिट्ठे हर रोज एक नया शिगूफ़ा लेकर आ रहे हैं। पत्रिका की साज-सज्जा नयनाभिराम है।                                                                                        -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु ; दिल्ली           rdkamboj@gmail.com                                                                                          
पाँच वर्ष की यात्रा पर बधाई 
उदंती की पाँच वर्षों की निरंतर यात्रा सफलता पूर्वक पूरी हो गई है।यह प्रसन्नता की बात है। मेरी हार्दिक बधाई स्वीकारें। इससे साबित होता है कि कुशल नेतृत्व और सहयोगियों कि मिल जुलकर काम करने की भावना अगर आपके पास है, तो सफलता के लिए कोई सीमा नहीं है। खासतौर से पत्रकारिता में हो रही गलाकाट प्रतियोगिता के इस युग में आप जिस गंभीरता और धैर्य के साथ सधे कदमों से चुपचाप आगे बढ़ते रहे उसके लिए आप बधाई की पात्र हैं। टीम उदंती को भी इस अवसर पर मैं बधाई देता हूँ साथ ही उदंती के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ ।                                                                                             -ललित कुमार वर्मा, भिलाई
                            lalit.mex@gmail.com

 सफर अनवरत चलता रहे
सर्वप्रथम तो उदंती के नियमित रूप से 5 वर्षों तक प्रकाशन होने के लिए आपको और आपकी पूरी टीम को तहे-दिल से मुबारकबाद पेश करता हूँ। मैं उदंती पत्रिका का प्रशंसक हूँ और पिछले कई महीने से मैं उसे इंटरनेट संस्करण को देख रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ। इसकी सामग्री काफी ज्ञानवर्धक है और इससे आपके सफल संपादन का पता साफ तौर पर चलता है। वर्तमान अंक में बाबाओं का गोरख धंधा के बारे में काफी जानकारी मिली कि किस प्रकार समाज के जागरूकता की कमी के कारण लोग आजकल बाबाओं के चंगुल में फंसते जा रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा से लोकतंत्र का प्रशिक्षण, 1300 साल पुराना रायपुर शहर, विलुप्त प्रजातियों की शरण स्थली, विनोद साव की कहानी- सिन्टी, आदि सहित अनेक सामग्री पठनीय है। यह उदंती दिनों दिन तरक्की करे और पत्रिका का सफर अनवरत चलता रहे, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ।
         -आफताब आलम, (संपादक-पत्रकारिता कोश                             aaftaby2k@gmail.com

Sep 26, 2013

आपके पत्र

आपके पत्र/ मेल बॉक्स
यथार्थ का दर्पण
उदन्ती का अगस्त अंक मिला। धन्यवाद! हमेशा की तरह सबसे पहले 'अनकही’ के अन्तर्गत 'ये कैसा मध्याह्न भोजन है’ पढ़कर अभिभूत हो गई। सम्पादकीय तथ्यों का खज़ाना  और  यथार्थ का दर्पण है ! ज्योत्स्ना प्रदीप के  हाइकु मार्मिक हैं। सुदर्शन रत्नाकर की लघुकथाएँ हृदयस्पर्शी हैं, जिनमें 'घर की लक्ष्मी’ ने ज़्यादा प्रभावित किया। डॉ. उर्मिला अग्रवाल द्वारा 'झरे हरसिंगार’ की समीक्षा  ताँका-संग्रह का पूरा परिचय देने में सक्षम है। पत्रिका का अन्तिम लेख 'बापू ने नहीं मनाया आज़ादी का जश्न’ तो स्वर्णिम दस्तावेज़ है। काश! हमने बापू को 'राष्ट्रपिता’ का पद देने के साथ-साथ कुछ सीखा भी होता तो आज के भारत की तस्वीर कुछ और ही होती ।
 -डॉ. सुधा गुप्ता, साकेत, मेरठ

ज्यों-ज्यों निहारिए
उदंती का अगस्त अंक सचमुच सुन्दर है। कविवर मतिराम के शब्दों में-
ज्यों-ज्यों निहारिए नेरे ह्वै नैननि,
त्यों-त्यों खरी निकरै सी निकाई
विषय- सामग्री की दृष्टि से भी अंक सार्थक है। अच्छी पत्रिका हर महीने निकालना कोई हँसी-खेल नहीं।  आप यह कार्य बख़ूबी निभा रही हैं। शुभकामनाएँ आपके साथ हैं।
-   डॉ. गोपाल बाबू शर्मा, आगरा (उ.प्र.)

...भ्रष्टाचार के शिकार मासूम बच्चे 
 इस अंक में प्रकाशित अनकही में आपने सही कहा। भ्रष्टाचार ने मासूम बच्चों को भी नहीं छोड़ा।  तमिलनाडु में जब मध्याह्न भोजन का कार्य सफलतापूर्वक चल सकता है, तो अन्य प्रदेशों में क्यू नहीं? इसी तरह पाकिस्तान के प्रति भी कड़ा प्रतिकार आवश्यक है।
इसी अंक में अनिता जी के चिंतन- 'हम आजाद हैं’ में  उन्होंने सच कहा है कि हम आजाद हो कर भी गुलाम हैं। श्री राम के संस्कारों को खोते जा रहें है। राम जी ने स्वय को भूलकर परहित के लिए जीवन जिया, मगर आज मानव ही मानवता की परिभाषा भूल गया।  ज्वलंत समस्याओं पर चिंतन करवाने के लिए आपका धन्यवाद।
  -ज्योत्स्ना प्रदीप

 ...जवाब किसी के पास नहीं है
अनिता जी चिंतन में आपने बड़ा भारी-भरकम सवाल किया है और इसका ज़वाब तो आज के किसी नेता के पास भी नहीं है या कोई नेता इसका जवाब देना भी नहीं चाहेगा जो। कुछ भी आपने पूछा है वो सिर्फ एक आम नागरिक से सम्बंधित है, जो पहले भी गुलाम था और आज भी गुलाम है, लगता है आगे भी रहेगा।
जब तक हमारी किस्मत में ऐसे नेता हैं- हाँ आज़ाद हैं, आज के चोर-उचक्के, लुटेरे, डाकू, खूनी, बलात्कारी, रिश्वतखोर, कामचोर, निकम्मे... कोई रह गया है हो तो उसे भी गिन लो... बस एक आम आदमी को छोड़ कर, जो बेबसी से बस आज़ादी के ख़्वाब देख रहा है और अंत में इसी में दफ़न हो जाएगा... काश मैं यहाँ गलत साबित हो जाऊँ... शुभकामनाएँ हर आम आदमी को जो अपने खुश होने की आज़ादी चाहता है।
 -अशोक सलूजा

दिल भर आया...
पल्लवी सक्सेना ने मेरे अनुभव स्तम्भ में विम्बलडन के बहाने रोचक जानकारी प्रस्तुत की है। इसी अंक में सुदर्शन रत्नाकर की सभी लघुकथाएँ दिल को छू गयीं... मुरलीधर वैष्णव जी आपकी कविता  'प्रिय बहना’ बहुत सुंदर है! काश! आप जैसा हर कोई सोचे....  ज्योत्स्ना जी... इतने भावपूर्ण, इतने मार्मिक हाइकु....सच में दिल भर आया... बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति! खोज के अन्तर्गत 'नींद में खलल और याददाश्त’ बहुत अच्छी जानकारी है। धन्यवाद
 - अनिता

संग्रहणीय अंक
 हृदयनाथ मंगेशकर के शब्दों में मुकेश दा के अंतिम दिनों की यादों को प्रस्तुत करके उदंती ने इस महान गायक को स्मरण किया है। मुकेश दा को मेरा नमन। छत्तीसगढ़ की अनूठी परम्परा 'मितान बधई’ के बारे में क्या कहूँ लेखक डॉ. कौशलेन्द्र इसके लिए बधाई के पात्र हैं, आज की पीढ़ी को इसके बारे में बताया जाना चाहिए फ्रेंडशिप डे की परम्परा हमारे छत्तीसगढ़ में न जाने कब से चली आ रही है।  यात्रा संस्मरण में 'कच्छ के रन’ की जानकारी अच्छी लगी। इसमें कच्छ के इतिहास और संस्कृति के बारे में कुछ और बातें जानने को मिलती तो अच्छा लगता।
  - रश्मि वर्मा, भिलाई

सकारात्मक विचार
 सुदर्शन जी आपकी सभी लघुकथाएँ बहुत अच्छी लगीं। इनमें से घर की लक्ष्मी तो बहुत ही सुन्दर है। इसकी सकारात्मक विचारधारा ने सास-बहू के रिश्ते को बहुत मधुर बना दिया है। 
 - मंजू


Aug 14, 2013

आपके पत्र

...विनाशलीला
उदंती का नेट संस्करण देखा बहुत अच्छा लगा। इस अंक में आपने उत्तराखंड की विनाशलीला को प्रमुखता दी है इसके लिए आपको मेरा साधुवाद।          
        -प्रोफ़ेसर अश्विनी केशरवानी
 ashwinikesharwani@gmail.com

सबक नहीं लिया तो...?
मासिक पत्रिका उदंती के जुलाई अंक  के संपादकीय च्ये कैसा विकास है! के साथ-साथ  शेखर पाठक के लेख  नदियाँ दिखा रही हैं अपना रौद्र रूप और डॉ. खडग सिंह वल्दिया के लेख ...और इसलिए बच गया केदार नाथ मंदिर ,  विकास की उस अवधारणा को अनावृत करते हैं जो प्रकृति को रौंदते हुए सुख के साधन जुटाने में यकीन करती है। दरअसल,  आज उत्तराखंड सहित देश के दूसरे पर्वतीय राज्यों में जो कुछ हो रहा है, वह उस अवैज्ञानिक विकास का फल है जिसके लिए हम लोग अक्सर आतुर दिखते हैं। देव भूमि को पर्यटन स्थल और रिहायशी घरों को होटल में तब्दील करने के लालच ने हमें कहीं का न छोड़ा। हम देवताओं की पूजा भी ऐयाशी से करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारा हेलीकाप्टर सीधे भगवान के समीप उतरे। चूल्हे तक सड़क पहुँचाने की होड़ में हम ब्लास्ट कर हिमालय को तोड़ते रहे और प्राकृतिक रूप से तय धाराओं के रुख को मोड़ते रहे। ठेकेदार और उनके कारिंदे एक पेड़ की जगह दस पेड़ काटकर अपनी जेब भरते रहे और सरकार द्वारा नियुक्त वनाधिकारी रिश्वत से समाज में अपना रुतबा बढ़ाते रहे।
हमने अपनी नदियों का अपमान करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। उत्तराखंड में पानी के बहाव वाले सभी जगहों पर कभी समाजवाद के नाम पर, कभी दलित राजनीति के बहाने तो कभी भूमिहीन संगठन के झंडों तले लोगों ने कब्ज़ा जमाया और सरकार की नाक के नीचे नदियों की जमीन को हथियाई। इसके अलावा डायनामाइट दाग-दाग कर हम पहाड़ी चोटियों के दिलों को चोट पहुँचाते रहे और तय करते रहे कि नदियाँ किधर से बहें। अपने तीर्थ स्थानों का हम सिर्फ पर्यटन स्थलों के हिसाब भोग करते रहे और भूल गए कि प्रत्येक क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है।
 परेशानी की बात यह है चाहे नेता हों या सामान्य लोग, सभी स्वार्थ में अंधे होकर हिमालय को नुकसान पहुँचाते रहे हैं।  उत्तराखंड के स्थानीय लोग भी यह नहीं समझ पाते हैं कि उनका हित किस बात में हैं? उनमें वैज्ञानिक चेतना का अभाव है। उत्तराखंड में घटित प्राकृतिक आपदा से हमारे समूचे देश को आजकल जिस संकट का सामना करना पड़ रहा है, उससे  यदि हमने सबक नहीं लिया तो फिर हम कभी भी अपनी समझदारी में इज़ाफा न कर पाएँगे।
              -सुभाष लखेड़ा, नई दिल्ली   subhash.surendra@gmail.com

शिक्षाप्रद लेख
अनकही में प्राकृतिक आपदा पर आपने समाज को शिक्षा देता बहुत बढ़िय़ा लेख लिखा है । बहुत बधाई ! पत्रिका में सुमित जी का व्यंग्य भी काफी अच्छा है।
       -अन्नपूर्णा बाजपेयी, कानपुर   annapurna409@gmail.com

लघुकथाएँ मानव मन का दर्पण
उदंती के जुलाई अंक में सुकेश साहनी जी की लघुकथाएँ- जिन्दगी, बेटी का खत, जागरूकता, ओएसिस पढ़कर वर्तमान समाज की स्थिति व मानव मन के भावों का दर्पण देख मन द्रवित हो गया। सुकेश जी की वर्षो पहले लिखी हुई कहानी इमिटेशन भी याद आ गई , जिसे पढऩे के बाद ही से लघुकथाओं के प्रति मेरा एक विशेष आकर्षण प्रारम्भ हुआ था। आज भी वह लघुकथा मेरे ज़हन में अंकित है। लघुकथा जागरूकता और जिन्दगी पढ़कर बस वाह! ही निकलती है। सुकेश जी जैसा लेखक ही मानव -मन व स्थितियों का इतना सुन्दर चित्रण कर सकता है। वह सदा  यूँ ही लिखते रहें।
  - सीमा स्मृति, दिल्ली

नजर नहीं फेरी जा सकती
इस अंक में प्रकाशित सुकेश साहनी की चार लघु-कथाएँ मार्मिकता लिए हुए दिल को गहरे छू गए... पर वास्तविकता से नजर नहीं फेरी जा सकती ।
          -सुनीता अग्रवाल दिल्ली

भारत- निमार्ण...विनाश की ओर?
 जुलाई अंक में प्राकृतिक आपदा पर अनकही बहुत सटीक काफी अध्ययन के बाद लिखा गया है किन्तु जिनको पढऩा और उस पर कार्य करना चाहिए वे आँख-कान बंद कर कुर्सी पर विराजमान हो कर्त्तव्य की इतिश्री समझते है... बस हो रहा है भारत -निर्माण...विनाश की ओर... इस विस्तृत लेख के लिए धन्यवाद...
-जनार्दन प्रसाद

Jul 18, 2013

आपके पत्र



एक पाती... 
उदंती के जून,  2013  अंक में आपका संपादकीय ‘ निदान खोजना ही होगा…’ के लिए साधुवाद! आपने फैलती नक्सली हिंसा की भर्त्सना करते हुए जिस गहराई से इस समस्या के मूल कारणों की तरफ देश, शासन और प्रशासन का ध्यान खींचा है, वह काबिले गौर है और स्पष्ट रूप से यह सुझाव देता है कि नक्सल प्रभाव को रोकने के लिए हमें तत्काल ऐसे सभी उपाय करने होंगे ;जिनसे आदिवासियों को शोषण से निजात मिल सके।  इस सन्दर्भ में मैं यहाँ आपके इस अंक में छपी डॉ. श्याम सखा  श्याम  की इन पँक्तियों को दोहराना चाहता हूँ कि- ‘ ‘आज नहीं तो कल होगा, हर मुश्किल का हल होगा’  यूँ सदैव की भाँति उदंती के जून अंक में प्रकाशित सभी रचनाएँ सामायिक और प्रभावी हैं। सभी लेखकों को बधाई! आपकी इस  अनकही से प्रभावित होकर मैंने  नक्सलवादियों के नाम एक पत्र लिखा  हैं जो इस प्रकार से है-
जरूरी नहीं है कि हम सही हों, जरूरी नहीं कि तुम सही हो,
या फिर मेरी या फिर तुम्हारी हाँ में हाँ  मिलानी वाली भीड़;
तो फिर क्या करें ?
क्या इस असहमति के चलते, बन्दूक और बमों का सहारा लें?
निर्दोष लोगों का खून बहायें, आतंकवाद को अपनाएँ;
लोगों को अपनी बात मनवाने के लिए, उनके खून से नहाएँ,
और फिर किसी एक दिन सरकारी गोली के निशाने पर आएँ, ;
अथवा पकड़े जाने पर  कहीं फाँसी के फंदे पर झूल जाएँ ?
जरा सोचो, क्या यह जरूरी है? जान खुदा की अमानत है।
न दूसरों की जान लें, न अपनी जान दें, और वो भी सिर्फ इसलिए,
किसी ने तुम्हें बरगलाया है, अपने जाल में फँसाया है;
अपने स्वार्थ साधने के लिए कठपुतली बनाया है!
मुद्दा इतना बड़ा नहीं कि यूँ कीमती जान को गँवाया जाए,
आओ, संवाद के रास्ते इस गुत्थी को सुलझाया जाए!
                                     -सुभाष लखेड़ा, नई दिल्ली          
                              subhash.surendra@gmail.com
जुझारूपन का भाव
आपका जून अंक विश्व पर्यावरण दिवस पर केंद्रित हैं। हमने वरुण देवता का सम्मान करना छोड़ दिया, वरुण देवता रुष्ट हैं, कुपित तो होंगे ही। हमें पुन: प्राकृतिक शक्तियों का सम्मान करना सीखना होगा। 
 चिंतन में विनोद साव के लेख पर मेरी राय है- भारत में नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त हो चुका है। चीनी माओवाद ने उसकी हत्या कर दी है। बस्तर की भौगोलिक दुर्गमता और छत्तीसगढ़ के लोगों में जुझारूपन के अभाव ने आन्ध्र के उग्रवादियों को आमंत्रित किया है। हमारी राज्य सरकारें चीनी आतंकवाद को रोक पाने में असफल रही हैं। चीन छत्तीसगढ़ में है .... चीन भारत की सीमाओं पर है और और उसका सशक्त प्रतिरोध करने वाला कहीं कोई नहीं है। किंतु हम केवल सरकारों को ही पूरी तरह दोषी नहीं ठहरा सकते। समाज की निष्क्रियता भी इसके लिए,  कम जि़म्मेदार नहीं है।
                                                                   -कौशलेन्द्र
                                                    kaushalblog@gmail.com

साहित्य और समाज का व्यापक फलक
पिछले अंक में प्रकाशित ग़ज़ल जंगल का न होना, फिर बादल का न होना, बादल न होने पर जल का न होना, परस्पर नाखून और मांस कि तरह जुड़ा है, जिसे श्याम जी ने बहुत सहजता से व्यक्त किया है। घर की कलह रिश्तों को दलदल बना देती है, यह आज के पारिवारिक विघटन का कटु सत्य है। कम से कम शब्दों में जीवन और जगत का सत्य पेश कर दिया है। विनोद साव जी का नक्सली अन्दोलन पर प्रस्तुत विश्लेषण तार्किक है। भैरव प्रसाद की कहानी ' एक पाँव का जूता '  बहुत मार्मिक है। पाठक को द्रवित किए बिना नहीं रहती। क्या इस तरह की कालजयी रचना से हमारे राजनेता कुछ सीखेंगे? अँधियारे रास्ते और उजला सवेरा- भावना सक्सैना जी का आलेख शोषण के इतिहास को परत-दर-परत खोलने में सक्षम है। अपने साढ़े तीन साल के प्रवास में उन्होंने भारतीयों की 140 साल पहली पीड़ा को पाठकों के समक्ष रखा। अनुपम मिश्र का आलेख और डॉ रत्ना जी का सम्पादकीय हमें वर्तमान की अपरिहार्य चिन्ता से रूबरू कराते हैं। छोटी-पत्रिका में साहित्य और समाज के व्यापक फलक को प्रस्तुत किया गया है। अनिता ललित के हाइकु गागर में सागर की तरह हैं साथ ही अभिव्यक्ति की ताज़गी को भी सँजोए हैं।
                                                         -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु’
                                                        rdkamboj@gmail.com

अर्थपूर्ण हाइकु
इस अंक में प्रकाशित अनिता ललित की हाइकु लगाओं पौधे बहुत सुंदर, बहुत खूबसूरत, बहुत अर्थपूर्ण, बहुत सार्थक और बहुत मार्मिक है। बधाई।
                                                                  -अशोक सालुजा