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Jul 18, 2016

भोर

 भोर 

- र्मिला शर्मा

सरस भोर की किरण ने,
फैलाया कैसा उल्लास!

चुपके से अरुणिमा सिमटती,
विकसित हो रहे जलजात!!

चपल को किला मौन रहे क्यों?
दिशि-दिशि में फैला आह्लाद!

स्वर- रस में डूबा कण-कण यों,
चहुँ ओर लालित्य प्रवाह!!

मृदु ओ मंद समीरण तुझसे,
पुलकित पल्लव और पराग !

नींद भरे दृग-पट खुलते ज्यों,
कलियों में नव-रस संचार!!

तृण-तृण पर यों विहँस रहा है,
तुहिन कणों का भव्य-विलास!

जल कण के लघु रुप में जैसे,
प्रतिबिम्बित हो रहा विराट!!

हे प्रकृति तुम पूज्य हमारी,
नमन तुम्हे है बारम्बार!!

कही मनुज से छीन ना लेना,
अनुराग मेरा वात्सल्य प्रवाह


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