- विनोद साव
सर्दी की सुबह की नर्म धूप, चाय की चुस्की और अख़बार- तीनों की ‘कॉकटेल’ बनाकर रसास्वादन करते हुए मैं अपने आँगन में खड़ा ही हुआ कि थोड़ी देर में ‘हैप्पी न्यू-इयर’ की हुंकार सुनाई दी। मैं चौंक गया। सिर उठाकर जब सामने देखा तो पड़ोसी साहू जी को पाया। वे अपने अहाते से हाथ उठाकर मुझे नए साल की शुभकामना का सिग्नल दे रहे थे- तब याद आया कि आज नए साल का पहला दिन है।
ओह! नया साल फिर आ गया। अभी-अभी तो पिछले साल को झेला है और पेला है। कल रात ही उसे टरकाया है। अब फिर एक नया साल फिर कोई नया झमेला होगा। फिर नई समस्याओं की शुरुआत होगी। मुझे याद आ गए बीते पिछले कुछ साल जो हर साल कुछ नहीं तो नई सरकार लेते आए थे। हर साल एक नई सरकार और साल के जाते-जाते सरकार भी चली जाती- फिर नया साल आता और अपने साथ नई सरकार लाता। टीवी में दिखाए जाने वाले किसी चमचमाते साबुन के विज्ञापन की तरह ‘अब लक्स नहीं... न्यू-लक्स’। वैसे ही आने वाला नया साल कहता- ‘अपनें चाहने वालों के लिए पुरानी नहीं... नई सरकार... नए साल का नया उपहार।।। हमारी न्यू-सुपर सरकार। जनता की दरकार पर नई सरकार। नई सरकार की नई पेशकश- सौ दिनों में महँगाई हटाए... बेजा कब्जे पर पट्टा दिलवाए... पब्लिक सेक्टर को प्राइवेट बनवाए। ऋण माफ़ी कराए, लगान माफ़ी कराए और सबकी जन्म-शताब्दी मनाए। इस तरह हर साल के शुरू होने के साथ ही नए आश्वासन, नई घोषणाएँ, नई परियोजनाएँ के वे सब्ज बाग दिखाते, देशप्रेम की बात करते। ऐसा लगाता कि ‘राम राज आ रहा है पर हमें रावण राज भी नसीब नहीं हुआ। कहते हैं- रावण की लंका सोने की थी।’ रावण की प्रजा सुखी थी पर यहाँ तो हर साल राष्ट्र के नाम संदेशों में वे देश की जनता को अपनी प्यार भरी शुभकामनाएँ देते और साथ में साल भर हमें- बढ़ती बेरोजगारी चढ़ती महँगाई, गरीबी-भूखमरी और दंगों की सौगात देते। अब हर शुभकामना संदेशों के बाद मन में दहशत समाने लगता है... किसी अज्ञात आशंका से मन काँपने लगता है।
आजकल शुभकामनाओं से मैं परहेज करने लगा हूँ। इनसे मुझे अपच सी होने लगी है। आज फिर एक नए साल का पहला दिन है। दिन भर नए साल की मुबारकबाद देने वालों का तांता लगा रहेगा। हैप्पी न्यू इयर की रट लगाने वालों का हमला होगा। यह सोचकर मैं ऊपर से नीचे तक सिहर उठा। मन शुभकामनाओं के खौफ से भर उठा। इस पड़ोसी साहू के बच्चे ने भी सबेरे- सबेरे मूड-ऑफ कर दिया। अगल- बगल वालों का चैन-सुख छीनकर आखिर उसने अपना पड़ोसी धर्म निभा ही दिया।
जिस दिन भी कोई मेरे सुखद जीवन या उज्ज्वल भविष्य के लिए अपनी शुभकामनाएँ देता है मैं घबरा उठता हूँ। ऐसा लगता है जरूर कहीं पर कुछ गड़बड़ होने वाला है। मुझे किसी साजिश का अन्देशा होता है। शुभकामना देने वाला किसी षड्यंत्रकारी सा लगता है। मेरे खिलाफ चलाए जाने वाले किसी कुचक्र का भान होता है। मुझे चाणक्य सूत्र याद आने लगता है - ‘यदि कोई अति-सौजन्य दिखा रहा तो या अतिशय औपचारिकता पूरी कर रहा हो तो वह संदेह जनक है।’ जरूर उसके पीछे कोई राज है। इनसे बचने का प्रयास करें।’ मैं इन थोपी गई शुभकामनाओं पर चिंतन करने लग जाता हूँ कि क्या जरूरत है किसी की बेरोक- टोक शुभकामनाओं की। मैं अच्छा खासा और भला- चंगा हूँ। हर रोज बिना वजह अपनी ड्यूटी पर चला जाता हूँ। जिसके एवज में सरकार से भरी- पूरी तनख्वाह वसूल लेता हूँ। बीवी-बच्चों की तरफ से सब खैर है। ऑफिस वाले सहकर्मियों की भी मेहरबानी है जो मुझ जैसे साहित्यानुरागी को झेल रहे हैं। बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद, इष्ट-मित्रों की कृपा और महिलाओं की दया- मया भी मेरे कंधों पर है। स्थिति भले ही थोड़ी तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है इसलिए मैं किसी की मुबारकबाद का मोहताज नहीं हूँ। ऐसे में किसी पड़ोसी द्वारा सवेरे-सवेरे मेरे अहाते में शुभकामना संदेश फेंक देना मुझे ‘काग-दोष’ देखने जैसा जान पड़ता है। सब ठीक- ठाक चल रहा था कि उनकी शुभकामनाओं की बिल्ली ने रास्ता आड़ काट दिया। ये शुभकामनाएँ मुझे वैसे ही कचोटती हैं, जैसे देश की जनता को राष्ट्र के नाम संदेश।
पता नहीं इन शुभकामनाओं का ग्रह-नक्षत्र मेरे साथ ठीक क्यों नहीं बैठता है? जब भी कोई देता है तो बस कहीं न कहीं कोई अनिष्ट हुआ समझो, फिर वह पूरा दिन मुझे हर सम्भावित अनिष्ट को नाकाम करने की कोशिश में बिताना पड़ता है। मैं हर महत्त्वपूर्ण दिन में लोगों से मिलने- जुलने में कतराने लगा हूँ। पता नहीं किसके मुँह में क्या निकल जाए। किसी की ग्रीटिंग कोई गारंटी-कार्ड तो है नहीं फिर आजकल गारंटी- वारंटी देने वाले कौन से पक्के हैं। ये कम्बख्त डाक वाले भी मेरी रचना की स्वीकृति तो लाते नहीं। यदि कहीं छप भी गई तो भेजी गई पत्रिका को गोलगप्पड़ कर जाते हैं और ये ग्रीटिंग कार्ड फेंक जाते हैं।दिमाग में उठे ख्यालात और दिन में बनी ग्रंथियाँ तजुर्बों से ही पक्के होते हैं। मैंने कई बार ये पाया है कि ‘टैम- कुटैम’ जब भी हमारे तथाकथित कृपालुओं ने लोगों को शुभकामनाएँ दी तो उसका ‘रिएक्शन’ ही होता है। वे निरपेक्षता की बात करते तो इधर सापेक्षता का घनत्व अपने उफान पर होता है। वे सत्य-अहिंसा- परमोधर्म: का उपदेश देकर यह जताते हैं कि ‘उपदेश सदैव सुनने वालों के लिए होते हैं। कहने वालों के लिए नहीं।’ इधर हिंदी-चीनी भाय- भाय की गुहार लगाते और उधर बॉर्डर पर लोग गोलियों की धाँय- धाँय सुनाते। हिन्दू- मुस्लिम-सिक्ख- ईसाई आपस में है भाई-भाई के नारे ‘आपस में हैं सब दंगाई’ में तब्दील हो जाते हैं। राम की मंगलकामना, रहीम की मुबारकबाद और रजिंदर का नया-साल दी मुबारक सब कुछ धरा का धरा रह जाता है। अंतरात्मा की आवाज हवा हो जाती है। तब वे नए सिरे से शुभकामना देने के प्रयास में लग जाते हैं। नए प्रयोग काम में लाते हैं। उन पर शुभकामना देने का फितूर सवार होता है। वे कौमी-एकता, क्रॉस-कंट्री-रेस, एकता पर्व और सर्वधर्म सम्मलेन मनाकर शुभकामना देने के नए-नए हथकंडे तलाशते हैं और देश रसताल की ओर जाता हुआ यह साबित कर देता है कि केवल कोरे नारों व खोखली दुआओं के भरोसे स्थायित्व का आ पाना संभव नहीं है।
देश की और मेरी दशा एक समान है। देश के शुभचिंतकों ने जैसी देश की दशा बनाई वैसे ही मेरे हितैषी मुझे नहीं बख्शते हैं। अब तो इनके भय से अपने बच्चों का जन्मदिन और अपनी शादी की सालगिरह मनाने की हिम्मत नहीं होती। ऐसे मौके पर किसी एक इष्ट का हम सुमिरन करते हैं तो पूरे इष्ट मित्रों का कुनबा हमारे दरवाजे पधारता है। कभी इम्तिहान के दिनों में भी उनके ‘विश यू आल द बेस्ट’ के नारे मेरे मार्क्स घटाते रहे और मेरी उत्तर-पुस्तिका का तापमान कभी- कभी शून्य तक भी उतर जाता। प्रैक्टिकल में मिलने वाले मार्क्स मुझे अक्सर इम्प्रेक्टिकल करार करते रहे। बेरोजगारी का ये आलम होता कि कभी- कभार कोई इंटरव्यू कॉल मिल भी जाता तो इन्टरव्यू दिलाने वाले मेरे दूसरे साथी अपनी शुभकामना मुझे दे देते और बदले में मेरी नौकरी वे ले लेते। ले-दे के आज मेरे सारे जीवन की पूंजी एक अदद नौकरी मुझे मिल गई है तो यहाँ भी मुझसे ज्यादा प्रैक्टिकल मेरे शुभकामना दाता मेरी प्रमोशन खुद हड़प लेते हैं।
ऐसी कई कड़वी घुटों को पीने के बाद अपने शुभचिन्तकों से किनारा करने लगा हूँ।
“आज ऑफिस नहीं जाना है क्या?” की मेरी वामायी आवाज ने मेरी चिंतन प्रक्रिया को भंग किया तो देखा कि इस नए साल के पहले ही दिन मैं ऑफिस के लिए लेट हो चुका हूँ। इस लेट लतीफी के कारण बॉस की शुभकामना अब रूखे स्वर में सुननी पड़ेगी। आज सबेरे पड़ोस में मिलने वाली शुभकामना की दहशत से मन भर गया। सोचा कि इस पड़ोसी को पकड़कर दो-चार शुभकामनाएँ मैं भी जमा दूँ ; लेकिन ‘दिल के अरमां आँसुओं में बह गए।’ और उधर वे चिल्ला- चिल्लाकर मुझे सुना रहे हैं ‘साल नया अब आया हो, जियो मेरे राजा।’
सम्पर्कः मुक्तनगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़) 491 001, मो. 9009884014


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