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Feb 23, 2012

यादेंः कहि देबे संदेस के 50 वर्ष- बृजलाल वर्मा का साथ और पलारी वासियों का अपनापन

बृजलाल वर्मा के साथ मनु नायक
फिल्म की शूटिंग के दौरान

- डॉ. रत्ना वर्मा

मनु नायक की जुबानी 

पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म 'कहि देबे संदेस' जो समाज में व्याप्त जाति- भेद को खत्म करने पर आधारित थी, के निर्माण को 50 वर्ष होने जा रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारी सरकार खराब हो चुके इस फिल्म का रिप्रिंट कराकर इस सांस्कृतिक विरासत को बचाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। 
पिछले दिनों 'कहि देबे संदेस' के निर्माता निर्देशक मनु नायक जब रायपुर आए तो यह चर्चा जोरों पर थी कि वे अपनी बरसों से रूकी फिल्म 'पठौनी' के निर्माण की योजना बना रहे हैं। परंतु आज के माहौल को वे पहले जैसा नहीं पाते। लेकिन 75वें वर्ष की उम्र में पहुँचने के बाद भी उनके उत्साह में जरा भी कमी नहीं आई है, उन्हें मौका मिले तो वे एक और इतिहास रच सकते हैं। 
मैंने जब उदंती में फिल्म 'कहि देबे संदेस' पर विशेष अंक प्रकाशित करने की योजना के बारे में उन्हें बताया तो इस फिल्म के निर्माण को लेकर आरंभ में आई कठिनाइयों को याद करते हुए मनु जी जैसे 1963-64 के दौर में चले गए ...कि कैसे उन्हें रास्ते में श्री बृजलाल वर्मा मिल गए और कैसे वे उनके गाँव पलारी शूटिंग के लिए पहुँच गए। इस फिल्म में गाँव का सिद्धेश्वर मंदिर तथा बाल समुंद तालाब के कई दृश्य फिल्माएँ गए हैं साथ ही गाँव के गली- चौबारे, घर- आंगन, खेत- खलिहानों का बड़ी खूबसूरती के साथ फिल्मांकन किया गया है। वह पलारी गाँव तो आज भी वही है, नहीं है तो सिर्फ वैसी हरियाली, वैसे भरे- पूरे खेत- खलिहान और वैसी खुशहाली। ...आइए मनु नायक जी की जुबानी सुनते हैं कि ग्राम पलारी में शूटिंग के लिए वे कैसे पहुँचे और उनकी यूनिट ने वहाँ 22 दिनों की शूटिंग कैसे पूरी की - संपादक
पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म को छत्तीसगढ़ अंचल में ही फिल्माया जाएगा यह पहले से ही तय था इसके लिए पंडरिया और आस-पास के कुछ स्थानों का चुनाव कर लिया गया था। फिल्म निर्माण के भागीदारों नारायण चंद्राकर और तारेंद्र द्विवेदी के साथ मेरा अनुबंध हुआ था, जिसके अनुसार मुझे पूरी यूनिट के साथ रायपुर पहुँचना था और पूर्व निर्धारित स्थान पर सीधे शूटिंग के लिए पहुँचना था। इसका पूरा खर्च भी भागीदार उठाएंगे यह तय था। पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जब मैं अपनी टीम लेकर 12 नवंबर 1964 को मुंबई से रायपुर पहुँचा तो दुर्ग रेल्वे स्टेशन पर नारायण चंद्राकर मिले और बताया कि रायपुर में द्विवेदी ने शूटिंग की कोई तैयारी नहीं की है। मैं तो जैसे होश ही खो बैठा। मेरे साथ मेरी पूरी टीम थी। पर मेरेही भागीदारों ने मुझे धोखा दे दिया था। मेरे पास इतने पैसे भी नहीं थे कि मैं अपनी टीम की वापसी के टिकिट का इंतजाम कर पाता। खैर रायपुर में बुनकर संघ के सामने खपरा भट्ठी के पास अपने खास मित्र रामाधार चंद्रवंशी के निवास पर मैंने अपनी पूरी टीम को ठहराया और कुछ इंतजाम करने के उद्देश्य से बाहर निकल पड़ा। टहलते हुए कुछ सोचता सा मैं बस स्टैंड की तरफ निकला- संयोग देखिए रास्ते में मेरी मुलाकात पलारी के विधायक बृजलाल वर्मा जी (बाद में 1977 के जनता शासन में वे केंद्रीय संचार और उद्योग मंत्री भी बने ) से हो गई। मुझे इस तरह सर झुकाए चिंता में पैदल जाते हुए देख कर उन्होंने पीछे से आवाज लगाई और मेरा हालचाल पूछने लगे। वर्मा जी को समाचारों के माध्यम से मालूम हो गया था कि मैं छत्तीसगढ़ी में पहली फिल्म बनाने जा रहा हूं।
मैंने साथ चलते हुए वर्मा जी को अपनी परेशानियों से अवगत कराया। वर्मा जी ने गंभीरता से मेरी सारी परेशानी सुनी और कहा- मनु जी आपने मेरा गाँव देखा है?
मैंने कहा कि आपका गाँव? कौन सा गाँव?
उन्होंने बताया पलारी गाँव।
जब मैंने कहा कि मैं तो खरोरा से आगे कहीं गया ही नहीं हूँ। तब मेरी बात सुनकर वर्मा जी ने जो कहा उसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी- उन्होंने कहा- 'अगर आप मेरे गाँव में अपनी फिल्म की शूटिंग करेंगे तो मैं सारा बंदोबस्त कर दूँगा। आपकी टीम के रहने के लिए रेस्ट हाऊस बुक करा देता हूँ, भोजन के लिए बर्तन आदि की व्यवस्था करा देता हूँ... और...' वे न जाने आगे और क्या-क्या कहते पर इतना सुनते ही मैं तो भाव- विभोर हो गया। मैंने और कुछ सोचे बिना तुरंत कहा वर्मा जी मैंने आपका गाँव तो नहीं देखा है पर मैं अपनी फिल्म की शूटिंग अब तो आपके ही गाँव में करूँगा।
यह सुनते ही उन्होंने कहा- 'तो ठीक है मैं गाँव एक चिट्ठी लिख देता हूँ क्योंकि मैं तो आज भोपाल जा रहा हूँ।' उनके भोपाल जाने की बात सुनकर मैं फिर घबरा गया। तुरंत बोल पड़ा आप यहाँ नहीं रहेंगे तो मैं शूटिंग कैसे कर पाऊँगा। वे मुस्कुराए और उसी सहजता से कहा- 'सारी व्यवस्था हो जाएगी आप चिंता मत करो।' फिर उन्होंने वहीं खड़े- खड़े बस स्टैंड में ही अपने चचेरे भाई तिलकराम वर्मा के नाम चिट्ठी लिखी और ड्राइवर को दे दी। इसके बाद मुझसे कहा जाइए आपका काम हो जाएगा।
इसी दौरान बातों-बातों में श्री वर्मा जी ने एक और प्रस्ताव रख दिया कि 'पूरी फिल्म की शूटिंग तो पलारी में होगी ही साथ ही फिल्म में महिला पात्रों के लिए उनके घर के पुश्तैनी गहने भी पहनने के लिए दिए जाएँगे।' यह बात उन दिनों वर्मा जी के लिए भले ही सहज रही होगी लेकिन आज जब सोचता हूँ तो लगता है कितनी बड़ी बात उन्होंने कह दी। आपसी प्यार और दोस्ती में विश्वास का एक ऐसा रिश्ता तब होता था जब डर या धोखे की बात मन में उपजती ही नहीं थी। मेरे लिए तो यह गर्व की बात थी कि उन्होंने मुझे यह सम्मान दिया।
छत्तीसगढ़ में पहने जाने वाले जितने भी गहने फिल्म में नायिकाओं और अन्य महिला पात्रों ने पहने हैं विशेष कर बिदाई के समय सुरेखा द्वारा पहने गए सोने के गहने जिसमें गले में पहनी गई ककनी, काले धागे से बंधी सोने की पुतरी, कान के कर्णफूल, नाक के लौंग तथा हाथ में चाँदी का कटवा सभी वर्मा जी के घर के असली पुश्तैनी गहने हैं। सुरेखा तो उन गहनों को देखकर रोने लगी थी कि ये सारे गहने मैं ही पहनूँगी। दुलारी बाई ने भी गले में जो गोल कंठहार पहना है वह तथा फिल्म में अन्य महिला पात्रों द्वारा पहने गए गहने भी छत्तीसगढ़ के पारंपरिक गहने हैं।
...और इस तरह वर्मा जी द्वारा पूरी व्यवस्था करने के बाद मैं अपनी यूनिट लेकर पलारी पहुँच गया। पलारी में तिलक दाऊ रेस्ट हाउस के सामने बंदूक लेकर हमारे स्वागत में खड़े हुए मिले। पलारी में कदम रखते ही पहली ही नजर में मुझे भा गया वर्मा जी का पलारी गाँव। सबसे पहले हम बालसमुंद पहुँचे जहाँ 9वीं सदी का ईंटों से बना ऐतिहासिक पुरातात्विक महत्त्व का सिद्धेश्वर मंदिर हैं वहाँ की खूबसूरती देखते ही बनती थी। तालाब, घाट और चारों ओर फैली हरियाली। हमने तुरंत मंदिर और बालसमुंद तालाब के किनारे फिल्म का एक गीत- होरे होरे होरे... (महेन्द्र कपूर और मीनू पुरूषोत्तम की आवाज में) की शूटिंग शुरु कर दी। फिल्म का एक और गाना बिहिनिया के उगत सूरूज देवता... (मीनू पुरूषोत्तम ) को भी हमने तालाब और मंदिर प्रांगण में ही सूट किया। तोर पैरी के झनर झनर... का फिल्मांकन दाऊ बलीराम ( वर्मा जी के चाचाजी ) के घर के सामने वाले तालाब में किया गया था।
मेरी फिल्म में अधिकांश कलाकार छत्तीसगढ़ से हैं। पलारी गाँव के लोगों ने भी कई छोटी- छोटी भूमिकाएँ निभाई हैं। वर्मा जी के भाई विष्णुदत्त ने तो नायक के पिता की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिल्म में चूंकि सहकारिता पर बात की गई है तो बृजलाल जी का एक भाषण भी हमने फिल्म में रखा है। उन्हें हमने संवाद लिख कर दिया गया था पर उन्होंने अपने मन से ही सहकारिता पर संवाद बोल दिए। अत: उन्होंने जो बोला वही हमने फिल्म में रखा है। उनके साथ इस दृश्य में पलारी के बीडीओ ए. पी. श्रीवास्तव भी बैठे हुए दिखाई देते हैं। जिनका बहुत अधिक सहयोग हमें मिला।
सच बात तो यह है कि पलारी गाँव के निवासियों का जैसा सहयोग मुझे मिला है वह भुलाए नहीं भूलता। जिसे अपना समझ कर भरोसे से शूटिंग करने आया था उन्होंने तो दगा किया पर असली अपने तो यहाँ मिले जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के भरपूर प्रेम लुटाया। शूटिंग के लिए वर्मा जी के चाचा बलिराम दाऊ का पूरा घर मुझे मिल गया था। जिसे फिल्म में जमींदार के घर के रूप में दिखाया गया है। बहुत बड़े आँगन वाला घर था उनका। दाऊ जी का मैं हमेशा आभारी रहूँगा।
हमने पलारी में 22 दिन बिताए। इस दौरान पलारी में कई स्थानों पर लगातार शूटिंग हुई। सारे कलाकार लगातार वहीं रहे। उन्होंने गाँव के जीवन को पूरी तरह जीया। गाँव में सादा खाना बनता था सब वही प्रेम से खाते थे। चूंकि फिल्म की सभी महिला पात्र गाँव की पृष्ठभूमि से आईं थीं इसलिए लगातार इतने लंबे अरसे तक गाँव में रहने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। इतना ही नहीं दुलारी बाई, उमा, सुरेखा सब खुद ही चावल चुन कर देती थीं और खाना बनाने में सहयोग करती थीं।
फिल्म के किसी भी दृश्य में कोई अतिरिक्त सेट नहीं लगाया गया था। घर, खेत, आंगन, मंदिर तालाब, गाँव की गलियाँ सब कुछ बिल्कुल प्राकृतिक और वास्तविक रूप में ही रखे गए थे। जैसे स्कूल में जो शिक्षक पढ़ाते हुए नजर आते हैं वे वहाँ वास्तविक जीवन में भी शिक्षक थे। इसी तरह सतनामी गुरु के प्रवचन के लिए असली गुरु को बुलाया था। उन्हें कबीर के दोहे के साथ एक संवाद बोलना था- 'कुम्हार किसिम किसिम के हड़िया बनाथे पर सब्बेच माटी एकेच्च हे। गाय मन रंग रंग के होते पर सब्बो के दूध एके होते। अइसने ये दुनिया म रंग- रंग के चोला हम देखथन ...एकर सेती भइया मैं तुंहर मन से बिनती करत हवं एकता से राहव छूआछूत, ऊँच -नीच सब ल मिटावव उहीं म तुंहार, हमार, समाज सबके कल्याण हे।' लेकिन इस संवाद को गुरू बोल नहीं पाए, हमारे पास फिल्म कम थी अत: मैंने बचे हुए रील में संवाद को छोटा कर खुद ही डब किया। इसके बाद भी फिल्म के कई दृश्य व गाने फिल्माने बाकी थे। सुवा गीत -तरी हरी नहना मोर नहना री...और झमकत नदिया... की शूटिंग हम पलारी में ही करना चाहते थे पर अफसोस फिल्म की रील खत्म होने के कारण ऐसे कई महत्त्वपूर्ण दृश्यों को हमें मुम्बई में सेट लगाकर फिल्माना पड़ा। सबसे अधिक अफसोस तब हुआ जब दो दिन के लिए बस्तर महाराज महाराज प्रवीणचंद्र भंजदेव पलारी आए थे। उन्हें भी मैं अपनी फिल्म के लिए कैद करना चाहता था। वह दिन मुझे आज भी याद है जब बस्तर महाराज ने हमारे साथ बैठकर कढ़ी भात खाई थी।
वह यादगार दिन
शूटिंग के आखिरी दिन वर्मा जी ने हमें चाय के लिए बुलाया। चाय के साथ उन्होंने सबको छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध व्यंजन चावल के आटे का चीला खिलाया। वह दिन हम पूरी यूनिट के लिए यादगार दिन था। एक साथ कई चूल्हें जल रहे थे और तवे पर एक के बाद एक चीला बनते जाता था। पताल (टमाटर) की चटनी के साथ गरम-  गरम परोसे जा रहे उस दिन के चीले के स्वाद को मैं इतने बरसों बाद भी भूल नहीं पाता। पलारी से विदाई के दिन बीडीओ एपी श्रीवास्तव ने भी पूरी यूनिट को खाने पर बुलाया। श्रीवास्तव जी ने पूरी शूटिंग के दौरान भरपूर सहयोग दिया। मैं उनका, बृजलाल वर्मा जी का और पूरे पलारी गाँव का आभारी हूँ। उन सबके सहयोग और प्रेम के बगैर मैं यह फिल्म नहीं बना सकता था। लेकिन आज कहाँ हैं वैसे लोग और वैसा विश्वास कि जिन्होंने अपने सोने- चांदी के पुश्तैनी गहने तिजौरी से निकाल कर शूटिंग के लिए बड़ी सहजता से दे दिए। धन्य है पलारी गाँव और पलारी के लोग।

आलेखः रफी साहब की दरियादिली देख सभी गायकों ने घटा दी अपनी फीस

पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म
मनु नायक अपने सीमित बजट की वजह से गीतकार डॉ. एस. हनुमंत नायडू 'राजदीप' और संगीतकार मलय चक्रवर्ती पर यह राज जाहिर नहीं करना चाहते थे कि वह बड़े गायक-गायिका को नहीं ले सकेंगे। लेकिन, होनी को कुछ और मंजूर था। तब मलय चक्रवर्ती धुन तैयार करने के बाद पहला गीत रफी साहब की आवाज में ही रिकार्ड करने की तैयारी कर चुके थे और उनकी रफी साहब के सेक्रेट्री से इस बाबत बात भी हो चुकी थी। सेक्रेट्री रफी साहब की तयशुदा फीस से सिर्फ 500 रूपए कम करने राजी हुआ था। सीमित बजट के बावजूद अपनी धुन के पक्के मनु नायक ने हिम्मत नहीं हारी और मलय दा को लेकर सीधे फेमस स्टूडियो ताड़देव पहुंच गए।
उस घटना को याद करते हुए मनु जी बताते हैं कि 'वहां जैसे ही रफी साहब रिकार्डिंग पूरी कर बाहर निकले, उनके वक्त की कीमत जानते हुए मैनें एक सांस में सब कुछ कह दिया। मैनें अपने बजट का जिक्र करते हुए कहा कि मैं छत्तीसगढ़ी की पहली फिल्म बना रहा हूं, अगर आप मेरी फिल्म में गाएंगे तो यह क्षेत्रीय बोली- भाषा की फिल्मों को नई राह दिखाने वाला कदम साबित होगा। चूंकि रफी साहब मुझसे पूर्व परिचित थे, इसलिए वह मुस्कुराते हुए बोले- कोई बात नहीं, तुम रिकार्डिंग की तारीख तय कर लो। और इस तरह रफी साहब की आवाज में पहला छत्तीसगढ़ी गीत-'झमकत नदिया बहिनी लागे' रिकार्ड हुआ। इसके अलावा रफी साहब ने मेरी फिल्म मे दूसरा गीत 'तोर पैरी के झनर-झनर, तोर चूरी के खनर-खनर, जीव ह रेंगाही तोर हंसा असन' को भी अपना स्वर दिया। इन दोनों गीतों की रिकार्डिंग के साथ खास बात यह रही कि रफी साहब ने किसी तरह का कोई एडवांस नहीं लिया और रिकार्डिंग के बाद मैनें जो थोड़ी सी रकम का चेक उन्हें दिया, उसे उन्होंने मुस्कुराते हुए रख लिया। मेरी इस फिल्म में मन्ना डे, सुमन कल्याणपुर, मीनू पुरूषोत्तम और महेंद्र कपूर ने भी गाने गाए लेकिन जब रफी साहब ने बेहद मामूली रकम लेकर मेरी हौसला अफज़ाई की तो उनकी इज्जत करते हुए इन दूसरे सारे कलाकारों ने भी उसी अनुपात में अपनी फीस घटा दी। इस तरह रफी साहब की दरियादिली के चलते मैं पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म में इन बड़े और महान गायकों से गीत गवा पाया।'
मुबारक बेगम की जगह लिया सुमन कल्याणपुर ने
पहले लता मंगेशकर फिर शमशाद बेगम और मुबारक बेगम से होते हुए 'कहि देबे संदेस' का विदाई गीत 'मोर अंगना के सोन चिरैया वो नोनी' अंतत: आया सुमन कल्याणपुर के हिस्से में।
हो अ हो हो अ हो अ हो
मोरे अंगना के सोन चिरइया ओ नोनी
अंगना के सोन चिरइया ओ नोनी
तैं तो उडि़ जाबे पर के दुवार ...
इसका खुलासा भी बड़ा रोचक है। निर्माता- निर्देशक मनु नायक इस बारे में बताते हैं कि इस विदाई गीत के लिए हमारे सामने पहली पसंद तो लता दीदी थीं लेकिन उनकी डेट तत्काल नहीं मिल रही थी फिर उनकी फीस को लेकर भी हमारे लिए थोड़ी उलझन थी। अंतत: हम लोगों ने शमशाद बेगम से इस गीत को गवाना चाहा। खोजबीन करने पर पता चला कि शमशाद बेगम अब गाना बिल्कुल कम कर चुकीं हैं। ऐसे में हम लोगों ने मुबारक बेगम को इस गीत के लिए एचएमवी से अनुबंधित कर लिया। मुबारक बेगम स्टूडियो पहुंची और रिहर्सल भी किया। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। उनकी आवाज में यह गाना जम भी रहा था। लेकिन दिक्कत आ रही थी महज एक शब्द के उच्चारण को लेकर। गीत में जहां 'राते अंजोरिया' शब्द है उसे वह रिहर्सल में ठीक उच्चारित करती थीं लेकिन पता नहीं क्यों जैसे ही रिकार्डिंग शुरू करते थे वह 'राते अंझुरिया' कह देती थीं। इसमें हमारे एक शिफ्ट का नुकसान हो गया। उस रोज पूरे छह घंटे में मुबारक बेगम से 'अंजोरिया' नहीं हुआ वह 'अंझुरिया' ही रहा। अंतत: हमने अनुबंध की शर्त के मुताबिक उनका और सारे साजिंदों व तकनीशियनों का भुगतान किया और अगले ही दिन सुमन कल्याणपुर को अनुबंधित कर उनकी आवाज में यह विदाई गीत रिकार्ड करवाया। चूंकि हम एचएमवी से पहले ही अनुबंध कर चुके थे, ऐसे में गीत न गवाने के बावजूद मुबारक बेगम का नाम टाइटिल में हमें देना पड़ा।
हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी का जादू
'कहि देबे संदेस' के संगीत का एक और सशक्त पक्ष यह भी है कि फिल्म में गीतों से लेकर पाश्र्व में जहां कहीं भी बांसुरी के स्वर सुनाई देते हैं वह पं. हरिप्रसाद चौरसिया के बजाए हुए हैं। ददरिया शैली में गाया गया गीत 'होरे... होरे... होरे... होर' सुनकर इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। फिल्म का संगीत पक्ष सशक्त रखने मनु नायक ने किस तरह की पहल की खुद उन्हीं की जुबानी सुनिए- जब चक्रवर्ती साहब के साथ फिल्म के संगीत को लेकर चर्चा चल रही थी तब यह बात उठी कि आर्केस्ट्रा कितना बड़ा रखा जाए और कितने साजिंदे हों? मैंने चक्रवर्ती साहब से कहा कि देखिए यहां तो साधारण बजट की फिल्म में भी आर्केस्ट्रा में 70 से 100 साजिंदे होते हैं, लेकिन हमारा बजट बेहद सीमित है, हम इतना नहीं कर पाएंगे। ऐसे में चक्रवर्ती साहब ने 10 से 15 साजिंदों के साथ गीत रिकार्ड करने अपनी सहमति दी लेकिन इसके साथ ही उनकी शर्त यह थी कि सारे साजिंदे ए ग्रेड या एक्स्ट्रा स्पेशल ए ग्रेड के लोग होने चाहिए। तब साजिंदों में एबीसी तीन ग्रेड होते थे। इसके ऊपर भी एक्स्ट्रा स्पेशल ए ग्रेड हुआ करता था। इस ग्रेड में पं. हरिप्रसाद चौरसिया आते थे। सभी साजिंदों का पारिश्रमिक भी ग्रेड के हिसाब से होता था। इस आधार पर चक्रवर्ती साहब ने सबसे पहले पं. हरिप्रसाद चौरसिया को अनुबंधित किया। इसके बाद ए ग्रेड के सुदर्शन धर्माधिकारी और इंद्रनील बनर्जी भी अनुबंधित किए गए। सुदर्शन धर्माधिकारी को ठेका, तबला और पखावज में महारत हासिल थी वहीं सितार वादन में इंद्रनील बनर्जी का कोई सानी नहीं था। ऐसे गुणी साजिंदों को लेकर हमनें सारे गीत और पार्श्व संगीत रिकार्ड किए।

'कहि देबे संदेस' की व्यथा-कथा

'कहि देबे संदेस' की कहानी छुआछूत और जातिवाद पर करारा प्रहार थी। इसके साथ ही फिल्म में सहकारिता पर आधारित खेती (को-आपरेटिव फार्मिंग) को भी प्रमोट किया गया था। कहानी शुरू होती है जमीन के विवाद को लेकर। पटवारी की लिखा- पढ़ी की गड़बड़ी की वजह से जमींदा शिव प्रसाद पाठक (रमाकांत बख्शी) के हक में जा रही जमीन जो थी असल में चरणदास (विष्णुदत्त वर्मा) की। फिर भी अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर जमींदार मामला जीत जाता है। इस अन्याय के खिलाफ चरणदास फरसा उठा कर जमींदार को मारने निकल पड़ता है। इसी दौरान चरणदास की पत्नी फूलबति (सविता) भाग कर जमींदार के घर पहुंचती है और जमींदार की पत्नी पार्वती (दुलारी बाई) से गुहार लगाती है। जब जमींदार इस गुहार को सुनता है तो वह भी बंदूक लेकर चरणदास को मारने निकल पड़ता है। ऐसे में हताश फूलबति जाकर तालाब में कूद जाती है। पीछे आ रहा जमींदार उसे बचा लेता है। इस तरह दुश्मनी को भूल दो परिवार एक हो जाते हैं।
इसी बीच कहानी में जात- पा के भेद को स्कूल में पढ़ रहे बच्चों के माध्यम से आगे बढ़ाया गया है जिसमें छोटी जात का बच्चा नयनदास जमींदार की बहन गीता को लड्ड़ू देता है गीता भाई शिव प्रसाद के डर से लड्ड़ू कुएं में फेंक देती है। लेकिन बेटे की शिकायत पर सीता और गीता को भाई से डांट खानी पड़ती है।
कहानी आगे बढ़ती है और जमींदार की दोनों बहनें सीता (सुरेखा), गीता (उमा) और चरणदास का बेटा नयनदास (कान मोहन) बड़े हो जाते हैं। गीता और नयनदास का बाल सुलभ आकर्षण प्रेम में परिवर्तित हो जाता है। आदर्शवादी जमींदार दहेज का विरोधी है इसलिए उसकी दोनों बहनों के लिए सही रिश्ते नहीं आते हैं। एक और पात्र कमल नारायण (जफर अली फरिश्ता) स्वजातीय होने की वजह से जमींदार की बहन से शादी करना चाहता है इसके लिए वह पंडित (शिवकुमार दीपक) को प्रलोभित कर बार- बार अपना रिश्ता जमींदार के घर भेजता है। लेकिन जमींदार इसके लिए तैयार नहीं होता। ऐसे में कमल नारायण लड़कियों की बदनामी शुरू कर देता है। नायक नयनदास का डॉक्टर दोस्त भी अपना वादा निभाते हुए उसी गांव में डॉक्टरी करने आ जाते हैं। जमींदार सजातीय होने के कारण डॉ. को अपनी बहन उमा से शादी का प्रस्ताव रखता है पर छोटी बहन सुरेखा डॉ. को पसंद करने लगती है। अंत में उनकी ही शादी होती है। विवाद के कारण मनु नायक वैसा अंत नहीं कर पाए जैसा वे चाहते थे।
रूकावटें भी कम नहीं थी
अंग्रेजी की कहावत 'वैल बिगन इस हाफ डन' की तर्ज पर स्टोरी, कास्टिंग और दूसरे तमाम पहलुओं को फाइनल करने के बाद अंतत: मनु नायक ने तय किया पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म को छत्तीसगढ़ अंचल में ही फिल्माया जाए। वे फिल्म के निर्देशन की जवाबदारी महेश कौल के सहायक के तौर पर सेवा दे रहे रायपुर के निरंजन तिवारी को देना चाहते थे। लेकिन कुछ व्यक्तिगत कारणों से अनुबंध के बावजूद मनु नायक ने निरंजन तिवारी की जगह खुद ही निर्देशन की जवाबदारी सम्हालने का फैसला लिया। फिर भी 'कहि देबे संदेस' के रास्ते में रूकावटें कम नहीं हुईं। फिल्म निर्माण के लिए मनु नायक का रायपुर के व्यवसायिक भागीदारों नारायण चंद्राकर और तारेंद्र द्विवेदी के साथ बाकायदा अनुबंध हुआ था, जिसमें प्रमुख रूप से इस बात का उल्लेख था कि श्री नायक अपनी पूरी टीम लेकर रायपुर पहुंचेंगे और इन भागीदारों द्वारा पहले से तय की गई लोकेशनों पर शूटिंग होगी जिसका सारा खर्च भी भागीदार ही उठाएंगे। पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, उन्होंने अनुबंध तोड़ दिया।
ऐसे मुश्किल वक्त में मनु नायक को रायपुर के रामाधार चंद्रवंशी, पलारी के विधायक बृजलाल वर्मा, बीडीओ एपी श्रीवास्तव और पलारी गांव के लोगों का उदार सहयोग मिला। फिल्म के टाइटिल में मनु नायक ने इन सभी लोगों का आभार भी जताया है।
विवाद की कहानी
मनु नायक ने बताया कि मेरी फिल्म 'कहि देबे संदेस' को जबरिया विवादित कराने का श्रेय रायपुर के उन सगान को जाता है, जिन्हें मुंबई में मैं अपनी इस फिल्म में एक महत्वपूर्ण जवाबदारी दे रहा था। लेकिन वह रात भर ड्रिंक करके सुबह उपलब्ध नहीं होते थे। इसलिए मैनें उन्हें अपनी फिल्म से हटा दिया। इसे उन्होंने अपना अपमान समझा और रायपुर आकर लोगों को भड़का दिया कि इस फिल्म में उनके समुदाय को नीचा दिखाया गया है। इससे लोग एकजुट हो गए और धमकी दे दी कि टॉकीज में आग लगा देंगे और किसी भी हालत में इस फिल्म को रिलीज नहीं होने देंगे। मनोहर टॉकीज के संचालक शारदाचरण तिवारी जी इन धमकियों से बेहद परेशान थे, उन्होंने भी फिल्म के पोस्टर अपने यहां से उतरवा लिए और फिल्म प्रदर्शित करने से मना कर दिया। इसके बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ। मेरी फिल्म में एक पात्र का नाम कमल नारायण है। संयोग से इसी नाम के एक चर्चित वकील और कांग्रेसी नेता रायपुर में थे। उन्होंने भी आपत्ति जता दी कि उन्हें व उनके समुदाय को बदनाम करने के लिए खल पात्र का नाम कमल नारायण जानबूझकर रखा गया है। उन्हें भी मैनें किसी तरह समझाया।
इंदिरा गांधी ने देखी सांसदों-विधायकों के साथ
जिन लोगों ने विवाद को हवा दी थी उन्होंने दुर्ग और भाठापारा में फिल्म रिलीज होने के तुरंत बाद कु लोगों को दिल्ली ले जाकर फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर दी। उच्च स्तरीय शिकायत के बाद तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने फिल्म देखने के लिए एक कमेटी बनाई। स्क्रीनिंग की तारीख तय हुई तो मैंने मंत्रालय में अपील की कि इस दौरान छत्तीसगढ़ के तमाम सांसदों और दिल्ली में उपलब्ध छत्तीसगढ़ के विधायकों को भी बुलवाया जाए। लिहाजा सांसद डॉ. खूबचंद बघेल, मिनीमाता और विधायक बृजलाल वर्मा सहित कई लोगों ने फिल्म देखी।
स्क्रीनिंग के दौरान श्रीमती गांधी भी पहुंची उन्होंने फिल्म का कुछ हिस्सा देखा और रायपुर की कांग्रेसी सांसद मिनी माता से कुछ जानकारी ली। मैं उस स्क्रीनिंग में नहीं था। मुझे माता जी और डॉ. बघेल ने बताया था कि इंदिरा जी ने फिल्म को बड़े चा से देखा था। इसके बाद माताजी ने मुझे इंदिरा जी से मिलवाया तो मैनें तुरंत उन्हें विवाद की पृष्ठभूमि का सार बता दिया। इस पर उन्होंने कहा कि 'नहीं-नहीं आपने बहुत अच्छी फिल्म बनाई है और ऐसी फिल्म और बननी चाहिए।' इसके बाद शाम को उन्होंने प्रेस में अपना वक्तव्य दे दिया कि- यह फिल्म राष्ट्रीय एकता पर आधारित है।
फिर तो सारा विरोध स्वत: दब गया। हालांकि रायपुर में एक समुदाय विशेष के लोग तब भी मेरी फिल्म को लेकर परेशान थे। उनके समुदाय के कुछ बुजुर्ग मेरे रायपुर वाले घर में आकर रोज आजिजी करते थे कि-'भांवर के सीन भर ला काट दे ददा। ऐसे में रोज-रोज की आजिजी से तंग आकर मैनें नायक- नायिका के फेरे सहित कुछ दृश्य काट दिए। मैनें अनमने ढंग से सिर्फ नायिका की बिदाई दिखा कर नायक को फौज में जाते हुए एक दृश्य डाल दिया। हालांकि इस दृश्य की वजह से ही फिल्म का अंत गड़बड़ा गया।
एक चिटठी से फिल्म हुई टैक्स फ्री
नई दिल्ली में विवाद का पटाक्षेप होने के पहले से मैं मध्यप्रदेश के तत्कालीन रेवेन्यू मिनिस्टर से मिलकर अपनी फिल्म को टैक्स फ्री करवाने की जुगत में लगा था। लेकिन कोई बात नहीं बन रही थी। ऐसे में मंैने तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र को एक चिटठी लिखी। जिसमें मैंनें अपना उद्देश्य उल्लेखित करते हुए अंत में लिखा कि-'एक महान जननेता के रूप में ही नहीं बल्कि 'कृष्णायन' के अमर रचयिता के रूप में भी आपका सम्मान है।' हालांकि मुझे पहले ही (डॉ. एस. हनुमंत) नायडू साहब ने उन दिनों की चर्चा के मुताबिक बता दिया था कि श्री मिश्र ने 'रामायण' की तर्ज पर 'कृष्णायन' लिखवाई है। खैर, इसी दौरान दिल्ली में फिल्म की स्क्रीनिंग हुई और श्रीमती गांधी का बयान सारे प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हो गया। इसके बाद बिना किसी कोशिश के खुद मुख्यमंत्री ने मुझे बुलवाया और कहा कि- जहां ऐसे मुद्दे पर नाटकों का मंचन तक नहीं होता वहां आपने पूरी फिल्म बनाई है यह बहुत बड़ी बात है। इस तरह उन्होंने बिना देखे ही मेरी फिल्म को टैक्स फ्री घोषित किया।
बाद में मेरी श्री मिश्र के साथ एक और बैठक हुई जिसमें उन्होंने मुझे मध्यप्रदेश शासन का फिल्म सलाहकार नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा। हालांकि यह सब उस वक्त धरा रह गया, जब हमारे पलारी के विधायक बृजलाल वर्मा ने 36 विधायकों के साथ बगावत कर श्री मिश्र की सरकार गिरा गोविंद नारायण सिंह को मुख्यमंत्री बनवा दिया था। मेरी फिल्म टैक्स फ्री करने के साथ ही मध्यप्रदेश शासन के समाज कल्याण विभाग ने भी एक प्रिंट खरीदा। तब करीब 10 साल तक विभाग की ओर से मध्यप्रदेश विशेषकर छत्तीसगढ़ के गांव- गांव में मेरी फिल्म का प्रदर्शन होता था। आज भी भोपाल में विभाग के पास मेरी फिल्म का प्रिंट रखा होगा।
मुहूर्त शॉट रायपु के विवेकानंद आश्रम में
14 नवंबर की शाम पलारी रवाना होने के पूर्व मनु नायक के सामने दुविधा थी कि पूरे एक दिन टीम को खाली कैसे रखें। इसका भी उपाय उन्होंने सोच लिया पास ही रामकृष्ण मिशन आश्रम में जाकर उन्होंने स्वामी आत्मानंद से मुलाकात की और धूम्रपान की पाबंदी की शर्त पर आश्रम के भीतर एक दृश्य फिल्माने की इजाजत ले ली। इस तरह 'कहि देबे संदेस' के मुहूर्त शॉट के तौर पर 14 नवंबर 1964 को पहला दृश्य हॉस्टल के एक कमरे में दो दोस्तों कान मोहन और कपिल कुमार के बीच की बातचीत वाला दृश्य शूट किया गया। पलारी में फिल्म की शूटिंग शुरू तो हुई लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत थी कच्ची फिल्म की। शूटिंग के लिए तब ब्लैक एंड व्हाइट कच्ची फिल्म ब्रिटेन से समुद्री मार्ग से आती थी। भारत-पाक युद्ध के चलते देश में आपातकाल के चलते कच्ची फिल्म के लिए लगभग राशनिंग की स्थिति थी। ऐसे में मनु नायक के सामने चुनौती थी कि जितनी फिल्म मिल सकती है उससे कम से कम रि-टेक में शूटिंग पूरी करें। इस चुनौती को भी उन्होंने पूरा भी किया।
प्रीमियर रायपुर के बजाए दुर्ग में
पोस्ट प्रोडक्शन के बाद अंतत: 14 अप्रैल 1965 को फिल्म रिलीज हुई दुर्ग की प्रभात टाकीज में। फिल्म का प्रीमियर होना था रायपुर के मनोहर टॉकीज में, लेकिन कतिपय विवाद के चलते टॉकीज के प्रोप्राइटर शारदा चरण तिवारी ने अनुबंध के बावजूद दो दिन पहले ही फिल्म के प्रदर्शन से मनाही कर दी। यह अलग बात है कि दुर्ग में यह फिल्म बिना किसी विवाद के चली, फिर इसे भाटापारा में रिलीज किया गया और सारे विवादों के निपटारे के बाद जब फिल्म टैक्स फ्री हो गई तो रायपुर के राजकमल (आज के राज टॉकीज) में प्रदर्शित हुई।
रूपहले परदे पर भिलाई दिखाने की ऐसी मेहनत
'कहि देबे संदेस' में मन्ना डे की आवाज में गाया गीत 'दुनिया के मन आघू बढ़ गे' में स्वतंत्र भारत के पहले औद्योगिक तीर्थ भिलाई पर गीतकार डॉ. एस. हनुमंत नायडू राजदीप ने 'भिलाई तुंहर काशी हे ऐला जांगर के गंगाजल दौ, ऐ भारत के नवा सुरूज हे इन ला जुर मिल के बल दौ, तुंहर पसीना गिरै फाग मा नवा फूल मुस्काए रे' जैसी सार्थक पंक्ति लिखी है। फिल्म में इस गीत के दौरान जहां यह पंक्तियां आती है ठीक वहीं भिलाई के दृश्य आते हैं। इसकी शूटिंग की भी बड़ी रोचक दास्तां है।
मनु नायक इस बारे में बताते हैं सीमित खर्च में फिल्म पूरी करना एक चुनौती थी और वह दौर बेहद कठिन था। पाकिस्तान के साथ युद्ध की वजह से आपातकाल लगा हुआ था। एक तो कच्ची फिल्म की विदेश से आपूर्ति नहीं रही थी दूसरा भिलाई इस्पात संयंत्र को सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील मानते हुए इसके आस- पास फोटोग्राफी या शूटिंग पर उन दिनों भारत सरकार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया था। मेरे लिए मुश्किल थी कि फिल्म डिवीजन से संपर्क नहीं हो पाया था। फिर जो कच्ची फिल्म उपलब्ध थी उसी में मुझे शूटिंग हर हाल में करनी थी। इसलिए प्रतिबंध के दौर में मैंने एक मूवी कैमरा उस वक्त की एक बड़ी वैन में रखा और पहुंच गया आज के बीएसपी के मेनगेट के पास। तब प्लांट की बाउंड्री, मेनगेट और सेक्टर-3 का निर्माण नहीं हुआ था और चारों तरफ दूर- दूर तक मशीनों और मैदान के सिवा कुछ नजर नहीं आता था। मैंने वैन में परदा डाल कर चोरी छिपे भिलाई के शॉट्स लिए। फिल्म रिलीज होने के बाद कई लोगों ने मुझसे इस दृश्य के बारे में पूछा लेकिन हंस कर टालने के सिवा मेरे पास कोई चारा नहीं था।