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Feb 19, 2017

एक कली आँगन में चिटकी

एक कली आँगन में चिटकी
- रंजना त्रिखा

 एक कली आँगन में चिटकी -
मन- उपवन  को  महकाया।
मेरी- बगिया में फिर सावन -
उमड़- घुमड़ कर घिर आया।।

        उसकी- चितवन में नव- जीवन
की हैरानी झाँक रही।
         सब कुछ  से परिचय पाने की -
   उत्कंठा- भी- नाच रही।।

 कभी नयन का द्वार खोल -
 चहुँ ओर ताकती पड़ी -पड़ी।
   कभी मूँद नयनों  को अपने -
पिरो रही सपनों की लड़ी।।

        कभी  विहँसती  अँखियाँ  मूँदे -
      जाने  किन  यादों  में  घिरी।
     कभी बिसूरे मुख में दिखती -
       जाने   क्या   फटकार   पड़ी।।

       चकित ताकती चित्र लिखित सी -
 क्या ईश्वर- की- माया है !
      आज की बिटिया ने हर कल में -
यह- संसार- रचाया है !!

         नहीं अगर कोई बेटी जन्मी -
     क्या होगा संसार कहो ??
   कोख कहाँ से पाओगे -
        ऐ जग के पालनहार कहो ???

      बिना शक्ति के शिव - शव है -
    बिन- नारी के नर नहीं बना!
     यूँ- ही गाल बजाता  फिरता -
  फोड़- न- पाये भाड़ चना!!

एक- गाड़ी के दो- पहिये,
      एक- सिक्के के दो- फलक बने !
      एक- दूजे के बिना नहीं कुछ  ,
   क्यों- अहंकार- से रहो तने !!

      आने दो- जग में बेटी को -
 माता- ये कहलायेगी !
 सृष्टि- इसी से चलेगी -
         वरना मनुज जाति मिट जायेगी !!

सम्पर्क: 25, स्टेट बैंक कॉलोनी, टौंक फाटक, जयपुर- 302015