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May 2, 2025

ग़ज़लः तुम्हें राधा बुलाती है

 - अशोक शर्मा 

कभी तू मान जाती है, कभी तू रूठ जाती है,

अज़ब हैं ख़ेल क़िस्मत का, हँसाती है, रुलाती है।


अदा उसकी यही प्यारी मुझे हरदम लुभाती है,

लिखे वो नाम मेरा और लिख-लिखकर मिटाती है।


वही तो गाँव है, गलियाँ, वही है नीम पे झूला,

अचानक क्यों भला इनको अकेला छोड़ जाती है।


बताया तो हुआ मालूम क्यों ये हाल है मेरा,

मुझे भी हो गया है प्यार ये दुनिया बताती है।


तुम्हें मालूम हो तो तुम बताओ ये ज़रा हमको,

चुराकर ले गया है कौन, क्यों ना नींद आती है।


नहीं है ज़िन्दगी को चैन इक पल भी किसी ज़ानिब,

मदद करती नहीं है और तानें भी सुनाती है।


अभी है वक़्त तेरा तो परख ले ज़िन्दगी हमको,

हमारा  वक़्त  आने  दे,  सुनेंगे  क्या सुनाती है।


कभी उपवास रखती है, कभी रोज़ा रखा उसने,

ग़रीबों की अना तो भूख को यूँ भी छिपाती है।


ज़रा देखो पलटके श्याम, तुम क्या छोड़ आए हो,

तुम्हें  गोकुल  बुलाता  है, तुम्हें  राधा बुलाती है।


पराया धन कहा उसको, पराया कर दिया हमने,

यही  इक  बात  बेटी  को, अकेले  में रुलाती है।

रचनाकार के बारे में- छत्तीसगढ़ शासन से सेवानिवृत्त राजपत्रित अधिकारी, -लगभग चार दशकों से सक्रिय लेखन,मूलतः ग़ज़ल लेखन, अनेक गीत, दोहे, स्वतंत्र आलेख ,कविताएँ और कहानियाँ भी । एक स्वतंत्र ग़ज़ल संग्रह,तीन साझा ग़ज़ल संग्रह और एक साझा दोहा संग्रह प्रकाशित। देश विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और डिजिटल पटल पर अनेक रचनाओं का नियमित प्रकाशन। सम्पर्कः  ‘सोहन-स्नेह’, कॉलेज रोड, महासमुंद (छत्तीसगढ़) 493445, मो. 9425215981, ईमेल- informashoksharma@gmail.com

Sep 1, 2024

ग़ज़लः ख़ुदा भी उसको खुला आसमान देता है

  - मीनाक्षी शर्मा ‘मनस्वी’


जो अपनी फिक्र को, ऊँची उड़ान देता है

ख़ुदा भी उसको, खुला आसमान देता है।

 

जो देखे आइने को, दिल के अपने साफ़ करके;

उन्हीं के अक्स को, मुकम्मल पयाम देता है।

 

ख़्वाहिशें, बंदगी तमाम, चलके देखें तो;

हो जहाँ रूह वहीं पर, आराम देता है।

 

टूटते तारों से कब तक, दुआ हम माँगेंगे ?

बुलंद करके ख़ुदी को, पैगाम देता है।

 

जले है लौ कि जब तलक, है तेल बाती में; 

कि खौफ़ को क्यों  'मनस्वी' स्थान देता है।

-Ph_8604634044, email- meenakshishiv8@gmail.com


Feb 3, 2024

ग़ज़लः1. नादाँ हूँ... 2. सूरज बन कर

  - विज्ञान व्रत







1. नादाँ हूँ...


क्या   तस्वीर   बनाई  थी

क्या  तस्वीर   दिखाई  दी


क्या    पूछो    बीनाई   की

तू   ही   तू   दिखलाई  दी


मैंने    लाख     दुहाई    दी

उसने  कब   सुनवाई   की


उसने आकर  महफ़िल  में

मंज़र    को    रानाई     दी


नादाँ   हूँ   क्या    समझूँगा 

ये      बातें    दानाई     की                                 


2. सूरज बन कर...


मुझको  अपने  पास  बुलाकर

तू  भी  अपने   साथ   रहाकर


अपनी   ही   तस्वीर   बनाकर 

देख  न  पाया  आँख  उठाकर


बे - उन्वान       रहेंगी        वर्ना 

तहरीरों  पर   नाम   लिखाकर 


सिर्फ़    ढलूँगा    औज़ारों      में

देखो   तो  मुझको  पिघलाकर


सूरज  बन  कर   देख  लिया ना 

अब  सूरज-सा   रोज़  जलाकर


Jan 1, 2024

दो ग़ज़लः इस वतन के वास्ते, इस कदर गुस्साए हैं बादल

  - बृज राज किशोर ‘राहगीर’

1. इस वतन के वास्ते


खिड़कियाँ बेहद ज़रूरी हैं हर इक घर के लिए।

रोशनी लेकर यही आती हैं भीतर के लिए।

 

हाथ जबसे तुमने थामा है सफ़र के बीच में,

ये भी काफ़ी से ज़ियादा है मुक़द्दर के लिए।

 

जान देते आए हैं जो इस वतन के वास्ते,

सर झुकाए हैं खड़े हम उनके आदर के लिए।

 

मैंने ऐसा क्या कहा जो इस क़दर नाराज़ हो,

हाथ में ले आए हो तलवार इस सर के लिए।

 

लोग ऐसे भी हैं जिनको रोशनी भाती नहीं,

चाहिएगा ख़ून मेरा उनके ख़ंजर के लिए।


   2. इस कदर गुस्साए हैं बादल 


बरसते जा रहे हैं, इस क़दर ग़ुस्साए हैं बादल।

नदी के घाट सड़कों पर उठा ले आए हैं बादल।

 

बहुत नाराज़ हैं शायद, बहा ले जाएँगे सब कुछ,

न जाने किस समन्दर को बुलाकर लाए हैं बादल।

 

नहीं जब आए थे हम तो, हमें बुलवा रहे थे तुम,

कहानी यह बुलावे की अभी बतलाए हैं बादल।

 

बरस भर पैर फैला सोए थे अफ़सर शहर वाले,

मगर अब किश्तियाँ उनसे यहाँ चलवाए हैं बादल।

 

अरे नेताओं अब तक कोई भाषण क्यूँ नहीं आया,

विदेशी ताक़तों ने ही यहाँ भिजवाए हैं बादल।

 लेखक के बारे मेंः  पचास वर्षों से लेखनरत, तीन काव्य संग्रह, एक ग़ज़ल संग्रह, एक गीत संग्रह प्रकाशित, देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित, आकाशवाणी एवं मंचों पर काव्य-पाठ।, सम्पर्कः ईशा अपार्टमेंट, रुड़की रोड, मेरठ (उ.प्र.)-250001, मोबा. नं. 9412947379


Dec 2, 2022

ग़ज़लें- आई याद पुरानी उसकी

- डॉ. आरती स्मित

1.

आते-आते फिर आई है याद पुरानी उसकी

भूला-बिसरा इक तसव्वुर, इक कहानी उसकी।


इक  वो मंजर गुल-गुंचों का, इक है काँटों वाला

लेकिन हर मंजर में  है क़ायम इक रवानी उसकी ।


याद नहीं, फ़रियाद नहीं दीदार तलक को तरसूँ

भूल गया  कि है मीरा-सी इक दीवानी उसकी ।


एक समंदर उमड़ा पड़ता जैसे दिल के अंदर

आज बहा न दे आँखों से ,इक नादानी उसकी ।


फूलों पर शबनम फैली है या फिर रात के आँसू

ग़फ़लत में हूँ स्मित या आई याद पुरानी उसकी ।

2.

न तो मंज़िल की ख़बर और न हमसफ़र का पता

दश्त-ए-ज़ुल्मत में कहाँ पाएँ तेरे घर का पता ।


मैं तो मंदिर की तरफ़ जा रहा था ऐ साक़ी

न जाने किसने बताया है तेरे दर का पता ।     


मेरे अपने ही तग़ाफ़ुल से देखते हैं मुझे

न उनको ग़म की ख़बर न है दिल-जिगर का पता ।


वो हमने जिनकी परस्तिश की जिनको रब माना

वो हमको देते हैं रुसवाई के शहर का पता ।


ऐ मेरे नूर-ए-नज़र तुझपे दो जहां क़ुर्बां

क्यों तूने स्मित को दिया फिर से चश्म-ए-तर का पता ।


सम्पर्कः
डी 136
, गली न. 5, गणेशनगर पांडवनगर कॉम्प्लेक्स, दिल्ली, मो. 8376836119, dr.artismit@gmail.com, www.smitarti.wordpress.com

Sep 1, 2022

ग़ज़लः रोज बहाने


  - विज्ञान  व्रत

1.

उनकी    यादों    के    तहख़ाने

यानी   कुछ   नायाब    ख़ज़ाने

अब  वो  किसकी  बात  सुनेंगे

ख़ुद   ही   जाऊँगा    समझाने

रोज़   जहाँ   मिलते  थे   दोनों

अब   हैं   वो  मशहूर   ठिकाने

उनकी   कुछ   मजबूरी    होगी

रोज़    बहाने       रोज़    बहाने

अब  उनमें   ही   रहता   हूँ   मैं

मुझको  रक्खें   ठीक - ठिकाने

कल तक  मेरा  हिस्सा   थे  जो

        आज   हुए    हैं     वो     बेगाने       

 2.

जब    उन्हें    महसूसता     हूँ

रब     उन्हें     महसूसता    हूँ

मैं   रहा   अहसास    जिनका

अब    उन्हें    महसूसता    हूँ

अब  किसी  को  क्या  बताऊँ

कब    उन्हें     महसूसता    हूँ

आज  जो  हस्सास   हूँ    कुछ

तब    उन्हें     महसूसता     हूँ

आज   अपनी    ज़िन्दगी   का

ढब    उन्हें     महसूसता     हूँ

सम्पर्कः एन - 138 , सैक्टर - 25 ,  नोएडा - 201301, मो. 09810224571

Aug 1, 2022

दो ग़ज़लें

- अशोक ‘अंजुम’

1. इंतजार हल्का था

चढ़ाव कम था तो उस पर उतार हल्का था

हमें बचना ही था ग़र्दो-गुबार हल्का था

 

उसे आना तो था पर रहगुजर से लौट गया

वो तेरी चाह तेरा इंतज़ार हल्का था

 

मुझे मालूम था ये साथ निभ न पाएगा

लगाव कम था कि जो था करार हल्का था

 

इसलिए हमने कभी तुझसे तगादा न किया

जिंदगी तुझ पे हमारा उधार हल्का था

 

 लाजमी इसका उतरना है पता था मुझको

गो तुझ पे इश्क का जो था बुखार हल्का था

 

किस तरह मुल्क अरे तुझको तरक्की मिलती

बोझ भारी था मगर हर कहार हल्का था

 

तेरे हमले से बता कैसे बच गया 'अंजुम'

मौत बोली कि वो अपना शिकार हल्का था


2. कुछ बारिश ऐसी होती है

अपनेपन को ढूँढ रहा है तेरा मेरा अपनापन

भारी-भारी कसमें-वादे हल्का-फुल्का अपनापन

 

तेरा इतना, मेरा इतना, दोनों की सीमाएँ तय

अपनेपन में है बँटवारा, ऐसा कैसा अपनापन

 

अहसानों का एक पुलिंदा रखा हुआ है सीने पर

फिर ये कैसी यारी अपनी, फिर ये कैसा अपनापन

 

हर इक आहट पर लगता था तुम होगे, तुम ही होगे

आँखें दर पर लगी रही हैं, रहा तरसता अपनापन

 

कुछ बारिश ऐसी होती हैं जिनमें सब धुल जाता है

पक्के-पक्के रिश्ते-नाते, कच्चा-कच्चा अपनापन

 

विश्वासों के कैनवास पर जिसे सजाया था ‘अंजुम’

कैसे-कैसे रंग दिखाए, पाकर मौका अपनापन


सम्पर्कः स्ट्रीट-2, चंद्र विहार कॉलोनी (नगला डालचंद), क्वारसी बायपास, अलीगढ़- 202002 (उ.प्र.). मोबाइल 9258779744

Jul 1, 2022

ग़ज़लः सोचा नहीं


- धर्मेन्द्र गुप्त

अपने  बारे में  कभी सोचा नहीं

ठीक से दरपन कभी देखा नहीं

 

भूखे बच्चे को  सुलाऊँ किस तरह

याद मुझको कोई भी क़िस्सा नहीं

 

आप मुझको तय करें मुमकिन नहीं

मैं कोई  बाज़ार  का  सौदा  नहीं

 

ज़हन में हर  वक़्त रहती धूप है

मेरा सूरज तो कभी ढलता नहीं

 

नाज़ मैं किस चीज़ पर आख़िर करूँ

मुझमें  मेरा कुछ  भी तो अपना नहीं

 

जो ठहर  जाए  निगाहों  में मेरी

ऐसा  मंज़र  सामने आया नहीं

 

सबके हिस्से में  कोई अपना तो है

अपने हिस्से में मैं ख़ुद अपना नहीं

 

तेज हैं कितनी हवाएँ , फिर भला

दर्द का बादल ये क्यों उड़ता नहीं

सम्पर्कः के 3/10 ए. माँ शीतला भवन गायघाट, वाराणसी -221001, 8935065229, 8004550837

Mar 1, 2022

ग़ज़ल- होली में

 
- विनीत मोहन 'फ़िक्र सागरी' 




कभी तो कुर्ब में आकर, मिलो दिलदार होली में..

मुहब्बत का जुबाँ से भी, करो इजहार होली में..

खिले हर सिम्त गुल, कचनार, जूही औ चमेली के,

फिजाँ ने भी किया है, इश्क का इकरार होली में..

अधूरे रंग खिल जाएँ, अगर हाथों से छू लो तन,

पपीहा प्रेम का कबसे, करे मनुहार होली में..

खुशी सारी ज़माने की, लगे फीकी तुम्हारे बिन,

भुला दो नफ़रतें मन की, सभी इस बार होली में ..

गुलाबी होंठ, रतनारे नयन, दहका बदन गोरा,

ये मन फागुन हुआ, करता फिरे, इसरार होली में..

करो शृंगार सोलह, यामिनी पे चाँद है ठहरा,

करे फिर इश्क की खुशबू, चमन गुलजार होली में। ।

नशा छाया, घुली मस्ती, हवा में रंग जो बिखरे,

बचाये 'फ़िक्र' फिर कैसे, कोई किरदार होली में?

सम्पर्कः एम आई जी - 118, शांति बिहार कालोनी,रजा खेड़ी, मकरोनिया, सागर, मध्य प्रदेश- 470004, मो.  91- 7974524871, Email- v।maudichya@yahoo

ग़ज़ल- रंग- बिरंगा फाग

 
- निधि भार्गव मानवी 
( गीता कालोनी, ईस्ट दिल्ली )

फागुनी ऋतु आ गई हिय जागता अनुराग है ।

तन बदन में घोलता रस रंग- बिरंगा फाग है ..

भावनाएँ जोर करतीं हो रहा मदहोश मन ।

पाँव थामे से न थमते, मन की भागम भाग है ..

हैं पिया परदेश जिनके उनके जी की क्या कहूँ ।

बिरहनों के हिय में इक विरह की आग है ।

क्यूँ गगन में चाँद तारे कर रहे अठखेलियाँ ।

दिल जलाती रात काली, हसरतों में दाग है ।

आएगा मेहमान कोई घर हमारे आज फिर ।

भोर से ही नित मुँडेरी बोलता यह काग है ।


Feb 1, 2022

ग़ज़ल - मेरा सूरज तो कभी ढलता नहीं

  - धर्मेन्द्र गुप्त

अपने  बारे में  कभी सोचा नहीं

ठीक से दरपन कभी देखा नहीं


भूखे बच्चे को  सुलाऊँ किस तरह

याद मुझको कोई भी क़िस्सा नहीं


आप मुझको तय करें मुमकिन नहीं

मैं कोई  बाज़ार  का  सौदा  नहीं


ज़हन में हर  वक़्त रहती धूप है

मेरा सूरज तो कभी ढलता नहीं


नाज़ मैं किस चीज़ पर आख़िर  करूँ

मुझमें  मेरा कुछ  भी तो अपना नहीं


जो ठहर  जाये  निगाहों  में मेरी

ऐसा  मंज़र  सामने आया नहीं


सबके हिस्से में  कोई अपना तो है

अपने हिस्से में मैं ख़ुद अपना नहीं


तेज हैं कितनी हवाएँ , फिर भला

दर्द का बादल ये क्यों उड़ता नहीं


सम्पर्कः के  3/10 ए. माँ शीतला भवन , गायघाट, वाराणसी -221001, 8935065229, 8004550837

Dec 1, 2021

दो ग़ज़लें

-विज्ञान व्रत 
  
  1.तसव्वुर 

आप  कब  किसके   नहीं  हैं

हम   पता   रखते    नहीं   हैं

 

जो   पता   तुम   जानते   हो

हम   वहाँ    रहते    नहीं   हैं

 

जानते     हैं   आपको    हम

हाँ   मगर   कहते    नहीं   हैं

 

जो    तसव्वुर    था    हमारा

आप   तो     वैसे    नहीं    हैं

 

बात    करते     हैं      हमारी

जो   हमें    समझे    नहीं   हैं


     2. ख़ामोशियाँ    

आपसे     नज़दीकियाँ      हैं

इसलिए      तन्हाइयाँ       हैं

 

आसमाँ    पर    ये     सितारे

आपकी      रानाइयाँ        हैं

 

आशियाँ  है  ख़ास   तो  क्या

बिजलियाँ  तो  बिजलियाँ  हैं

 

कल   जहाँ    ऊँचाइयाँ    थीं

अब     वहाँ     गहराइयाँ   हैं

 

आप  हैं   किस    रौशनी   में

गुमशुदा      परछाइयाँ       हैं

 

कर  रही   हैं   शोर    कितना 

ये   अजब    ख़ामोशियाँ    हैं

 

सुन   रहे   हैं   लोग   जिनको

आपकी    सरगोशियाँ       हैं

 

सम्पर्कः एन - 138 , सैक्टर - 25 , नोएडा – 201301, मो. 09810224571

Sep 3, 2021

दो ग़ज़ल

- विज्ञान  व्रत


1.        

उनकी   आँखों    में   चिंगारी

लेकिन   बातों   में    गुलबारी

 

उनसे   मिलकर    बैरागी   हूँ

छूट    गयी    है    दुनियादारी

 

कोई    हुक्म    नहीं    मानेगा

उनका  हुक्म  हुआ   है  जारी

 

गर मुझको आज़ाद  किया  है

फिर   क्यों   इतनी   पहरेदारी

 

दरिया  में  जब  कूद  गया  हूँ

अब   दरिया  की   ज़िम्मेदारी

 

2.

पागल   क्या   दीवाना   क्या

इनमें   फ़र्क़    बताना    क्या

 

मुझको    कोई    याद    नहीं

अपना   क्या    बेगाना   क्या

 

मुझको  तुम   क्या   दे   पाये

तुमको   फिर  लौटाना   क्या

 

ख़ुद ही  सब कुछ  जान  गये

फिर  तुमको   बतलाना  क्या

 

तुम   जन्मों   से   मुझमें   हो

फिर  तुमको  अपनाना   क्या

 

सम्पर्कः एन - 138 , सैक्टर - 25 , नोएडा – 201301, मो .  09810224571