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Jan 1, 2026

यात्रा संस्मरणः अयोध्या से वाराणसी- उमंग और ऊर्जा भरते घाट

- सुदर्शन रत्नाकर 










आठ बज कर पाँच मिनट पर हवाई जहाज़ ने पट्टी पर दौड़ना शुरू किया और फिर जैसे ही उसने उड़ान भरी। पीछे का सब कुछ छूटता गया। मन अयोध्या की ओर उड़ता गया। चार दिन पहले ही भाई का फ़ोन आया, हम सब यानी हरबंस भाई-सविता भाभी, भाभी के भैया, मधु भाभी एवं बहन संतोष और मैं सुबह आठ बजे नई दिल्ली एयरपोर्ट से एयर इंडिया की फ्लाइट से अयोध्या जा रहे हैं। न करने और सोचने की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी।सच ही कहते हैं, जब ईश्वर ने दर्शन के लिए बुलाना हो तो, ऐसे ही कार्यक्रम बनते हैं।श्री राम के दर्शन करने की सोच मात्र से ही मन में भरी प्रफुल्लता से चार दिन व्यतीत हो गए और अब हवाई जहाज़ अपनी गति से गंतव्य की बढ़ रहा है। 

  दस बजे जब हवाई जहाज़ ने लैंड किया और अयोध्या की उस पावन धरा, भारत के जनमानस के नायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने जन्म लिया था, पर पाँव रखते ही आँखें खुशी से सजल हो गईं।

अयोध्या का एयरपोर्ट छोटा है ; लेकिन श्रीराम की अत्यंत सुंदर पेंटिंग्स ने मन मोह लिया।एयरपोर्ट से बाहर निकले तो भाई के मित्र के द्वारा भेजे गए कर्मचारियों ने फूलों के गुलदस्ते देकर हमारा स्वागत किया। दो गाड़ियों से हम सभी होटल रामायणा की ओर अग्रसर हुए। प्रखर- जिसने सारे ट्रिप की रूपरेखा बनाई थी, हमें रास्ते में बताता  गया। अयोध्या नाम तो सबके हृदय में बसा है; लेकिन अभी तक एक छोटा सा शहर ही था, विकास के नाम पर कुछ अधिक नहीं हुआ था पर अब वही शहर चमचमाती सड़कों, नए-नए बने होटलों और इमारतों से इठला रहा है। इठलाए भी क्यों न, रंग रूप तो बदला ही है, सदियों की प्रतीक्षा के बाद भगवान राम का भव्य मंदिर जो बना है, जिसे देखने देश से ही नहीं, विदेशों से भी श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। 

   होटल एयरपोर्ट से दस मील की दूरी पर है। औपचारिकताएँ पूरी करके हमने नाश्ता किया। एक बजे हमें मंदिर में जाना है, जो होटल से कुछ ही दूरी पर है। गाड़ी अंदर तक नहीं जातीं, लेकिन पूर्व आज्ञा-पत्र ले रखा है। संकरी गलियों से लोगों की भीड़ से बचते हुए हम आगे बड़े और मंदिर के द्वार से थोड़ी दूरी पर उतरे। हमारे और हमारे आराध्य के बीच बस थोड़ी ही दूरी थी। भैया और दीदी के लिए व्हीलचेयर ली। वहीं माथे पर राम-नाम का तिलक लगा कर हम  खुशी के अपार सागर में डूबे ऊबड़- खाबड़ रास्ते से आगे बढ़े।

 अगला रास्ता हमें सीढ़ियों से तय करना था। यह अंतिम पड़ाव था। लगभग साठ सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद हम उस भव्य मूर्ति के सामने खड़े थे। जिसका दर्शन करने हम आए थे। लग रहा था, जैसे वे आँखें हमें देख रही हैं, उनसे निकलती लौ और मूर्ति की आभा देखकर इतनी भाव विभोर हो उठी कि आँखें नम हो गईं और फिर आँसू बहने लगे। भाई की भी वही स्थिति थी। वह भी बहुत भावुक है। श्रद्धालुओं की बहुत लम्बी पंक्ति थी इसलिए अधिक समय तक रुक नहीं सकते थे। सबके लिए सुख-शांति माँगते हुए,  आगे बढ़े और उतनी ही सीढ़ियाँ उतर कर नीचे आ गए; लेकिन मन तो जैसे पावन -पवित्र होकर वहीं छूट गया था। राम मंदिर के तदोपरांत, राम दरबार देखने गए, दशरथ महल, कनक भवन राम और सीता के दर्शन करके आँखें तृप्त हों गईं।

वापस होटल पहुँचे तो चार बज गए थे। थोड़ी देर आराम करने के बाद हनुमान गढ़ी देखने के लिए निकले। हनुमानगढ़ी एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन हनुमान मंदिर है। कहा जाता है भगवान राम ने हनुमान जी को अयोध्या की रक्षा का भार दिया था तथा उन्हें अयोध्या में निवास करने का आदेश दिया था। यहाँ की सीढ़ियाँ पुरानी और बहुत ऊँची है। हनुमान चालीसा पढ़ते हुए किसी तरह पहुँच ही गए। हनुमान जी की सजग आँखें सच में नगर की सुरक्षा में सचेत थीं।

   सरयू नदी हम  सायंकाल में रौशनी में देखना चाहते थे। देव दीवाली के कारण लाखों लोगों ने सरयू में स्नान किया था। इस समय भी अपार भीड़ थी। छह बजे हम लता मंगेशकर चौक पहुँचे। मधुर स्वर लहरियों से वातावरण गुंजायमान हो रहा था। लता मंगेशकर चौक से जैसे-तैसे करके सीढ़ियाँ उतरकर नीचे घाट पर पहुँचे। दीये वहीं मिल रहे थे। सभी ने जलते दीपक सरयू की लहरों पर छोड़ दिए। जगमग करते और भी सैंकड़ों दीपक लहरों के साथ लहराते हुए आगे बढ़ रहे थे मानों आसमान में सितारे टिमटिमा रहे हों। 

ऊपर आकर पुल से सरयू नदी की दूसरी ओर आ गए, जहाँ कई मंदिर हैं: लेकिन हम केवल, नागेश्वर नाथ मंदिर ही देख पाए। यह शिव जी का अत्यंत प्राचीन मंदिर है। दर्शन करने के बाद लता मंगेशकर चौक, जहाँ बहुत बड़े आकार की वीणा बनी हुई है। वहाँ कुछ देर ठहरें और  चित्र लिए।

दूसरे दिन हमने वाराणसी के लिए प्रस्थान करना था। सुबह नाश्ता लेकर दस बजे हमने सड़क मार्ग से यात्रा प्रारंभ की। रास्ते में रुकते हुए हमने यात्रा का पूरा आनंद लिया हमारे साथ ड्राइवर सोनू ,अंजनी और ब्लैक कामांडो शर्मा जी थे, जो हर स्थान के बारे में बताते हुए  जा रहे थे, राजनीति पर भी खूब चर्चा करते रहे। अंजनी बीस-बाइस वर्ष का बड़ा चुस्त और संस्कारी लड़का है। उसने बताया कि वह हनुमान जी का परम भक्त है, उसे हमेशा यह एहसास होता है कि वे उसके साथ हैं। वह सुबह एक घंटा नियम से पूजा करता है। किसी दिन किसी विशेष कारण से पूजा नहीं कर पाता, तो उस दिन कहीं भी जाते हुए रास्ते में उसे हनुमान जी का कोई न कोई मंदिर अवश्य दिख जाता है।

      जब वाराणसी पहुँचे अँधेरा, हो गया था।सँकरी सड़कें जगह-जगह रास्ते में लगा जाम और रेंगती हुई गाड़ियाँ। बैठे-बैठे थकान होने लगी थी। होटल द. एच.एच.आई (होटल हिन्दुस्तान इंटरनेशनल) तक पहुँचने में ही बहुत समय लग गया। रिसेप्शन पर अभी पहुँचे ही थे कि लिफ्ट से सात- आठ सुंदर -सी महिलाएँ एक जैसी साड़ियाँ पहने हुए निकलीं। हमें देखते ही उन्होंने हाथ जोड़कर नमस्ते की। उनके  हाथों में मेंहदी लगी हुई थी। हमारे जवाब देने पर उन्होंने ने बताया कि वे शिकागो से हैं। जब मधु भाभी ने बताया कि वे भी शिकागो सें आई हैं, तो ख़ुश हो गई। अच्छा लगा कि विदेशी हमारी संस्कृति, हमारी परम्पराओं को अपना रहे हैं। अयोध्या में भी विदेशियों को भारतीय वेशभूषा में माथे पर राम-नाम का तिलक लगाए मंदिर परिसर में घूमते हुए और श्री राम के दर्शन करते हुए देखा था।

  यह शाम हमने होटल में ही संगीत सुनते हुए, बातचीत करने में बिताई। अगली सुबह का कार्यक्रम अभी अनिश्चित था कि कब शुरू होगा।  सुबह हम तैयार हो ही रहे थे कि भाई के पास शर्मा जी का फ़ोन आ गया कि तैयार रहें, वे नौ बजे आ जाएँगे। नाश्ता लेकर हम जाने के लिए ई रिक्शा से निकले; क्योंकि श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर तक कार नहीं जा सकतीं। मंदिर के बाहर ही व्हील चेयर मिल गई और छोटे रास्ते से अंदर जाने की आज्ञा भी। मंदिर के बाहर ही एक दुकान से प्रसाद की टोकरी ली, वहीं जूते उतारे और अपने-अपने फ़ोन और बैग जमा करवाए, गेट नंबर चार से मंदिर परिसर में प्रवेश किया। पहले मंदिर तक जाने का रास्ता छोटी-छोटी गलियों से होकर जाता था; लेकिन अब खुले गलियारे बन गए हैं, जिससे लोगों के आवागमन में सुविधा हो गई है।

 गलियारे में जाते ही सबसे पहले ज्ञानवापी मस्जिद दिखाई दी, जो मंदिर के एकदम साथ है। इस समय चारों ओर से बंद किया हुआ है। सिक्योरिटी प्रक्रिया के पश्चात हम एक बड़े से दालान में पहुँचे, जहाँ शिव जी को समर्पित विश्वनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिसके दर्शन मात्र से आत्मा को शुद्धि मिलती है। सम्राट विक्रमादित्य ने इसका निर्माण करवाया था, जबकि वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण 1780 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। 

   यहाँ भी हमें सुविधा से दर्शन गए। शिवलिंग से छू कर गेंदे के फूलों का हार जब पुजारी ने पहनाया तो मन गद्गद हो गया। लगा भोले नाथ की कृपा के फूल बरस रहे हैं। हर हर महादेव के नारों की आवाज़ से सारा वातावरण गूँज रहा था। पंक्तियों में लगे हज़ारों दर्शनार्थियों की श्रद्धा देखते ही बन रही थी। यह आस्था ही तो मनोबल बढ़ाती है।     

 वाराणसी के अन्य मंदिरों में भैरव मंदिर, श्री अन्नपूर्णा मंदिर, श्री दुर्गा माता मंदिर, सारनाथ मंदिर हैं। अन्नपूर्णा मंदिर, देवी अन्नपूर्णा को समर्पित मंदिर है। किंवदंती के अनुसार एक बार जब पृथ्वी पर अन्न की कमी हो गयी, तब माँ पार्वती ने माँ अन्नपूर्णा के रूप में अवतार लिया और पृथ्वी लोक पर अन्न उपलब्ध कराकर समस्त मानव जाति की रक्षा की थी। वहाँ से हमें चावल और रुद्राक्ष का प्रसाद मिला, जो हमने सम्भाल कर रख लिया।

   होटल में  थोड़ी देर विश्राम करने के पश्चात् हम प्रमुख बौद्ध स्थल सारनाथ मंदिर देखने के लिए निकले, जो वाराणसी से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिसमें कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल हैं।

   जैसे ही हमने प्रांगण में प्रवेश किया, सबसे पहले हमें सुसज्जित वह स्थान दिखाई दिया, जहाँ महात्मा बुद्ध अपने पहले पाँच शिष्यों के सम्मुख बैठे ,उन्हें प्रवचन दे रहे हैं। उसके बाद धर्मचक्रों को घुमाते हुए परिक्रमा की। इसके सामने ही वह वृक्ष है, जिसकी एक शाखा  श्रीलंका से लाकर यहाँ लगाई गयी थी। मंदिर में प्रवेश करते ही भगवान बुद्ध की शांत भाव से बैठे अत्यंत सुंदर प्रतिमा के दर्शन मात्र से ही मन में अपार शांति छा गई। मंदिर की दीवारों पर महात्मा बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित मनोहारी पेंटिंग्स वातावरण को और भी आकर्षक बनाती हैं। स्वच्छ और शांत वातावरण को छोड़कर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी। पर अभी हमें धूमेक स्तूप भी देखना था। विशाल प्रांगण में बने इस स्तूप का निर्माण सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व करवाया था।

    जिसे देखकर आश्चर्य हुआ और मन उनके आगे नत मस्तक हो गया, जिनके हाथों ने इसे बनाया था। गाइड ने बताया कि मुग़ल शासकों ने इसके एक हिस्से को तोड़कर देखा था कि कहीं इसमें सोना तो नहीं भरा हुआ। बाद में 1930 में इस हिस्से की मरम्मत की गई, जो अलग दिखता है।

     मंदिर से बाहर निकलकर थोड़ी ख़रीददारी की। लौटने का समय हो हो गया था। साढ़े छह बजे गंगा -आरती आरंभ हो जाती है इसलिए विश्राम न करके सीधे गंगा घाट की ओर बढ़े। रास्ते में शर्मा जी ने हमें ढाबे पर ले गए। जहाँ की चाय लाजवाब होती है, अदरक डालकर बनायी गई चाय  कुल्हड़ में पिलाते हैं। मैं तो चाय नहीं पीती; लेकिन सभी ने इस चाय का आनन्द उठाया। 

  एक पुल को पार करते हुए शर्मा जी ने बताया कि इस पुल का नाम अंधा पुल है। एक अँधे भिखारी की मृत्यु के बाद उसके पास से आठ करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे, जिससे इस पुल का निर्माण करवाया गया था और इसका नाम अंधा पुल रखा गया।     

   छह बजे हम अस्सी घाट पहुँचे, जहाँ से पचास सीढ़ियाँ उतरकर हमें नीचे जाना था। सीढ़ियाँ पुरानी और बहुत ऊँची हैं। सोचकर ही घबराहट होने लगी कि इतनी सीढ़ियाँ चढ़कर वापिस भी आना है। अधिक परेशानी तो भैया और दीदी को थी। उन दोनों को हाथ पकड़कर नीचे उतरना पड़ा। अभी तो परेशानी शेष थी। कठिन प्रक्रिया  के बाद जैसे तैसे बोट पर पहुँचे और इसके साथ ही सारी थकान, सारी कठिनाइयाँ भूल गईं, जब गंगा की लहरों से अठखेलियाँ करती बोट आगे बढ़ी। लगभग सभी घाट जगमगाती रोशनी से सजे हुए थे। कुल अट्ठासी घाट हैं, जहाँ पूजा और स्नान किया जाता है; लेकिन मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट श्मशान घाट हैं, जो विशेष रूप से दाह संस्कार के लिए उपयोग किए जाते हैं। यहाँ दिन-रात शवों को जलाया जाता है । मान्यता है कि जिसका शव यहाँ जलाया जाता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह आस्था और विश्वास है, जो सदियों से चला आ रहा है, शेष जाने वाली आत्मा तो बता नहीं पाती।

     दशाश्वमेध सबसे प्राचीन घाट है, जहाँ पर प्रसिद्ध गंगा आरती का आयोजन होता है। हमारी बोट जब वहाँ पहुँची, तो आरती चल रही थीं। अद्भुत, अलौकिक दृश्य। अभी तक सुनते आए थे, अब सामने खड़े सुन और देख रहे थे। अचम्भित तो होना ही था। एक अनूठी आभा का जैसे संचार होने लगा था।  नीचे गंगा की लहरें, ऊपर खुला आसमान, शीतल हवा के झोंकों का स्पर्श और चमकता पूरा चाँद, जो हमारे साथ-साथ चल रहा था। हृदय में उमंग और तन-मन तनाव रहित। सांसारिक बंधनों में रहकर, क्या यह मोक्ष नहीं था? यही तो था, चाहे क्षणिक था।               

   आठ नवम्बर आज वाराणसी में अंतिम दिन था। आराम से सोकर उठे। नाश्ता लेकर ग्यारह बजे चैक आऊट किया। हमारी दिल्ली की वापसी की फ्लाइट छह बजे की थी, जो चालीस मिनट विलंब दिखा रही थी। हमारे पास पर्याप्त समय था; लेकिन भीड़ आज भी बहुत थी। लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डे पर पहुँचने में समय लगेगा। रास्ते में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय भी देखना था, जो एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रतिष्ठित केन्द्रीय विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना पंडित मदन  मोहन मालवीयजी ने 1916  में की थी। इसका उद्देश्य पारंपरिक भारतीय ज्ञान और आधुनिक शिक्षा को जोड़ना था। विश्वविद्यालय का मुख्य परिसर साढ़े पाँच किलोमीटर में फैला हुआ है। सब कुछ देखने में हमें कार से भी आधा घंटा लग गया।

    ढाई बज गए थे। अभी हमें लंच भी लेना था। खाने के बाद एक बार फिर से सबने अदरक वाली कुल्हड़ की चाय का आनंद लिया। हवाई अड्डे पर सभी औपचारिकताएँ पूरी करने के बाद पता चला- फ्लाइट सवा आठ बजे उड़ान भरेगी। प्रतीक्षा के अतिरिक्त क्या कर सकते थे। घर तो लौटना था। ट्रिप की अच्छी-अच्छी बातों के बारे में बातचीत करते हुए हमने उस प्रतीक्षा का भी आनंद लिया।

सम्पर्कः ई-29, नेहरु ग्राउंड, फरीदाबाद 121001, मोबा. 9811251135

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