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Feb 28, 2011

रंग बिरंगी दुनिया

एक बैंक जहां ताला नहीं लगता!
यह सचमुच चौंकाने वाला समाचार है कि जब चारो ओर लूट मची हो ऐसे समय में महाराष्ट्र के शनि शिंगनापुर गांव में यूनाइटेड कमर्शियल बैंक (Uco) देश की पहली ऐसी ब्रांच है, जिसमें कभी ताला नहीं लगता। दरअसल यह बिना ताले वाला बैंक खोला ही इसीलिए गया है क्योंकि इस गांव के लोग अपने घरों के दरवाजों पर भी कभी ताले नहीं लगाते! बैंक के इस ब्रांच का नाम लॉकलेस बैंक रखा गया है। बैंक अगले कुछ महीनों में एक एटीएम लगाने वाला है। बैंक का कामकज बंद हो जाने के बाद जानवर न घुस जाए सिर्फ इसलिए दरवाजे पर एक कुंडा लगा दिया जाता है।
शनि शिंगनापुर अहमदनगर जिले का एक छोटा सा गांव है। गांव में शनिदेव का एक प्रसिद्ध मंदिर है। रोजाना करीब 5 हजार भक्त यहां पूजा के लिए आते हैं। खास बात यह है कि इस गांव में किसी भी घर में दरवाजे नहीं हैं। बताया जाता है कि सैकड़ों साल पहले जब से गांव में शनिदेव का मंदिर बना, तब से यहां कोई अपराध भी नहीं हुआ है! ग्रामीणों की शनिदेव में बड़ी आस्था है। गांव में कोई चोरी न होने के पीछे सभी शनिदेव की कृपा मानते हैं। लोगों का मानना है कि जो भी चोरी या लूट जैसी वारदात करेगा, उसे शनिदेव का कोप झेलना पड़ेगा।
30 करोड़ का शाही पलंग
एक अंग्रेज डिजाइनर ने दुनिया की सबसे महंगी पलंग का निर्माण किया है। जिसकी कीमत लगभग 30 करोड़ रुपए है। इस पलंग के निर्माता स्टुअर्ट ह्यूजेस कहते हैं कि उनकी यह हस्तनिर्मित बिस्तर सर्वोत्तम किस्म की लकड़ी से तराशी गई है। इस बहुमूल्य पलंग पर 24 कैरेट का 107 किलोग्राम सोना जड़ा है। हीरों से जडि़त इस पलंग में कई बहुमूल्य पत्थर भी लगे हैं। इसकी सजावट के लिए जो फैब्रिक इस्तेमाल हुआ है वह सर्वोत्तम किस्म का इटेलियन सिल्क है। कीमत को देखते हुए यह तो तय है कि इसमें इस्तेमाल की गई सभी वस्तुएं असली और गारंटेड है पर इस बिस्तर पर सोने वाले को भी इसमें सोने के बाद सुख की नींद आयेगी या नहीं इसकी तो बनाने वाला भी गारंटी नहीं दे सकता। फिर भी उम्मीद तो यही की जानी चाहिए कि इस शाही पलंग पर सो कर कोई भी अपने को राजा महसूस करेगा। नींद भले ही न आए।
छींककर सिर में लगी गोली निकाली
सिनेमा में बंदूक की गोली से अनेक प्रकार के करतब दिखाने का खेल तो सबने देखा होगा लेकिन अगर सचमुच में ऐसा हो तो क्या लोग दांतो तले उंगली दबाने को मजबूर नहीं होंगे। सुनने में यह भले ही अविश्वसनीय लगे लेकिन इटली के एक व्यक्ति ने अपने सिर में लगी गोली को अपनी छींक के द्वारा नाक से निकाल दिया।
डार्को सेंगरमानो नाम के एक 28 वर्षीय व्यक्ति को नए साल की पूर्वसंध्या पर एक पूजास्थल पर टहलते हुए सर में गोली लगी। गोली उसके सर के दाहिने हिस्से में लगने के बाद आंखों के छेद से होते हुए उसके नाक की नलिका में जाकर फंस गई। हालांकि इसके बावजूद भी डार्को गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ।
द डेली टेलिग्राफ की खबर के मुताबिक खून से लथपथ डार्को को अस्पताल ले जाया गया। लेकिन इससे पहले की डॉक्टर उसके सर में लगी गोली को बाहर निकालते उसने अपनी छींक द्वारा खुद ही गोली को बाहर निकाल दिया।

Jan 29, 2011

उदन्ती.com-जनवरी 2011

वर्ष 1, अंक 5, जनवरी 2011
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फूल चुन कर एकत्र करने के लिए मत ठहरो। आगे बढ़े चलो, तुम्हारे पथ में फूल निरंतर खिलते रहेंगे।
- रवींद्रनाथ ठाकुर
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अनकही: वो सुबह कभी तो आएगी...
यादें: टाइगर मैन: बिली अर्जन सिंह - कृष्ण कुमार मिश्र
एक पाती: पर्यावरण का शत्रु पॉलीथीन - दिव्या जैन
वाह भई वाह
मनोविज्ञान: मासूमियत का अंत - अजिता मेनन
पर्यावरण: खतरे में है सुंदरवन - नरेंद्र देवांगन
कविताएं: अनुभवों का शंखनाद - रश्मि प्रभा
भोर की पहली किरण - आशा भाटी
खुशी के फूल - डॉ. भावना कुंअर

संस्मरण: तन मन धन से समर्पित ... - द्वारिका प्रसाद शुक्ल
सेहत: अनार का जूस: चार हफ्ते में घटा सकता है... - उदंती फीचर्स
परदादा बनने की उम्र में पिता बनने का सुख
पिकासो के रोचक संस्मरण
लघु कथाएं: कागज की किश्तियां, रिश्ते - डॉ अशोक भाटिया
कहानी: डाची - उपेंद्रनाथ अश्क
किताबें: ठाकुर जगमोहन सिंह
व्यंग्य: हाय मेरी प्याज - राम किशन भंवर
वन्य जीवन: दुर्लभ काला तेन्दुआ, अलका ने रचा इतिहास
आपके पत्र/ मेल बाक्स
रंग बिरंगी दुनिया



वो सुबह कभी तो आएगी...

जब शाम को सूरज डूबता है तो चाहे वृद्ध हो या जवान, रईस हो या गरीब, स्वस्थ हो या बीमार प्रत्येक मनुष्य इस उम्मीद के साथ सोता है कि कल सुबह शुभ होगी। वर्ष 2010 (जिसकी एकमात्र पहचान भ्रष्टाचार के सर्वनाशी भयंकर ज्वालामुखी का फटना होगी) की आखिरी शाम को तो देश के अधिकांश आम नागरिकों की यह उम्मीद कई हजार और गुना बढ़ गई होगी। नववर्ष की सुबह आई, लेकिन हमारी उम्मीद पूरी नहीं हुई। भ्रष्टाचार के एक से एक ज्यादा शर्मनाक मामले उजागर होते ही जा रहे हैं।
आम नागरिक आज यही महसूस कर रहा है कि भ्रष्टाचार के मामले में पानी सर के ऊपर से बढ़ चुका है। इसलिए आइए जरा इस बात पर गौर करें कि भ्रष्टाचार इतना भयंकर प्रकोप कैसे बना? समस्या के मूल कारणों को समझने से ही समस्या का हल भी निकलता है।
लाल बहादुर शास्त्री के प्रधान मंत्रित्वकाल तक देश की राजनीति भी काफी कुछ हमारे समाज के पारंपरिक मूल्यों और आदर्शों के प्रति आस्थावान बनी रही। शास्त्रीजी की असामयिक मृत्यु एक युगांतकारी घटना थी- मूल्यवान राजनीति के युग का अंत। वंशवाद पर आधारित मूल्यविहीन राजनीति का प्रारंभ हुआ जिसमें पारंपरिक परिभाषाओं को तिलांजलि देकर नई परिभाषा गढ़ी गईं। चाहे जैसे भी हो, धनवान बनना सफलता का एकमात्र पैमाना बन गया। नेता के प्रति स्वामीभक्ति राजनीतिक प्रतिबद्धता की पर्याय बन गई और चापलूसी राजनीतिक कौशल का प्रमाण। ऐसे माहौल में देश मेंकानून का राज्य होने के बजाय निरंकुशता शासन का मूलमंत्र बन गई जिसकी परिणति 1975 के आपातकाल में हुई जो सदैव ही हमारे इतिहास का काला अध्याय रहेगा।
आपातकाल तक के सात- आठ वर्षों में परिवारवाद से प्रेरित राजनीति का स्पष्ट संदेश था कि शासन तंत्र में सत्तासीन होने का मतलब था धनवान बनने का अवसर। अधिकांश राजनेता और सरकारी अधिकारी तथा कर्मचारी अपने को कानून से ऊपर मानते हुए भ्रष्टाचार के माध्यम से धन और संपत्ति लूटने में जुट गए। माले मुफ्त, दिले बेरहम। यहां तक कि सत्ता के सर्वोच्च पद पर आसीन परिवार से जुड़े योगी ब्रम्हचारी तक मर्सिडीज कार, वायुयान और एक बंदूक के कारखाने के मालिक बन गए।
केंद्र से प्रेरित होकर उत्तरप्रदेश, बिहार तथा अन्य प्रदेशों में भी परिवारवाद से प्रायोजित क्षेत्रीय दलों का उद्गम हुआ और उन्होंने भी राजनीति को भ्रष्टाचार से धनवान बनने का माध्यम बनाया। इस प्रकार के कुशासन में अपहरण जैसे संगीन अपराध उद्योग बन गए और डकैती तथा हत्या में लिप्त अपराधी बड़ी संख्या में राजनीतिक दलों का चोला पहनकर विधानसभाओं और संसद के सदस्य बन कर सत्ता के उच्च स्तरों पर कब्जा करने लगे। संसद में बहुमत सिद्ध करने के लिए सदस्यों की खरीद फरोक्त होने लगी। स्वाभाविक था कि पिछले दो दशकों में भ्रष्टाचार का पैमाना बोफोर्स सौदे के 64 करोड़ रुपयों से बढ़कर आज कामनवेल्थ गेम्स और 2जी स्पेक्ट्रम के हजारों, लाखों करोड़ रुपए तक जा पहुंचा।
भ्रष्टाचार में अत्यंत तीव्र गति से वृद्धि पिछले पांच- छह वर्षों में हुई है। आज यह इतना विकराल रूप ले चुका है कि न्याय प्रणाली, सेना और मीडिया भी इसके प्रकोप से ग्रसित हंै। इसका मुख्य कारण है पिछले पांच-छह वर्षों में केंद्र में शासन व्यवस्था से शर्मनाक खिलवाड़। जिसके चलते शासन की पूरी शक्ति ऐसे व्यक्ति के हाथों में है जिसकी संसद या जनता के प्रति कोई जवाबदारी नहीं है। इसके विपरीत शासन के उच्चतम संवैधानिक पद पर बैठाए गए व्यक्ति के पास अपनी कैबिनेट के किसी मंत्री को टोकने की भी शक्ति नहीं है। परिणाम है कैबिनेट के सभी मंत्री मनमानी करने में लगे हैं।
भ्रष्टाचार को समर्पित इसी कुशासन का परिणाम है कि देश की जनता दमघोंटू महंगाई से त्रस्त कराह रही है। नक्सलवाद पनप रहा है और आतंकवाद की काली छाया पसरी हुई है।
प्रश्न है कि इस विकराल समस्या से निदान कैसे मिलेगा! भ्रष्टाचार से निपटने का तरीका भी आम आदमी के हाथ में होता है। क्योंकि भ्रष्टाचार सिर्फ आम आदमी को ही सताता है। अभी हाल में आम आदमी ने बिहार में भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार किया है। बिहार के चुनाव में आम आदमी ने ऐसे व्यक्तियों को शासन के लिए चुना है जो हमारे पारंपरिक मूल्यों से अपना जीवन अनुशासित करते हैं। बिहार में आम आदमी ने वंशवाद की राजनीति करने वाले भ्रष्टाचारी नेताओं को धूल चटा दी। बिहार में सत्तासीन नेताओं ने भ्रष्टाचार के लिए दंडित सरकारी कर्मचारियों की सम्पत्ति जब्त करने का कानून बना कर पूरे देश को भ्रष्टाचार से निपटने का एक कारगर तरीका दिखाया है। प्रसन्नता की बात है कि मध्य प्रदेश सरकार भी ऐसा ही कानून बनाने जा रही है। देश की अन्य सरकारों को भी इसका अनुकरण करना चाहिए।
प्रसन्नता की बात है कि वर्ष के प्रथम सप्ताह में सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने स्वीकार किया कि आपातकाल में सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय कि आपातकाल में नागरिकों के मूलभूत अधिकार निष्क्रिय रहेंगे गलत था। वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय से आम नागरिकों को नववर्ष की शुभकामनाएं दी हैं।
हम अपने पारंपरिक मूल्यों का पालन करके ही भ्रष्टाचार से मुक्ति पा सकते हैं। हमारे पारंपरिक मूल्यों के अनुसार जीवन में सफल होने से ज्यादा महत्वपूर्ण है सफलता पाने का साधन। अतएव आइए हम सब लोग संकल्प लें कि सिर्फ ईमानदार व्यक्तियों को ही अपना वोट देंगे। इस प्रकार हम भ्रष्टाचार से मुक्त सुबह को संभव बनाने में कारगर प्रयत्न करेंगे।
सुधी पाठकों को नववर्ष की शुभकामनाएं।
- डॉ. रत्ना वर्मा

टाइगर मैन बिली अर्जन सिंह

- कृष्ण कुमार मिश्र
टाइगर हैवन के बरामदे में पड़ी अठारहवीं सदी की विक्टोरियन कुर्सी पर बैठे बिली अर्जन सिंह मुझे हमेशा पढ़ते हुए मिले, आस- पास तमाम मेजों पर ढोरों देशी- विदेशी किताबें व पत्रिकाएं। जंगल के मध्य एक बेहद जीवन्त व खूबसूरत बसेरा बाघों एवं मनुष्य दोनों का। यह आदमी और जानवर के मध्य सहजीविता का अद्भुत नमूना था, पर अब न ही वहां विक्टोरियन फर्नीचर है और न किताबें, यदि कुछ बचा हुआ दिखाई देता है तो टाइगर हैवन की दीवारों पर लगी 'काई' जिसे इस बार की आई भीषण बाढ़ अपने साथ वापस ले जाना भूल गयी, या यूं कह लेंं कि सुहेली नदी व जंगल को यह मालूम हो चुका था कि अब उनका रखवाला उनसे अलविदा कहने वाला है! हमेशा के लिए। इसीलिए उस रोज टाइगर हैवन खण्डहर सा बस धराशाही होने को तैयार दिखाई दे रहा था, और सुहेली ठहरी हुई नजर आ रही थी।
बिली जवानी के दिनों में यह जगह कभी नहीं छोड़ते थे, चाहे जितनी बारिश हो, फिर उस वक्त सुहेली में गाद (सिल्ट) भी नहीं थी। पर उम्र बढऩे की साथ- साथ सुहेली में सिल्ट बढ़ती गयी, हर बारिश में दुधवा व टाइगर हैवन दोनों जल-मग्न होने लगे, नतीजतन बिली बरसात के चार महीने जसवीन नगर फार्म पर बिताने लगे और टाइगर हैवन से पानी निकल जाने पर फिर अपने प्रिय स्थान पर वापस लौट आते अपनी किताबों के साथ।
लेकिन इस बार बाढ़ के चले जाने के बाद भी अब बिली कभी नही लौटेगें, यही नियति है इस स्थान की। बिली की उम्र के साथ ही टाइगर हैवन ने भी अपनी जिन्दगी पूरी कर ली। जहां इस इमारत में आजकल आतिश- दान में आग जलती थी, बिली के प्रिय तेन्दुओं व बाघिन तारा और कपूरथला के राज-परिवार की तस्वीरें लगी थीं, कमरों में पुस्तकें समाती नहीं थी, वहां अब सब कुछ वीरान हैं। अगर कुछ है तो बाढ़ के द्वारा छोड़े गये वीभत्स निशान।
गत वर्ष बिली की तबियत खराब होने के बावजूद वो बाढ़ गुजर जाने के बाद दो बार यहां आये, और कहा कि लगता है, मेरे साथ ही टाइगर हैवन भी नष्ट हो जायेगा! ... नियति की मर्जी वह इस वर्ष यहां नहीं लौट पाये... अब यह जगह की अपनी कोई तकदीर नहीं है जिसके हवाले से इसके वजूद को स्वीकारा जा सके।
मेरी कुछ स्मृतियां हैं उस महात्मा के सानिध्य की जिनका जिक्र जरूरी किन्तु भावुक कर देने वाला है। वो हमेशा नींबू पानी पिलाते। दुधवा और उसके बाघों को कैसे सुरक्षित रखा जाय बस यही एक मात्र उनकी चिन्ता होती। दुधवा के वनों की जीवन रेखा सुहेली नदी की बढ़ती सिल्ट को लेकर एक विचार था उनका कि सुहेली कतरनिया घाट वाइल्ड लाइफ सैक्चुरी में बह रही गिरवा नदी से जोड़ दिया जाय। इससे दो फायदे थे, एक कि दुधवा में आती बाढ़ पर नियन्त्रण और दूसरा दुधवा में गैन्जेटिक डाल्फिन एवं घडिय़ाल की आमद हो जाना।
चूंकि अभी तक दुधवा टाइगर रिजर्व में ये दोनों प्रजातियां नहीं हैं जबकि कतरनियां घाट डाल्फिन और घडिय़ाल की वजह से आकर्षण का केन्द्र है। साथ ही इन प्रजातियों के आवास को भी विस्तार मिल सके, यही ख्वाहिश थी बिली की।
बिली अर्जन सिंह से मेरी पहली मुलाकात 1999 में हुई, इसी वक्त मंैने जन्तुविज्ञान में एम.एस.सी करने की बाद वन्य जीवों पर पी.एचडी. करने का निर्णय किया। बिली से मैं अपने परिचय का श्रेय दुधवा के प्रथम निदेशक रामलखन सिंह को दूंगा, क्योंकि इन्हीं की एक आलोचनात्मक पुस्तक 'दुधवा के बाघों में आनुवंशिक प्रदूषण' पढऩे के बाद हुई। पहली मुलाकात में बिली से जब इस पुस्तक की चर्चा की तो उन्होंने कहा क्या तुमने मेरी किताबें नहीं पढ़ी। बाद में स्वयं बरामदे से लाइब्रेरी तक जाते और तमाम पुस्तके लाते और फिर कहते देखो यह पढ़ो। फिर ये सिलसिला अनवरत जारी रहा। मैंने बिली साहब की किताबों से दुधवा के अतीत को देखा सुना, और यहीं से मैंने बिली को अपना आदर्श मान लिया, नतीजा ये हुआ कि मैं एक शोधार्थी से एक्टीविस्ट बन गया, अब वन्य- जीवों के लिए लड़ाई लड़ता हूं।
92 वर्ष की आयु में इस महात्मा ने नववर्ष 2010 के प्रथम दिवस को अपने प्राण त्याग दिये। मगर आज इनके जीवों व जंगलों के प्रति किये गये महान कार्य समाज को सुन्दर संदेश देते रहेंगे एक दिगन्तर की तरह।
बिली के पिता जसवीर सिंह, दादा राजा हरनाम सिंह, परदादा महाराजा रणधीर सिंह थे जिन्होंने 1830 से लेकर 1870 ई. तक कपूरथला पर स्वतंत्र राज्य किया। महाराजा रणधीर सिंह को गदर के दौरान अंग्रेजों की मदद करने के कारण खीरी और बहराइच में तकरीबन 700 मील की जमीन रिवार्ड में मिली थी।
15 अगस्त 1917 को गोरखपुर में जन्में बिली कपूरथला रियासत के राजकुमार थे। इनका बिली नाम इनकी बुआ राजकुमारी अमृत कौर ने रखा था जो महात्मा गांधी की सचिव व नेहरू सरकार में प्रथम महिला स्वास्थ्य मंत्री रहीं, आप की शिक्षा- दीक्षा ब्रिटिश- राज में हुई, राज-परिवार व एक बड़े अफसर के पुत्र होने के कारण आप ने ऊंचे दर्जे का इल्म हासिल किया और ब्रिटिश- भारतीय सेना में भर्ती हो गये, द्वितीय विश्व- युद्ध के बाद इन्होंने खीरी के जंगलों को अपना बसेरा बनाना सुनिश्चित कर लिया। पूर्व में इनकी रियासत की तमाम संपत्तियां खीरी व बहराइच में थी जिन्हें अंग्रेजों ने इनके पुरखों को रिवार्ड के तौर पर दी थी। चूंकि बलरामपुर रियासत में इनके पिता को बरतानिया हुकूमत ने कोर्ट- आफ- वार्ड नियुक्त किया था, सो इनका बचपन बलरामपुर की रियासत में गुजरा। बलरामपुर के जंगलों में इनके शिकार के किस्से मशहूर रहे और 12 वर्ष की आयु में ही इन्होंने बाघ का शिकार किया।
1960 में बिली की जीप के सामने एक तेन्दुआ गुजरा अंधेंरी रात में जीप- लाइट में उसकी सुन्दरता ने बिली का मन मोह लिया, ये प्रकृति की सुन्दरता थी जिसे अर्जन सिंह ने महसूस किया। इसी वक्त उन्होंने शिकार को तिलांजलि दे दी।
1969 में यह जंगल बिली ने खरीद लिया, जिसके दक्षिण- उत्तर में सरिताएं और पश्चिम- पूर्व में घने वन। इसी स्थान पर रह कर इन्होंने दुधवा के जंगलों की अवैतनिक वन्य-जीव प्रतिपालक की तरह सेवा की।
बिली हमेशा कहते रहे कि जो जंगल अंग्रेज हमें दे गये कम से कम उन्हें तो बचा ही लेना चाहिए। क्योंकि आजादी के बाद वनों के और खासतौर से साखू के वनों का रीजनरेशन कराने में हम फिसड्डी रहे हैं। वे कहते रहे की फारेस्ट डिपार्टमेन्ट से वाइल्ड- लाइफ को अलग कर अलग विभाग बनाया जाय, वाइल्ड- लाइफ डिपार्टमेन्ट।
बाघों के लिए अधिक संरक्षित क्षेत्रों की उनकी ख्वाहिश के कारण ही किशनपुर वन्य-जीव विहार का वजूद में आना हुआ उनके निरन्तर प्रयासों से 1977 में दुधवा नेशनल पार्क बना और फिर टाइगर प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई, और इस प्रोजेक्ट के तहत 1988 में दुधवा नेशनल पार्क और किशनपुर वन्य जीव विहार मिलाकर दुधवा टाइगर रिजर्व की स्थापना कर दी गयी। टाइगर हैवन से सटे सठियाना रेन्ज के जंगलों में बारहसिंहा के आवास हैं जिसे संरक्षित करवाने में बिली का योगदान विस्मरणीय है। जो अब दुधवा टाइगर रिजर्व का एक हिस्सा है।
जंगल को अपनी संपत्ति की तरह स्नेह करने वाले इस व्यक्ति ने अविवाहित रहकर अपना पूरा जीवन इन जंगलों और उनमें रहने वाले जानवरों के लिए समर्पित कर दिया।
टाइगर हैवन की अपनी एक विशेषता थी कि यहां तेन्दुए, कुत्ते और बाघ एक साथ खेलते थे। बिली की एक कुतिया जिसे वह इली के नाम से बुलाते थे, यह कुतिया कुछ मजदूरों के साथ भटक कर टाइगर हैवन की तरफ आ गयी थी, बीमार और विस्मित! बिली ने इसे अपने पास रख लिया, यह कुतिया बिली के तेन्दुओं जूलिएट और हैरियट पर अपना हुक्म चलाती थी और यह जानवर जिसका प्राकृतिक शिकार है कुत्ता इस कुतिया की संरक्षता स्वीकारते थे। और इससे भी अद्भुत बात है, तारा का यहां होना जो बाघिन थी, बाघ जो अपने क्षेत्र में किसी दूसरे बाघ की उपस्थित को बर्दाश्त नहीं कर सकता, तेन्दुए की तो मजाल ही क्या। किन्तु बिली के इस घर में ये तीनों परस्पर विरोधी प्रजातियां जिस समन्वय व प्रेम के साथ रहती थी, उससे प्रकृति के नियम बदलते नजर आ रहे थे।
विश्व प्रकृति निधि की संस्थापक ट्रस्टी व वन्य- जीव विशेषज्ञ श्रीमती एन राइट ने बिली को पहला तेन्दुआ शावक दिया, ये शावक अपनी मां को किसी शिकारी की वजह से खो चुका था, लेकिन श्रीमती राइट ने इसके अनाथ होने की नियति को बदल दिया, बिली को सौंप कर।
भारत सरकार ने उन्हें 1975 में पद्म श्री, 2006 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। वैश्विक संस्था विश्व प्रकृति निधि ने उन्हें गोल्ड मैडल से सम्मानित किया। 2003 में सेंचुरी लाइफ- टाइम अवार्ड से नवाजा गया। 2005 में नोबल पुरूस्कार की प्रतिष्ठा वाला पाल गेटी अवार्ड दिया गया जिसकी पुरस्कार राशि एक करोड़ रुपये है। यह पुरस्कार 2005 में दो लोगों को संयुक्त रूप में दिया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इसी वर्ष 2007 में बिली अर्जन सिंह को यश भारती से सम्मानित किया। इतने पुरस्कारों के मिलने पर जब भी मंैने उन्हें शुभकामनायें दी, तो एक ही जवाब मिला के पुरस्कारों से क्या मेरी उम्र बढ़ जायेगी, कुछ करना है तो दुधवा और उनके बाघों के लिए करें ये लोग।
प्रिन्स, जूलिएट, हैरिएट तीन तेन्दुए थे जिन्हें बिली ने टाइगर हैवन में प्रशिक्षित किया और दुधवा के जंगलों में पुनर्वासित किया। बाघ व तेन्दुओं के शावकों को ट्रेंड कर उन्हें उनके प्राकृतिक आवास यानी जंगल में सफलता पूर्वक पुनर्वासित करने का जो कार्य बिली अर्जन सिंह ने किया वह अद्वितीय है पूरे संसार में। बाद में इंग्लैड के चिडिय़ाघर से लाई गयी बाघिन तारा भी दुधवा के वनों को अपना बसेरा बनाने में सफल हुई। इसका नतीजा हैं तारा की पीढिय़ां जो दुधवा के वनों में फल- फूल रही हैं। बिली की तेन्दुओं व बाघों के साथ तमाम फिल्में बनाई गयी जिनका प्रसारण डिस्कवरी आदि पर होता रहता है।
कुछ लोगों ने बिली पर तारा के साइबेरियन या अन्य नस्लों का मिला- जुला होना बताकर बदनाम करने की कोशिश की और इसे नाम दिया 'आनुवंशिक प्रदूषण' जबकि आनुवांशिक विज्ञान के मुताबिक भौगोलिक सीमाओं व विभिन्न वातावरणीय क्षेत्रों में रहने वाली जातियों का आपस में संबंध हानिकारक नहीं होता है बल्कि बेहतर होता हैं।
बिली अपने मकसदों में हमेशा कामयाब रहे एक बहादुर योद्धा की तरह और उसी का नतीजा है भारत का दुधवा टाइगर रिजर्व। बाघों और तेन्दुओं के साथ खेलने वाला यह लौह पुरूष अब हमारे बीच नहीं है। पर उनकी यादें है जो हमें प्रेरणा देती रहेंगी।
आज मैं इतना जरूर कहूंगा कि दुधवा टाइगर रिजर्व जो कर्मस्थली थी बिली की उसका नाम बिली अर्जन सिंह टाइगर रिजर्व कर दिया जाय यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी बिली साहब को। क्योंकि जब एक अंग्रेज यानी जिम कार्बेट के नाम पर आजाद भारत में हेली नेशनल पार्क तब्दील होकर जिम कार्बेट नेशनल पार्क हो सकता है तो बिली अर्जन सिंह के नाम से क्यों नहीं। भारत में वन्य जीव संरक्षण में और खासतौर से बाघ संरक्षण के क्षेत्र में बिली अर्जन सिंह के कद का कोई व्यक्ति न तो कभी हुआ और न ही मौजूदा समय में है।
दो वर्षों से आ रही भयानक बाढ़ ने दुधवा के वनों व टाइगर हैवन को क्षतिग्रस्त करना शुरू कर दिया है यदि जल्दी कोई हल न निकाला गया तो बिली का यह घर जो अब स्मारक है के साथ- साथ हमारी अमूल्य प्राकृतिक संपदा भी नष्ट हो जायेगी। बिली अर्जन सिंह के संघर्षों का नतीजा है दुधवा टाइगर रिजर्व और टाइगर हैवन, और इन दोनों को सहेजना अब हमारी जिम्मेदारी।का मिला- जुला होना बताकर बदनाम करने की कोशिश की और इसे नाम दिया 'आनुवंशिक प्रदूषण' जबकि आनुवांशिक विज्ञान के मुताबिक भौगोलिक सीमाओं व विभिन्न वातावरणीय क्षेत्रों में रहने वाली जातियों का आपस में संबंध हानिकारक नहीं होता है बल्कि बेहतर होता हैं।
बिली अपने मकसदों में हमेशा कामयाब रहे एक बहादुर योद्धा की तरह और उसी का नतीजा है भारत का दुधवा टाइगर रिजर्व। बाघों और तेन्दुओं के साथ खेलने वाला यह लौह पुरूष अब हमारे बीच नहीं है। पर उनकी यादें है जो हमें प्रेरणा देती रहेंगी।
आज मैं इतना जरूर कहूंगा कि दुधवा टाइगर रिजर्व जो कर्मस्थली थी बिली की उसका नाम बिली अर्जन सिंह टाइगर रिजर्व कर दिया जाय यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी बिली साहब को। क्योंकि जब एक अंग्रेज यानी जिम कार्बेट के नाम पर आजाद भारत में हेली नेशनल पार्क तब्दील होकर जिम कार्बेट नेशनल पार्क हो सकता है तो बिली अर्जन सिंह के नाम से क्यों नहीं। भारत में वन्य जीव संरक्षण में और खासतौर से बाघ संरक्षण के क्षेत्र में बिली अर्जन सिंह के कद का कोई व्यक्ति न तो कभी हुआ और न ही मौजूदा समय में है।
दो वर्षों से आ रही भयानक बाढ़ ने दुधवा के वनों व टाइगर हैवन को क्षतिग्रस्त करना शुरू कर दिया है यदि जल्दी कोई हल न निकाला गया तो बिली का यह घर जो अब स्मारक है के साथ- साथ हमारी अमूल्य प्राकृतिक संपदा भी नष्ट हो जायेगी। बिली अर्जन सिंह के संघर्षों का नतीजा है दुधवा टाइगर रिजर्व और टाइगर हैवन, और इन दोनों को सहेजना अब हमारी जिम्मेदारी।
उनकी किताबें
जिम कार्बेट और एफ. डब्ल्यू. चैम्पियन से प्रभावित बिली अर्जन सिंह ने आठ पुस्तकें लिखी जो उत्तर भारत की इस वन-श्रृंखला का बेहतरीन लेखा- जोखा है।
इन जंगलों और इनमें रहने वाली प्रकृति की सुन्दर कृतियों को देखने और जानने का बेहतर तरीका है उनकी किताबें जिनके शब्द उनके अद्भुत व साहसिक कर्मों का प्रतिफल है।
1-तारा- ए टाइग्रेस
2-टाइगर हैवन
3-प्रिन्स आफ कैट्स
4-द लीजेन्ड आफ द मैन-ईटर
5-इली एन्ड बिग कैट्स
6-ए टाइगर स्टोरी
7-वाचिंग इंडियाज वाइल्ड लाइफ
8-टाइगर! टाइगर।
पता: 77, कैनाल रोड, शिव कालोनी, लखीमपुर खीरी- 262701 (उ.प्र.)
Email: dudhwalive@live.com, www.dudhwalive.com


पर्यावरण का शत्रु पॉलीथीन

- दिव्या जैन

गृहणियां पॉलीथीन की थैलियों का उपयोग के बाद इनमें ही घर का कूड़ा करकट बची हुई सब्जियां, बचा हुआ अन्न व अन्य खाद्य सामग्री भर कर इसमें गां लगाकर खुले में, सड़क पर, नालियों में या कचरे के ढेर में फेंक देती हैं। बात यहां समाप्त नहीं होती बल्कि प्रारम्भ होती है।
प्यारे देशवासियों, पर्यावरण प्रेमियों, गौ भक्तों को दिव्या जैन का जय जिनेन्द्र। मैं इस पत्र के माध्यम से समस्त भारतवासियों का ध्यान आकृष्ट कर उनको सम्पूर्ण देश के लिए, देश के पर्यावरण के लिए व गाय माता के लिए नुकसान का कारण बन रहे पॉलीथीन की थैलियों की तरफ ले जाना चाह रही हूं। यह मैं इसलिए कर रही हूं कि मैंने पॉलीथीन से हुए नुकसान को नजदीक से देखा है।
विज्ञान ने मानव को प्रगति के पथ पर आगे बढऩे के असीम अवसर दिए हैं, लेकिन मनुष्य ने बिना कुछ सोचे समझे ही विज्ञान के माध्यम से रोजमर्रा के कुछ ऐसे साधन पैदा कर दिए हंै जो मनुष्य के साथ- साथ पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक सिद्ध हो रहे हंै। उनमें से एक है- पॉलीथीन।
पॉलीथीन कागज, कपड़े या गत्ते की तरह गलता नहीं है। आज पॉलीथीन ने मानव जीवन में अच्छी खासी पैठ बना ली है, या कहें कि इसने हमें अपना गुलाम बना लिया है। व्यावसायिक मार्केट हो या सब्जी मंडी सभी के हाथों में पॉलीथीन की थैलियां नजर आ जाती हंै। आज लोग कपड़े या जूट का थैला लेकर चलने में शर्म महसूस करते हैं और घर से बाजार हाथ हिलाते जाना पसन्द करते हैं।
जबकि हम सभी जानते हैं कि पॉलीथीन की थैलियां हमारे लिए बहुत नुकसानदायक है। ये जमीन में जाकर उसके उपजाऊपन को नष्ट करती है। नदी नालों में जाकर उसके बहाव को रोककर गन्दगी व बीमारी का कारण बनती है कई बार महामारी का कारण भी बनती है। नदी, तालाब, नालों व धरती पर इसकी परत बिछ जाने से जमीन के भीतर जल नहीं पहुंच पाता। इस तरह ये पेड़ पौधों को पनपने नहीं देती। आज जहां कहीं भी जमीन को खोदकर देखें तो वहां पॉलीथीन की थैलियां ही थैलियां मिलेंगी। पॉलीथीन क्योंकि गल कर नष्ट होने वाली वस्तु नहीं है, बस जमती ही जाती है। इसे जलाने पर विषाक्त गैस पैदा होती है जो पर्यावरण के साथ- साथ मनुष्य के लिए भी खतरनाक है। पॉलीस्टरीन नामक प्लास्टिक को जलाने से क्लोरोफ्लोरो कार्बन बाहर आते हैं, जो जीवन रक्षक ओजोन कवच को नष्ट कर देते हैं।
पॉलीथीन से सीवर लाईन के चोक होने की कई घटनाएं भी हुई हैं। सन् 1998 में मुम्बई में सीवर नेटवर्क चोक हो गया और उसने कृत्रिम बाढ़ का रूप धारण कर लिया जो सिर्फ पॉलीथीन थैलियों के कारण हुआ। मंैने स्वयं पॉलीथीन के नुकसान को देखा है, आज से दो वर्ष पूर्व जब मैं अपने ननिहाल व दादाजी के घर (कोटा) गर्मियों की छुट्टियों में गई थी, तब मुझे पता चला कि एक गाय की मृत्यु पॉलीथीन की थैलियों के कारण हुई है, तो मैं हैरान रह गई कि पॉलिथीन इतना नुकसानदायक भी हो सकता है। मुझे इससे बहुत दु:ख हुआ, मेरे लिए यह असहनीय था लेकिन इस घटना ने मुझे प्रेरित किया कि मैं पॉलीथीन के विरोध में काम करूं।
दरअसल होता यह है कि गृहणियां पॉलीथीन की थैलियों का उपयोग के बाद इनमें ही घर का कूड़ा करकट बची हुई सब्जियां, बचा हुआ अन्न व अन्य खाद्य सामग्री भर कर इसमें गांठ लगाकर खुले में, सड़क पर, नालियों में या कचरे के ढेर में फेंक देती हंै। बात यहां समाप्त नहीं होती बल्कि प्रारम्भ होती है। खुले में घूमते मवेशी विशेषकर गाय जिसे हम माता, बल्कि माता से भी बढ़कर मानते हंै वे भोजन की खुशबू से आकर्षित होकर थैली की गांठ को खोलना चाहती हैं लेकिन खोल नहीं पातीं अन्त में वह भोजन सामग्री को थैली समेत खा जाती हैं। उनके पेट में धीरे- धीरे यह थैलियां जमा होती जाती हंै क्योंकि पॉलीथीन का किसी तरह पाचन सम्भव नहीं है अत: अधिक मात्रा में पेट में जमा पॉलीथीन उनके शरीर में बीमारियां पैदा कर देती है और उनका हाजमा खराब कर देती है इस तरह उनको मौत की नींद सोना पड़ता है। कितनी खतरनाक मौत होती है उस निरीह की...।
पशु चिकित्सकों के सामने यह समस्या रहती है कि कोई भी ऐसी दवाई नहीं है जो पशुओं के पेट में जमा पॉलीथीन को पचा सके या बाहर निकाल सके। इस तरह पॉलीथीन पशुओं के लिए चलता- फिरता कत्लखाना है और हम हैं कि इससे बेखबर होकर मवेशियों को मौत के मुंह में भेज रहे हैं।
यहां मैं आपको यह भी बताना चाहूंगी कि अगर पॉलीथीन या कचरा निकालने के लिए पशुओं के पेट का ऑपरेशन कराया जाए तो उसमें बहुत अधिक खर्चा आता है तथा 3 घण्टे से भी अधिक समय लगता है साथ ही उसे ठीक होने में लगभग 45 दिन लगते हैं। ऐसा कौन व्यक्ति है जो यह सब कुछ कर सके। मजबूरन पशु को... मरना पड़ता है।
मैं यहां कहना चाहूंगी कि लोग गाय को बचाने के नाम पर बड़े- बड़े कार्य करते हैं, कोई कानून बनाने की बात करता है, कोई रैली निकालता है। यह सब वे करें अच्छी बात है इससे चेतना आती है, पर क्या यह हमारा दायित्व नहीं है कि हम गायों की मौत का कारण बन रहे पॉलीथीन की थैलियों के उपयोग को बन्द कर दें। पॉलीथीन को खुले में, उसमें भोजन सामग्री बांध कर नहीं फेंके। अगर हम ऐसा कर पाएं तो बेमौत मर रहे इन पशुओं पर हमारा बहुत बड़ा उपकार होगा।
इस विषय में सरकार कानून बना दे तब भी हम सबका इसके प्रति जागरूक होना जरूरी है। हम डर से नहीं बल्कि विवेक के आधार पर इनका पालन करें। अत: मेरा यह निवेदन है कि आप सब पॉलीथीन के दुष्प्रभाव को समझें और इसके उपयोग को बन्द करें, इसके स्थान पर कागज या कपड़े के बने हुए बैग का उपयोग करते हुए पर्यावरण संरक्षण में भागीदार बनें और ऐसा करने में शर्म नहीं बल्कि गर्व का अनुभव करें। इसे अपनी परम्परा व संस्कृति का हिस्सा मानें।
इसके साथ ही मैं प्लास्टिक के बने खिलौनों की बात भी करना चाहती हूं। 'सैंटर फॉर संाइस एण्ड एनवायरमेंट' (सी.एस.ई.) का ताजा अध्ययन बताता है कि भारतीय बाजारमें बिक रहे अधिकांश खिलौनों में थैलेट नामक रसायन पाया जाता है। सीएसई ने प्रमुख ब्रांड्स के 24 खिलौनों के नमूने जांच करवाएं, इसमें 15 सॉफ्ट टॉयज व 9 हार्ड टॉयज थे। जांच में सामने आया कि सभी में एक या एक से अधिक तरह के थैलेट्स नामक रसायन थे जो कि किसी न किसी तरह से छोटे- छोटे बच्चों में अनेक तरह की बीमारियों का कारण बन रहे हैं, जिसमें अस्थमा, गुर्दा, एलर्जी, प्रजनन सम्बन्धी बीमारियां प्रमुख हैं। यह सब बताने के पीछे मेरा मकसद यह है कि हम पॉलीथीन व प्लास्टिक के दुष्प्रभाव को समझें। हम सस्ते, सुन्दर व सुलभ के चक्कर में इनका उपयोग करके स्वयं के साथ- साथ सम्पूर्ण देश के पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं।
आइए हम आज से ही नई शुरूआत करें, जागें व जगाएं। अभी नहीं तो कभी नहीं, कागज व कपड़े की संस्कृति की तरफ पुन: लौटें और ऐसा करने में गर्व का अनुभव करें। मैं तो यह भी कहूंगी कि सरकार को तुरन्त नियम बनाना चाहिए कि प्रत्येक कर्मचारी रोजाना हाथ में कपड़े का थैला लेकर कार्यालय व बाजार जाए और उस पर यह भी लिखवाए कि- 'पॉलीथीन पर्यावरण का शत्रु है।'
मैंने ऐसा किया है आप भी करें क्योंकि यह हम सब का दायित्व भी है। हम जिस धरती पर रहते हंै उसके प्रति हमारी भी कुछ जिम्मेदारी बनती है।
मैं अन्त में यह भी कहूंगी कि हमने अब तक पॉलीथीन की थैलियों को उपयोग में लेकर पर्यावरण को बहुत अधिक नुकसान पहुंचाया है। उस गलती को सुधारें और उसके लिए वृक्षारोपण करें, मात्र पौधे ही नहीं लगाए बल्कि उसकी रक्षा का भी संकल्प लें, उसे पुत्र के समान पालें, बड़ा करें बाद में वह पौधा बड़ा वृक्ष बनकर हमें व हमारी पीढिय़ों को इतना कुछ देगा जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होगी।
आओ- आओ हम पेड़ लगाएं
छोटा नन्हा पेड़ लगाएं
अखबारों में नहीं, जमीन पर लगाएं
छोटा नन्हा पेड़ लगाएं
हजारों नहीं सिर्फ एक पेड़ लगाएं
छोटा नन्हा पेड़ लगाएं
रिकार्ड के लिए नहीं हमारे स्वयं के लिए
छोटा नन्हा पेड़ लगाएं।
मेरे बारे में ...
अपने जीवन में घटित घटना से प्रेरित होकर विगत लगभग 2 वर्षों से पॉलीथीन मुक्ति अभियान चला रही चित्तौडग़ढ़ शहर की रहने वाली 10 वर्षीय नन्ही बालिका दिव्या जैन का प्रयास, लगन, निष्ठा और हौसले की मिसाल है। राज्य सरकार ने जब 1 अगस्त 2010 से राज्य में पॉलीथीन पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया तो इस नन्ही बालिका ने राजस्थान के कई जिलों व कस्बों में घूम- घूम कर पॉलीथीन की थैलियों के दुष्प्रभाव की जानकारी दी और कपड़े की थैलियां बाटकर शपथ पत्र भरवाया। वह राज्य सरकार के निर्णय से काफी प्रसन्न है क्योंकि अपने मिशन के लिये लगातार प्रयासरत रही दिव्या को सफलता मिली है। दिव्या को उसके द्वारा लगातार किये जा रहे प्रयासों के लिये कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है तथा प्रशस्ति पत्र भी प्राप्त हुए हैं। दिव्या कहती है- 'मेरे लिये यह खेल या मजाक नहीं बल्कि एक मिशन है, जिसमें मैं कामयाब रहूंगी'
पता- मकान नं.-59, सेक्टर-4 गांधीनगर, चित्तौडगढ़- 312001 (राजस्थान) मो. 9214963491
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