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Jun 1, 2024

किताबेंः साहित्य की गहनतम अनुभूतियों का रसपान कराती पुस्तक

-  डॉ. सुरंगमा यादव

संवेदना एवं अभिव्यक्ति (विमर्श ) : प्रथम संस्करण: 2024, मूल्य: 280 रुपये (सज़िल्द), पृष्ठ: 104, प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे- 19/ 139, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली - 110059

भूमिका पुस्तक का दर्पण होती है,जिसमें पुस्तक का मुखड़ा प्रतिबिंबित होता है। किसी पुस्तक में भूमिका के दो रूप देखे जा सकते हैः पहला, रचनाकार द्वारा व्यक्त किए गए स्वयं के उद्गार; दूसराः किसी अन्य साहित्यकार, स्नेही या आत्मीय जन द्वारा लिखी गयी भूमिका। इसमें शुभेच्छा का भाव प्रमुख होता है। भूमिका पुस्तक प्रकाशन से पूर्व अस्तित्त्व में आती है जिसमें पुस्तक की उन विशेषताओं तथा अंशों को उजागर किया जाता है, जिसे पढ़कर पाठक में पुस्तक पढ़ने की जिज्ञासा उत्पन्न हो सके।

समीक्षा पुस्तक प्रकाशन के पश्चात् लिखी जाती है। समीक्षक तटस्थ भाव से पुस्तक की विशेषताओं तथा कमजोर पक्षों को रेखांकित करता है। विषय- विस्तार, भाषा- शैली, संप्रेषण, सामाजिक सरोकार आदि को दृष्टिगत रखकर समीक्षक कृति की परख करता है। समीक्षा पाठक के मस्तिष्क पर रचना की रेटिंग- सी कर देती है।

रामेश्वर कांबोज ‘हिमांशु’ जी का लेखन- फलक बहुत विस्तृत है।  गद्य और और पद्य साहित्य की विविध विधाओं के साथ- साथ बाल कविताओं तथा  पाठ्य पुस्तकों की रचना भी आपने की है। आप न केवल एक  सहृदय साहित्यकार हैं: बल्कि एक जागरूक पाठक भी है। भूमिका तथा समीक्षा लेखन आप की सर्जनशीलता का एक प्रमुख आयाम है। भूमिका लिखना हो या समीक्षा आप कृति का सर्वांगपूर्ण अवलोकन और अध्ययन करने के उपरान्त ही अपनी  लेखनी चलाते हैं। आपकी पारखी दृष्टि आलोच्य कृति का तटस्थ मूल्यांकन करके ऐसा निचोड़ प्रस्तुत करती है कि पाठक पुस्तक के हर पक्ष से परिचित हो जाता है। सद्यः प्रकाशित ‘संवेदना एवं अभिव्यक्ति’ हाथ में आने पर यह विचार और भी प्रबल हो गया। ‘संवेदना एवं अभिव्यक्ति’  में  आपने स्वयं की कृति सहित कुल 14 रचनाकारों की रचनाओं पर सारगर्भित समीक्षात्मक लेख लिखे हैं।

डॉ. जेन्नी शबनम की चार कृतियों- लम्हों का सफर- काव्य संग्रह, प्रवासी मन- हाइकु संग्रह, नवधा- विविध काव्य विधा संग्रह तथा मरजीना- क्षणिका संग्रह, डॉ. कविता भट्ट -मीलों चलना है- काव्य संग्रह तथा काँठा माँ जून- हिन्दी हाइकु का गढ़वाली में अनुवाद, कृष्णा वर्मा -सिंदूरी भोर- हाइकु संग्रह, डॉ. भीकम सिंह-सिवानों पे गाँव- हाइकु-संग्रह तथा थके से सहयात्री- चोका- संग्रह, रचना श्रीवास्तव- सपनों की धूप- हाइकु संग्रह, सुदर्शन रत्नाकर-मन मल्हार गाए, बोलो न निर्झर, युग बदल रहा है; क्रमशः सेदोका, छोटी कविताएँ तथा काव्य संग्रह, डॉ. हरदीप कौर सन्धु-रंग शहूदी-द्विपदी कविताएँ, रश्मि विभा त्रिपाठी-मन की परिधि-काव्य संग्रह, डॉ. मीना अग्रवाल- बातें करती हवा- हाइकु संग्रह, रामेश्वर काम्बोज- नवगीत की भूमिका, डॉ. पद्मजा शर्मा- आसमान को छूना है, शिव डोयले-शब्दों के मोती, पुरुषोत्तम श्रीवास्तव ‘पुरु’-अनुभूति के पल तथा रेखा रोहतगी- मन मुखिया, हाइकु संग्रहों पर अपनी लेखनी चलाकर सुधी पाठकों का मार्ग प्रशस्त किया है। 

पुस्तक की भूमिका में आप लिखते हैं- “हमारे भावप्रवण साथियों ने चाहे छोटी-बड़ी कविताएँ लिखी हों, चाहे जापानी शैली के हाइकु, ताँका,चोका, सेदोका आदि रचे हों, उनमें हमारी समूची भारतीयता दूध-मिसरी की तरह घुल गई है है, उनमें संस्कृति की सुगंध रच-बस गई है।

यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे अपने अग्रजों की रचनाओं के साथ-साथ युवा साथियों के साहित्य की गहनतम अनुभूतियों का आनंद प्राप्त करने का भी अवसर मिला है।”

पुस्तक के कुछ प्रमुख उद्धरण हैं- डॉ. जेन्नी शबनम की कविताओं में जीवन की जद्दोजेहद के साथ संतप्त मन लिये आगे बढ़ने का संघर्ष है-लम्हों का सफर।

कोहरा ढक ले/अठखेलियाँ सारी/प्रिय-संग की।  

डाकिया आँखें/मन के ख़त भेजे/ प्रिय न पढ़े।

सर्द न होना/चाय की प्याली जैसे/अधर धरो।- ( मीलों चलना है/  डॉ. कविता भट्ट )

 उपर्युक्त ये तीन हाइकु केवल हाइकु नहीं, वरन् किसी कुशल कैमरामैन द्वारा लिए गए स्नैपशॉट प्रतीत होते हैं। 

डॉ. भीकम सिहं वही हाइकुकार हैं, जिनके पास चित्रकार की कल्पना, कैमरामैन की सटीक दृश्य को क्लिक करने की सूझ-बूझ और कवि के शब्द-चित्रांकन की क्षमता मौजूद है-सिवानों पे गाँव। 

कवयित्री  डॉ.  हरदीप कौर सन्धु को शब्द-सिद्धि प्रप्त है । वह आसपास के शब्दों में प्राण फूँककर उनको जीवंत कर देती हैं ।प्राण प्रतिष्ठा होने पर उनके शब्द श्लोक का रूप धारण कर लेते हैं-रंग शहूदी।

21 कृतियों का समग्रता में परिचय कराने वाली ‘संवेदना एवं अभिव्यक्ति’ पुस्तक में दो लेख- भाव जगत के मोती तथा बहुवर्णी भावों का गुलदस्ता क्रमशः मरजीना तथा बातें करती हवा, कृति के नाम निर्धारण से पूर्व लिखी गयी भूमिकाएँ है, इसी कारण इनमें कृति के नामों का उल्लेख नहीं आ सका है। 

प्रेरकः पीया चाहे प्रेम रस

  - ब्रजभूषण 

पीया चाहे प्रेम रस, राखा चाहे मान।                                                       एक म्यान में दो खड्ग, देखा-सुना न कान॥

  रावण का सीता को बार-बार तंग करना तथा उनसे विवाह करने का आग्रह करना स्वभावतः मंदोदरी को अच्छा नहीं लगा। उसने अपने पति को समझाया और राम के पास सीता को छोड़ आने की प्रार्थना की। पर रावण इतनी सरलता से मानने वाला कहाँ था? उसने मंदोदरी से कहा, "तुम मेरे व्यक्तिगत काम में बाधा मत डालो।"

"किंतु तुम्हारा व्यक्तिगत कार्य मेरे व्यक्तिगत कार्य में भी तो बाधा डाल रहा है।"

"वह कैसे?"

"ऐसे कि सीता एक नारी है और मैं भी नारी हूँ। एक नारी का उत्पीड़न दूसरी नारी कभी सहन नहीं कर सकती।"

"सीता के प्रति तुम्हारी यह सहानुभूति ठीक नहीं।"

"क्या उसके प्रति तुम्हारा अनीति का व्यवहार ठीक है?"

"मैं एक बार कह चुका हूँ कि यह मेरा व्यक्तिगत मामला है।"

"मैं भी बार-बार कह चुकी हूँ कि तुम्हारे व्यक्तित्व से पर व्यक्तित्व जुड़ा हुआ है, अतः मुझे बोलने का पूरा अधिकार है।"

मंदोदरी के वाद-विवाद करने से रावण क्रोधित हो उठा। वह बोला, "मेरे अधिकार के सामने तुम्हारा अधिकार तुच्छ है। तुम कुछ भी कहो, मैं सीता से विवाह करूँगा ही।"

"क्यों पाप के भागी बनते हो? वह जगत् माता है, उसके लिए ऐसी बात सोचना और कहना पाप है। केवल तुम्हारी इच्छा से ही तो यह कार्य नहीं होगा।"

"होगा और अवश्य होगा।" रावण उच्च स्वर में बोला।

"कभी भी नहीं होगा और होगा भी तो केवल एक उपाय से।’’

रावण का क्रोध एकदम शांत हो गया। उसने प्रार्थना के स्वर में मंदोदरी से पूछा, "क्या उपाय है वह? "

"तुम राम का रूप धारण करके सीता के पास जाओ।"

मंदोदरी की बात सुनते ही रावण प्रसन्नता से भर गया, लेकिन दूसरे ही क्षण उसकी सारी प्रसन्नता विलीन हो गई। उसने कहा, "तुम मुझे मूर्ख बना रही हो। राम का रूप धारण करने के पश्चात् भोग-लिप्सा की बात मेरे मन में रह ही कहाँ सकेगी?"

कविताः पक्षी-जीवन बचा रहेगा

  - चक्रधर शुक्ल 

पक्षी-जीवन बचा रहेगा

पेड़ लगाओ ।

गौरैया फिर घर में आए

नीड़ बनाओ ।

मोबाइल का टावर घर में 

नहीं लगाओ ।

ए सी की गरमाहट से तुम

उन्हें  बचाओ ।

बालकनी में  पानी रक्खो

उन्हें बुलाओ ।

कंकरीट के भवन साथियों 

नहीं बनाओ ।

जीव-जन्तु को नहीं  सताओ

उन्हें बचाओ  ।

पक्षी -जीवन बचा रहेगा

पेड़ लगाओ ।

जीवन दर्शनः इकीगाई (Ikigai) : सोच की खोज

 - विजय जोशी  
 पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

जब आदमी अकेला या कहें खुद के साथ होता है तो तो कई बार उसके मन में अनेक प्रश्न उभरते हैं जैसे मैं क्या हूँ, मैं क्यों हूँ, मेरी  खुशियाँ किस चीज़ में है, क्या मैं अपने वर्तमान से खुश हूँ आदि आदि। ये जिज्ञासाएँ ही जीवन में मस्तूल का कार्य करती हैं, बशर्ते हम शांतिपूर्वक समाधान सोचें और खोजें।
        पिछले दिनों एक ऐसा ही एक अनुभव मिला  मुझे पारसी जीवनशैली आधारित फिल्म मस्का को हाल ही में दुबारा देखने के दौरान, जब एक नए  जीवन दर्शन इकीगाई (Ikigai) से मेरा साक्षात्कार हुआ, जिसमें एक भटकाव भरा जीवन जीते हुए नायक अंत में एक ठहराव पर आ पाता है। इकीगाई में एक सफल, सुचारु, सुखी जीवन जीने का अद्भुत सूत्र समाहित है, जो चार भागों में विभक्त है इस प्रकार: 
1. पसंदगी (Passion) : जीवन में राह या कैरियर चुनते समय यह जानना बेहद जरूरी है कि हमें वास्तव में क्या पसंद है, क्योंकि यही तो हमें सतत उत्साह, उमंग एवं ऊर्जा से सरोबार रखेगा।
2. क्षमता (Competence) : उपरोक्त के साथ यह ज्ञात होना भी आवश्यक है कि हम किसमें अच्छे हैं तथा किस कार्य का संपादन अच्छी तरह से कर सकते हैं, जिसके अभाव में पसंदगी भी अर्थहीन हो जाती है। दोनों का तादात्म्य एवं संतुलन ही प्रगति की पहली सीढ़ी है। 
3. उपलब्धि (Achievement) : ज़िंदगी में पैसे महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। हमारा सम्पूर्ण जीवन यापन इस पर आधारित है। सो प्रथम दोनों आयाम आर्थिक पैमाना तय करने में मददगार होंगे। इसकी उपेक्षा संभव ही नहीं।
4. सामाजिक (Social) : मानव एक समाजिक प्राणी है। यह अवयव है एक वृहद व्यवस्था का। सो इसका प्रभाव भी सन्निहित है इसमें। प्रथम समस्त आयाम निरर्थक हैं यदि समाज को जरूरत ही न हो आपके अवदान की। सो समाज के खाके में ठीक से बैठ पाने की दशा ही सफलता सुनिश्चित करेगी। इस आधार को नकारा नहीं जा सकता।
उपरोक्त दर्शन की खोज जापान के ओकीनावा द्वीप निवासी अकिहीरो हेसगावा ने करते हुए इसका महत्त्व उद्घाटित किया था जिसका सार है : 
-  जीवन को उपयोगी बनाना
- जो काम कर रहे हैं उसे पसंद करना
- अपने काम में आनंद लेना
- खुद के अस्तित्व को अर्थ प्रदान करना
- आसपास अच्छे वातावरण का सृजन
- और इस प्रकार जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करते हुए खुशी के साथ जीना
उपरोक्त बातें ही जापानियों के जीवन को सार्थक सिद्ध करती हैं। हम हिंदुस्तानी इन पलों में कम से कम आत्म निरीक्षण का प्रयास तो कर ही सकते हैं।
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
 मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

Apr 1, 2024

उदंती.com, अप्रैल- मई 2024

चित्रः संदीप राशिनकर
वर्ष - 16, अंक - 9- 10

एक समय में एक काम करो, ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमें डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ।   - स्वामी विवेकानंद

संयुक्तांक
इस अंक में

अनकहीः बूँद- बूँद पानी बचाना होगा,,, - डॉ. रत्ना वर्मा 

आलेखः पीड़ितों को नागरिकता देने का बना कानून - प्रमोद भार्गव

आलेखः 2029 में संयुक्त चुनाव कराने की तैयारी- एक-देश, एक-चुनाव 

 नवगीतः पानी की हर बूँद बचाने - सतीश उपाध्याय

 पर्यावरणः हर वर्ष नया फोन पर्यावरण के अनुकूल नहीं - सोमेश केलकर

 लघुकथाः कबाड़ - सुभाष नीरव

 चिंतनः मन थोड़ा बदल जाए तो... - सीताराम गुप्ता

 बाल कविताः चिड़िया गीत सुनाती है - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

स्वास्थ्यः ऊँचे पहाड़ जीवन के लिए बेहतर - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

कविताः नदिया - गौतमी पाण्डेय

डायरी के पन्नों सेः मन्नत का वह धागा - शशि पाधा

 यात्रा- संस्मरणः एलिफैंटा केव्स- अद्भुत संरचना - प्रिया आनंद

 लघुकथाः अपनी ही आग में - आनन्द

कहानीः नजर बट्टू - ज्योति जैन

कविताः बकरी - हरभगवान चावला

व्यंग्यः ट्रेम्पोलीन में कूद झमाझम - बी. एल. आच्छा

लोककथाः इतना महँगा नाश्ता

किताबेंः उदासी की चुप्पी को झकझोरती संवेदना की गूँज - अरुणेन्द्र नाथ वर्मा

कविताः बाट जोहते चौखट - शुभ्रा मिश्रा

 प्रेरकः जीवन कितना न्यायपूर्ण है - निशांत

 जीवन दर्शनः मनवा भीतर क्यों ना झाँके - विजय जोशी