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May 1, 2026

किताबेंः युवा क्रांतिकारी के बहुआयामी व्यक्तित्व से परिचित कराती कृति

  - प्रो. सुरंगमा यादव 

पुस्तक : मेरे भगत सिंह : लेखक- पंकज चतुर्वेदी, संस्करण:प्रथम 2026, पृष्ठ:324, मूल्य: रु 350 , प्रकाशकः पेंगुएन स्वदेश, पेंगुएन रैंडम हाउस, इण्डिया,प्रा . लि . चौथी मंज़िल,कैपिटल टॉवर,-1एमजी रोड गुरुग्राम, हरियाणा-122002

भगत सिंह  एक क्रांतिकारी होने के साथ-साथ उच्चकोटि के दूरदर्शी विचारक भी हैं। यह बात और है  कि उनके जीवन काल में उनके विचार, उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की भाँति  प्रचार न पा सके । यदि जिंदगी ने उन्हें मौका  दिया होता तो, आजादी की  लड़ाई की भाँति  स्वतंत्र भारत में भी उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती।  उन्हें महज़ 'असेंबली बम कांड' या 'सांडर्स वध' के अभियुक्त के रूप में देखना उनके विशाल व्यक्तित्व को  संकुचित करने जैसा है। वे एक ऐसे नायक थे, जिनसे अंग्रेज सरकार  इस कदर  भयभीत थी कि उनकी शहादत के बाद भी जन- आक्रोश के डर से उनके पार्थिव शरीर को रात के अँधेरे में जला दिया गया। जो क्रांतिकारी जीते जी साम्राज्यवाद के लिए चुनौती बना रहा, उसका शव भी फिरंगियों के मन में भय पैदा कर रहा था।

भगत सिंह केवल सशस्त्र क्रांति के पक्षधर नहीं थे, बल्कि एक प्रखर वैचारिक योद्धा भी थे। उनका लक्ष्य केवल  देश को आजाद कराना मात्र नहीं था,  बल्कि उससे भी कहीं  आगे, स्वतंत्र भारत की तस्वीर कैसी होनी चाहिए,   इसका  पूरा खाका उनके दिमाग में स्पष्ट था।  वे एक ऐसे समाजवादी गणराज्य का स्वप्न देखते थे,  जहाँ शोषण का कोई स्थान न हो और प्रत्येक नागरिक की हिस्सेदारी समान हो। यही कारण था कि उन्होंने अपने संगठन का नाम बदलकर 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) रखा।  उनके भीतर अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रबल चेतना  और शक्ति आरंभ से ही  थी, उनकी सबसे प्रिय पुस्तक कार्लाइल की लिखी 'क्राई फॉर जस्टिस' थी। वे  विवाह को क्रांति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा तथा क्रांति को ही धर्म मानने वाले थे ।   

‘मेरे भगत सिंह’ पुस्तक के लेखक पंकज चतुर्वेदी, जो  मूल रूप से पत्रकार हैं, ‘जवाहर  लाल हाजिर हों’ के साथ- साथ आपने कई  चर्चित पुस्तकें  लिखी हैं  और कई प्रतिष्ठित सम्मानों से आपको सम्मानित किया गया है। 

 ‘मेरे भगत सिंह’ पुस्तक का शीर्षक जितनी आत्मीयता से भरा हुआ है, लेखक ने उतने ही मनोयोग से इस पुस्तक की रचना की है।  यह पुस्तक भगत सिंह के संपूर्ण व्यक्तित्व और विचारों को प्रामाणिक ढंग से हमारे सामने रखती है,  क्योंकि इसमें भगत सिंह से सीधे जुड़े लोगों के विचार और उनके संस्मरणों को आधार बनाया गया है। यह पुस्तक चार खंडों में विभाजित है तथा प्रत्येक खंड अपने आप में विशिष्ट है क्योंकि प्रत्येक खंड  भगत सिंह के विचारों व  व्यक्तित्व के   उन  पहलुओं को उजागर करता है, जो बहुत कम लोगों तक सीमित थे। यह कृति केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि भगत सिंह के मानवीय और वैचारिक पक्षों का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है।

पूत के पाँव पालने में, कॉमरेड्स या साथी क्रांतिकारी,राजनेता,मीडिया और विमर्श- इन चार खंडों में भगत सिंह के छोटे -से जीवनकाल  के वृहत् अध्यायों को समेटने का सफल प्रयास किया गया है। 

    प्रथम खंड में भगत सिंह के निकटस्थ जनों के संस्मरण है, जो पाठक को भगत सिंह से आत्मीय जुड़ाव की अनुभूति कराते हैं तथा भगत सिंह के व्यक्तित्व व  विचारों के उन पक्षों को अनावृत करते हैं, जो भगत सिंह को एक क्रांतिकारी की चर्चित भूमिका से अलग वैचारिक योद्धा तथा एक ऐसे नौजवान के रूप में हमारे सामने लाते हैं ,जो कि जीवन के उल्लास से पूर्ण है, दिल खोलकर हँसता है,  रोता है, दिल्लगी करता है, वाकपटु है, उदार है और प्रेम के भावों से परिपूर्ण है; परंतु कर्तव्य पथ का पथिक है। ये संस्मरण लाहौर नेशनल कॉलेज के प्रिंसिपल छबीलदास की पुत्री सुश्री मनोरमा दीवान के हैं, जहाँ भगत सिंह ने 1923 में प्रवेश लिया।  लाहौर स्थित द्वारिकादास पुस्तकालय में लाइब्रेरियन राजाराम शास्त्री, प्रो. जगमोहन सिंह द्वारा भगत सिंह की पूजनीय माँ श्रीमती विद्यावती जी का 1975 में लिये गए  साक्षात्कार के रूप में तथा उनके छोटे भाई कुलतार सिंह की बेटी सुश्री वीरेन्द्र सिंधु के माध्यम से प्रस्तुत हुए हैं। बेहद सहज- सरल भाषा में ये  पर्त दर पर्त खुलते हुए पाठक के सामने एक  ऐसे भगत सिंह को खड़ा करते हैं, जो जाँबाज तो है ही, संवेदनाओं व भावनाओं से भरा हुआ भी है। हमेशा हँसते रहने वाले भगत सिंह अपनी माँ से कहा करते थे, ‘बेबे तुम परेशान न हुआ करो।  तुम्हारे लिए एक  अनोखी दुल्हन ब्याहकर लाऊँगा’, भगत सिंह का आशय  हिंदुस्तानी की आजादी से था। राजाराम शास्त्री के अनुसार अदालत में भगत सिंह को हँसते  देखकर मजिस्ट्रेट के टोकने पर भगत सिंह, सिंह की तरह गरजते हुए कहते हैं, “मजिस्ट्रेट महोदय,इस समय  आपको मेरा हँसना अच्छा नहीं लगता; पर उस दिन आप क्या करेंगे, जिस  दिन मैं  फाँसी के तख्त पर भी हँसूँगा और इंकलाब  जिंदाबाद चिल्लाऊँगा?”

 खंड दो ‘कॉमरेड्स या साथी क्रांतिकारी’ के अंतर्गत क्रांतिकारी शिव वर्मा की भगत सिंह के साथ पहली मुलाकात से लेकर शहादत के कुछ समय पूर्व हुई मुलाकात का विवरण  तथा उनसे कहे गए शब्दों को पढ़कर मन भावुकता और गर्व से भर उठता है कि जानें किस मिट्टी के बने थे ये लोग, जिनके मन में शहादत की होड़ लगी हुई थी। ‘सांडर्स वध’ के बाद भगत सिंह की पत्नी का स्वांग रचकर उन्हें लाहौर से  सुरक्षित निकालने वाली दुर्गा भाभी का योगदान और चंद्रशेखर आजाद का संदेश  लेकर  गांधी जी से उनकी  वह ऐतिहासिक मुलाकात, जिसमें उन्होंने क्रांतिकारियों की फाँसी रुकवाने का प्रयास किया, इस खंड का मुख्य आकर्षण है।

  अजय कुमार घोष, बटुकेश्वर दत्त, भगवान दास माहौर, विजय कुमार सिन्हा और यशपाल जैसे  क्रांतिकारी साथियों की  दृष्टि से भगत सिंह का चित्रण इस पुस्तक को एक ऐतिहासिक दस्तावेज की श्रेणी में खड़ा करते हैं।

     तीसरा खंड ‘राजनेता’ शीर्षक से है जिसमें सुभाष चन्द्र बोस द्वारा  महात्मा गाँधी से आग्रह करना, शहादत के बाद महात्मा गाँधी, मोहम्मद अली जिन्ना, ई.एम.एस.  नंबूदरीपाद, महामना  आदि के  विचार यह सिद्ध करते हैं कि भगत सिंह आजादी की लड़ाई में कितना महत्त्वपूर्ण थे तथा उनकी शहादत से स्वाधीनता आंदोलन को गति मिली है। यह खंड भगत सिंह तथा साथियों की फाँसी के संबंध में महात्मा गाँधी पर उठने वाले प्रश्न चिह्नों  के काफी हद तक  उत्तर तलाशते हुए  महात्मा गाँधी की भूमिका को रेखांकित भी करती है। 

 अंतिम खंड ‘मीडिया और विमर्श’ में भगत सिंह की शहादत के पश्चात्  ब्रिटिश और भारतीय मीडिया की टिप्पणियाँ  हैं, जो ये बताती हैं कि किस तरह पूरी दुनिया में भगत सिंह की शहादत से क्रिया- प्रतिक्रिया हुई। भारत में  शोक की लहर दौड़ गई, जनाक्रोश की आँच  ब्रिटिश संसद तक पहुँची। 

यह पुस्तक इसलिए भी  महत्त्वपूर्ण है ; क्योंकि ये केवल  शहादत तक ही सीमित नहीं है ; बल्कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सजा सुनाए जाने के बाद तत्कालीन  नेताओं ने फाँसी की सजा  रुकवाने के लिए क्या प्रयास किए,  इसका ब्यौरा भी प्रस्तुत करती है। 

 वास्तव में उपर्युक्त  चारों खंडों में विभिन्न लोगों के जो विचार, संस्मरण अब तक  बिखरे हुए रूप में  हमें प्राप्त होते थे, इस पुस्तक में उन सभी को लेखक ने  एक शोधार्थी की भाँति  एकत्र करके  पुस्तक का रूप प्रदान किया है तथा मूल कथ्य  के प्रति पूर्ण सतर्कता एवं सावधानी बरती है। 

 इस पुस्तक में अनेक दुर्लभ चित्र हैं, जिन्हें देखकर रोमांच हो उठता है तथा पुस्तक और भी प्रामाणिक बन जाती  हैं। भगत सिंह के जीवन संघर्ष, उनके विचारों की गहराई, सोच की ऊँचाई और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली ढंग से करने के कारण यह पुस्तक सार्वकालिक प्रासंगिक व पठनीय  है।

आलेखः प्रेम शब्द का घटता अर्थ और भाषा की जिम्मेदारी

  - हिना श्रीवास्तव

कुछ शब्द ऐसे होते हैं, जिनका अर्थ केवल शब्दकोश तक सीमित नहीं होता; बल्कि वे हमारी संवेदनाओं और सामाजिक मर्यादाओं से गहराई से जुड़े होते हैं। ऐसे शब्दों का प्रयोग यदि बिना सोचे-समझे या गलत सामान्यीकरण के साथ किया जाने लगे, तो धीरे-धीरे उनका वास्तविक अर्थ धूमिल होने लगता है। जब किसी गहरे और गरिमामय शब्द को हर प्रकार की स्थिति के लिए प्रयोग किया जाने लगे, तब उसका मूल अर्थ कमजोर पड़ने लगता है।

‘प्रेम’ भी ऐसा ही एक शब्द है। यह केवल एक भावना नहीं; बल्कि मनुष्य की संवेदनशीलता और विश्वास का प्रतीक है। आजकल जब इस शब्द का प्रयोग असंतुलित या अनैतिक संबंधों के लिए होते हुए देखती हूँ, तो मेरे भीतर गहरी पीड़ा और कुंठा उत्पन्न होती है।

हाल के वर्षों में हमने अनेक ऐसी घटनाएँ देखी हैं, जिनमें अनैतिक या अवैध संबंधों के कारण रिश्ते तार-तार हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो समाज में ऐसे असंतुलित संबंधों की एक बाढ़-सी आ गई हो।

समाज की नैतिक संरचना को झकझोर देने वाली घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रहती हैं—जैसे किसी स्त्री का अपनी ही बेटी के होने वाले पति के साथ विवाह कर लेना, या किसी नवविवाहिता का अपने किसी परिचित के साथ मिलकर अपने ही पति की हत्या कर देना। इस प्रकार की घटनाएँ केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं होतीं; बल्कि समाज के मूल्यों और नैतिक आधारों पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।

स्पष्ट है कि ऐसे संबंध प्रायः प्रेम नहीं, बल्कि क्षणिक आकर्षण और वासना से प्रेरित होते हैं। परंतु विडंबना यह है कि समाचार पत्रों, पुलिस तथा जनप्रतिनिधियों द्वारा साधारण भाषा में ऐसे मामलों को अक्सर ‘प्रेम प्रसंग’ कह दिया जाता है। विवाह के इतर चल रहे संबंध, विश्वासघात से जुड़े विवाद, छलपूर्वक बनाए गए रिश्ते—इन सबको एक ही शब्द में समेट दिया जाता है—'प्रेम संबंध’। इस प्रकार की घटनाओं के संदर्भ में हमें गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि प्रेम जैसे गहरे और पवित्र शब्द का प्रयोग इस प्रकार नहीं किया जाना चाहिए।

वास्तविकता यह है कि ऐसे मामलों के लिए विवाहेतर संबंध, अवैध संबंध, धोखे से बना संबंध, आपराधिक संबंध या अनैतिक संबंध जैसे शब्द अधिक उपयुक्त हैं। चूँकि भाषा समाज की सोच को प्रभावित करती है; इसलिए जब पुलिस या मीडिया इस प्रकार के विवादित संबंधों को ‘प्रेम प्रसंग’ कहती है, तो समाज की युवा पीढ़ी के मन में प्रेम के बारे में एक विकृत समझ विकसित होने लगती है।

जब ऐसे शब्द समाचारों, ऑडियो-वीडियो और अन्य दृश्य माध्यमों के द्वारा बार-बार किशोर-किशोरियों के सामने आते हैं, तो उनका प्रभाव उनके मन पर गहरा पड़ता है। इससे उनके भीतर यह धारणा बनने लगती है कि किसी भी प्रकार का आकर्षण या केवल शारीरिक निकटता ही प्रेम है, जबकि वास्तविकता यह है कि प्रेम एक अत्यंत गहरी और जिम्मेदारी वाली भावना है।

भारतीय परंपरा में प्रेम को अत्यंत ऊँचा और पवित्र भाव माना गया है। यह केवल आकर्षण नहीं; बल्कि सम्मान, विश्वास और समर्पण की भावना है। सच्चे प्रेम में दूसरे व्यक्ति की गरिमा सुरक्षित रहती है और संबंध ईमानदारी से निभाए जाते हैं।

सच्चा प्रेम किसी भी परिस्थिति में दूसरे के अहित की कामना नहीं कर सकता—केवल अपने प्रिय के लिए ही नहीं, अपितु प्रत्येक व्यक्ति के प्रति उसके मन में संरक्षण और कल्याण की भावना ही निहित रहती है।

अतः पुलिस, प्रशासन और मीडिया—जिनकी भाषा सीधे समाज तक पहुँचती है—उन्हें ऐसे मामलों में शब्दों का अधिक सावधानी से प्रयोग करना चाहिए। घटनाओं को उनके वास्तविक स्वरूप में प्रस्तुत करना न केवल सच्चाई को स्पष्ट करता है; बल्कि समाज में सही समझ भी विकसित करता है।

इसलिए आवश्यक है कि हम प्रेम जैसे गहरे और पवित्र शब्द की गरिमा को समझें और उसे हर प्रकार के संबंध का सामान्य नाम बनने से बचाएँ।

प्रेम शब्द केवल किसी संबंध का नाम नहीं है, बल्कि मनुष्य की संवेदनशीलता, उसके मानवीय मूल्यों का प्रतीक एवं उसके जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।

-जयपुर,राजस्थान

सॉनेटः इस समय

  - अनिमा दास 

इस समय मैं, तुमसे नहीं करती कोई संवाद 

शून्याकाश की मौन कविता में अभी हूँ लीन 

मुझे स्पर्श नहीं करते शब्द-वाण, कटु निनाद 

मैं नहीं हूँ किसी ध्वनि में, न हूँ उसकी अधीन।

 

इस समय मैं,हूँ आबद्ध स्वयं की प्रतिच्छाया में 

सर्वशेष महोदधि में एक क्षुद्र जलकण लवणीय 

लुप्तप्राय मेरा सत्व होने मुक्त अभिशप्त ग्रह से 

होता वेगहीन विस्मृत कर प्राक कथा मोहनीय।

 

इस समय, विष की वर्षा में ज्वलन है अतिशय 

हाँ! अद्य हुआ है श्रीहीन मेरे भाग का वृन्दावन 

हृदय नहीं है यमुना-तट की सुरभि में नृत्यमय 

प्राण-पीयूष हो रहा शुष्क, शून्य हो रहा कानन।

 

इस समय,मयूर-वर्ण व्यथा हो रही अर्ध जीवित  

अंत क्यों नहीं है गतिमय श्वास का, क्यों है प्रथित?


खानपानः कॉफी के स्वाद निराले

  - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

कॉफी शब्द कहाँ  से आया? कॉफी इथियोपिया से आई थी, जहाँ  के लोग इसे कहवा कहते थे। स्वर्गीय डॉ. के. टी. अचया ने वर्ष 1998 में ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी से प्रकाशित अपनी पुस्तक ए हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड में लिखा है कि कॉफी के बीज अरब व्यापारियों द्वारा कुलीन वर्ग के उपयोग के लिए भारत लाए गए थे। अरबी लोगों ने दक्षिण भारत और श्रीलंका में कॉफी के बागान लगाए। और सूफी बाबा बुदान ने कर्नाटक के चिकमगलुर के पास कॉफी के पौधे उगाए। 

1830 की शुरुआत में, शुरुआती ब्रिटिश आगंतुकों ने दो प्रकार की कॉफी के कॉफी बागान लगाए – अच्छी ऊँची जगहों पर कॉफी अरेबिका के, और निचले इलाकों में कॉफी रोबस्टा के बागान। (चूँकि युरोप में कहवे का कारोबार अरब व्यापारी करते थे; इसलिए अरेबिका नाम पड़ा; और रोबस्टा, क्योंकि पश्चिम अफ्रीका की यह किस्म रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधी है)। जैसा कि मैंने कॉफी पर अपने पूर्व लेखों में लिखा था, कॉफी एक स्वास्थ्यवर्धक पेय है, खासकर जब इसे गर्म दूध के साथ मिलाकर पिया जाता है। कई अमेरिकी लोग बिना दूध वाली (ब्लैक) कॉफी पीते हैं।

तमिलनाडु के कुंभकोणम शहर के कॉफी के शौकीन बाशिंदे अपनी कॉफी को कुंभकोणम डिग्री कॉफी कहते हैं। उनका दावा है कि उसके स्वाद का कोई मुकाबला नहीं है। वे आगे कहते हैं कि यह कॉफी विशुद्ध अरेबिका कॉफी है और इसमें चिकरी पाउडर नहीं मिला होता है, जो आम तौर पर डिपार्टमेंटल स्टोर या कॉफी शॉप पर मिलने वाले कॉफी पाउडर या कॉफी के बीजों में होता है। इसी तरह, सिकंदराबाद की जिस कॉफी शॉप से मैं कॉफी खरीदता हूँ वहाँ  शुद्ध अरेबिका कॉफी पावडर के साथ-साथ चिकरी मिश्रित अरेबिका कॉफी पीने वालों के लिए चिकरी मिश्रित कॉफी पावडर भी मिलता है।

लेकिन चिकरी है क्या? यह भी कॉफी की एक किस्म है, और भारत चिकरी का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। हमारे देश में यह सुदूर पूर्वी राज्यों (असम, मेघालय, सिक्किम) में उगाई जाती है। वहीं कुछ लोगों का ऐसा दावा है कि पोषण के मामले में चिकरी अरेबिका से बेहतर हो सकती है; क्योंकि इसमें कैफीन की मात्रा कम होती है। कैफीन एक अणु है, जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करता है, हालांकि इस सम्बंध में अब तक कोई निर्णायक प्रमाण नहीं मिले हैं।

आंध्र प्रदेश अराकू घाटी के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली अपनी विशेष कॉफी के लिए प्रसिद्ध है। अराकू कॉफी के बारे में दावा है कि यह न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी उपलब्ध सबसे अच्छी कॉफी है। यह शुद्ध अरेबिका कॉफी है। बहुत अच्छी किस्म की अरेबिका तमिलनाडु की शेवरॉय पहाड़ियों और कर्नाटक के मंजराबाद किले के आसपास के इलाकों में भी उगाई जाती है। भारत भर के बड़े शहरों में कई युवा स्टारबक्स की कॉफी खरीदते हैं और पीते हैं, और कैफे कॉफी डे (सीसीडी) से भी। स्टारबक्स सिर्फ शुद्ध अरेबिका कॉफी का उपयोग करता है, जबकि सीसीडी के बारे में स्पष्ट नहीं है कि वे शुद्ध अरेबिका का उपयोग करते हैं या मिश्रण का।

कॉफी की इन विभिन्न प्रमुख किस्मों को लेकर इतना शोर क्यों है? जवाब इतालवी आनुवंशिकीविद डॉ. मिशेल मॉर्गन्टे द्वारा किए गए हालिया आनुवंशिकी अध्ययन (नेचर कम्युनिकेशंस जनवरी 2024) से मिलता है जो बताता है कि कॉफी की कई कृष्य किस्में बेहतर स्वाद दे सकती हैं। दी हिंदू ने हाल में संक्षेप में अपने विज्ञान पृष्ठ पर यह बात बताई है और बीबीसी न्यूज़ के अनुसार कॉफी अरेबिका में आनुवंशिक परिवर्तन बेहतर महक दे सकते हैं। तो वक्त आ गया है कि भारतीय आनुवांशिकीविद भारतीय कॉफियों के जीन्स अनुक्रमित करके देखें। (स्रोत फीचर्स)

Apr 1, 2026

उदंती.com, अप्रैल - 2026

 वर्ष - 18, अंक -9

शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण, 

मन की शक्ति बढ़ाना 

और आत्मनिर्भर बनाना है।

                          - स्वामी विवेकानंद

अनकहीः आस्था, परंपरा और हमारा विश्वास  - डॉ. रत्ना वर्मा

 आलेखः नए युवा और बदलती कैरियर संभावनाएँ - संध्‍या राजपुरोहित

 मौसमः भारत में जल्दी आ गई गर्मी, सिमट रही सर्दियाँ -  अजय मोहन

 यात्रा वृतांतः उदयेश्वर नीलकण्ठ महादेव मंदिर  - डॉ. आरती स्मित

 आलेखः जीवन के उत्तरकाल को सहजता से जीना सीखें - सीताराम गुप्ता

 प्रकृतिः घोंसलों पर लहराती लटकन सजावट नहीं, चकमा है 

 कथाः पहली बार - अर्चना राय

 तुतलाहटः भाषा का प्रथम संगीत - जयप्रकाश मानस

 कविताः निःशब्द -  डॉ. कनक लता मिश्रा

 लघुकथाः अदृश्य आघात - योगराज प्रभाकर

 कहानीः उदास आँखें - आशा पाण्डेय

 लघुकथाः मकड़ी - सुषमा गुप्ता

 संस्मरणः कमली तू आ गई... - देवी नागरानी

 व्यंग्यः हम मूर्खों के सिरमौर - गिरीश पंकज

 कविताः भूमि का शृंगार तरु है - पूर्णिमा राय

 दो नवगीतः 1. अवसादों का बंद पिटारा, 2. आकस्मिक  - डॉ. भावना तिवारी

 किताबेंः ‘बिजुरी’ के बहाने हमारे समय का सामाजिक रूपक - कुँवर सिंह

कविताः पर मेरे हुए तो नहीं - सुरभि डागर

आलेखः महानदी जल-बँटवारा - छत्तीसगढ़ और ओडिशा में विवाद - प्रमोद भार्गव

शोधः प्यास लगना और बुझना