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Jul 1, 2026

लघु लेखः जीवन पहले या सम्मान?

 - हिना श्रीवास्तव

सर्दियों की वह सुबह आज भी मेरी स्मृतियों में ज्यों की त्यों है। धूप अभी पूरी तरह फैली नहीं थी और छत पर बने छोटे से बाथरूम में गीज़र की हल्की भाप तैर रही थी। ठंड इतनी थी कि बिना गरम पानी के नहाने की कल्पना भी मुश्किल लगती थी। मैं उस वक्त कॉलेज के तृतीय वर्ष में थी और कॉलेज जाने के लिए ही तैयारी कर रही थी। मैं नहा ही रही थी कि अचानक गीज़र के भीतर से तेज़ आवाज़ आई। अगले ही पल उसकी जाली से तीखी आँच-सी निकलने लगी। उस क्षण मेरे हाथ-पाँव जैसे सुन्न हो गए। समझ ही नहीं आया कि क्या करूँ। एक पल को लगा, मानो पूरा बाथरूम आग की लपटों में घिर जाएगा।

उस क्षण मैं कुछ सेकंड के लिए जड़ हो गई। समझ नहीं पा रही थी कि पहले शरीर ढकूँ… या जीवन बचाऊँ। घबराकर मैंने जल्दी से दरवाज़ा खोला और किसी तरह बाहर आ गई। उस समय मेरे मन में बस एक ही विचार था- इस जगह से जितनी जल्दी हो सके निकल जाना चाहिए।

कुछ देर बाद जब मन थोड़ा शांत हुआ, तो मैंने यह बात घर में बताई और कहा कि आग लगने पर भी कुछ क्षण तो मैं यह विचार कर रही थी कि पहले कपड़े पहनूँ कि जान बचाऊँ।

सबसे पहले माँ ने सुना। माँ ने मेरी बात पूरी होते ही कहा-“अरे पगली! ऐसी हालत में क्या सोचती? सीधे बाहर भाग आती। जान है तो सब है। कपड़े बाद में भी पहने जा सकते थे।”

उनकी आवाज़ में चिंता थी- वह चिंता, जो केवल माँ के स्वर में होती है।

थोड़ी देर बाद पिताजी ने भी यह बात सुनी। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा- “नहीं, ऐसे कैसे बाहर आ जाती? इज़्ज़त सबसे बड़ी चीज़ होती है। थोड़ी चोट लग जाती, तो लग जाती; लेकिन बिना कपड़े पहने बाहर आना ठीक नहीं होता। तुमने सही किया कि पहले खुद को ढका।”

मैं चुपचाप दोनों की बातें सुनती रही। एक ही घटना थी, पर दो बिल्कुल अलग प्रतिक्रियाएँ। माँ के लिए जीवन सबसे बड़ा था , पिताजी के लिए सम्मान।

उस दिन पहली बार मैंने गहराई से महसूस किया कि स्त्री और पुरुष की सोच में अंतर केवल अनुभव का नहीं, बल्कि प्रवृत्ति का भी होता है। शरीर का नहीं, दृष्टि का भी होता है।

आज जब मैं स्वयं एक बेटी की माँ हूँ, तब उस घटना को याद करती हूँ , तो मन अपने आप माँ की ही ओर खड़ा दिखाई देता है। यदि मेरी बिटिया के साथ कभी ऐसी कोई स्थिति आए, तो मेरा उत्तर भी वही होगा- जो उस दिन मेरी माँ ने कहा था।

फिर भी मन के किसी कोने में यह प्रश्न आज भी शांत नहीं हुआ है कि क्या जीवन अधिक महत्त्वपूर्ण है, या सम्मान?

या फिर अन्तर्द्वंद्व से बचने के लिए आज भी मैं स्वयं को ये कहकर संतुष्ट कर लेती हूँ कि जीवन और सम्मान का यह प्रश्न स्वयं में ही सापेक्ष  है और इसे सापेक्षता के सिद्धांत के अनुप्रयोग के अंतर्गत ही देखा जाना चाहिए।

May 1, 2026

आलेखः प्रेम शब्द का घटता अर्थ और भाषा की जिम्मेदारी

  - हिना श्रीवास्तव

कुछ शब्द ऐसे होते हैं, जिनका अर्थ केवल शब्दकोश तक सीमित नहीं होता; बल्कि वे हमारी संवेदनाओं और सामाजिक मर्यादाओं से गहराई से जुड़े होते हैं। ऐसे शब्दों का प्रयोग यदि बिना सोचे-समझे या गलत सामान्यीकरण के साथ किया जाने लगे, तो धीरे-धीरे उनका वास्तविक अर्थ धूमिल होने लगता है। जब किसी गहरे और गरिमामय शब्द को हर प्रकार की स्थिति के लिए प्रयोग किया जाने लगे, तब उसका मूल अर्थ कमजोर पड़ने लगता है।

‘प्रेम’ भी ऐसा ही एक शब्द है। यह केवल एक भावना नहीं; बल्कि मनुष्य की संवेदनशीलता और विश्वास का प्रतीक है। आजकल जब इस शब्द का प्रयोग असंतुलित या अनैतिक संबंधों के लिए होते हुए देखती हूँ, तो मेरे भीतर गहरी पीड़ा और कुंठा उत्पन्न होती है।

हाल के वर्षों में हमने अनेक ऐसी घटनाएँ देखी हैं, जिनमें अनैतिक या अवैध संबंधों के कारण रिश्ते तार-तार हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो समाज में ऐसे असंतुलित संबंधों की एक बाढ़-सी आ गई हो।

समाज की नैतिक संरचना को झकझोर देने वाली घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रहती हैं—जैसे किसी स्त्री का अपनी ही बेटी के होने वाले पति के साथ विवाह कर लेना, या किसी नवविवाहिता का अपने किसी परिचित के साथ मिलकर अपने ही पति की हत्या कर देना। इस प्रकार की घटनाएँ केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं होतीं; बल्कि समाज के मूल्यों और नैतिक आधारों पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।

स्पष्ट है कि ऐसे संबंध प्रायः प्रेम नहीं, बल्कि क्षणिक आकर्षण और वासना से प्रेरित होते हैं। परंतु विडंबना यह है कि समाचार पत्रों, पुलिस तथा जनप्रतिनिधियों द्वारा साधारण भाषा में ऐसे मामलों को अक्सर ‘प्रेम प्रसंग’ कह दिया जाता है। विवाह के इतर चल रहे संबंध, विश्वासघात से जुड़े विवाद, छलपूर्वक बनाए गए रिश्ते—इन सबको एक ही शब्द में समेट दिया जाता है—'प्रेम संबंध’। इस प्रकार की घटनाओं के संदर्भ में हमें गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि प्रेम जैसे गहरे और पवित्र शब्द का प्रयोग इस प्रकार नहीं किया जाना चाहिए।

वास्तविकता यह है कि ऐसे मामलों के लिए विवाहेतर संबंध, अवैध संबंध, धोखे से बना संबंध, आपराधिक संबंध या अनैतिक संबंध जैसे शब्द अधिक उपयुक्त हैं। चूँकि भाषा समाज की सोच को प्रभावित करती है; इसलिए जब पुलिस या मीडिया इस प्रकार के विवादित संबंधों को ‘प्रेम प्रसंग’ कहती है, तो समाज की युवा पीढ़ी के मन में प्रेम के बारे में एक विकृत समझ विकसित होने लगती है।

जब ऐसे शब्द समाचारों, ऑडियो-वीडियो और अन्य दृश्य माध्यमों के द्वारा बार-बार किशोर-किशोरियों के सामने आते हैं, तो उनका प्रभाव उनके मन पर गहरा पड़ता है। इससे उनके भीतर यह धारणा बनने लगती है कि किसी भी प्रकार का आकर्षण या केवल शारीरिक निकटता ही प्रेम है, जबकि वास्तविकता यह है कि प्रेम एक अत्यंत गहरी और जिम्मेदारी वाली भावना है।

भारतीय परंपरा में प्रेम को अत्यंत ऊँचा और पवित्र भाव माना गया है। यह केवल आकर्षण नहीं; बल्कि सम्मान, विश्वास और समर्पण की भावना है। सच्चे प्रेम में दूसरे व्यक्ति की गरिमा सुरक्षित रहती है और संबंध ईमानदारी से निभाए जाते हैं।

सच्चा प्रेम किसी भी परिस्थिति में दूसरे के अहित की कामना नहीं कर सकता—केवल अपने प्रिय के लिए ही नहीं, अपितु प्रत्येक व्यक्ति के प्रति उसके मन में संरक्षण और कल्याण की भावना ही निहित रहती है।

अतः पुलिस, प्रशासन और मीडिया—जिनकी भाषा सीधे समाज तक पहुँचती है—उन्हें ऐसे मामलों में शब्दों का अधिक सावधानी से प्रयोग करना चाहिए। घटनाओं को उनके वास्तविक स्वरूप में प्रस्तुत करना न केवल सच्चाई को स्पष्ट करता है; बल्कि समाज में सही समझ भी विकसित करता है।

इसलिए आवश्यक है कि हम प्रेम जैसे गहरे और पवित्र शब्द की गरिमा को समझें और उसे हर प्रकार के संबंध का सामान्य नाम बनने से बचाएँ।

प्रेम शब्द केवल किसी संबंध का नाम नहीं है, बल्कि मनुष्य की संवेदनशीलता, उसके मानवीय मूल्यों का प्रतीक एवं उसके जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।

-जयपुर,राजस्थान