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Jun 12, 2009

श्रम की गरिमा का सम्मान

श्रम की गरिमा का सम्मान
'श्रम सभ्यताओं की प्राण शक्ति है। यदि श्रम को उपेक्षित किया जाता है तो हर समाज में आलस्य का कैंसर पैदा हो जाता है।' श्रम की इसी गरिमा को पूरा सम्मान देते हुए एकलव्य द्वारा 'कुम्हार, धोबी, बुनकर, मोची- हमारे समय में श्रम की गरिमा' नामक नई पुस्तक का प्रकाशन किया गया है। 
 इस किताब में समाज के निचली कही जाने वाली जातियों के द्वारा किये जाने वाले कामों पर बड़ी गहराई से, न केवल प्रकाश डाला गया है बल्कि  इन जातियों को ऐसे कामों के दौरान जिन परेशानियों को आत्मसात करना पड़ता है उसका भी खुलासा किया गया है।
आधुनिक लाइफ स्टाइल में जीने वाले शहरी बच्चों के लिए लिखी गयी इस किताब में लेखक की यही अपेक्षा है कि बच्चे इन लोगों के जीवन को पास से देखें। इससे बच्चों का ही नहीं बल्कि बड़ों का भी नजरिया बदलेगा और सदियों से शोषित इन जातियों के परिश्रम का सही आंकलन हो सकेगा।
आदिवासी, पशु पालक, चर्मकार, किसान,  कुम्हार, बुनकर, धोबी, नाई के जीवन क्रम, मान्यताएं, उनका सामाजिक दर्जा आदि पर विस्तार से लिखते हुए प्रो.कांचा आइलैया ने इन समुदायों के कौशल को भी दर्शाया है। अकुशल श्रमिक कहे जाने वाले श्रमिकों के श्रम को समाज ने किस तरह से उपयोग करने के बाद इनको उपेक्षित किया है इसको बखूबी लिखा गया है।
एकलव्य द्वारा प्रकाशित इस किताब के लेखक प्रो. कांचा आइलैया हैं। चिंत्राकन दुर्गा बाई व्याम ने
किया है। 
 धूप में गुलाबी होती  कहानियाँ
यह पुस्तिका हिमाचल के उन सभी खूबसूरत इंद्रधनुषी मौसमों को समर्पित है जो इन कहानियों के गवाह बनें। प्रिया आनंद की इन कहानियों में पहाड़ी देवियों की रहस्यमयता ने बहुत सारे द्वार खोले हैं। वे अपनी कहानियों के बारे में स्वयं कहती हैं कि 'पहाड़ की किसी भी सड़क से आती इन देवियों को देखने का जो अलौकिक अहसास मैंने पाया है वह भी मेरी कई कहानियों का आधार बना हैं।'
पुस्तक की इन कहानियों को लेकर इमरोज ने अपनी कवितामय टिप्पणी दी  है जैसे वे 'मैदानÓ कहानी के बारे में कहते हैं कि सारे रंगों से रंग-रंग भी होती है, भीगती है और गुलाबी धूप में गुलाबी होती रहती है।  'नीली यमुना' तरंग नाम की अहसासमंद औरत की खूबसूरत कहानी है। जिसमें यमुना का नीला रंग भी है गंगा का सफेद रंग और सरस्वती का गुलाबी रंग भी। वे कहते हैं कि अपनी कहानियों में प्रिया खुद ही एक सवाल बन जाती है और खुद ही एक जवाब।
 कहानी संग्रह की लेखिका प्रिया पिछले 36 वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं। उनकी 250 के लगभग कहानियां एवं लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका यह दूसरा कहानी संग्रह है। पहले कहानी संग्रह का नाम है 'मोहब्बत का पेड़'। पिछले आठ वर्षों से पत्रकारिता से जुड़ी प्रिया वर्तमान में हिमाचल प्रदेश के 'दैनिक दिव्य हिमाचल' में कार्यरत है।
पूनम प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस संग्रह का मूल्य 150/- है।

इस अंक के रचनाकार

अविनाश वाचस्पति
14 दिसंबर 1958 का जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से कला स्नातक। सभी साहित्यिक विधाओं में समान रूप से लेखन। व्यंग्य, कविता एवं फिल्म पत्रकारिता विषयक आलेख प्रमुखता से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। हरियाणवी फीचर फिल्म 'गुलाबो' 'छोटी साली' और 'जर, जोरू और जमीन' में प्रचार और जनसंपर्क । नेत्रदान पर बनी हिंदी टेली फिल्म 'ज्योति संकल्प' में सहायक निर्देशक के तौर पर कार्य । वर्तमान में फिल्म समारोह निदेशालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली से संबद्ध। पता- साहित्यकार सदन, पहली मंजिल, 195 सन्त नगर, नई दिल्ली 110065  मोबाइल 09868166586
ईमेल-avinashvachaspati@gmail.com
मुकुन्द कौशल
7 नवम्बर 1947 को दुर्ग के एक गांधीवादी गुजराती परिवार में जन्में मुकुन्द कौशल हिन्दी, छत्तीसगढ़ी एवं उर्दू सहित गुजराती में भी लेखन करते हैं। देशभर की पत्र-पत्रिकाओं में 1960 से शताधिक रचनाएं प्रकाशित जिसमें प्रमुख सात काव्य संग्रह सहित 20 समवेत काव्य संकलनों में रचनाएं सम्मिलित। धारावाहिकों, टेलीफिल्मों व फीचर फिल्मों सहित 30 से अधिक ऑडियो एलबम्स के लिए गीत लेखन। 25 से अधिक पुरस्कार व सम्मान। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन
पता - एम-516, पद्मनाभपुर, दुर्ग- 491001 छत्तीसगढ़, मोबाइल - 093294-16167
नाजि़म नकवी
उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली, ऊंचाहार में जन्म। बीए इलाहाबाद से, शायरी का चस्का इसी शहर ने लगाया। अपने क़स्बे के नाम पर नाजि़म मुस्तफ़ाबादी के तख़ल्लुस से लिखना शुरू किया। पत्रकार बनने का सपना कभी नहीं टूटा, घरवालों की नाराजग़ी के बावजूद भी नहीं। छोटे से साप्ताहिक समाचार-पत्र इलाहाबाद केशरी के संपादन से जेब ख़र्च की कमी को पूरा किया। अपने क़स्बे से एक शाम का दैनिक समाचार 'ऊंचाहार मेलÓ की शुरूआत की जो सिर्फ 45 अंक के बाद बंद करना पड़ा।  दिल्ली आए जहां विनोद दुआ की शरण में जगह मिल गई, स्क्रिप्ट राइटर के तौर पर। तब से लेकर आजतक, पिछली एक दहाई से टीवी और फि़ल्मों की दुनिया में कुछ सार्थक कर पाने की जुगत में हैं।
पता- 2nd Floor, Plot No. 634, Sector 1, Vaishali, Ghaziabad
   Blog - http://awaazkepremi.blogspot.com
नितीन जानकीदास देसाई
27 जुलाई 1967 को जन्म। पुणे विद्यापीठ से एम ए हिंदी (अनुवाद), बैंकिग और सूचना तकनीक विषयों पर लेखन, मानव संबंध और स्वभाव पर कविताएं, वर्तमान में बैंक में अधिकारी।
 ईमेल- nitin67j@gmail.com

डॉ. सिद्धार्थ खरे


1977 से पत्रकारिता (प्रिंट व टेलीविजन) 2002 में बेस्ट रिपोर्टिंग के लिए माधव राव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय- शोध संस्थान भोपाल द्वारा स्थापित राज्य स्तरीय जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी अवार्ड। मध्यप्रदेश असेंबली प्रेस एडवाइजरी गैलरी के पूर्व सदस्य। मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के पूर्व जनरल सेके्रटरी ।
ईमेल-  khare.siddhartha@gmail.com

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वाह भई वाह

एक आईसक्रीम वाला बार-बार चिल्ला रहा था, 'एक बार खाएगा तो हजार बार खाएगा'।
यह सुन कर पास खड़े लड़के से रहा नहीं गया। वह उसकी नकल करते हुए बोला, 'मुफ्त में खिलाएगा तो लाख बार खाएगा'।
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आत्मीय प्रस्तुति

आत्मीय प्रस्तुति
उदंती का नया अंक पढ़कर ख़ुशी हुई । हमेशा की तरह यह अंक भी अच्छी साज-सज्जा, बेहतर रचनाओं और आत्मीय प्रस्तुति के कारण दिल को छू गया । बधाई ।
- देवमणि पांडेय, मालाबार हिल, मुम्बई
ब्लाग की असामयिक मौत
संजय तिवारी के लेख में इस बात का कोई जिक्र ही नहीं है कि ब्लाग की यह असामयिक मौत कैसे हो रही है। हां मैं इस बात से सहमत हूं कि बहुत सारे ब्लाग केवल नाम के लिए चल रहे हैं। उनमें कुछ गिने चुने लोग ही टिप्पणी करते हैं। मैं लिखूं तो तुम टिप्पणी करो और तुम लिखो तो मैं टिप्पणी करूं। संयोग से मैंने भी एक ब्लाग बनाया है। पर बहुत उत्साह का माहौल दिखता नहीं है। अगर हम सचमुच ब्लाग को जिंदा देखना चाहते हैं तो कुछ विचारवान लोगों को आगे आना पड़ेगा और इसमें भागीदारी करनी पड़ेगी। केवल दूर से बैठकर देखने या कहने से काम नहीं चलेगा। उदंती के इस अंक में वंदना से परिचय कराने के लिए आपको सौ-सौ सलाम। इतने अद्भुत चित्र मैंने पहली बार देखे हैं। खासकर चोटी में लिपटी बच्ची को देखकर मैं बेहद रोमांचित हूं। छत्तीसगढ़ की संस्कृति और कला पर सामग्री देखकर खुशी हुई। वंदना के चित्रों ने पत्रिका में चार चांद लगा दिए हैं। वंदना को भी बधाई।
- राजेश उत्साही, बैंगलोर
सराहनीय प्रयास
    यू हीं नेट को छानते हुए आपके उदंती.कॉम पर नजर पड़ी। पत्रिका का प्रयास और विचार सराहनीय है। शुभकामनाएं।
- अशोक कुमार, असिस्टेंट एडिटर, bhadas4media.com
नयनाभिराम कलेवर
उदंती के दो अंक देखें। सच कहूं, छत्तीसगढ़ की यह एक उपलब्धि है। इतनी सुंदर, सुरुचिपूर्ण, सुसज्जित पत्रिका मैंने अब तक नहीं देखी। खुद एक पत्रिका का प्रकाशन करता हूं लेकिन इस पत्रिका के नयनाभिराम कलेवर बाकी पत्रिकाओं को फीकी कर देती हैं। उदंती में छत्तीसगढ़ की महक है। साहित्य-संस्कृति एवं समकालीन विषयों का संस्पर्श करने वाली यह बहुरंगी पत्रिका निरंतर प्रकाशित होती रहे यही मेरी शुभकामना है।
- गिरीश पंकज, संपादक, सद्भावना दर्पण, रायपुर
पठनीय
उदंती का मार्च अंक मिला। प्रकाशन, गुणवत्ता की प्रशंसा पहले ही कर चुका हूं। रचनाएं इस बार भी पठनीय हैं। इस अंक में प्रकाशित  कविताएं पत्रिका के महत्व को बढ़ाती हैं।
- त्रिभुवन पाण्डेय, सोरिदनगर, धमतरी
संस्कृतियों का परिचय
उदंती अच्छी निकल रही है। इसमें बीच बीच में आप विभिन्न संस्कृतियों से परिचय कराने वाले लेख प्रकाशित करती हैं जो बहुत अच्छे व जानकारी प्रधान होते हैं।  ऐसे लेख हमेशा प्रकशित करने की कोशिश करें।    
                 - शेली खत्री, जबलपुर
आजाद भारत की भयावह हकीकत
उदंती का मार्च अंक आनलाइन पढऩे को मिला। नक्सलग्रस्त इलाके का यात्रावृतांत- मैंने देखा एक समृद्ध संस्कृति को विलुप्त होते... काफी अच्छा लगा। पढ़कर ताज्जुब हुआ कि वहां के हालात इतने जटिल हैं। बिना किसी लागलपेट के यह वृतांत लिखा गया है। दाद देनी होगी अंजीव जी के हिम्मत की जिन्होंने हमें आजाद भारत के इस भयावह हकीकत से अवगत कराया। उदंती के प्रकाशन के लिए संपादकीय टीम को कोटिश: बधाई। 
- श्वेता शर्मा, कवयित्री, यू.एस.ए.

तिनके नहीं मिलेंगे तब बाल ही काम आएँगे, उम्र को भूल जाइए...

तिनके नहीं मिलेंगे तब
बाल ही काम आएँगे

चिडिय़ा अपना घोंसला बनाने के लिए तिनकों का सहारा लेती है, लेकिन जिस रफ्तार से हम अपनी प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं एक दिन ऐसा न हो कि चिडिय़ों को तिनके का सहारा भी न मिलें। तब हो सकता है   उन्हें  दूसरी वस्तुओं से उन्हें अपना आशियाना सजाना पड़े। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह इन चिडिय़ों ने जोएन के सफेद बालों से अपना घोंसला बनाया। 
जाब्रियान विलियम्स ने जब बाल कटाए तो इसका फायदा उनके अलावा उन चिडिय़ों को भी हुआ जिन्हें इसकी बदौलत आशियाना मिल गया। ब्रियान के बाल हर महीने उनकी पत्नी जोएन काटती थी।
  जोएन कटे बालों को एक कागज में इकट्ठा कर बगीचे में डाल आती। वहीं अपना घोंसला बना रही कुछ चिडिय़ा तिनके की जगह इन बालों को इस्तेमाल करतीं। 68 वर्षीय सेवानिवृत शिक्षक विलियम्स ने बताया कि एक दिन में मैंने देखा कि गोल्डफिंच, ग्रीनफिंच और राबिन चिडिय़ों ने मेरे सफेद बालों का एकत्रित कर घोंसला बना लिया है तो हैरान रह गया। मेरे बालों का इतना अच्छा इस्तेमाल देखकर मुझे बड़ी खुशी मिली।
बार्नस्टेपल के रहने वाले इस दंपति ने बताया कि सबसे पहले हमने राबिन का घोंसला देखा। लेकिन बाद में पाया कि गोल्डफिंच और ग्रीनफिंच ने भी बालों से अपने घोंसले बना लिए हैं। जोएन ने बताया कि बालों को फेंकते समय मैंने बिल्कुल नहीं सोचा था कि इनका इतना अच्छा इस्तेमाल भी हो सकता है।
उम्र को भूल जाइए...
जैसे- जैसे हमारी उम्र बढऩे लगती है हमारा शरीर भी थकने लगता है। इसके साथ ही कई शारीरिक समस्याएं शुरु हो जाती हैं। लेकिन दक्षिण-पूर्व आस्ट्रेलिया की 83 वर्षीय योग प्रशिक्षक बेट्टी काल्मैन ने तो जैसे उम्र को मात दे दी है। इस उम्र में वह जहां चुस्त दुरुस्थ बनी हुई है वहीं आज भी वह कठिन से कठिन योगासनों को सहजता से कर लेती हैं। उनके चेहरे पर योग की चमक व फिटनेस साफ नजर आती है।
अपनी जिंदगी योग को समर्पित कर चुकी बेट्टी पिछले 40 सालों से लोगों को योग सिखा रही हैं। उनका कहना है योग आपको रबर की तरह लचीला बनाए रखता है। कमलासन हो, शीर्षासन या कठिन योगमुद्रा, बेट्टी के लिए यह सब इतना सहज है जैसे किसी के लिए पैदल चलना। बेट्टी का कहना है कि 50 साल पहले मैं जितना योग कर सकती थी आज उससे ज्यादा कर सकती हूं। यह कभी आपको बूढ़ा नहीं होने देता। उनका कहना है कि आपका शरीर एक अद्भुत उपकरण है। आप इसे जितना चाहे खींच सकते हैं। हर बार आपको बेहतर परिणाम ही मिलेगा।
काल्मैन योग पर तीन किताबें भी लिख चुकी हैं। इन दिनों वह सप्ताह में 11 क्लास लेती हैं। मुस्कुराते हुए वह इतना जरूर कहती हैं कि योग कर रहे हैं तो उम्र को भूल जाइए।

Apr 27, 2009

उदंती.com, अप्रैल 2009

वर्ष 1, अंक 9, अप्रैल 2009
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लोकतंत्र इस धारणा पर आधारित है कि साधारण लोगों में असाधारण संभावनाएं होती हैं।
— हेनरी एमर्शन फास्डिक
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अनुभव
जब तक हम कड़वेपन के स्वाद का अनुभव प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक मिठास के स्वाद का आनंद भी नहीं पा सकते।
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