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Aug 25, 2010

छोटे- बड़े सपने...

- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
तीनों बच्चे रेत के घरौंदे बनाकर खेल रहे थे।
सेठ गणेशीलाल का बेटा बोला 'रात मुझे बहुत अच्छा सपना आया था।'
'हमको भी बताओ।' दोनों बच्चे जानने के लिए चहके।
'उसने बताया 'सपने में मैं बहुत दूर घूमने गया, पहाड़ों और नदियों को पार करके।'
नारायण बाबू का बेटा बोला 'मुझे और भी ज्यादा मजेदार सपना आया। मैंने सपने में बहुत तेज स्कूटर चलाया। सबको पीछे छोड़ दिया।'
जोखू रिक्शेवाले के बेटे ने अपने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा 'तुम दोनों के सपने बिल्कुल बेकार थे।'
'ऐसे ही बेकार कह रहे हो। पहले अपना सपना तो बताओ।' दोनों ने पूछा।
इस बात पर खुश होकर वह बोला 'मैंने रात सपने में खूब डटकर खाना खाया। कई रोटियां, नमक और प्याज के साथ, पर....'।
'पर...पर क्या?' दोनों ने टोका।
'मुझे भूख लगी है।' कहकर वह रो पड़ा।
कट्टरपंथी
पूरे शहर में मौत जैसा सन्नाटा छाया हुआ था। सुनसान गलियों में आतंक पहरा दे रहा था। लोग जरा- सी तेज आवाज पर भी चौंक उठते। पंडित दीनदयाल आंगन में बैठे हुए थे।
दरवाजे पर थपथपाहट हुई। बिना कुछ सोचे- समझे उन्होंने द्वार खोल दिया। एक युवक तेजी से भीतर आया और गिड़गिड़ा उठा 'मुझे बचा लीजिए। कुछ गुण्डे मेरे पीछे पड़े हैं।' याचना उसकी आंखों में तैर रही थी।
पंडित किंकर्तव्यविमूढ़ । कट्टरता नस- नस में बसी थी। किसी का छुआ अन्न-जल तक ग्रहण नहीं करते थे। उन्होंने आग्नेय नेत्रों से युवक को घूरा। वह सिहर उठा।
भीड़ दरवाजे पर आ चुकी थी। युवक को उन्होंने भीतर कोठरी में जाने का इशारा किया।
भीड़ में से एक बाहर निकल आया- 'पंडित जी, एक काफिर इधर आया था। हमने उसको इसी दरवाजे में घुसते देखा है। देखिए न, वह अन्दर कोठरी में बैठा है।'
पंडितजी हंसे- 'उसे तुम काफिर कह रहे हो? अरे वह तो मेरा भतीजा सोमदत्त है। आज ही जबलपुर से आया है। बाहर घूमने निकल गया था। वह तुमको मुसलमान समझकर भाग खड़ा हुआ होगा।'
'पंडितजी, आप झूठ बोल रहे हैं।' कई स्वर उभरे 'अगर आप इसके हाथ का पानी पी लें तो हमें यकीन हो जाएगा।'
पंडितजी ऊंची आवाज़ में बोले- 'बेटा सोमदत्त, एक गिलास पानी ले आना।' पानी आ गया। पंडितजी एक ही सांस में गट्गट् पी गए- 'अब तो तुम्हें विश्वास हो गया?'
'हां! हो गया।' और भीड़ लौट गई।
युवक की आंखों में कृतज्ञता तैर रही थी।

तिरंगे को सलाम

- नवीन जिंदल
तिरंगा लहराना और भारत को एक सूत्र में बांधना युवाओं को मजबूत भारत के निर्माण के लिए प्रेरित करता है।
डलास की टैक्सास यूनिवर्सिटी में पढ़ते समय, 20 साल के युवा, नवीन जिंदल ने अध्ययन के दौरान अमेरिका के लोगों को अपने झंडे पर गर्व से इठलाते हुए देखा था। उनका घर हो या पहनने के कपड़े सभी पर उनके झंडे पर बने तारे और पट्टियां नजर आती थीं और अमेरिका के लोगों का गर्व अपने देश में उनके राष्ट्रीय झंडे के रूप में स्वत: प्रकट होता है।
इस प्रवृत्ति को देखकर युवा नवीन जिंदल ने सोचा कि ऐसा हमारे देश में क्यों नहीं हो सकता है? उच्चतम न्यायालय ने 2004 में उनको इसका जवाब दिया, जब अपने ऐतिहासिक फैसले में उसने व्यवस्था दी कि आदर और गरिमा के साथ स्वतंत्र रूप से राष्ट्रीय झंडे को फहराना प्रत्येक भारतीय नागरिक का मौलिक अधिकार है। छात्र जीवन के प्रारंभ में ही राष्ट्रीय झंडे के लिए नवीन जिंदल के मन में बेहद श्रद्धा का भाव था, वहां पर वे छात्रों की अधिसभा के अध्यक्ष के रूप में अपने राष्ट्रीय झंडे का प्रदर्शन बड़े ही गर्व के साथ करते थे।
यूएस में अपनी उच्च शिक्षा को पूरी करने के बाद, 1992 में भारत वापस आने के बाद भी नवीन जिंदल ने छत्तीसगढ़ (तब मप्र) में रायगढ़ की अपनी फैक्ट्री के परिसर में भारत के राष्ट्रीय ध्वज को सम्मानजनक तरीके से फहराकर भारत का नागरिक होने के नाते अपने कत्र्तव्य और सम्मान को प्रदर्शित करना जारी रखा। बिलासपुर के तत्कालीन आयुक्त ने तब आपत्ति जताई थी कि भारत के ध्वज संहिता के अनुसार, किसी भी गैर-सरकारी नागरिक को निश्चित दिनों को छोड़कर भारतीय ध्वज फहराने की अनुमति नहीं थी।
नवीन जिंदल के अतिविशाल ध्वज
0 सोनीपत, हरियाणा में 207 फीट विश्व में सबसे ऊंचा झंडा।
0 कुरूक्षेत्र, कैथल, लडवा, हिसार व हरियाणा में 206 फीट ऊंचा।
0 दिल्ली और गुडग़ांव, हरियाणा में 100 फीट ऊंचा।
0 रायगढ़, छत्तीसगढ़ में 100 फीट ऊंचा।
0 अंगुल, उड़ीसा में 206 फीट ऊंचा।
नवीन जिंदल ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत, सरकारी पदाधिकारी द्वारा उन्हें राष्ट्रीय घ्वज को फहराने से मना करने की कार्रवाई के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका प्रस्तुत की। किसी गैर-सरकारी व्यक्ति द्वारा झंडा फहराने पर रोक लगाने का कोई कानून नहीं था और ऐसा करने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन था, यह अनुच्छेद सभी भारतीय नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी प्रदान करता है। केन्द्रीय सरकार ने इसकी व्याख्या दी थी लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय की खंड पीठ ने 22 सितंबर 1995 को नवीन जिंदल द्वारा प्रस्तुत रिट याचिका को अनुमति दे दी थी। यह संघर्ष लगभग एक दशक से भी अधिक समय तक चलता रहा और अन्तत: 23 जनवरी, 2004 को माननीय उच्चतम न्यायालय ने नवीन जिंदल और भारत के नागरिकों के पक्ष में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। इस प्रकार, एक दशक पुरानी कानूनी लड़ाई में जीत हासिल हुई। श्री जिंदल का दूसरा अभियान भी सफल रहा था जब दिसंबर 2009 में गृह मंत्रालय ने स्मारकों/ विशाल खंभों पर रात्रि में पर्याप्त रोशनी के साथ ध्वज को फहराने के उनके प्रस्ताव पर अपनी सहमति जताई थी। इसके बाद, उन्होंने अपने अभियान को आगे बढ़ाया और फरवरी 2010 में माननीय स्पीकर के माध्यम से भारतीय संसद की नियम समिति से संसद सदस्यों को सदन में बैठने के दौरान लेपल पिन से राष्ट्रीय ध्वज को प्रदर्शित करने की अनुमति प्राप्त की।
नवीन जिंदल का अगला कदम तिरंगे को देशभक्ति के अगले मुकाम पर ले जाना था। उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को 100 फीट से अधिक ऊंचे खंभे पर फहराना शुरू किया।
माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय से प्रेरित होकर नवीन जिंदल ने 'फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया' की स्थापना की थी जिसके माध्यम से वे प्रत्येक भारतीय को तिरंगे से अपने आप को जोडऩा चाहते हैं। फ्लैग फाउंडेशन आज के युवा वर्ग को इस तिरंगे से जोडऩे के लिए पूरी निष्ठा से प्रयास कर रहा है ताकि आजादी के लिए हमारे संघर्ष का यह शक्ति का प्रतीक बन सके और उन करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा के महान स्रोत के रूप में सेवा कर सके जो पूरे विश्व में अपने-अपने कार्यक्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रहे हैं।
फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने हरियाणा में झंडा फहराने के लिए पांच विशाल खंभों की स्थापना पहले ही कर दी है। इनका वजन 12.5 टन है और इनको इस प्रकार से बनाया गया है कि इन पर लगभग 325 वर्ग मीटर के आकार वाले झंडे को फहराया जा सकता है। झंडे को सभी मौसमों में सुरक्षित रहने वाले 'डेनियर पॉलीस्टर' नामक विशेष सामग्री से तैयार किया जाता है जो तूफान हो या कोई अन्य मौसम सभी में पूरी तरह से सुरक्षित रहता है।
जब हम राष्ट्रगान की धुन के साथ हवा में अठखेलियां करते राष्ट्रीय ध्वज को देखते हैं तो हम रोमांचित हो उठते हैं। यद्यपि यह केवल एक कपड़े का टुकड़ा ही तो है लेकिन यह ध्वज हमारे दिमाग और दिल पर जो अमिट छाप छोड़ता है वह अतुलनीय है। हमारी देशभक्ति उस समय ऊंचाइयों को छूने लगती है जब हम विजेन्द्र सिंह या अभिनव बिन्द्रा को उनके पदक को लेने के लिए ओलंपिक के मंच पर ऊपर चढ़ते समय भारतीय तिरंगे को फहराया जाता देखते हैं। राष्ट्रीय ध्वज, चैंपियन और सैनिक दोनों को आनंद से झूमने पर मजबूर कर देता है।
आज के समय में, जब भारत आर्थिक महाशक्ति बनने और वैश्विक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए अपने विकास पथ पर निरंतर आगे बढ़ रहा है तो राष्ट्रीय ध्वज को स्वच्छन्दता से लहराते देखकर और भी अच्छा लगता है।
स्वतंत्रता दिवस के पावन मौके पर, आओ अपने मौलिक अधिकारों का सदुपयोग करें और अपने राष्ट्रीय ध्वज को इतनी ऊंचाई पर फहराएं जितनी ऊंचाई पर हम इसे लहराता देखना चाहते हैं। अपने देश के महान प्रतीक के माध्यम से गर्व के साथ अपने अनुराग को व्यक्त करने का समय आ गया है और जैसा कि 14 अगस्त, 1947 को जवाहर लाल नेहरू ने भी कहा था कि 'विकास के भावी कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करके और अपने अनूठे देश के लिए राष्ट्रवाद की भावना को जगा कर हमें अपनी नियति को पहले से ही निश्चित कर लेना चाहिए।'
नवीन जिंदल का कहना है 'राष्ट्रीय ध्वज फहराने से व्यक्ति धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रवाद के संकीर्ण विचारों से ऊपर उठ जाता है और भारतीय होने के गर्व की भावना से ओत-प्रोत हो जाता है। हमारा तिरंगा प्रत्येक भारतीय के धर्म, भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीयता का प्रतिनिधित्व करता है और यह सच है कि यह 'विविधता में एकता' का महान प्रतीक है।'
ध्वज फहराने की वह लंबी लड़ाई
0 यूएस में अपनी उच्च शिक्षा को पूरा करने के बाद नवीन जिंदल 1992 में भारत वापस आए।
0 उन्होंने छत्तीसगढ़ (तब मध्य प्रदेश) में रायगढ़ में अपनी फैक्ट्री के परिसर में राष्ट्रीय ध्वज को सम्मानजनक तरीके से फहराया।
0 बिलासपुर के आयुक्त ने इस पर इस आधार पर आपत्ति जताई कि भारत में ध्वज संहिता के अनुसार, कतिपय दिनों को छोड़कर गैर सरकारी व्यक्ति को भारतीय ध्वज को फहराने की अनुमति नहीं है।
0 नवीन जिंदल ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सरकारी पदाधिकारी द्वारा राष्ट्रीय ध्वज को फहराने से मना करने पर दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की।
0 दिल्ली उच्च न्यायालय की खंड पीठ ने 22 सितंबर 1995 को नवीन जिंदल द्वारा दाखिल रिट याचिका को अनुमति दे दी।
0 भारत संघ ने जनवरी 1996 की किसी तिथि को उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक विशेष इजाजत याचिका प्रस्तुत की।
0 7 फरवरी 1996 को माननीय उच्चतम न्यायालय ने इसकी अनुमति दे दी थी और विरोधी फैसले के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी थी।
0 भारत संघ ने 18 अक्टूबर 2000 को एक अन्तर-मंत्रालय समिति का गठन किया था।
0 नवंबर 2000 से लेकर मई 2001 तक सरकार उच्चतम न्यायालय से बार-बार स्थगन मांगती रही। विलंब की इस प्रकार के दांव- पेचों पर कड़ा रुख अपनाते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय ने २ मई 2001 को राष्ट्रीय ध्वज को उचित सम्मान, श्रद्धा और गर्व के साथ फहराने की अनुमति प्रदान कर दी थी।

रंग- बिरंगी दुनिया

सबसे बुजुर्ग नवविवाहित जोड़ा... 
अभी तो मैं जवान हूं...
कहते है प्यार की कोई उम्र नहीं होती इसी बात को साबित किया है हेनरी और वेलरी ने। ब्रिटेन की हेनरी केर की उम्र 97 साल है और वेलरी ब्रेकोवित्ज 87 साल की हैं। इन दोनों की उम्र पर मत जाइए क्योंकि इनके दिल अब भी जवां हैं। जी हां यह जोड़ा ब्रिटेन में शादी करने वालों में सबसे बुजुर्ग नवविवाहित जोड़ा है।
यह दोनों जवान जोड़ा दोनों लंदन में बुज़ुर्गों के लिए बने एक आवासीय परिसर में रहते हैं जहां उनकी पहली मुलाकात हुई थी। हेनरी को वेलरी से पहली नजर में ही प्यार हो गया लेकिन इस प्यार को उन्हें शादी में बदलने के लिए चार साल तक इंतजार करना पड़ा। उत्तरी लंदन के गोल्डर्स ग्रीन में दोनों ने यहूदी रीति- रिवाज से शादी की।
दोनों के बीच प्यार का सिलसिला तब शुरू हुआ जब हेनरी की कविताएं सुनने वालों के दल में वेलेरी शामिल हुईं। दोनों के कुछ साझा दोस्त थे जो दक्षिण अफ्रीका के उनके प्रवास के समय में बने थे। वेलेरी जोहानसबर्ग में पढ़ाती थीं और हेनरी सिनेमा के लिए वहां काम करते थे। हेनरी ने बताया कि वेलेरी से प्यार का इजहार उन्होंने चाय की प्याली की चुस्कियों के दौरान किया था लेकिन शादी के लिए हां करने में वेनेरी ने काफी समय भी लिया। दोनों पहले से शादीशुदा रह चुके हैं। वेलेरी की 70 साल पहले और हेनरी की 60 साल पहले शादी हुई थी। इस समय दोनों के बच्चे अमेरिका में रहते हैं।
यह तो हुई ब्रिटेन की बात पर हमारे देश में भी पिछले दिनों इसी तरह एक शादी हो चुकी है। खुरई सागर मध्यप्रदेश में 76 वर्षीय लल्ली अहिरवार और 65 वर्षीय भागबाई ने अक्षय तृतीया के दिन वैदिक रीति-रिवाज शादी करके यही साबित किया कि प्रेम में उम्र बाधक नहीं होती। इन दोनों के भी पूर्व जीवन साथी की मृत्यु हो चुकी है।
लल्ली और भागबाई की प्रेम कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। भागबाई मजदूरी करती हैं और वह लल्ली के गांव रजवास में काम के सिलसिले में गई थी वहीं दोनों की मुलाकात हुई और फिर मुहब्बत की गाड़ी चल पड़ी। नाति-नातिन वाले ये दोनों बुजुर्ग साथ रहना चाहते थे, मगर उनकी यह इच्छा उनके ही बच्चों को नागवार गुजरी। परिवार का सहयोग न मिलने के कारण दोनों की यह इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी। लेकिन इनका प्यार देखकर कुछ समाजसेवी आगे आए, उन्होंने दोनों बुजुर्गों का घर बसाने का निर्णय लिया और अक्षय तृतीया के दिन उनकी शादी करा दी। दोनों अब शादी के बाद खुश हैं।

Aug 11, 2010

समय रहते मां को मना लेना चाहिए

समय रहते मां को मना लेना चाहिए
अनकही में धरती माता क्रोधित है के जरिए आपने सही कहा है कि पर्यावरण के प्रति हम अभी सचेत नहीं हो रहे हैं। यह धरती मां का ही तो क्रोध है कहीं बाढ़ तो कही सूखा पड़ा है। मां कभी अपने बच्चों का बुरा नहीं करती समय रहते हमें अपनी मां को मना लेना चाहिए।
तनाव भरी जिंदगी में हंसी के दो पल कितना सुकून दे जाते हैं ...रामेश्वर जी के सावधान! मैं आत्मकथा लिख रहा हूं गुदगुदाने वाले व्यंग्य के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और बधाई।
- सुमीता
दुखांत कहानी
परितोष चक्रवर्ती की कहानी चॉकलेट पढ़कर ऐसा लगा जैसे उन्होंने अपनी किसी लम्बी कहानी या उपन्यास के लिए जो नोट्स लिए हैं वही प्रस्तुत कर दिए। हालांकि विषय अछूता है। अगर हम इसे कहानी मान भी लें तो उसका अंत उन्होंने जिस तरह से किया है, वह सारे कथानक और उपजी संवदेना को एक झटके में नष्ट कर देता है। मेरे ख्याल से कहानी की सफलता इसी बात में थी कि वह पाठक के दिमाग में इन बच्चों के जीवन के बारे में सोचने का सबब बने। वे जब भी स्टेशन पर इन बच्चों को देखें उनके बारे में सोचें। लेकिन जो दुखांत है वह कहानी को याद रखने लायक ही नहीं छोड़ती। कायदे से कहानी को ...वे प्लेटफार्म की ओर दौड़ पड़े । शायद राजधानी में कुछ खाने का सामान हाथ लग जाए... पर ही खत्म कर देना चाहिए था।
- राजेश उत्साही, बैंगलोर, utsahi@gmail.com
अच्छी कविताएं
उदंती के जून अंक में पर्यावरण और प्रकृति से सम्बंधित सभी लेख अच्छे हैं। दोनों कविताएं भी बहुत अच्छी लगीं।
-देवमणि पाण्डेय, devmanipandey@gmail.com

सटीक विचार
अनकही में आपने पर्यावरण को विषय के रूप में चुन कर सार्थक और सटीक विचार व्यक्त किया है। आप बधाई की पात्र हैं। मां का गुस्सा तो तभी फूटता है जब उसकी संतानें बड़ी गलती करते हैं।
सुरेश यादव, नई दिल्ली - sureshyadav55@gmail.com
स्मारकों की भव्यता
राजीव धौम्या की सुंदर शैली से ही राजस्थान के स्मारकों की भव्यता का उचित वर्णन किया जा सकता है। राजस्थान की ऐसी खूबसूरत यात्रा पर ले जाने के लिए राजीव को धन्यवाद।
-दीपक, आभा मेनन, नई दिल्ली, deepak.demoninlove@gmail.com

मीडिया का कच्चा- चिट्ठा
जहां खबरें बिकती हैं में संजय द्विवेदी ने मीडिया के वर्तमान स्वरुप का कच्चा- चिट्ठा खोल कर रख दिया है। सब कुछ सामने है फिर भी ऐसा लगता तो नहीं कि मीडिया अपनी नीतियों को बदलेगा। यह सब वास्तव में बहुत ही दुखद है।
-स्नेहा सिंह, इंदौर
विज्ञान कल्पना से ही शुरु होती है
पर्यावरण सुधार पर प्रो. वॉग की यह ललित कल्पना कि ध्रुव प्रदेशों में सीढ़ी बनाकर उधर से पृथ्वी की उत्सर्जित कार्बन डाई आक्साइड अंतरिक्ष में फेंक दी जाए, अभी कल्पना है। विज्ञान की हर नई खोज रचनात्मक, कल्पना से शुरू होती आई है पर अभी व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो इसमें एक बड़ी कठिनाई है। वह है सुर्य से निरंतर निकलने वाली प्रचंड वायु जिसे सोलर विंड कहा जाता है। इससे शौर्य वायु के धु्रवों पर टकराने से ध्रुवीय प्रकाश दिखता है। इसका वेग और इसके अवेशित धूल कण चार्ज पार्टिकल्स कार्बन डाई आक्साइड पर क्या प्रतिक्रिया और अभिक्रिया करेंगे। यह प्रयोग से स्थापित करना होगा। बहरहाल इस ललित वैज्ञानिक कल्पना को उदंती ने प्रकाशित किया इसके लिए बधाई। सोलर विंड और पृथ्वी की चुंबकीय क्षेत्र के बीच प्रतिक्रिया का चित्र संलग्न है। जो पाठकों का निश्चय ही ज्ञानवर्धन करेगा।
- बृजेन्द्र श्रीवास्तव, ग्वालियर, brijshrivastava@rediffmail.com

Jul 12, 2010

उदंती.com, जुलाई 2010

वर्ष 2, अंक 12, जुलाई 2010
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बुरे लोग तभी जीतते हैं जब अच्छे लोग कुछ नहीं करते।
- अब्राहम लिंकन
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