मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Feb 17, 2010

इस अंक के लेखक


राहुल कुमार सिंह
जन्म - 21.11.1958 शिक्षा - स्वर्ण पदक सहित स्नातकोत्तर उपाधि (प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व), प्रावीण्यता सहित स्नातकोत्तर पत्रोपाधि। शोध- 'जांजगीर का विष्णु मंदिर' तथा 'भारतीय संग्रहालय के कार्य' अकादमिक शोध-लेखन। 1984 से शासकीय सेवा में। लेखन- छत्तीसगढ़ राज्य गठन के अवसर पर मध्यप्रदेश शासन, उच्च शिक्षा विभाग एवं म.प्र. हिन्दी ग्रथ अकादमी के समवेत उपक्रम की पत्रिका 'रचना' द्विमासिक नवंबर 2000 अंक में 'छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढि़या' शीर्षक से मुख्य लेख प्रकाशित। प्रसिद्घ नाटक 'जसमा ओडऩ' का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद। शोध पत्र, पत्रिकाओं, आकाशवाणी, दूरदर्शन के लिए कला, साहित्य, संस्कृति एवं पुरातत्व विषयों पर नियमित लेखन, वक्तव्य। 500 से भी अधिक ग्रामों का ग्रामवार पुरातत्वीय व सांस्कृतिक सर्वेक्षण। बिलासा सम्मान 2008 से सम्मानित।
सम्पर्क- संचालनालय, संस्कृति एवं पुरातत्व,
महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय,
सिविल लाइन्स, रायपुर, मोबाइल- 09425227484
Email- rahulks58@yahoo.co.in
डॉ. दीप्ति गुप्ता
आगरा विश्वविद्यालय से शिक्षा। अमृतलाल नागर के उपन्यासों पर पी.एच-डी.। क्रमश: रूहेलखंड विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली एवं पुणे विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यापनरत। तीन वर्ष के लिए भारत सरकार व्दारा 'मानव संसाधन विकास मंत्रालय', नई दिल्ली में 'शैक्षिक सलाहकार' पद पर नियुक्त। समय से पूर्व रीडर पद से स्वैच्छिक अवकाश लेकर पूर्णतया रचनात्मक लेखन में संलग्न। राजभाषा विभाग, हिन्दी संस्थान, शिक्षा निदेशालय व शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली आदि अनेक सरकारी एवं गैर-सरकारी विख्यात संस्थानों में एक प्रतिष्ठित अनुवादक के रूप में सेवा। हिंदी और अंग्रेज़ी में कहानियां व कविताएं, सामाजिक सरोकारों के लेख व पत्र प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित। हिंदी में 'अंतर्यात्रा' और अंग्रेज़ी में 'ओसेन इन द आई' कविता संग्रह प्रकाशित। लेखन के अतिरिक्त 'चित्रकारी' में गहन रुचि।
सम्पर्क- 2 ए, आकाशदूत सोसायटी, 12 ए,
नॉर्थ एवेन्यू, जॉगर्स पार्क के सामने
कल्याणी नगर, पुणे - 411006,
मोबाइल - 098906 33582
Email- drdeepti25@yahoo.co.in
कमल चोपड़ा
सितम्बर 1955 पंजाब में जन्म। शिक्षा- चिकित्सा स्नातक। लेखन- लघुकथा, कहानी, बाल कहानी। लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां, लघुकथाएं व बाल कहानियां प्रकाशित। कृतियां- अतिक्रमण (कहानी संग्रह), अभिप्राय (लघुकथा संग्रह), फंगस (लघुकथा संग्रह),अन्यथा (लघुकथा संग्रह)। सम्पादन- 1.हालात 2.प्रतिवाद, 3.अपवाद, 4.आयुध, 5.अपरोक्ष, लघुकथा संग्रहों का सम्पादन व 'संरचनाÓ पत्रिका का संपादन। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन/ व्यवसाय।
सम्पर्क- 1600/114, त्रिनगर, दिल्ली- 110035,
फोन- 011-27381899.
डॉ. गीता गुप्त
साहित्य की सभी विधाओं में देश भर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं आकाशवाणी में रचनाएं प्रकाशित एवं प्रसारित। आत्मकथ्य- सृजन धर्मिता मुझे जीने का संकल्प प्रदान करती है। लिखना मेरे लिए जीवन का पर्याय है और अस्तित्व का बोधक भी। सम्प्रति- उच्च शिक्षा सेवा में।
सम्पर्क- ई-182/2, प्रोफेसर्स कॉलोनी,
भोपाल 462002 (म.प्र.)
मोबाइल- 09424439324
बुधराम यादव
3 मई 1946 ग्राम खैरवार (खुर्द) लोरमी बिलासपुर जिले में जन्म। सिविल अभियांत्रिकी में पत्रोपाधि। 1965 से छत्तीसगढ़ी एवं हिन्दी में सृजन एवं प्रकाशन। प्रकाशित कृति - अंचरा के मया- छत्तीसगढ़ी गीत कविता संग्रह, संप्रति - सेवा निवृत्त अभियंता।
संपर्क - एम.आई.जी. 4/8 चंदेला नगर,
रिंग रोड क्र. 2 बिलासपुर (छ.ग.)
मोबाइल- 097551 41676

आपके पत्र

हिंदी भाषा
सटीक तर्कों और तथ्यों वाला शानदार आलेख। लेखक को साधुवाद कि उन्होंने छत्तीसगढ़ी को पर्याप्त महत्व देते हुए हिंदी की अनिवार्यता को साबित किया। व्यावहारिक और भावनात्मक, दोनों पहलुओं से। यह ध्यान देने वाली बात है कि हिंदी और छत्तीसगढ़ी में कोई विरोध ही नहीं है। हर छत्तीसगढिय़ा हिंदी से भी बराबर प्रेम करता है और उतना ही मान (या कहें कि कहीं ज़्यादा) देता है। हिंदी भाषा से बढ़कर राष्ट्रभाषा है और छत्तीसगढ़ी हमारी अपनी बोली है। एक को पाने के लिए दूसरे को छोडऩे की कोई आवश्यकता नहीं है, और इसलिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है।
-विवेक गुप्ता, भोपाल, vivekbalkrishna@gmail.com
महंगाई भ्रष्टाचार का पौधा है
उदंती के पिछले दोनों अंक खास हैं। नवंबर अंक में लेव निकोलायेविच के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा। ऐसे ही महान लेखकों की दिनचर्या उर्जा और प्रेरणा देती है। महत्त्वाकांक्षी फूल बहुत ही सुंदर कहानी है। खलील जिब्रान जैसे दार्शनिक लेखक को बार -बार पढऩा अच्छा लगता है, जीवन यदु की ...पर मुझको खटना पड़ता है, कविता को मर-मर जीने में... बहुत अच्छी पंक्तियां। अनकही में भ्रष्टाचार और गरीबी का घातक गठबंधन बहुत ही विचारोत्तेजक लेख है - भ्रष्टाचार आज हर जगह व्याप्त है। छोटे से छोटा कर्मचारी हर बात के लिये पैसे की मांग करता है और हम भी अपना समय बरबाद न हो इसके लिए उसकी मांग पूरी करते हैं। आज भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। महंगाई भ्रष्टाचार का ही पौधा है। ... दिसंबर अंक में अनकही पढ़ कर यही कहूंगी कि जलसमस्या आज विकराल रुप धारण करने के कगार पर है । यदि हम अब भी नहीं चेते तो बड़ी देर हो जायेगी । केवल सरकार को ही नहीं हमें भी इस ओर कड़े कदम उठाने होंगे। कोंकण की खूबसूरत यात्रा वृत्तांत या फिर यूं कहें कि यात्रा करवाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
सुमीता केशवा, मुम्बई, sumitakeshwa@yahoo.com
सुंदर अंक
उदंती का दिसम्बर अंक पढ़ा। मन्टो की कहानी, दीपाली की लघुकथाएं, समोसा माट साब और मुक्तादास के बारे में एक सांस में ही पढ़ गया। सुंदर अंक के लिए बधाई स्वीकारें।
- राजेश उत्साही, बैंगलोर, utsahi@gmail.com
सड़क चिंतन
सुरेश कांत जी हमारे समय के महत्वपूर्ण व्यंग्यकार हैं। उनकी शैली, जैसा कि आपने 21 वीं सदी के व्यंग्यकार में प्रकाशित सड़क चिंतन पर टिप्पणी करते हुए उनके व्यक्तित्व का आंकलन उन्हें बहुत सहज-सरल कहा है। यही विशेषता उन्हें अन्यों से अलग करती है ।
-जवाहर चौधरी, 16 कौशल्यापुरी, चितावद रोड, इन्दौर, jc.indore@gmail.com
कोकण यात्रा
प्रकृति मन को ताजगी और ऊर्जा से भर देते हैं। उदंती में आप समय समय पर हमें विभिन्न पर्यटन एवं पुरातत्व स्थलों के बारे में जानकारी देती हैं, जो पढऩे वालों को भी प्रकृति के करीब जाने और उन स्थलों की सैर के लिए उकसाते हैं। अभिषेक ओझा की पहाडिय़ों पर बसा कोंकण संस्मरण पढ़ते हुए यात्रा का अहसास तो हुआ ही साथ में दिये चित्रों से उन सुरम्य वादियों में घुमने की इच्छा और बलवती हो गई।
- लतिका शर्मा, दुर्ग

Dec 2, 2009

उदंती.com, दिसम्बर 2009


वर्ष 2, अंक 5, दिसम्बर 2009
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शालीनता का मोल नहीं लगता, पर उससे सब कुछ खरीदा जा सकता है।
- लेडी मांटेग्यू
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अनकही: छिति जल पावक गगन समीरा...


छिति जल पावक गगन समीरा...


उपरोक्त शब्दों से महाकवि तुलसीदास ने सरल भाषा में पंचतत्व के गूढ़ार्थ को स्पष्ट किया है। पंचतत्व के रूप में हमारे मनीषियों ने पर्यावरण के मुख्य निर्णायक अवयवों की पहचान हजारों वर्ष पहले ही कर ली थी। इतना ही नहीं हमारे पूर्वजों ने यह जानकर कि पर्यावरण के उचित संतुलन पर समूची प्रकृति का अस्तित्व निर्भर है, पर्यावरण के निर्णायक अवयवों को पूजनीय भी निर्धारित कर दिया था। बड़ी संख्या में वेदों की ऋचाओं में धरती, वृक्षों, नदियों, सूर्य, आकाश इत्यादि की स्तुति की गई है। कालांतर में प्रकृति के प्रति आस्था हमारी परंपरा का स्थायी अंग बन गई और आज तक चली आ रही है।
प्राकृतिक पर्यावरण के पूजनीय मानने का ही यह परिणाम था कि हमारे देश की समृद्धि की पूरे विश्व में ख्याति थी और इसे सोने की चिडिय़ा कहा जाता था। विश्व में मान्यता थी कि भारत में दूध की नदियां बहती थीं। यह ख्याति अंग्रेजों के भारत में आने के पहले तक बरकरार रही।
हमारे पर्यावरण से बलात्कार अंग्रेजी राज में औद्योगीकरण के साथ प्रारंभ हुआ। रेलवे लाइन बिछाने के लिए जंगलों की बेहिसाब कटाई की गई। औद्योगिक उत्पादन के लिए लगाए गए कारखानों से निकलने वाला धुआं वायुमंडल प्रदूषित करने लगा और उनसे निकलने वाला रसायन मिश्रित जल नदियों को गंदा करने लगा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से औद्योगीकरण में और तेजी आई और आज यह हालत हो गई है कि जनता के बड़े हिस्से को सांस लेने के लिए शुद्ध वायु और पीने के लिए शुद्ध जल नसीब नहीं है।
वास्तव में पर्यावरण का प्रदूषण एक वैश्विक संकट है अत: इसका उपचार भी वैश्विक स्तर ही संभव है। अर्थात विश्व के सभी राष्ट्रों को मिलकर ही इस संदर्भ में कठोर निर्णय लेने होंगे। अमरीका और यूरोप के देशों में जिस विशाल स्तर पर औद्योगीकरण हुआ है उतना ही अधिक इन विकसित राष्ट्रों ने पर्यावरण को प्रदूषित किया है और कर रहे हैं। न्यायोचित बात तो यह है कि जिन राष्ट्रों ने पर्यावरण को जितना अधिक नुकसान पहुंचाया है/ पहुंचा रहे हैं वे इतनी ही अधिक इसकी जिम्मेदारी लें। परंतु औद्योगिकीकरण के बलबूते पर विकसित अमरीका और योरप के देश अपनी धौंस दिखाकर विकासशील राष्ट्रों को भी समानरूप से जिम्मेदारी लेने का दबाव डाल कर इस मामले को टालते जा रहे हैं। आज हालत कितनी संकटपूर्ण बन गई है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पर्यावरण विशेषज्ञ यह चेतावनी दे रहे हैं कि अगले कुछ दशकों में मानव का अस्तित्व ही समाप्त होने की संभावना है।
पर्यावरण एक विश्वव्यापी व्यवस्था है जो पृथ्वी के दो ध्रुवों पर जमी बर्फ की मोटी परत (आइस कैप), समुद्रों से जल का वाष्पीकरण, वायुमंडल और सूर्य किरणों से निर्धारित होती है। पर्यावरण में तेजी से बढ़ते प्रदूषण से इन प्राकृतिक अवयवों के आपसी तालमेल में जो गड़बड़ी आई है उसका परिणाम हम विश्व के बढ़ते तापमान के रूप में भुगत रहे हैं। विश्व में तापमान का लेखा जोखा रखने की प्रथा सन 1850 से प्रारंभ हुई। इसके अनुसार 2009 में समाप्त हुआ दशक अभी तक का सबसे गरम दशक रहा है।
बढ़ते तापमान का घातक परिणाम है कि पृथ्वी के ध्रुवों पर लाखों साल से जमी बर्फ की परत तेजी से पिघल रही है और समुद्रों में जल का स्तर ऊपर उठ रहा है जिससे धरती के हिस्से डूबते जा रहे हैं। मालदीप जैसे अनेक देश जो दो समुद्र के बीच टापुओं के समूह हैं, पूरे के पूरे डूब जाएंगे। हमारे स्थानीय संदर्भ में तापमान के बढऩे का दुष्परिणाम है कि हिमालय के ग्लेशियर, गंगोत्री और यमुनोत्री, जो गंगा और यमुना को जन्म देते हैं, तेजी से पिघल रहे हैं। (प्रतिवर्ष 20 मीटर की गति से) गंगा और यमुना प्रदूषित हो चुकी हैं। अब तो इनके सूखने का संकट हमें घूर रहा है। सोचिये क्या होगा उस विशाल जनता का जो गंगा और यमुना से जीवन यापन करती हैं।
ऐसे भयानक संकट से निपटने के लिए क्या किया जाए? उत्तर स्पष्ट है। नदियों के प्रदूषण को रोकने के लिए कारगर कदम उठाने के साथ-साथ हमें ऊर्जा उत्पादन के वैकल्पिक साधनों का विस्तार करना होगा। सूर्य किरणों और वायु से विद्युत उत्पादन के तरीकों की खोज कर ली गई है और इनसे पर्यावरण का प्रदूषण भी नहीं होता है फिर भी आजतक विद्युत उत्पादन के इन वैकल्पिक साधनों में भारत की क्षमता का सिर्फ 6 प्रतिशत ही कार्यान्वित किया गया। शेष विश्व में भी हालत कुछ ऐसी ही है।
पर्यावरण के प्रदूषण से आहत प्रकृति ने मौसम के चक्र को छिन्न- भिन्न करके आसन्न संकट का स्पष्ट संकेत दे दिया है। अपने देश ने ही अधिकांश क्षेत्र में सूखे के साथ-साथ कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और असम में भीषण बाढ़ की आपदा को देखा है। ऐसा ही दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका योरप और दक्षिण अमरीका के अनेक देशों को झेलना पड़ा है। आस्ट्रेलिया और उत्तरी अमरीका के विस्तृत वनक्षेत्र दावानल से भस्म हो गए हैं। इस प्रकार की आपदाओं में साल- दर -साल तेजी से वृद्धि होती जा रही है।
कोपनहेगन में इसी माह समाप्त हुए पर्यावरण संबंधी विश्व सम्मेलन के बारे में तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया। विश्व के 192 देशों के राष्ट्राध्यक्षों के कोपनहेगन में जुटने के बावजूद भी कोई सर्वमान्य समयबद्ध कार्यक्रम पर समझौता नहीं हो पाने से यही सिद्ध होता है कि विश्व में किसी भी देश के नेताओं ने इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया है।
सब कुछ जानते हुए भी इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए कुछ होता क्यों नहीं दिखता? कारण है राजनैतिक इच्छा- शक्ति की कमी। राजनैतिक इच्छा- शक्ति को जगाने का एकमात्र साधन है जनता द्वारा दबाव बनाना। समय आ गया है कि जनता इस संबंध में उचित कदम उठाए। क्योंकि पृथ्वी हमारी मां है। मां का दूध तो पिया जाता है लेकिन मां का खून नहीं पिया जाता!

- रत्ना वर्मा

पक्षी विज्ञान





हम किसी से कम नहीं
- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन
एक हैरतअंगेज घटना सुनिए। जून 2007 में एक मॉंकिगबर्ड एक महिला डाकिए को लगातार तीन सप्ताह परेशान करती रही। घटना साउथ गैरी प्लेस, टुल्सा, ओक्लाहामा, यूएसए की है। घटना असाधारण इसलिए है कि जहां कुत्तों के बारे में तो मशहूर है कि वे डाकियों (महिला-पुरुष दोनों) के बारे में चिंतित रहते हैं, मगर एक पक्षी, वह भी नन्ही-सी मॉंगिबर्ड ने न सिर्फ इस महिला डाकिए को पहचाना बल्कि उसका पीछा भी करती रही।
एक प्रयोग
व्यक्ति विशेष को पहचानना कोई असाधारण घटना नहीं है, यह बात हाल ही में किए गए एक वैज्ञानिक प्रयोग से $जाहिर होती है। शहरों में रहने वाली मॉंकिगबड्र्स जल्दी ही मनुष्यों को पहचानना सीख लेती है। हाल ही में डॉ. डगलस जे. लेवी और उनके साथियों द्वारा प्रकाशित एक शोध पत्र का विषय यही है। प्रयोग के तहत एक ही इन्सान को चार दिन तक रोज विश्वविद्यालय परिसर में बने मॉंकिकगबर्ड के घोंसले के साथ छेड़छाड़ करना था। मॉंिकगबर्ड ने शोरगुल मचा दिया, उस इन्सान पर हमला करने को झपटी और हर दिन उस पर झपटती रही। और हर दिन वह तभी हमला करने की कोशिश करती जब वह महिला घोंसले से पहले दिन की अपेक्षा ज्यादा दूरी पर होती। मगर पांचवे दिन जब एक अलग व्यक्ति घोंसले के नजदीक आया तो मॉंकिगबर्ड ने ठीक वही व्यवहार किया जो उसने पहले दिन पहले व्यक्ति के साथ किया था। और वही मॉंकिगबर्ड उस चौराहे से गुजरते सैकड़ों अन्य राहगीरों को लेकर सहज थी, बशर्ते कि वे उसके घोंसले से पर्याप्त दूरी पर रहें।
ये परिणाम दर्शाते हैं कि एक आम शहरी पक्षी, मॉंिकगबर्ड, जल्दी से मनुष्यों को पहचानना सीख लेती हैं। व्यक्ति विशेष द्वारा घोंसले के साथ 30-30 सेकंड की दो छेड़छाड़ इसके लिए पर्याप्त होती हैं। शोधकर्ता इस अध्ययन के आधार पर एक सामान्य निष्कर्ष निकालते हैं: 'शहरी पक्षी आम तौर पर प्रजनन में उच्च सफलता हासिल करते हैं हालांकि शहरी आबादी में घोंसले के शिकारियों की तादाद ज्यादा होती है। हमारा मत है कि मॉंकिगबर्ड की अनुभूति और तेजी से सीखने की क्षमता उन्हें नए पर्यावरण में सफलता के लिए तैयार करती हैं। अर्थात हमने जितना समझा था, पक्षी उससे $ज्यादा होशियार होते हैं।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के डॉ. नाथन जे. एमरी पक्षियों की अक्लमंदी पर शोध करते रहे हैं। इस विषय को उन्होंने संज्ञानात्मक पक्षी विज्ञान नाम दिया है अर्थात पक्षियों में बुद्घि का विकास। औरसिर्फ मॉंिकगबर्ड से प्रभावित होना पर्याप्त नहीं है। एमरी बताते हैं कि पक्षी दृश्य छवियों के बीच भेद करने में असाधारण रूप से कुशल होते हैं।
कबूतर हवाई चित्रों, मनुष्यों, पेड़ों और पानी, कुर्सियों, कारों, व्यक्तियों, फूलों और निश्चित रूप से कबूतर की छवियों के बीच भेद कर सकते हैं। एक शोधकर्ता डॉ. वाटनबे का तो दावा है कि कबूतर पिकासो, सोनेट, चगाल और गॉग की पेंटिग्स को भी अलग-अलग पहचान लेते हैं। फिर अफ्रीकी भूरा तोता है जिसका नाम एलेक्स है। वह वैज्ञानिकों के बीच बहुत मशहूर है। वह तो अलग-अलग आकृतियों व पदार्थों से बनी लगभग 100 वस्तुओं को पहचान लेता था (जी हां हाल ही में उसकी मृत्यु हो गई।) एरिजोना विश्वविद्यालय की डॉ. आइरीन पेपरबर्ग, जिन्होंने उसका अध्ययन किया था, ने 'एलेक्स के अध्ययन: भूरे तोतों की संज्ञान व संप्रेषण क्षमताÓ
शीर्षक से एक पूरी किताब लिखी है।
हालांकि पक्षी बुद्घि सम्बंधी अधिकांश अध्ययन कबूतरों, तोतों, मुर्गियों, और बटेरों पर किए गए हैं मगर इनमें भी $ज्यादा ध्यान कौओं और तोतों को मिला है। इसका कारण यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि इन पक्षियों का अग्र मस्तिष्क साइ$ज में लगभग बंदरों और वनमानुषों के बराबर होता है।
एमरी बताते हैं कि यह तथ्य पक्षियों के अग्र मस्तिष्क पर एक नई रोशनी डालता है। पक्षी व्यवहार को सामाजिक इकॉलॉजिकल समस्याओं का समाधान करने हेतु अनुकूलन के रूप में देखा जा सकता है। यह लगभग स्तनधारियों के समकक्ष है। उनका हार्डवेयर (यानी भेजा) अलग है हालांकि यह भी उसी तरह की संरचना से विकसित हुआ है।
पेपरबर्ग का कहना है कि यदि स्तनधारियों के दिमाग आईबीएम पीसी जैसे हैं तो पक्षियों के दिमाग एपल मैकिंटोश के समान हैं। इन दोनों में वायंरिंग और प्रोसेंसिंग अलग- अलग है मगर अंतिम आउटपुट (यानी व्यवहार) एक जैसा है।
प्रमुख बात यह है कि सिर्फ दिमाग की साइ$ज को न देखा जाए। इसकी बजाय $ज्यादा उपयोगी नाप दिमाग की साइ$ज और शरीर की साइ$ज का अनुपात (भेजा-शरीर अनुपात) होगा। इसी अनुपात के आधार पर हम समझ सकते हैं कि क्यों नन्हे चूहे लगभग हमारे बराबर होशियार हो सकते हैं, या यह क्यों कहा जाता है कि चिपैंजी लगभग 6 वर्ष के बच्चे के बराबर बुद्घिमान होता है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि मस्तिष्क के अंदर के विभिन्न घटक भी काफी महत्वपूर्ण होते हैं। इसी के आधार पर प्रजातियों के बीच अंतर पैदा होते हैं। जैसे गाने वाले पक्षियों और कौओं के बीच या बटेर और मुर्गियों के बीच।
नसीहत
विडंबना यह है कि इन अध्ययनों से नसीहत यह मिलती है कि किसी व्यक्ति को 'बर्ड-ब्रेन्ड' यानी पक्षी-बुद्घि कहना अब कोई अपमान नहीं बल्कि तारीफ है। इसका एक उदाहरण यह है कि चिम्पैं$जी के समान कौए भी 'सहज- भौतिकी का उपयोग करते हैं और औ$जार बनाते हैं। यह बात सर्वविदित है कि कौए हुकनुमा टहनी की मदद से पेड़ों के सुराखों में इल्लियां निकाल लेते हैं। एक कौए का नाम बेटी था जिसका अध्ययन ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किया था। यह कौआ तो एक तार से हुक बना लेता था और गिलास के पेंदे में रखे मांस के टुकड़े को उससे उठा लेता था। अगली बार जब आप पंचतंत्र, जातक कथाएं या इस तरह की कहानियां पढ़ेंगे तो आपको यह याद करके म़जा आएगा कि कथा और तथ्य काफी करीब हो सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)