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Apr 1, 2026

लघुकथाः मकड़ी

  - डॉ. सुषमा गुप्ता

उसने अखबार से नज़र उठाई। पहले मरी हुई मकड़ी को देखा फिर मुझे। वो भी घूरकर।

 मैंने सकपकाकर सफाई दी, “मुझे हत्या नहीं करनी थी। इसकी हत्या का मेरा कोई इरादा भी नहीं था; पर मैं डरी हुई थी। यह मकड़ी मेरे बिस्तर के बहुत पास थी। मुझे मकड़ी से डर लगता है।”

“मकड़ी तुमसे ताकतवर थी?”

“अरे नहीं! कमज़ोर-सी थी। एकदम ज़रा- सी।”

मेरी इस बात पर उसने व्यंग्य- भरी मुस्कान के साथ मुझे देखते हुए कहा, “यह कितनी विरोधाभासी बात है। वह तुमसे कमज़ोर थी और तुम्हें उससे डर लग रहा था!” 

मेरी पेशानी पर कुछ बल उभर आए। मैंने ऊहापोह से कहा, “उसकी उपस्थिति मेरे सुकून में खलल थी…शायद…”

उसने गहरी साँस छोड़ते हुए हाथ का अखबार नीचे पटक दिया और बेहद निराश होकर कहा, “डरे हुए लोग ही अक्सर हमलावर होते हैं।”

मेरी नज़र अख़बार की हैडलाइन पर अटक गई।

“भ्रष्टाचार के विरोध में रैली निकालते, यूनिवर्सिटी के छात्रों पर प्रशासन ने निर्ममता से लाठियाँ भाँजी।” ■

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1 comment:

  1. Anonymous03 April

    मकड़ी के माध्यम से कितनी सत्य बात कहती बेहतरीन लघुकथा। बधाई । सुदर्शन रत्नाकर

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