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Apr 1, 2026

कथाः पहली बार

  - अर्चना राय

उमड़ते-घुमड़ते बादल, मंद-मंद बहती ठंडी हवा और जंगल की हरियाली, सभी वातावरण में एक अलग ही रूमानियत पैदा कर रहे थे। जंगल के पथरीले रास्ते पर हिचकोले खाती जीप की पिछली सीट पर पत्नी के साथ बैठकर, जिंम कार्बेट की जंगल सफारी करते रोहित की खुशी का ठिकाना नहीं था। आज उसे ऐसा लग रहा था, जैसे सारा आकाश उसकी मुट्ठी में बंद होने जा रहा था। कुछ देर बाद फॉरेन डेलिकेट के साथ मीटिंग होते ही उसका ड्रीम प्रोजेक्ट पूरा जो जाएगा। सोच-सोच फूला नहीं समा रहा था।

पिछले तीन साल की मेहनत और भागदौड़ का ही नतीजा था, जो उसका लक्ष्य पूरा होने की कगार पर था। 

इस पल का उसने कितनी बेसब्री से इंतजार किया, वही जानता है। अपने प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए तो जैसे उसने अपने आप को दुनिया और रिश्ते-नातों से लगभग अलग-सा ही कर लिया था। और तो और अपने आप को तक भुला बैठा था। बस खुद को पूरी तरह प्रोजेक्ट के काम में डुबा दिया था। उसके इस संघर्ष में नव-विवाहिता पत्नी रिया ने बहुत सहा था; इसलिए बस एक बार यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाए, फिर अपनी रिया की हर ख्वाहिश पूरी करेगा। उसे बिलकुल रानी की तरह  रखेगा। ऐसा विचार कर ही तो वह रिया को भी अपने साथ लेकर आया था। उसने सोचा था- एक तरफ फॉरेन डेलिगेट के साथ मीटिंग हो जाएगी और, रिया के साथ घूमना भी। 

रोहित अपने भविष्य के सुनहरे सपने और अतीत के विचारों में खोया था। इस तरह जंगल में घूमते तीन घंटे होने को आए थे, पर टाइगर दिखना तो दूर, उसकी आवाज़ तक सुनाई नहीं दी थी।

 रोहित के इशारे पर टाइगर देखने की एक आखिरी कोशिश करने जैसे ही ड्राइवर ने जीप आगे बढ़ाई कि, जोरदार बारिश शुरू हो गयी, और बारिश से बचने, न चाहते हुए भी उन्हें एक पेड़  के नीचे खड़े होना पड़ा। ये देख रोहित झुंझला गया "अरे यार! ये बारिश भी अभी ही होनी थी। आज का तो पूरा दिन ही खराब हो गया। इन्वेस्टर इम्पार्टेंट मीटिंग के लिए मेरा इंतजार कर रहे हैं, और मैं लेट हो रहा हूँ।" कलाई पर बँधी घड़ी पर नजर डाल वह बेचैनी से बोला।

"अरे वाह! बारिश..." रिया छोटे बच्चे की तरह बारिश देख खुशी से चहक उठी। वह तो जैसे रोहित के साथ के हर एक पल जी-भर, जी लेना चाहती थी। इसलिए शरारत करती बार-बार हथेलियों की अँजुरी में बारिश का पानी भर-भर रोहित पर उछालने लगी। 

"अरे! ये क्या कर रही हो? वैसे भी अभी तक टाइगर दिखाई नहीं दिया, ऊपर से बारिश ने आकर उसे देखने की रही सही उम्मीद भी खत्म कर दी।" रोहित बेचैनी से बोला।

"आप, एक बात बताओ? क्या जंगल में सिर्फ टाइगर ही होता है?" रिया ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा।

"और क्या? आखिर जंगल सफारी का मतलब ही टाइगर को देखना होता है। और वही नहीं दिखा, तो क्या फायदा।" अनमनाते हुए उसने कहा।

"पर मुझे तो ऐसा नहीं लगता।" रिया ने मुस्कुराते हुए कहा।

 "तो फिर,... मैडम आपको क्या लगता है? जरा मुझे भी बताओ।" रिया को मुस्कुराते देख उसने भी  अपने आप को संयत कर हँसकर कहा। 

"अपने आस-पास तो देखिए, क्या कुछ नहीं है यहाँ।" 'देखिए' शब्द को जोर देकर, अपनी बाहें पसार रिया गोल-गोल घूमती हुई रिया अदा से बोली।

"क्या देखूँ?" अचंभित-सा रोहित बोला।

" देखो!...ये हरे भरे पेड़ मानो मेज़बान की तरह अपनी बाहें फैलाकर, मेहमान की तरह हमारा स्वागत कर रहे हैं..."

 "अच्छा?"  सिर खुजलाते हुए रोहित रिया को देख रहा था।

 "ये फूल-पत्तियों से सजे रास्ते, मानो प्रकृति ने हमारे स्वागत में रंगोली सजाई हो, और वो देखो अपने सतरंगी पंखों को फैलाकर मस्त मलंग नाचता मोर, मानो कुशल नृत्यांगना की भाँति हमारा मनोरंजन कर रहा है।" रिया अपनी ही धुन में मग्न नाचते हुई बोले जा रही थी। और रोहित चुपचाप रिया के अल्हड़पन को प्यार से एकटक देखे जा रहा था।

"अपने पीछे उस तालाब को देखो? इसका गहरा नीला रंग... और इसमें तैरते हंसों की कतार मानो कोई महात्मा अपने इष्ट की आराधना में ध्यानमग्न हों,... और ध्यान से सुनो! ये कोयल की कूक, और पंछियों का कलरव जैसे कोई गायक अपने प्रतिद्वंदी के साथ जुगलबंदी कर रहे हों। जंगल में भागते ये हिरणों का झुड़ जैसे नृत्य कलाकार कोरस नृत्य कर रहे हैं..और..."  बोलते-बोलते रिया अचानक झेंपते हुए चुप होकर रोहित को देखने लगी।

"और? तुम चुप क्यों हो गईं। बोलो न।" रोहित ने उत्साहित होकर कहा, तो रिया दोगुने जोश से कहने लगी।

 "यह बारिश की बजती जलतरंग, जैसे कोई संगीत के सुर छेड़ रहा हो,... मिट्टी की सौंधी-सौंधी इत्र-सी खुशबू, मानो धरा ने हवा के माध्यम से आकाश के लिए प्रेम संदेश भेजा हो। और भी कितना कुछ है यहाँ देखने।" 

"अरे बुद्धू राम! ...ये सब नजर से नहीं, नजरिये से देखा जाता है।" रोहित के कुछ न बोलने पर, रिया ने उसके माथे को अपनी हथेली से हल्की-सी चपत लगाते हुए कहा और खिलखिलाकर हँस दी। उसकी हँसी और पंछियों का कलरव एक सुर हो वातावरण को आनंदित कर गए।

प्रकृति की इतनी अद्भुत परिकल्पना और उपमाएँ  सुनकर रोहित अचंभित था।

अचानक रिया, रोहित का हाथ पकड़ बारिश में खींचकर उसके दोनों हाथ फैलाकर, उसके साथ 'टाइटेनिक पोज' में खड़ी हो गई।

रोहित ने महसूस किया उसके चेहरे पर पड़ती बूँदें, तन को ही शीतल नहीं कर रहीं थीं, बल्कि उसके मन को भी हल्का कर रहीं थीं। वह काफी देर तक ऐसे ही खड़ा रहा। उसे एक विचित्र-सी आह्लादित करती अनुभूति हो रही थी, जिसे शब्दों में कहना मुश्किल था।

"सचमुच, ऐसा एहसास आज पहली बार हुआ है। इससे पहले मैंने इस तरह कभी महसूस ही नहीं किया।" कहते हुए रोहित की आवाज़ खुशी से भर्रा गई, और उसने कसकर रिया को गले से लगा लिया।

"सब कुछ बहुत सुंदर है,...और सबसे सुन्दर है- तुम्हारा दिल।" उसने रिया की आँखों में देखकर कहा और उसका माथा चूम लिया।

"प्रकृति की इस अनुपम सुन्दरता को नष्ट करने का मुझे कोई हक नहीं।" कहकर अपने साथ लाए ब्लू प्रिंट को फाड़कर, यहाँ जंगल में होटल बनाने के अपने ड्रीम प्लान को हमेशा के लिए टाल दिया, और इन्वेस्टर्स को मीटिंग कैंसिल करने के लिए फोन करने लगा। ■

8 comments:

  1. Anonymous03 April

    ख़ुशियाँ विशेष आसमान से उतरकर नहीं आतीं, हमारे आस-पास बिखरी हैं, प्रकृति के कण-कण में हैं। बस नज़र चाहिए और एहसास कराने वाला साथी । बहुत सुन्दर रचना। बधाई । सुदर्शन रत्नाकर

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    1. आदरणीय कथा पर टिप्पणी करने के लिए आभार।

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  2. बहुत सुन्दर मन को भाने वाली कहानी है। बेशक छोटी-छोटी खुशियाँ बहुत महत्वपूर्ण हैं। लेखिका को हार्दिक बधाई।

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    1. धन्यवाद आदरणीया।

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  3. Anonymous09 April

    बहुत ही सार्थक संदेश है कहानी में… अर्चना जी को बहुत बहुत धन्यवाद एवं बधाई
    सादर
    मंजु मिश्रा
    www.manukavya.wordpress.com

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  4. Anonymous09 April

    मनभावन प्रकृति के सुंदर नज़रों से रूबरू कराने के लिए और सुंदर रचना के लिए लेखिका को बधाई -पूनम चंद्रलेखा

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  5. Anonymous10 April

    बहुत सुंदर प्रकृति वर्णन के साथ बढ़िया संदेशपूर्ण कहानी के लिए धन्यवाद महोदया।

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  6. प्यारी सी कहानी के लिए बहुत बधाई

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