- अंजू निगम
कुछ आँखों में
कभी शाम नहीं उतरती
और कुछ आँखों से
हमेशा रात लिपटी रहती है
सुनो न ऐ जिन्दगी
तुमने क्यों भर दिया
कुछ आँखों में आषाढ़ का महीना
या क्यों नहीं टूटती
कुछ आँखों से पूस की रात
मैं तुमसे बात करूँगी ज़िन्दगी
जब कभी मिलूँगी किसी नुक्कड़ पर
अच्छा लगेगा जब देखूँगी
इन आँखों में
खिलते बसंत के फूलों को।

अहा!
ReplyDelete'ज़िन्दगी, जब कभी मिलूंगी किसी नुक्कड़ पर' बहुत ही सुन्दर कविता और कविता की हरेक पंक्ति ह्रदय को स्पर्श करती हुई आगे बढ़ रही है.. 👏🏻👏🏻🙏🏻
कुछ आँखों में आशाढ़ का महीना
ReplyDeleteअति सुन्दर
आँखों में आषाढ़ का महीना ,वाह..वाह.., बहुत अद्भुत बिंब , बधाई!!!
ReplyDeleteशीला मिश्रा
बहुंत ही सुंदर
ReplyDeleteबहुत सुंदर अभिव्यक्ति। बधाई । सुदर्शन रत्नाकर
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर
ReplyDeleteबहुत सुन्दर प्रस्तुति 👏
ReplyDeleteबहुत ही भावपूर्ण रचना है। जिसमें बसंत की भिन्नता है और बसंत जब सबके लिए समान होगा तब देखने की अभिलाषा है।
ReplyDeleteअंजू दीदी की यह कविता सर्वे भवन्तु सुखिनः के भाव की सशक्त अभिव्यक्ति है।
वाह! बहुत सुन्दर कविता।
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