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Feb 1, 2026

अनकहीः आज के दौर में एक शादी ऐसी भी ...

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

महाराष्ट्र के लातूर ज़िले में हाल ही में संपन्न हुई एक शादी ने समाज को ठहरकर सोचने का अवसर दिया है। यह अवसर किसी भव्य आयोजन या असाधारण खर्च के कारण नहीं, बल्कि सादगी और सामाजिक चेतना के कारण सामने आया है ।

परभणी निवासी इंजीनियर शेखर माधव शेजुल और ऋतुजा शिंदे ने अपने विवाह को सादगी और अर्थपूर्ण मूल्यों के साथ सम्पन्न कर एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया। केवल 25 करीबी परिजनों की उपस्थिति में, बिना किसी तामझाम के, उनका यह विवाह एक मंदिर में सम्पन्न हुआ।

दरअसल इस विवाह की चर्चा हम सिर्फ इसलिए नहीं कर रहे कि यह सादगी से सम्पन्न हुआ है, बल्कि इसलिए कर रहे हैं; क्योंकि इस शादी में खर्च होने वाले दस लाख रुपये उन्होंने अपने गाँव के प्राथमिक विद्यालय में आधुनिक कंप्यूटर कक्ष की स्थापना के लिए दे दिए, ताकि ग्रामीण बच्चों को डिजिटल शिक्षा से जोड़ा जा सके। 

एक सार्थक और सराहनीय कदम इन्होंने उठाया है, तो उल्लेखनीय तो है ही, क्योंकि देखा तो यही जाता है कि इन दिनों वे शादियाँ ही मीडिया में अधिक चर्चा का विषय बनती हैं, जो भव्य और खर्चीली होती हैं, जबकि यहाँ तो शादी में खर्च होने वाली राशि को भी उन्होंने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उपयोगी बना दिया। 

इन दिनों देखा यही जा रहा है कि आज के समय में शादियाँ धीरे-धीरे संस्कार से अधिक प्रदर्शन का रूप लेती जा रही हैं और वे पवित्र संस्कार जैसे- हल्दी, मेहंदी, सप्तपदी जो सब घरेलू आँगनों में लोकगीतों और ढोलक- मंजीरे के साथ पारिवारिक सहभागिता के साथ संपन्न होती थीं, वे अब इवेंट मैनेजमेंट के माध्यम से भव्य रिसॉर्ट्स और डेस्टिनेशन वेडिंग के रूप में आयोजित की जाती हैं तथा बाज़ार और दिखावे का माध्यम बनकर महँगे और भव्य आयोजनों में बदल गई हैं। 

इस बदलाव को बढ़ावा देने में उन शादियों की भी बड़ी भूमिका है, जहाँ पैसे का मोल गौण हो जाता है - चाहे वह उद्योग जगत के बड़े नाम हों या फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध। जब इस प्रकार होने वाली करोड़ों की शादियाँ सार्वजनिक रूप से भव्यता के साथ प्रस्तुत की जाती हैं, तो समाज के एक वर्ग भी उसी होड़ में शामिल हो जाता है। परिणाम यह होता है कि अपनी हैसियत से अधिक खर्च करके वे भी अपनी शादियों को दिखावे की शादी में बदल देते हैं। यहाँ तक कि अब तो देखा- देखी पैसे के बल पर फ़िल्मी सितारों  और नामी- गिरामी गायकों और कलाकारों को शादी में आमंत्रित करने लगे हैं। 

शादियों के इस भव्य माहैल में शेखर माधव और ऋतुजा शिंदे की यह शादी कोई आंदोलन नहीं है; लेकिन सादगी से की गई उनकी शादी और उस पैसे का शिक्षा के क्षेत्र में किया गया उनका सहयोग यह अवश्य बताती है कि खुशी पैसे खर्च करने से नहीं, सोच से बनती है। और जब सोच बदलती है, तो एक शादी केवल रस्म नहीं रहती - वह समाज के लिए दिशा संकेत भी बन जाती है।

 बस दुख तब होता है जब ऐसे नेक उदाहरण से बहुत कम लोग सीख लेते हैं। ऐसे नेक कदम की सराहना तो हर कोई करता है; पर अमल करना नहीं चाहते। यह सवाल अक्सर अभिभावकों के सामने रखा भी जाता है कि इतनी फिज़ूलखर्ची क्यों - तो वे यह कहते हुए सामने वाले का मुँह बंद कर देते हैं कि मेरा इकलौता बेटा या बेटी है और शादी कौन रोज- रोज होती है, एक बार खुशियाँ मना लेने दो। या फिर यह भी कि बच्चे चाहते हैं कि उनकी शादी यादगार बने या सब उनकी भव्य शादी को याद रखें। आज के डिजीटल युग में युवाओं की सोच भी बदलती दिखाई देती है – वे अपनी काबिलियत पर धन अर्जित कर रहे हैं तो उन्हें खर्च भी उसी अंदाज में करने की इच्छा रखते हैं। 

समाज में अक्सर ऐसी फ़िज़ूलखर्च के विरुद्ध बातें तो होती हैं, कई सामाजिक आयोजनों में प्री- वेडिंग जैसे समारोह पर रोक लगाने की बात भी हुई है; पर एक दो उदाहरण को छोड़ व्यवहार में बदलाव कम ही दिखाई पड़ता है। कारण यही है कि आज दिखावे को सामाजिक सम्मान से जोड़ कर देखा जाने लगा है।  

आज ज़रूरत इस बात की है कि माधव शेजुल और ऋतुजा ने जिस सादगी और सामाजिक उत्तरदायित्व का रास्ता चुनते हुए विवाह किया है, उनके इन प्रयासों की सामाजिक मंचों पर खुलकर चर्चा की जानी चाहिए। उन्हें केवल सराहना ही नहीं, सम्मान भी मिलना चाहिए। आज का सोशल मीडिया यदि चाहे तो दिखावे की संस्कृति को बढ़ावा देने की बजाय ऐसे सकारात्मक उदाहरणों को व्यापक रूप से समाज तक पहुँचा सकता है। सही उदाहरणों को साझा करना, उन्हें चर्चा का विषय बनाना और उनसे प्रेरणा लेना - यही डिजिटल युग की वास्तविक शक्ति और सकारात्मक परिवर्तन की सबसे मजबूत नींव बन सकती है। 

तो आइए हम और आप मिलकर इस नींव को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाएँ और विवाह जैसे पवित्र संस्कार को भव्यता और दिखावे की संस्कृति से दूर रखते हुए इस पवित्र रिश्ते को समाज के उत्थान से जोड़ते हुए कुछ नेक काम भी करते जाएँ। 

14 comments:

  1. सराहनीय प्रेरणादायी गठबंधन के लिए नव युगल को हार्दिक शुभकामनाएँ। शिक्षा के विकास में योगदान स्वागतेय।

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    1. आपकी शुभेच्छाओं के लिए हृदय से धन्यवाद ऋता जी🙏
      शिक्षा और सामाजिक चेतना से जुड़ा यह गठबंधन वास्तव में प्रेरक है। ऐसी सकारात्मक सोच ही समाज को नई दिशा देती है।

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  2. डॉ सुनीता वर्मा02 February

    इस लेख को पढ़ने के बाद मुझे याद आया की एक महँगी शादी के लिए मेरे मित्र को ढाई सौ पेंटिंग का ऑर्डर मिला ।वे पेंटिंग इनविटेशन के तौर पे दी जानी थी ।फिर एक मित्र को कुछ पैकिंग डेकोरेशन का काम मिला उसी शादी के लिए ।तो महँगी शादियों में बहुत सारे लोगों को काम मिल रहा है ।कैटरिंग वाले को ,सजावट वाले को, इत्यादी ….तो सोचना यह हैं जिन्हें देने को पैसा है उनसे संभल नहीं रहा है तो वे ख़र्च कर रहे हैं ।उसे देखकर जिनके पास नहीं है वो भी ख़र्च करने का सोचते हैं तो स्थिति चिंताजनक है यह लेख सोचने को मजबूर तो करता ही है।

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    1. सुनीता जी आपका अनुभव अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष को सामने रखता है। सच है कि भव्य शादियों से अनेक लोगों को रोज़गार मिलता है, इसे नकारा नहीं जा सकता। पर चिंता वहीं से शुरू होती है जहाँ दिखावे की होड़ उन लोगों को भी उसी रास्ते पर धकेल देती है, जिनके लिए यह आर्थिक बोझ बन जाता है।
      आपकी टिप्पणी इस लेख की मूल भावना को और गहराई देती है—आभार 🌼

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  3. Anonymous03 February

    👍🏾

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  4. आपके सम्पादकीय सदैव ही समाज की समस्याओं पर केंद्रित होते हैं यह भी उनकी एक महत्वपूर्ण कड़ी है, निःसंदेह आज जब विवाह संस्कार से अधिक भौंडे प्रदर्शन का रूप लेते जा रहे हैं, शेखर माधव और ऋतुजा का यह विवाह समाज के लिए एक उदाहरण होना चाहिए, पर पीड़ा तब होती है जब इतने महत्वपूर्ण कार्य का कहीं कोई उल्लेख नहीं दिखता, मीडिया में इस संबंध में कहीं उल्लेख नहीं हुआ, आपने इसे सम्पादकीय का विषय बनाया इस हेतु साधुवाद,

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    1. आदरणीय श्रीवास्तव जी , आपके विचारों से पूर्णतः सहमति है। जब विवाह संस्कार प्रदर्शन में बदलने लगे, तब ऐसे उदाहरण समाज के लिए प्रकाशस्तंभ बनते हैं। मीडिया की चुप्पी निश्चित ही पीड़ादायक है, इसलिए ऐसे विषयों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाना आवश्यक।
      आपके सजग और संवेदनशील पाठन के लिए साधुवाद 🙏

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  5. Anonymous04 February

    समाज से सम्बंधित एक और महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक आलेख। शेखर माधव और ऋतुजा जैसे गठबंधन पहले भी हुए हैं, लेकिन मीडिया तवज्जो ही नहीं देता। प्रश्न यह भी हैकि समाज भी ऐसी शादियों की ओर ध्यान नहीं देता। धूमधाम से होने वाली शादियों की नक़ल तो सहज में ही कर लेते हैं। विशेषकर मध्यवर्गीय परिवार। पैसा हो न हो , दिखावा ज़रूर करेंगे। जिनके पास साधन हैं, करें। लोगों को रोज़गार मिलेगा । पर समझना तो उनको है, जो ऋण लेकर भी दिखावा करते हैं। एक विवाह पहले भी ख़बरों में आया था, जिन्होंने उस में होने वाले खर्चे से गाँव में एक कमरे वाले सौ घर बनवाए थे।
    आपका आलेख समाज में अच्छा संदेश देने वाला, जागरूक करनेवाला है ।साधुवाद । सुदर्शन रत्नाकर

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    1. आदरणीया रत्नाकर जी, आपने विषय के सामाजिक, आर्थिक और मानसिक—तीनों पक्षों को बहुत संतुलित ढंग से रखा है।
      दिखावे की नकल और ऋण लेकर आयोजन करना सचमुच चिंताजनक प्रवृत्ति है। आपका उल्लेख किया गया उदाहरण बताता है कि विकल्प मौजूद हैं, बस दृष्टि बदलने की आवश्यकता है।
      अनकही को इतनी गहराई से पढ़ने और सराहना हेतु आपका हृदय से धन्यवाद 🌺

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  6. बहुत सार्थक आलेख है, लेकिन यह तभी सम्भव है जब लड़का लड़की और उनके परिवार इस तरह की शादी के लिए एकमत हों, अन्यथा एक पक्ष तो फालतू के दिखावे का विरोध कर भी दे, दूसरा पक्ष समाज में अपनी प्रतिष्ठा की दुहाई देकर उसकी बात काट देता है। यह अनुभव से बोल रही हूँ 😊
    लेकिन चाहे गिनती की ऐसी पहल हों, मन को सकून पहुँचता है।

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    1. प्रियंका जी , आपका अनुभव बिल्कुल यथार्थ है और यही सबसे बड़ी चुनौती भी है। जब तक दोनों पक्ष और परिवार एकमत न हों, ऐसी पहल आसान नहीं होती। फिर भी, जैसा आपने कहा—गिनती की ही सही, ऐसी पहल मन को सुकून देती हैं और उम्मीद जगाती हैं।
      ईमानदार और सजीव प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार 😊

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