- विजय जोशी (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल)
उस दिन
दस्तक पर
जब दरवाजा खोला
एक संभ्रांत सुशील
माणिक मोती से जड़ी
सोने के फ्रेम में मढ़ी
एक रुआबदार पर रुखी
ऊपर से सुखी
पर शायद अंदर से दुखी
सेंट से महकती
अंतस में भटकती
एक भव्य महिला को पाया
मैंने अपना सिर खुजलाया
अभिवादन के लिये
जब उठा हाथ
वो मुस्कुराई मेरे साथ
और बोली
अरे तुमने मुझे नहीं पहचाना
भूल गए गुजरा जमाना
मैं तुम्हारी वही सहपाठी मित्र
याद करो मेरा चित्र
जो स्कूल में साथ पढ़ी थी
जीवन की सीढ़ी
कभी हमने साथ चढ़ी थी
मैं अचकचा गया
कहाँ वह पावन तरुणाई
और कहाँ यह वैभव की परछाई
तुम हंसती थीं तो
उस निष्पाप हँसी में
उल्लास के फूल झरते थे
जिसमें हम सब साथी
निर्मल मन से बहते थे
तुम्हारे तेवर जाने माने थे
इसलिए सब तुम्हारे दीवाने थे
पर अब
तुम वैसी कहाँ रहीं
वह सुदर्शनी काया
विशाल व्यक्तित्व में बदल गई
सूती फ्रॉक कीमती साड़ी में ढल गई
टूटी साइकिल मँहगी कार हो गई
और तुम्हें देखकर
जिंदगी खुद हैरान रह गई
तुमने जो सोचा वह सब पाया
तुम्हारी रग रग में बसी है माया
तुम बोलीं
मत भूलो पुराना कुछ भी
समय बीता पर अंतर घट रिता
मैं अब भी रखती हूँ तुम्हारी चाहत
केवल तुमसे मिलेगी मुझको राहत
मैंने कहा-
पुराना सब अब इतिहास है
टूटे तार पुनः जोड़ना
जीवन का उपहास है
ईश्वर ने हमें विवेक दिया
बदले में कुछ नहीं लिया
सिर्फ इसलिए कि
हम सत्य का मार्ग चुन सकें
उसी पर चलकर
जीवन के सपने बुन सकें
पर तुमने सुख सुविधा को चुना
आत्मा की आवाज को नहीं सुना
कहा भी गया है
कठिन होना जितना आसान है
सरल होना उतना ही कठिन
इसीलिए हम ज़मीर को मारकर भी
आसान मार्ग चुनते हैं
और लोग हम से सुख कम
दुख अधिक पाते हैं
इसलिए
अब तुन्हें अफ़सोस क्यों है
वैसे भी उम्र के इस मोड़ पर
सब कुछ ज्यों का त्यों है
तुमने प्यार के मायने नहीं जाने
अपने कभी नहीं पहचाने
पहले ही आधे अक्षर में अटक
अधूरी रह गईं
ढाई आखर का प्यार तो
एक फूल है
जिसकी पँखुरी झर भी जाए
तो खुश्बू बनी रहती है
मन में आनंद की नदी सदा बहती है
तुम इसे व्याख्यान मत समझना
मेरी बात को रात में गुनना
आज मैं अपने परिवेश, परिवार
समाज और घर-बार
सबसे बेहद सुखी और संतुष्ट हूँ
उम्र के इस वानप्रस्थी दौर में
मोह छोड़ने की कोशिश में व्यस्त हूँ
मुझे किसी चीज़ का कोई मलाल नहीं
जीवन मेरे लिए आनंद है बवाल नहीं
इसलिए मुझे
अपने में व्यस्त रहने दो
मन ने जो जो सोचा है
वह सब करने दो
और अंत में बस इतना कि
रहना चाहता हूँ आन से
और जाना चाहता हूँ
पूरे इत्मीनान से
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

R/Sir, प्रणाम। अति सुंदर रचना।
ReplyDeleteसुन्दर रचना! अद्भुत भावभिव्यक्ति!
ReplyDeleteअति सुंदर भावनात्मक रचना
ReplyDeleteतरल और सरल अभिव्यक्ति, आरम्भ जितना सुंदर...अंत उतना ही सहज
ReplyDeleteअति सुंदर भावना, उमर के साथ बदलना मगर कुछ गुजरा पल दिल ढूंढता है। S N Roy
ReplyDeleteमेरे लिए जीवन आनंद है , बवाल नहीं.. बहुत सारगर्भित पंक्तियों से पूरित सुंदर कविता।गुजरे दिनों की चित्रात्मक यात्रा करवाती हुई।सादर प्रणाम आदरणीय sir
ReplyDeleteपिताजी निःशब्द हुं
ReplyDelete