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Feb 1, 2026

किताबेंः इतिहास के हाशिये से उठती एक चेतना

 -  डॉ. पूनम चौधरी

पुस्तकः चंद्रशेखर आज़ाद के विश्वस्त सहयोगी : क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर-लेखकः डॉ.शिवजी श्रीवास्तव, प्रकाशकः राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, 5 इंस्टीट्यूशनल एरिया, वसन्त कुंज, नई दिल्ली-110070, पृष्ठः 142, मूल्यः210 रुपये

स्वतंत्र भारत में लिखा गया क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास  और आलोचना का बड़ा भाग विख्यात,परिचित और उजले चेहरों के आसपास ही सीमित रहा। उन उजाले पृष्ठों के पीछे अनगिनत नाम ऐसे थे जिनकी वैचारिक शक्ति और दुर्दांत जिजीविषा संगठन की रीढ़ थी, जिन्होंने तन से,मन से और विचारों से इस आंदोलन को, इस संघर्ष को निरंतरता दी और स्वयं का उत्सर्ग कर दिया। अक्सर यह चेहरे स्मृति के अंधेरे में चले गए। शिवजी श्रीवास्तव का यह प्रयास इस अंधेरे में उतारने का बेजोड़ साहस है।

चंद्रशेखर आज़ाद के विश्वस्त सहयोगी: क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं, बल्कि भारतीय क्रांति के उस अनदेखे- अनुलिखित पक्ष को सामने लाने का सशक्त प्रयास है, जहाँ विचार, संगठन, त्याग और सृजन एक-दूसरे में घुलकर राष्ट्र- निर्माण की चेतना बनते हैं। यह पुस्तक किसी व्यक्ति विशेष का स्मारक भर नहीं है; बल्कि उस दीर्घ चेतना के इतिहास का नैतिक दस्तावेज है जिसने इस क्रांतिकारी आंदोलन को सशक्त बनाया।

डॉ. भगवान दास माहौर का जीवन इस पुस्तक में एक सतत विचारशील चेतन की तरह स्पंदित होता है। यह पुस्तक बड़े-बड़े दावे प्रस्तुत नहीं करती, न ही माहौर जी का जीवन किसी नाटकीय आरोह अवरोह के साथ प्रस्तुत किया गया। यह जीवन मुखर होकर कोई दावा नहीं करता, स्वयं को केंद्र में नहीं रखता- फिर भी हर मोड़ पर उपस्थित रहता है। लेखक ने इसी मौन उपस्थिति को रेखांकित किया है। क्रांति क्षणिक उन्माद नहीं, विस्फोट नहीं; बल्कि धीरे-धीरे संस्कार बनती हुई व्यक्ति के व्यक्तित्व में उतरती जाती है, उसके शब्दों में अभिव्यक्त होने लगती है और अंततः उसके आचरण में बस जाती है। यह दृष्टि पुस्तक को साधारण जीवनी से उठाकर एक साहित्यिक-वैचारिक पाठ बना देती है।

 यह पुस्तक कई दृष्टि से विशेष है। राजनीतिक दृष्टि से यह कृति क्रांतिकारी आंदोलन की एक जटिल: किंतु अधिक मानवीय और कारुणिक छवि प्रस्तुत करती है। चंद्रशेखर आजाद केवल पौरुष और पराक्रम का प्रतीक बनकर नहीं उभरते;  बल्कि विश्वास और सहयोग की धुरी के रूप में सामने आते हैं। इसी पृष्ठभूमि में आजाद के चारों ओर डॉक्टर माहौर जैसा विश्वस्त सहयोगी है, जिसकी भूमिका राजनीतिक स्तर पर यह कृति क्रांतिकारी आंदोलन की एक अधिक मानवीय और अधिक जटिल छवि प्रस्तुत करती है। चंद्रशेखर आज़ाद यहाँ केवल वीरता के प्रतीक नहीं; बल्कि विश्वास और सहयोग की धुरी हैं। उनके चारों ओर डॉ. माहौर जैसे सहयोगी हैं, जिनकी भूमिका संघर्ष के वैचारिक चरण से लेकर सशस्त्र अवस्था तक दोनों ही कालखंडों  में समान रूप से निर्णायक रही है।

 शिवजी श्रीवास्तव की यह पुस्तक क्रांति को फिर एक नई परिभाषा दे रही है। क्रांति का आशय केवल बंदूक उठाना नहीं; बल्कि अनुशासन संगठन और वैचारिक स्पष्टवादिता के साथ समाज में बदलाव लाना है। यह पुस्तक आग्रह करती है कि राजनीतिक इतिहास को फिर से मानवीयता और भावनात्मक बुद्धि के साथ पढ़ा जाए। यह लेखक की वैचारिक सामर्थ्य और दूरदर्शिता है कि डॉ भगवान दास माहौर जी पर केंद्रित पुस्तक उनके साथ-साथ समानांतर परिदृश्य को भी उपेक्षित नहीं करती और यही प्रासंगिकता लेखक की कलम को विश्वसनीय बना रही है। सांस्कृतिक दृष्टि से पुस्तक में भगवान दास जी का व्यक्तित्व और कृतित्व ऐसे स्वतंत्रता सेनानी का रूप लेता है, जो आजीवन सृजन में रत रहा। परिशिष्ट में जुड़ी उनकी रचनाएँ  केवल काव्य- प्रदर्शन का भार ही नहीं उठातीं; बल्कि एक संघर्षशील आत्मा की पुकार बनकर उभरती हैं। उनकी कविताएँ वीरता की घोषणा बेशक नहीं करती; किंतु मनुष्य बने रहने की कोशिश उनमें अवश्य झलकती है। कविता यहाँ क्रांति का विकल्प नहीं, उसकी सहचरी है- एक ऐसी जगह जहाँ थका हुआ मन थोड़ी देर ठहरकर अपने विश्वास को फिर से पहचानता है। श्रीवास्तव जी ने जिस संवेदनात्मक संस्पर्श से इन कविताओं को प्रस्तुत किया है, वह पुस्तक के साहित्यिक पक्ष को और प्रभावी बनाती है।

 भाषीय दृष्टि से पुस्तक संयमित काव्यात्मकता का बेजोड़ उदाहरण है। लेखक प्रदर्शन अथवा किसी काव्य चमत्कार का बोझ लेकर नहीं चलता। लेखक की अपनी स्वाभाविक लय है, जो पाठक को घटनाओं के पार उनके अर्थ तक ले जाता है। वर्णन कहीं भी बोझिल नहीं होता; बल्कि स्मृति का रूप लेता चलता है। आपकी शैली अपने नैतिक ठहराव के साथ अत्यंत आकर्षक है- जैसे लेखक जानता हो कि जिस जीवन सत्य के बारे में वह लिख रहा है, उनके सामने शब्दों को भी अनुशासित रहना चाहिए। यही अनुशासन इस पुस्तक को विश्वसनीय भी बनाता है और मार्मिक भी।

 इस पुस्तक का दूसरा कालखंड जो स्वतंत्रता के बाद का है, वह अत्यंत विचार उत्तेजक और संवेदनपरक है। यहाँ वह खंडित सत्य हैं, जो अक्सर परिवर्तन के पश्चात् उपेक्षित कर दिए जाते हैं। यहाँ क्रांतिकारी आंदोलन की चमक नहीं; बल्कि उसका अवशेष है—वह अवशेष जिसमें आदर्श जीवित तो हैं; पर समाज की प्राथमिकताओं से बाहर हो चुके हैं। डॉ. माहौर का जीवन एक शिक्षक, विचारक और सादा नागरिक के रूप में इस प्रश्न को बड़ी तल्खी के साथ उठाता है कि स्वतंत्रता के बाद हमने उन क्रांति पुत्रों के सपनों के साथ क्या किया। यह प्रश्न लेखक ने इस तरह रचे हैं, जिससे पाठक स्वयं टकराता है, उनके जीवन विवरण में पिरोए हुए ये प्रश्न पाठक को न केवल व्यथित करते हैं; बल्कि हमारे इतिहास और साहित्य को प्रश्नों के घेरे में ला खड़ा करते हैं।

समीक्षात्मक दृष्टि से इस पुस्तक का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। वास्तव में यह पुस्तक साहित्य और इतिहास के अंतर सूत्र प्रस्तुत करती है। पुस्तक में इतिहास के तथ्यात्मक विवरण है, संदर्भ है, तारीखें है; किंतु वे शुष्क नहीं हैं; बल्कि वे मानवीयता और करुणा की कहानी में ढले हुए हैं। यह ढलाव ही इस पुस्तक को अकादमिक होते हुए भी संवेदनशील बनाता है। शोधार्थियों की दृष्टि से यह पुस्तक समृद्ध है, साथ ही सामान्य पाठक के लिए भी यह अनूठा अनुभव है और यही किसी स्तरीय कृति की पहचान है।

समग्र रूप से यह यह किताब एक स्मृति आख्यान है, जो बड़े ही सरल शब्दों में यह स्पष्ट कर देती है की इतिहास केवल विजयगाथा; नहीं बल्कि स्मृति का भी अनुशासन होता है। डॉ. भगवान दास माहौर का जीवन इस अनुशासन का उदाहरण है- जहाँ  क्रांति नारे में नहीं; बल्कि चरित्र और आचरण में प्रतिफलित होती है। लेखक की यह पुस्तक उसी चरित्र को शब्दबद्ध कर रही है। इस प्रयास में वह सफल भी हुए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में न केवल हमारी साहित्यिक सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना अधिक सजग और अधिक मानवीय बनती है; बल्कि वह धीरे- धीरे अनाम और अदृश्य स्वतंत्रता सेनानी को केंद्र में स्थापित कर देते हैं। इस प्रक्रिया में वह न केवल एक गुमनाम क्रांतिकारी को दृश्य में लाती है, इसी अर्थ में यह पुस्तक अतीत का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक नैतिक आमंत्रण है। ■

सम्पर्क: 98, पुष्पांजलि नगर फेज 3अवधपुरी आगरा ( उ. प्र.) 282-010, poonam.singh12584@gmail.com

कविताः कविता करने के लिए...

  -  डॉ. रमाकांत गुप्‍ता

     जो भी लिखता हूँ कविता बन जाती है।

     पर कब?

     जब किसी मेट्रो शहर के 

     किसी रेलवे स्टेशन पर

     कचरे के ढेर में से 

     सड़ी हुई पावरोटी निकाल कर

     किसी असहाय को देखकर 

     मन में वेदना उद्वेलित होती है,

     उस समय

     तो जो भी लिखता हूँ कविता बन जाती है । 1।


    जब दस घंटे मेहनत कर 

    कोई मजदूर 

    दिहाड़ी के सिर्फ चार सौ माँगता है

    उस रात और अगली सुबह के दो जून के खाने के लिए 

    और नोटों की गड्डी लिए अकड़ता हुआ सेठ

    परवाह किए बिना 

    अगले दिन के लिए टाल देता है

   उस समय 

   उस बेबस को जो टीस सताती है,

   उसे देख 

   जो भी लिखता हूँ वह कविता बन जाती है । 2।


  जब किसी बर्बर बलात्कारी को

  सबूतों की कमी के कारण  

   कोर्ट बरी कर देता है

   तब 

  वह बेबस महिला जो आह निकालती है

  उसे देख  

  जो भी लिखता हूँ वह कविता बन जाती है । 3।


 अब समझ में आया, 

 कविता करने के लिए-

 न पीएचडी की उपाधि, 

 न भाषा में पारंगतता, 

न रस, छंद, अलंकार , 

 न और कोई निपुणता,

 नहीं चाहिए कोई पांडित्य, 

 नहीं चाहिए अशुद्ध वर्तनी के लिए माफी,

 कविता करने के लिए 

 सिर्फ 

एक संवेदनशील हृदय ही है काफी ।4।

मोबा. 9820414276,  ईमेल drramakant2000@gmail.com

Jan 1, 2026

उदंती.com, जनवरी - 2026

वर्ष -18, अंक -6

मुदित नया साल

ओस भीगी धरा, किरनों के पाँव

उतरा है सूरज, अपने इस गाँव।

पत्तों से छनकर, आई है धूप

निखरा है प्यारा, धरती का रूप।

शरमाती कलियाँ, मुस्काते फूल

बाट में बिछाए, घास के दुकूल।

तरुवर पर पाखी, देते हैं ताल

द्वार पर खड़ा है, मुदित नया साल। 

                  - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

इस अंक में 

अनकहीः बौद्धिक स्वतंत्रता अभी बाकी है... - डॉ. रत्ना वर्मा

आलेखः वंदे मातरम् की गौरव गाथा  - प्रमोद भार्गव

प्रकृतिः आते हैं नभ से जल के मेहमान - रविन्द्र गिन्नौरे

दोहेः सूरज आने को हुआ - हरेराम समीप

संस्मरणः अयोध्या से वाराणसी - उमंग और ऊर्जा भरते घाट - सुदर्शन रत्नाकर

यादेंः नव वर्ष - एक उत्सव वाला दिन - डॉ. जेन्नी शबनम

आलेखः शोर में डूबता जीवन : हेडफोन की आदत... - संध्या राजपुरोहित

लघुकथाः चिप - मीनू खरे

व्यंग्यः नये साल में लालबुझक्कड़ फिर मिल गए - गिरीश पंकज

व्यंग्यः शुभकामनाओं की दहशत - विनोद साव

लघुकथाएँः 1. सफाई, 2. लीडर - अनुवाद: सुकेश साहनी

लघुकथाः दुर्गंध - सुकेश साहनी

कविताः परिवार : सात कविताएँ - जयप्रकाश मानस

कहानीः बोझ - डॉ. योगिता जोशी

लघुकथाः खुशफहमी -  हसन जमाल

किताबेंः छंद विधान एवं सृजन - डॉ . कविता भट्ट

कविताः बचपन -  प्रगति गुप्ता

प्रेरकः पेंसिल का संदेश

अनकहीः बौद्धिक स्वतंत्रता अभी बाकी है ...

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

पिछले दिनों एक्सप्रेस समूह के संस्थापक रामनाथ गोयनका की स्मृति में दिए गए अपने व्याख्यान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि ‘भारत की शैक्षिक और सांस्कृतिक नींव को खोखला करने के लिए मैकाले द्वारा किए गए अपराध को 2035 में 200 वर्ष पूरे हो जाएँगे, अतएव आने वाले दस सालों में गुलामी की इस औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने के राष्ट्रीय संकल्प की जरूरत है।’ उनके इस कथन को केवल राजनीतिक वक्तव्य की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, बल्कि  हम देशवासियों के लिए यह चिंतन और विचार करने का समय है, कि क्या हम इस मानसिक गुलामी में ही जीते रहना चाहते हैं या कि अपनी संस्कृति अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते हैं। 

यह तो आप सब जानते ही हैं कि मैकाले की शिक्षा का उद्देश्य एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना था, जो अपने ही अतीत को पिछड़ा, अपनी भाषा को हीन और अपनी संस्कृति को अवैज्ञानिक समझने लगे। हुआ भी वही, इस शिक्षा प्रणाली ने हमें रोजगार तो दिया, हम कुशल कर्मचारी तो बन गए; लेकिन सजग नागरिक नहीं बन सके। परिणामस्वरूप, हमने ज्ञान को केवल नौकरी, रोजगार और पैसा कमाने का जरिया माना; लेकिन इसके साथ ही अपने ही जीवन-मूल्यों को कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया। यही वजह है कि आज हम तकनीकी रूप से तो बहुत आगे निकल गए  हैं; लेकिन सामाजिक रूप से असंवेदनशील बन गए हैं। हम वैश्विक बाज़ार के लिए तो तैयार हैं; लेकिन अपने समाज की समस्याओं के प्रति उदासीन हैं। यह सब उसी शिक्षा का परिणाम है, जो हमें अपने परिवेश से काट देती है।

मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने सबसे गहरा आघात हमारी भाषाओं पर किया। अंग्रेज़ी बोलना प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया और  अपनी ही मातृभाषा को बोलने में झिझक महसूस होने लगी। हम अपने बच्चों को गर्व से कहते हैं- अंग्रेज़ी बोलो; लेकिन  यह कभी नहीं कहते- अपनी भाषा को जानो। नतीजा यह हुआ कि नई पीढ़ी अपने साहित्य, लोककलाओं, दर्शन और इतिहास से कटती चली गई। भाषा के साथ ही सांस्कृतिक स्मृति भी धूमिल होती गई। इतना ही नहीं मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने धर्म को अंधविश्वास और संस्कृति को रूढ़ि के रूप में प्रस्तुत किया। परिणामस्वरूप, हमने अपने पर्व, उत्सव, परंपराएँ और जीवन-पद्धति को पुराना और ग़ैर-आधुनिक मान लिया। पश्चिमी जीवनशैली की नकल को ही  प्रगति समझ लिया। 

विडंबना यह है कि जिन समाजों की नकल हम कर रहे हैं, वे तो अपने सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने में हमसे कहीं अधिक जागरूक और सजग हो गए हैं, जबकि हम अपने ही संस्कारों को बोझ समझने लगे। आप किसी भी दूसरे देश में चले जाइए, वहाँ पहले अपनी ही भाषा में बातचीत की जाती है। जब सामने वाला नहीं समझता तब या तो दुभाषिए की मदद ली जाती है या फिर यदि उन्हें अंग्रेजी आती है, तो वे टूटी फूटी अंग्रेजी से काम चलाते हैं; लेकिन उन्हें कभी इसकी वजह से हीनता का आभास नहीं होता; पर हमारे यहाँ यदि हम अंग्रेजी नहीं जानते तो हम हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं। इतना ही नहीं राजनीतिक मंचों पर भी वे अपनी ही भाषा में वक्तव्य देंगे, दुभाषिया ही उनकी सहायता करते है; लेकिन हम अपनी बोली भाषा को बोलने में छोटा महसूस करते हैं मानो हमसे कोई अपराध हो गया हो।

भले ही हमने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली हो; पर आज भी मानसिक रूप से गुलाम बने हुए हैं। हमारी सोच तो अब भी उधार की ही है। हम अपने ही परखे और माने हुए  ज्ञान पर संदेह करते हैं और विदेशी मान्यताओं को सहज स्वीकार कर लेते हैं। यह  एक प्रकार की गुलामी ही तो है। यह गुलामी तब और गहरी हो जाती है, जब हम अपने बच्चों को भी वही मानसिकता सौंप देते हैं। बिना प्रश्न किए वही पाठ्यक्रम, वही मूल्य और वही दृष्टिकोण आगे बढ़ते रहता है।

अब प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी शिक्षा की दिशा बदलने के लिए तैयार हैं? क्या हम ज्ञान को रोजगार से आगे जीवन-दृष्टि से जोड़ना चाहते हैं? नई शिक्षा नीति इस दिशा में एक प्रयास है; लेकिन नीति से अधिक जरूरी है मानसिक परिवर्तन। जब तक शिक्षक, अभिभावक और समाज मिलकर यह स्वीकार नहीं करेंगे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार और पैसे कमाना नहीं, चरित्र निर्माण भी है, तब तक परिवर्तन अधूरा रहेगा।

अतः हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो आधुनिक हो; लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी हो। जो विज्ञान और तकनीक सिखाए; लेकिन साथ ही दर्शन, साहित्य और नैतिकता भी, जो वैश्विक दृष्टि दे; लेकिन स्थानीय चेतना को मिटाए नहीं। भारतीय ज्ञान, परंपरा, उपनिषद, बौद्ध दर्शन, भक्ति आंदोलन, लोक साहित्य, ये सब केवल अतीत नहीं, बल्कि आज भी प्रासंगिक जीवन-दृष्टियाँ हैं। इन्हें शिक्षा का हिस्सा बनाना पिछड़ापन नहीं, आत्मसम्मान है।

राजनीतिक स्वतंत्रता तो हमने प्राप्त कर ली; लेकिन बौद्धिक स्वतंत्रता अभी पानी बाकी है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली को समाप्त करने का अर्थ पाठ्यक्रम बदलना नही; बल्कि सोच बदलना है। प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया यह आह्वान हमें याद दिलाता है कि आने वाले दस वर्ष केवल विकास के नहीं, आत्म- निर्माण का होना चाहिए। यदि हम सचमुच मानसिक गुलामी से मुक्त होना चाहते हैं, तो हमें अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और ज्ञान परंपरा को हेय नहीं, गौरव का विषय बनाना होगा; क्योंकि जो समाज अपने अतीत से कट जाता है, उसका भविष्य भी उज्ज्वल नहीं हो सकता।

आलेखः वंदे मातरम् की गौरव गाथा

- प्रमोद भार्गव

वंदे मातरम् को भारत की शाश्वत संकल्पना बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर वर्ष भर चलने वाले स्मरणोत्सव का शुभारंभ विशेष डाक टिकट और सिक्के के विमोचन के साथ किया। प्रधानमंत्री ने वंदे मातरम् की गौरव गाथा को विभिन्न उपमाओं- अलंकरणों से स्पंदन देते हुए इससे जुड़े इतिहास के एक काले पन्ने को खोलने के साथ कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की विभाजन कारी मानसिकता का खुलासा किया। उन्होंने कहा कि ‘आजादी की लड़ाई में वंदे मातरम् की भावना ने पूरे राष्ट्र को प्रकाशित किया था, लेकिन दुर्भाग्य से 1937 में इस गीत के महत्त्वपूर्ण पदों को उसकी आत्मा के एक हिस्से को अलग कर दिया गया था। जिस भाव से वंदे मातरम् के टुकड़े किए गए थे, कालांतर में उसी भाव ने विभाजन के बीज बो दिए थे।’ अतीत में इस गीत की मूल रचना के साथ जो भी खिलवाड़ किया गया हो, किंतु यह सच्चाई है कि आजादी की लड़ाई में इस गीत की अहम भूमिका रही है।    


बंकिम चंद्र चटर्जी के बांग्ला भाषा में लिखे उपन्यास ‘आनंद मठ’ से राष्ट्रगीत के रुप में स्वीकारा गया यह गीत कोई मामूली गीत नहीं है। भारत को उसकी व्यापक राष्ट्रीयता की पहचान और स्वाभिमान इसी गीत से प्राप्त हुए। नागरिक सभ्यता की विरासत, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानव सेवा के मूल्यों के उत्स इसी गीत के समवेत स्वर की उपज हैं। अंग्रेजों के विरुद्ध भिन्न जातीय और धर्म-समुदायों को संगठित करने के अभियान में इसी गीत की भूमिका बुलंद थी। तय है, वंदे मातरम् क्रांति के स्वरों में नींव का पत्थर था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की रक्त धमनियों में विद्रोह की उग्र भावना इसी गीत की देन है। 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन को देशव्यापी धरातल इसी गीत के बूते मिला था। और वह यही आंदोलन था, जिसमें गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज के फौजियों ने भी इसी गीत को गाते हुए मातृभूमि की बलिवेदी पर प्राण न्यौछावर किए। 

14 अगस्त 1947 की मध्य-रात्रि में जब देश आजाद हो रहा था, तब इस मंत्र-गीत का गायन श्रीमती सुचेता कृपलानी ने किया और वहाँ उपस्थित लोग इस गीत के सम्मान में गीत खत्म न हो जाने तक खड़े रहे। 15 अगस्त 1947 को जब स्वतंत्रता का सूर्योदय हो रहा था, तब आकाशवाणी पर पंडित ओंकार नाथ ठाकुर ने इसे बड़े ही रोचक ढंग से गाया। आखिरकार 24 अगस्त 1948 को जन-गण-मन के साथ इस गीत को भी राष्ट्र गीत की प्रतिष्ठा मिली। लेखक और दार्शनिक युगद्रष्टा होते हैं, इसलिए बंकिम बाबू ने इस गीत को लिखे जाने के वक्त ही अपनी दिव्य-दृष्टि से अनुभव कर लिया था कि यह गीत राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनकर लोकप्रियता के शिखर चूमेगा; इसीलिए उन्होंने इसे बांग्ला भाषा में न लिखते हुए संस्कृत में लिखा। मूल और संपूर्ण गीत की केवल नौ पंक्तियाँ बांग्ला में हैं। इस गीत का जो संपादित अंश राष्ट्र गीत के रूप में स्वीकार किया गया है, वह केवल आठ पंक्तियों का है।

वंदे मातरम् को इस्लाम विरोधी जताया जाता रहा है। जब कांग्रेस ने इसे प्रार्थना गीत के रूप में स्वीकार किया था, तब भी इसका विरोध हुआ था। 1937 में कांग्रेस कार्यकारिणी ने आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इसमें मौलाना आजाद, पंडित नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस जैसे प्रखर संस्कृति मर्मज्ञ सदस्य थे। समिति को जिम्मेदारी सौंपी गई थी कि वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर से विचार-विमर्श कर वंदे मातरम् के संबंध में दो टूक सलाह दें। समिति द्वारा रवीन्द्रनाथ से परामर्श के बाद जो प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया, उसके उपरांत कांग्रेस कार्यकारिणी ने फैसला लिया कि हरेक राष्ट्रीय व सार्वजनिक सभा में वंदे मातरम् के केवल दो पद गाए जाएँ। ऐसे अवसरों पर भारत विभाजन के जनक मोहम्मद अली जिन्ना भी इस गीत को आदर के साथ खड़े होकर गाया करते थे। तय है, गीत पर विवाद का समाधान स्वतंत्रता से पहले ही हो चुका था। 

बाद में देश -विभाजन के लिए जिम्मेदार मुस्लिम लीग के नेताओं ने जरूर वंदे मातरम् को बुतपरस्ती, अर्थात मूर्तिपूजा मानते हुए इसका विरोध किया। इस बहाने लीगियों ने अल्पसंख्यकों को खूब उकसाया। नतीजतन 1938 तक कांग्रेस के जो प्रमुख मुस्लिम नेता इस गीत की राष्ट्रीय गरिमा का ख्याल रखते चले आ रहे थे, वे भी दबी जुबान से इसका विरोध करने लगे। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप बहुसंख्यक हिंदू और सिख हठपूर्वक इस गीत की महिमा के बखान में लगे रहे। बाद में साझा सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के नजरिये से उर्दू के उदारवादी कवियों व राजनीतिकों ने वंदे मातरम् का अनुवाद ‘ऐ मादर, तुझे सलाम करता हूँ’ किया, अर्थात् हे माता, तुझे प्रणाम करता हूँ। मुल्क को गुलामी से आजाद कराने की इस इबादत में गलत क्या है? अरबी फारसी के अनेक कवियों ने भी देश को ‘माँ’ कहकर संबोधित किया है। लिहाजा राष्ट्र के प्रति अपनी भावनाओं व उद्गारों को प्रचलित रूपकों अथवा प्रतीकों में प्रकट करना मूर्तिपूजा या बुतपरस्ती कतई नहीं है। वंदे मातरम् एक मौलिक रचना है, इसकी व्याख्या धर्म नहीं, केवल साहित्य के संदर्भ में होनी चाहिए। इसे यदि कोई सांसद या विधायक इस्लाम विरोधी जताता है, तो उसका मकसद धर्म के बहाने राजनीतिक रोटियाँ सेंकना है, जो अलगाववादी राजनीति की संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक है।

खुद बंकिम चन्द्र ने लिखा है - ‘हिन्दू होने पर ही कोई अच्छा नहीं होता है, मुसलमान होने पर कोई बुरा नहीं होता और न ही मुसलमान होने पर कोई अच्छा होता है या हिन्दू होने पर कोई बुरा होता है। अच्छे बुरे दोनों जातियों में हैं। गोया, निर्वाचित चंद मुसलिम प्रतिनिधि इस्लाम के बहाने जिस राष्ट्रीयता का अपमान करते हैं, उसी राष्ट्रीयता के सम्मान में अन्य मुस्लिम प्रतिनिधि सुर में सुर मिलाते हैं। ऐसे ही चंद सिरफिरे मुस्लिमों ने आजाद हिंद फौज के नारे, ‘जय हिंद’ का भी विरोध किया था, जब दैनिक अखबार ‘डान’ ने वंदे मातरम् की आलोचना की तो महात्मा गांधी को कहना पड़ा, ‘वंदे मातरम् कोई धार्मिक नारा नहीं है, यह विशुद्ध राजनीतिक नारा है।’ यही नारा था, जिसने सोये हुए भारत को जगाने का काम करके, आजादी हासिल कराई थी।

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 9981061100