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May 1, 2022

परामर्शः कभी सोचा है

 - प्रगति गुप्ता
पाँच-छह महीनों से एक मरीज़ का हर महीने ही आना हो रहा था। वह अपना प्रेगनेंसी टेस्ट करवाने हमारे ही सेंटर पर आती थी। जब भी आती तो मुझे अभिवादन करना नहीं भूलती थी।  उसका नाम आशी नाम था।

सैकड़ों मरीज़ों के बीच, जब कोई चला कर अभिवादन करने जैसी आदत बना लेता है तो हमेशा ही स्मृतियों में रहता है । ऐसे में औपचारिक रिश्तों में भी अनायास ही एक अनजानी-सी आत्मीयता जुड़ जाती है। जहाँ प्रश्नों को पूछने और उत्तर देने में सहजता रहती है। ऐसा ही कुछ आशी और मेरे बीच हुआ।

आशी तीन दिन पहले ही आकर गई थी। पर आज जब उसे वापस सेंटर की सीढ़ियाँ पर चढ़ते देखा,  तो मुझे अपनी कुर्सी से उठकर रिसेप्शन पर आना पड़ा। वह अपनी रिपोर्ट लेने आई थी।

मैंने उसे अपने चेम्बर में अंदर बुलाया और अपने पास बैठने को कहा। मेरे अचानक ही अंदर बुला लेने पर उसने प्रश्नसूचक दृष्टि मेरे चेहरे पर डाली, तो मैंने उससे पूछा-“क्या हुआ आशी....आज आपने वापस प्रेगनेंसी टेस्ट क्यों करवाया?”

“कुछ नही मैम । तीन दिन पहले प्रेगनेंसी टेस्ट वीकली पॉजिटिव आया था, तो सोचा वापस करवा लूँ। आज सवेरे वापस करवाया था, तो पॉजिटिव आया है”-आशी ने कहा।

“फिर तुमने क्या सोचा है आशी! एक बात पूछूँ, बुरा मत मानना। तुम कुँवारी हो या शादी शुदा?”-मैंने झिझकते हुए उसके मन की टोह लेटे हुए पूछा

चूँकि आजकल किसी को भी सामने से देखकर कुँवारे होने या शादीशुदा होने का अनुमान लगा पाना बहुत ही मुश्किल होता है,  सो बहुत ही स्वाभाविक-सा यह प्रश्न मैंने पूछ लिया। वह मुझे एकटक देख रही थी और मैं उसके चेहरे पर आते-जाते भावों को पढ़ने की चेष्टा कर रही थी; क्योंकि मुझे उसके उत्तर की प्रतीक्षा थी।

“जी मेम! अभी मेरा विवाह नहीं हुआ है। पर मेरा एक बहुत करीबी दोस्त है। उनके साथ मेरी बहुत गहरी मित्रता है। हम दोनों विवाह भी करेंगे ।”

अपनी बात बोलकर आशी ख़ामोशी से मुझे ताकने लगी। इतने लोगों को रोज ही देखते, सुनते और उनके चेहरों को पढ़ते मुझे भी एक अरसा हो चुका था। बहुत कुछ उस अनकहे को पढ़ने की आदत हो गई थी, जो अक्सर लोग कहने में हिचकिचाते हैं। मुझे उसकी आँखों में ख़ुद के लिए कुछ तनाव-सा महसूस हुआ। अब उसका चेहरा भावशून्य हो गया था।

आजकल इस तरह के संबंधों को स्वीकारने में युवाओं को हिचक लेशमात्र भी नहीं महसूस होती है। यह बात मैं बहुत अच्छे से समझती थी। आज के युवा इसको आधुनिकता की श्रेणी में रखते हैं या फिर इसे आज की सच्चाई और जरूरत मानकर स्वीकारते हैं।

“साथ रहते हो तुम दोनों? क्या करती हो तुम? कहीं नौकरी या घर पर ही रहती हो।”

“जी हम दोनों इसी शहर में नौकरी करते है...एक ही कंपनी में काम करते हैं। सो मिलते ही रहते है।” ...

“आशी यह टेस्ट तो तुम घर पर भी कर सकती हो। फिर यहाँ आने की क्यों जरूरत पड़ी तुम्हें...”

मैं आशी को वो महसूस करवाना चाहती थी, जो वह भावों में बहकर महसूस नहीं कर पा रही थी।

“जी करती हूँ घर पर भी, पर क्रॉस चेक करने के लिए यहाँ आती हूँ।”

“ टेस्ट पॉजिटिव आया है। अब क्या करोगी तुम?”

“जी अभी शादी नहीं हुई है...तो गर्भपात ही करवाना होगा।” -आशी ने कुछ तनाव भरी आवाज़ में ही जवाब दिया। बात करते समय उसके चेहरे पर से मुस्कुराहट बिल्कुल गायब थी।

वैसे तो आज का युवा-वर्ग विवाह को भी गैर जरूरी समझता है। इस बीच बच्चे पैदा हो जाएँ, तो उसको भी सही ठहराने में नहीं चूकता। पर शायद अभी भारतीय परिवेश में इसको पूरी तरह स्वीकार पाना व्यवहार में नहीं आया है।

अपनी बात को जारी रखते हुए मैंने आशी से पूछा-“कितनी बार ऐसा निर्णय ले चुकी हो तुम?”

“ दो बार ..। क्यों पूछा आपने?”

उसके प्रश्न का जवाब देने के बजाए, मैंने अगला प्रश्न ही पूछ लिया।

“आशी! कभी तुम्हारा दोस्त साथ नहीं आया। बहुत प्यार करते हो न तुम दोनों? तभी तो वक़्त भी साथ में गुजारते हो।..कब से साथ हो?”

“जी प्यार तो करता है ...हम दोनों दो साल से साथ हैं।”

“हाँ! करता तो होगा ही तुमको वो प्यार। तभी साथ में वक़्त गुज़ारते हो।...मुझे सोचकर बताओगी कि पिछले कुछ महीनों से ही तुम्हें प्रेग्नेंसी टेस्ट को क्रॉस चेक करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? ”

आशी अब ज़वाब देने में असमर्थ थी और किसी गहरे सोच में होने से चुपचाप ही मुझे देखती रही। न जाने क्यों मुझे आभास हुआ, वह भी कहीं न कहीं बहुत कुछ सोचना चाह रही है। पर लड़के के लिए उसका लगाव सोचने नहीं दे रहा है। फिर मैंने ही अपनी बात पुनः शुरू करते हुए उससे कहा-“आशी कभी सोचा है तुमने....जो तुम कर रही हो,  उसका नतीज़ा भविष्य में क्या होगा?...तुम अपने लिए खाई खोद रही हो। जिसमें गिरने के लिए सिर्फ तुम आती हो। ...आखिर कब तक ख़ुद पर यह टॉर्चर करोगी? सोचकर देखना। यह शरीर तुम्हारा है, जिसके साथ तुम अत्याचार कर रही हो।”

काफी देर तक आशी निःशब्द ही मुझे देखती रही। मानो उसके सोचने-विचारने की शक्ति, उसके दोस्त की सोच से टकराकर शून्य में कहीं गुम हो गई हो या फिर मेरी कही बातों में, वह अपनी गुज़री ज़िन्दगी का आकलन करके स्वयं को ख़ोज रही हो ऐसा प्रतीत हुआ।

खुद से प्रेगनेंसी टेस्ट करने के बाद भी क्रॉस चेक करना उसके अपने अंदर दबे डर को भी इंगित कर रहा था।

बढ़िया नौकरी होने के बाद भी आज का युवा अपनी भावनाओं से हार रहा है। आज के इस भागदौड़ वाले समय में युवा वर्ग  आधुनिकता के नाम पर जिस होड़ में जुटा है, उसमें शरीर की पूजनीयता से जुड़े मानदंड कहीं खो गए है। सिर्फ क्षणिक सुख ही सर्वोपरि होता जा रहा है। जब भावनाओं से जुड़ी  परिभाषाएँ बदलती है या तब शरीर से जुड़ी प्राथमिकताएँ उनकी जगह लेती हैं, ऐसे में  मानसिक विकृतियों का बहुत खराब रूप सामने आता है। यह भी पहलू  बहुत शोचनीय है।

इतनी अच्छी जगह, अच्छे ओहदे पर काम करने के बाद भी अक्सर हमको  जिन भावों से जुड़े पहलुओं पर भी सोचना चाहिए , सोच नहीं पाते। बस बहते जाते है एक अंतहीन बहाव में। जब होश आता है तो अपना ही नुकसान कर बैठते है।

आज आशी भी कुछ कुछ ऐसे ही द्वन्दों को महसूस कर रही थी। मेरे से बात करने के बाद उसकी उलझन पर से शायद कुछ धुंध हटी थी, तभी वह मेरे से बोली.....

 “ह्म्म्म आप ठीक कह रही हैं.....पर अब नहीं भटकूँगी।...मैं भी अपने इस रिश्ते की असल दिशा को जरूर सोचूँगी।....जरूर सोचूँगी ...

शुक्रिया मेम! कहकर आशी मुझ से विदा लेकर चली गई। साथ ही मुझे भी एक अनकही-सी  सांत्वना देकर, काफी हद तक निश्चिंत कर गई।

सम्पर्कः 58, सरदार क्लब स्कीम, जोधपुर- 342001

प्रेरकः प्रतीक्षा करें… धीरज धरें…

  - निशांत

बेहतरीन लाइफ़-हैक्स केवल आपके फ़ोन की कोई छुपी हुई सेटिंग या ड्राइविंग की कोई अनूठी टिप्स जैसे ही नहीं होते। जीवन में सबसे कारगर साबित होने वाले लाइफ़-हैक्स आमतौर पर अमूर्त (एब्सट्रैक्ट) होते हैं। ये किसी विचार या योजना की तरह होते हैं जिन्हें जीवन में उतारने पर ही उनका प्रभाव स्पष्ट दिखता है।

आप जानना चाहेंगे कि इस तरह के मेरे कई लाइफ़-हैक्स में से सबसे अच्छा लाइफ़-हैक कौन- सा है?

प्रतीक्षा करना… इंतज़ार करना।

आपके जीवन को प्रभावित कर सकने वाला कोई भी बड़ा और महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने के पहले कम-से-कम 24 घंटे प्रतीक्षा करके हर पक्ष पर सोच विचार करना बहुत ज़रूरी है।

आपको नौकरी का ऑफ़र मिला है? तत्काल ही कोई निर्णय मत लीजिए। 24 घंटे तक इस पर विचार कीजिए। भावनाओं मे मत बहिए। नई नौकरी से जुड़े सारे पक्षों पर मनन कीजिए। नौकरी मिलना अपने आप में बड़ी बात है, लेकिन यदि आपको यह नौकरी नहीं करनी है, तो उसे तुरंत ही ठोकर मारने से बेहतर होगा कि एक दिन के लिए ठहरकर इस बारे में विचार कर लें।

नौकरी छूट गई? 24 घंटे तक ठहरकर इंतजार करें और यह सोचें कि यह क्यों हुआ… और अब आप आगे क्या करेंगे… आनन-फानन में अपने दोस्तों को कॉल करके उनसे नई नौकरी खोजने के लिए मत कहिए। थोड़ा रुकिए… क्या पता अगले 24 घंटों में आपको अपने अनुकूल कोई समाचार मिल जाए।

घर-परिवार में या किसी प्रिय व्यक्ति से कोई मतभेद या मनमुटाव हो गया? फौरन ही उनसे यह नहीं कह दें कि वे पूरी तरह गलत हैं। एक दिन के लिए इंतज़ार करें और सोचें कि जो कुछ भी हुआ उसमें कहीं आपकी भी तो कोई गलती नहीं थी। किसी भी व्यक्ति से संबंध तोड़ने में जल्दबाजी नहीं करें। किसी भी मन-भेद को इस सीमा तक नहीं गहराने दें कि भविष्य में आपको अपनी गलती का अहसास होने पर भी गलती सुधारने का मौका नहीं मिले।

क्या आप अपनी पत्नी या बच्चों या आपके अधीन काम करनेवालों पर चिल्लाने जा रहे हैं? रुकिए! अपने परिजनों या कलीग्स के साथ संबंध बिगाड़ने के पहले 24 घंटे के लिए ठहरकर विचार करें… यह सोचें कि आप सबके साथ बैठकर मसले को किस तरह से सुलझा सकते हैं।

मेरी कही सारी बातों का सार यह है कि हम सभी अपने जीवन में क्षणिक आवेगों से संचालित होते हैं और भावनाओं के बहाव में किसी भी बात पर त्वरित प्रतिक्रिया देने के कारण गलत निर्णय ले बैठते हैं। इन गलत निर्णयों के कारण जीवन कठिन हो जाता है, काम बिगड़ने लगते हैं, संबंधों में बिखराव आता है, धन-संपत्ति और स्वास्थ्य की हानि होती है, मानसिक कष्ट होता है।

तो जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण काम करने के पहले… अपने प्रियजन से नाता तोड़ने के पहले… अपने साथियों पर नाराज़गी ज़ाहिर करने के पहले… रुकें, इंतज़ार करें, सोचें।

ज़रा ठहरकर इंतज़ार करने का अर्थ यह नहीं है कि आपको हर हाल में लाभ ही होगा। हालातों का बनना और बिगड़ना बहुत सारे फैक्टर्स पर निर्भर है, लेकिन आपके भीतर इसका संतोष रहेगा कि आपने सारी बातों पर विचार किया और सुधार करने के लिए पर्याप्त प्रयास किया, और भविष्य में आपको इस बात का पछतावा नहीं होगा कि आपको धीरज से काम लेना चाहिए था। (हिन्दी ज़ेन)

दो लघुकथा 1. विकलांग

-माधव नागदा
  लँगड़ा भिखारी बैसाखी के सहारे चलता हुआ भीख माँग रहा था, “तेरी बेटी सुख में पड़ेगी, अहमदाबाद का माल खायेगी, बंबई(मुंबई) की हुंडी चुकेगी । दे दे सेठ लँगड़े को रुपये-दो रुपये।”

     उसने एक साइकिल कि दुकान के सामने जाकर गुहार लगाई । सेठ कुर्सी पर बैठा-बैठा रजिस्टर में किसी का नाम लिख रहा था । उसने सिर उठाकर भिखारी की तरफ देखा ।

    “अरे, तू तो अभी जवान और हट्टा-कट्टा है । भीख माँगते शर्म नहीं आती ? कमाई किया कर,    कमाई ।”

    भिखारी ने स्वयं को अपमानित महसूस किया । स्वर में तल्खी भरकर बोला, “सेठ, तू भाग्यशाली है । पूरब जनम में तूने अच्छे करम किए हैं । खोटे करम तो मेरे हैं । जन्म लेते ही भगवान ने  एक टाँग न छीन ली होती, तो मैं भी आज तेरी तरह कुर्सी पर बैठकर राज करता।”

    सेठ ने इस मुँहफट भिखारी को ज्यादा मुँह लगाना ठीक नहीं समझा । वह गुल्लक में भीख लायक परचूनी ढूँढने लगा । भिखारी आगे बढ़ा।

    “ये ले । ले जा ।”

    भिखारी हाथ फैलाकर नजदीक गया । परन्तु एकाएक हाथ वापस खींच लिया मानो, सामने सिक्के की बजाय जलता हुआ अंगारा हो । कुर्सी पर बैठकर ‘राज करने वाले’ की दोनों टाँगें घुटनों तक गायब थीं ।

2. परिवार की लाड़ली

       एक साथ तीन पीढ़ियाँ गाँव के बस स्टैण्ड पर बस का इंतजार कर कही थीं। दादी, माँ, , बेटा और उसकी नई-नवेली बहू। बस स्टैण्ड हाइवे के किनारे था। हालाँकि यातायात की कमी नहीं थी; लेकिन लोकल बसों की कमी थी। फलस्वरूप लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता था।

   समय गुजारने के लिये बेटे ने एक तरीका ढूँढ निकाला। वह आते-जाते ट्रकों के पीछे की लिखावटों को पढ़ने लगा। जरा जोर से, ताकि सब सुन लें। कोई रोमांटिक- सी बात होती, तो बहू की ओर देखकर और जोर से बोलता। बहू घूँघट कुछ ऊपर उठाती नीचे का ओंठ दाँतों तले दबाती और सबकी नजरें बचाते हुए पति की ओर आँखें तरेरती । पति को पत्नी के चेहरे की यह लिखावट ट्रक की लिखावट से भी ज्यादा रोमांचित कर देती। उसे इंतजार में भी अनोखा आनंद आने लगा।

  अभी-अभी मार्बल से लदा एक ट्रक गुजरा था। ओवरलोड। धीमी रफ्तार। दर्द से कराहता हुआ सा। लिखा था, ‘परिवार की लाडली’। बेटे ने कहा, वो देखो परिवार की लाडली जा रही है और बड़े लाड़ से पत्नी को निहारा।

  “हुँह,इतना तो बोझा लाद रखा है और परिवार की लाड़ली।” पत्नी ने व्यंग्य किया।

   सासूजी सुन रही थीं । उन्होंने तिरछी निगाहों से अपने पति व सास की तरफ देखा, फिर बोली, “इतना बोझा लाद रखा है तभी तो परिवार की लाड़ली है। वरना.....।”

बहू ने महसूस किया कि सासूजी की आवाज घुट कर रह गई है।

सम्पर्कः  लालमादड़ी (नाथद्वारा)- 313301(राज). मोब-9829588494

किताबेंः यथार्थ से साक्षात्कार कराती लघुकथाएँ

- नमिता सचान सुंदर

समीक्ष्य कृति- धूप के गुलमोहर  (लघुकथा-संग्रह), प्रथम संस्करण- 2021 लेखकः ऋता शेखर’मधु’, प्रकाशक: श्वेतांशु प्रकाशन- नई दिल्ली, पृष्ठ: 188, मूल्य: 340/-

अपने नाम को सार्थक करता ऋताशेखर का लघुकथा संकलन, ‘धूप के गुलमोहर’ कहीं धूप में गुलमोहर हो जाने की प्रेरणा देता है तो कहीं जेठ की आग उगलती दोपहरिया में रस-रंग की धार सा अंतस को गहरे तक सिंचित करता है।

पाँच श्रेणियों में सलीके से वर्गीकृत की गयीं 138 लघुकथाओं से सुसज्जित यह संकलन हमें वैचारिक एवं भावनात्मक दोनों ही स्तर पर प्रभावित और समृद्ध करता है।

सामाजिक सरोकार की श्रेणी वाली कथाएँ हमें मात्र मानवीय सरोकारों की ओर अँगुली पकड़कर ही नहीं ले चलती हैं, वरन् हमारी सोच में कुछ डिग्री का फर्क लाने की भी क्षमता रखती हैं।

ममता के बेपनाह विस्तार में भी संबंधों के दायरे हमारी सोच में झुकाव, वरीयता स्वाभाविक रूप से ले ही आते हैं।  यह बात संकलन की प्रथम कथा, ‘माँ’ में लेखिका ने कुछ इस अंदाज में कही है कि कथा समाप्त करते ही मेरे भीतर का पाठक चमत्कृत हो मुस्कुराया।

 ‘डील’ हमारे बदलते सामाजिक परिवेश की कथा है। ‘नेग’ में समय के साथ आया परिवर्तन तो परिलक्षित है ही, किंतु साथ ही है पुरानी रूढ़िवादी मानसिकता भी।  इन दोनों कथाओं का चुस्त-दुरुस्त चुहल- भरा अंत ही कथाओं को रोचक बना जाता है।  कथन और कहन का संतुलन बखूबी बनाए रखा है लेखिका ने।

 दोहरी मानसिकता वाले आचरण पर चोट करती कथा ‘नैतिकता’ का कसाव इसका मुख्य आकर्षण हैं। ‘प्रैक्टिकल नॉलेज’ की कथा-वस्तु थोड़ा हटकर है और यही ताजापन इस कथा की विशेषता भी है।

‘रिटायर्ड’- नौकरी की सेवा अवधि समाप्त होने पर व्यक्ति के भीतर उपजे खालीपन, अनुपयोगी होने के अहसास को दर्शाती कथा है। न लेखिका ने कहीं उस खालीपन का जिक्र किया, न पात्र विशेष ने व्यक्त किया, कथा के अन्य पात्रों का व्यवहार भी पात्र विशेष के प्रति अत्यंत सौहार्द पूर्ण रहा; फिर भी कथा समाप्त कर मन भीग गया। अनकहे ही सब कुछ कह देने का कौशल ही इस कथा को विशेष बना जाता है।

इस श्रेणी में लेखिका ने कुछ ऐसे सरोकारों की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है, जिन पर हम बात करने से बचना चाहते हैं, जिन्हें हम हमेशा कालीन के नीचे खिसका देते हैं। ऐसी ही एक कथा है ‘कासे कहूँ ’।

लघुकथा- ‘युग परिवर्तन’ और ‘बेतार संदेश’ में हमारी युवा पीढ़ी की संवेदनशीलता को सटीक प्रतीकों के माध्यम से दर्शाया गया है। इसी प्रकार सामाजिक सरोकार की श्रेणी में कुल मिला कर 41 कथाएँ हैं जो अपने-अपने ढंग से पाठक मन पर अपनी छाप छोड़ती हैं।

दूसरी श्रेणी ‘रिश्तों की लघुकथाएँ’ की है, जिसके अंतर्गत 45 कथाएँ हैं। माता- पिता- बच्चे, भाई- बहन, सास- ससुर- बहू, देवरानी- जिठानी, बहन- बुआ, सखियाँ। लेखिका ने हर रिश्ते के ताने-बाने को बुना है इन कथाओं में।

संप्रेषण किसी भी रचना की आत्मा होती है और लघुकथा में शब्द सीमा की अनिवार्यता के कारण भावों, विचारों का संप्रेषण तो रस्सी पर चलती नटी- सा संतलुन का कौशल माँगता है। कथा ‘काठ की हांडी’ में लेखिका का यह कौशल बखूबी उभर कर आया है।

‘शापित फल्गु’ कई कारणों से एक बहुत ही खास कथा है। ननद- भाभी के रिश्ते को नारी की पारस्परिक समझ से जोड़ना लेखिका की विकसित सोच का परिचायक हैं। इस कथा की सबसे बड़ी विशेषता है एक पौराणिक संदर्भ को सामाजिक विचारधारा से लघुकथा के चोले में कुछ इस तरह फिट कर देना कि कहीं भी न असहजता लगे, न ढीलापन नजर आए।

‘संक्राति की सौगात’, ‘मनमर्जी’ आदि लघुकथाएँ सास-ससुर और बहू के रिश्ते में एक नया मोड़ लेकर सामने आती हैं और मन को कुछ ऐसी ठंडक पहुँचाती है, जैसे जेठ की तपती धरती पर पहली बारिश की फुहार।

‘बीज का अंकुर’, ‘सागर की आत्महत्या’, ‘पिता की कोख’, ‘ठोस रिश्ता’ आदि कुछ ऐसी कथाएँ हैं, जो अपने- अपने विशिष्ट अंदाज में हमसे यह कहती हैं कि हर पारिवारिक रिश्ता दूसरे रिश्तों को मजबूती देता है यदि हम समझदारी से काम लें।

कहते हैं लघुकथा में एक संदेश, एक उद्देश्य का निहित होना उसकी शक्ति का परिचायक होता है। इस श्रेणी की लघुकथाओं में पारिवारिक संबंधों में समस्याएँ और उनके निराकरण का संदेश निहित है।

मानवेतर लघुकथाओं की श्रेणी की पाँचों संदेशपरक कथाओं में लेखिका ने अलग- अलग और कुछ तो बड़े अनूठे प्रतीक चुने हैं । ‘प्यासी आत्मा’, दोधारी तलवार सी हमारे सिर पर लटकती है, तो ‘व्यवस्था का नकाब’, हमें आईना दिखाती है।

अगली श्रेणी की चार लघुकथाएँ को ऋता जी ने कोरोनाकाल की लघुकथाओं के अंतर्गत रखा है। इन लघुकथाओं की पृष्ठभूमि भले ही कोरोनाकाल है, किंतु उनकी कथावस्तु सार्वकालिक है, फिर वह ‘दाग अच्छे हैं’ की सास-बहू का परस्पर सांमजस्य हो या ‘भीड़-निर्माता’ की प्रिया की संवेदनशीलता।

पाँचवी और आखिरी श्रेणी है विविध कथाओं की। इस श्रेणी में 43 लघुकथाएँ हैं। एक तरफ ‘मरियम’, ‘समझौता’, आदि लघुकथाएँ अपनी संवेदनशीलता से भीतर तक उतर जाती हैं, तो  दूसरी तरफ ‘प्रतिकार’ जैसी कथा पीड़ा और अट्टहास दोनों को एक साथ ही उपजा जाती है। हर कथा का अपना विशिष्ट कथ्य है और विशिष्ट ही कहन भी।

कुल मिलाकर ‘धूप के गुलमोहर’ से हो कर गुजरना संवेदनाओं, भावों, सरोकारों की एक ऐसी यात्रा है, जिसमें एक तरफ यथार्थ हमारी बाह थामे चलता है, तो दूसरी ओर हालात को बदलने की संभावनाएँ भी हमारा साथ नहीं छोड़ती। जो निभा पाए, उसके लिए लघुकथा अभिव्यक्ति का एक अत्यंत सशक्त माध्यम है। लघुकथा विधा के प्रति ऋता जी की गंभीरता और उसके निर्वाह के प्रति उनकी सजगता का परिचय तो इस संकलन के प्रारम्भ में उनके द्वारा लिखी गई ‘मेरी बात’ से ही मिल जाता है।

 धूप के गुलमोहर की भूमिका लिखी है प्रेरणा गुप्ता जी ने।  जो ईमानदारी इस विधा के प्रति उनकी स्वयं की लघुकथाओं में परिलक्षित होती है, उसी ईमानदारी का निर्वाह उन्होंने इस संकलन की भूमिका लेखन में किया है।

सम्पर्कः 5 /138 विकास नगर, लखनऊ - 226022, Email: namitasachan9@gmail.com

कविताएँः 1. चार गुना सुंदर दृश्य

 - केशव शरण

1.

अपनी दो आँखों से देखा

कोई दृश्य मुझे

जितना सुंदर लगता है

उसका चार गुना

चार आँखों से

मुझे दो आँखें ढूंढ़नी हैं

 

चार टांगें होती हैं तो

रास्ता हँसते-बोलते

कट जाता है

और दृश्य भी

चार गुना नज़दीक

नज़र आता है

 

दो टांगों से

दूना दूर

चार गुना सुंदर दृश्य

 

2. कितना दूर कितना क़रीब

 

मैं मुफ़्त में वन देख रहा हूँ

या टिकट लेकर उपवन

या गलियों से होता हुआ

जा रहा हूँ किसी द्वार तक

या बैठा हूँ कहीं

थक-हारकर

 

मैं कितना दूर हूँ

लोगों से

मैं कितना क़रीब हूँ

लोगों के

मुझे कुछ इसका

अनुमान नहीं है

 

शहर अनजान नहीं है

और जगह भी

मैं जहाँ हूँ

सम्पर्कः एस 2/564 सिकरौल, वाराणसी  221002, मो. 9415295137