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Mar 5, 2021

किताबें- उम्र भर देखा किए

– डॉ. प्रताप सहगल 

पुस्तकः जीवनी-  सूरज प्रकाश, लेखक-  विजय अरोड़ा, प्रकाशक- इंडिया नेटबुक्स, सी 122 सेक्टर 19, नोयडा- 201301,
मूल्य-200 रु. (पेपर बैक), 350 रु. (हार्ड बॉन्ड)

उम्र भर देखा किए… हिन्दी के जाने-माने कथाकार सूरज प्रकाश की जीवनी है। इसे उन्हीं के छोटे भाई विजय अरोड़ा ने, जो स्वयं भी एक कथाकार हैं, बड़े मनोयोग से लिखा है। एक जीवित लेखक अक्सर आत्मकथा लिखते हैं। हिन्दी में राजनेताओं या सेठों की जीवनियाँ तो मिलती हैं लेकिन किसी जीवित लेखक की जीवनी विरल ही होगी।

यह सत्य है कि इसे लिखने के लिए बहुत सारे इनपुट स्वयं सूरज ने ही अपने छोटे भाई को दिए होंगे लेकिन जिस तरह से विजय ने उन्हें पिरोया है, वह तो उन्हीं का कौशल है। सूरज प्रकाश की पारिवारिक पृष्ठभूमि, भारत-विभाजन के समय परिवार का तभी बने पूर्वी पाकिस्तान के बन्नू से भारत आना और दुर्धर्ष संघर्ष से इस जीवनी की शुरुआत हुई है। पुनर्स्थापन के इसी दौर में 1952 में सूरज प्रकाश का जन्म होता है। विजय अरोड़ा उनसे लगभग आठ साल छोटे हैं। अब आप अनुमान लगा सकते हैं कि एक बड़े भाई और प्रख्यात कथाकार सूरज को एक दूसरे कथाकार और छोटे भाई विजय ने किस तरह से अपने अंदर उतारा होगा और फिर उसे शब्द-चित्रों में सृजित किया होगा।

विजय ने बहुत सधे हुए ढंग से अपने इस लेखन में त्वरा-शैली का इस्तेमाल किया है। छोटे-छोटे खंडों में सूरज प्रकाश के जीवन की घटनाएँ एक-दूसरी से लिपटी चली आती हैं। देहरादून से बम्बई, बम्बई से अहमदाबाद और फिर पुणे में ही उनके जीवन का अधिक हिस्सा कटा है। कुछ इधर-उधर काम करने के बाद उन्होंने सबसे लंबी नौकरी रिज़र्व बैंक आफ इंडिया में ही की है। यह सब तो ब्यौरे हैं। इन ब्यौरों को दिलचस्प तरीके से उदघाटित करना, न सिर्फ उदघाटित, बल्कि उन्हें सर्जनात्मक आख्यान के रूप में शब्दों में बाँधना। इस अभियान में विजय विजयी साबित होते हैं।

उम्र भर देखा किए सूरज प्रकाश के जीवन एवं लेखकीय-संघर्ष को समानंतर रूप से साधते हुए चलती हुई जीवनी है। बीच-बीच में कुछ दोस्तों का ज़िक़्र भी आता है लेकिन वह केवल ज़िक़्र भर होता है। मुझे लगता है कि दोस्तों के साथ हुई बैठकें, साहित्यिक अथवा दूसरी मुठभेड़ें, उनके सर्जनात्मक तनाव, वैचारिक मतभेद, महत्वाकांक्षाओं की टकराहटें भी इस जीवनी का हिस्सा बनतीं तो शायद यह जीवनी एक लेखक के अंतर्लोक को खोलने में और अधिक सक्षम होती। यह हिस्सा मुझे अनुपस्थित लगा। इसी तरह से उनकी पत्नी मधु, जो स्वयं भी एक लेखक हैं, उनके साथ भी हुई होंगी कभी कुछ वैचारिक असहमतियाँ। अगर हुई हैं तो वे भी यहाँ दर्ज नहीं हैं। पारिवारिक संघर्ष है, सूरज प्रकाश के दफ्तरी जीवन में होने वाली ऊठा-पटक भी है। इस सारे माहौल में सृजन करने की छटपटाहट भी है। अहमदाबाद प्रवास सृजनात्मक दृष्टि से सर्वाधिक उपजाऊ रहा है तो पुणे प्रवास सबसे अधिक खुष्क। इस जीवनी से ही पता चलता है कि सूरज ने एक ही जीवन में दो जीवन जिए हैं। एक उस भयानक रात की जानलेवा घटना से पहले और एक जीवन उसके बाद। इस दुर्घटना ने उनके जीवन को देखने-परखने का नज़रिया भी बदला।

यह जीवन सूरज प्रकाश के बहुत सारी अज्ञात अथवा अल्प-ज्ञात तथ्यों को हमारे सामने खोलती है। उनकी जीवनी में एक आम पाठक की क्या दिलचस्पी हो सकती है। उनकी जीवनी कोई क्यों पढ़े? इस सवाल का जवाब भी लेखकीय संघर्ष और उसे बयान करने के अंदाज़ के साथ जुड़ा हुआ है। यह दोनों ही बातें इस जीवनी के पक्ष में जाती हैं। विजय ने छोटे-छोटे लेकिन महत्वपूर्ण प्रसंगों का कहानी की तरह से बयान किया है। पढ़ने का जो सुख मिलना चाहिए, वह इसे पढ़ते हुए मिलता है। इसीलिए इसकी भूमिका लिखते हुए प्रेम जनमेजय ने लिखा है एक एक पेज सिप करते हुए। यह सिपकॉफी का हो सकता हो और एक पैग का भी। लेकिन यहाँ यह सिप एक-एक पृष्ठ और एक-एक शब्द का है। जितने मनोयोग से विजय ने इस जीवनी को अपने शब्दों से संवारा है, उतनी ही संलग्नता और शिद्द्त के साथ प्रेम ने अपनी भूमिका दर्ज की है।

कोई भी जीवनी या आत्मकथा कभी भी पूरी नहीं होती। वस्तुत: पूर्णता तो कहीं होती ही नहीं। पूर्णता मिथ है। इसलिए यह जीवनी भी बहुत कुछ कहने के बावजूद कुछ और कहने के लिए छोड़ देती है। उसके लिए सूरज प्रकाश को शायद आत्मकथा लिखनी पड़ेगी। यह तो भविष्य की बात है फिलहाल आप जीवनी को पढ़कर एक लेखक के संघर्ष के बारे में बहुत कुछ जान सकते हैं। पढ़ने का आनंद, सो अलग। इसके लिए विजय अरोड़ा को बधाई।

आपके मन में इसे पढ़ने की इच्छा जगी हो तो तुरंत कार्रवाई करें। सराहनीय पुस्तक। हर एक के पढ़ने योग्य। अमेजन पर उपलब्‍ध। 

ग़ज़ल- बेटियाँ

-अशोक शर्मा

कड़ी धूप  में  गुलमुहर  बेटियाँ हैं,

हमारे  सहन  का  शजर  बेटियाँ हैं।

 

छुपाया  हुआ  सा हुनर  बेटियाँ हैं,

ये रेशम, ये मलमल, टसर बेटियाँ हैं।

 

खिले फूल  से  लग  रहे  खास  बेटे,

मगर  इस  चमन  में  समर  बेटियाँ  हैं।


नजाकत, नफासत, हिफाजत कहें क्या,

समझ  सीप  में  ये  गुहर  बेटियाँ  हैं।


पिता की  छड़ी  और अम्मा  का चश्मा,

समझ  लो  कि  नूरे - नर बेटियाँ हैं ।


रहीं शीत में  गुनगुनी  धूप  सी यें,

दिसम्बर  में ज्यों  दोपहर  बेटियाँ हैं।


घनी  रात  में  एक  ढिबरी सरीखी,

सदा  आस  की  ये  सहर बेटियाँ  हैं।


अधूरी  रहेगी  सदा  ज़िन्दगी  ये,

नहीं  जिन्दगी  में  अगर  बेटियाँ  हैं।


'अशोक' इनको समझो खुशी के परिन्दे,

चहकती  घरों  में  अगर  बेटियाँ  हैं।


सम्पर्कः 'सोहन-स्नेह', कॉलेज रोड, महासमुंद (छत्तीसगढ़) 493445, मो. 9425215981

जन्म दिवस (23 मार्च, 1910) लोहिया : तुम थे फक्कड़ फ़कीर की बानगी

 -विजय जोशी (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक भेल, भोपाल)

दंभ मान मद करहिं न काऊ, भूलि न देहिं कुमारग पाऊ

लोभ पास जेहिं गर न बंधाया, सो नर तुम्हार समान रघुराया

            सत्य की ही तर्ज पर इतिहास भी वस्तुपरक (objective) होता है विषयपरक (subjective) नहीं, लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश में एकाधिकार वाद के अंतर्गत उसे भी रेहन रखकर अपने हिसाब से लिखवाया गया है आदिकाल से। राज दरबारों में राजकवि का धर्म भी यही हुआ करता था। इस राग दरबारी संस्कृति ने नई पीढ़ी को जो विरासत सौंपी वह तथ्यपरक न होकर ठकुरसुहाती के मायाजाल आप्लावित रही। राजनैतिक नेतृत्व ने एक ओर जहां अपनी गल्तियों या कमियों का भी महिमामंडन कर जनमानस को परोस दिया, वहीं सच्चे तथा अच्छे लोगों के योगदान को उपहास का पात्र बनाकर प्रस्तुत करने से न तो कोई परहेज किया और न ही किसी किस्म की शालीनता बरती। यह देश तो मनीषियों की धरती है और अच्छों के सूर्य समान अवदान को स्वार्थ की बदली सदृश्य कुछ देर तक तो छुपाया जा सकता है, किन्तु विलोपित करना संभव नहीं। तो आइये आज चर्चा करें भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक पुरोधा डॉ. राममनोहर लोहिया की जिनके योगदान की बेरहमी से उपेक्षा की गई। लोहिया मूलत: समाजवादी दर्शन के जनक थे, जिसमें न तो वामपंथी नारेबाजी एवं निर्दयता का पुट था और न ही पूंजीवादी व्यवस्थान्तर्गत शोषण की संभावना। इस माडल को यदि ईमानदारीपूर्वक अपनाया गया होता तो आज हमें इतने दुर्दिन न देखने पड़ते। वे औसत कद काठी के साधारण पुरुष थे आभिजात्य संकृति सभ्यता से सर्वथा परे। पहरावा ठेठ देसी। इरादों की ईमानदारी की निहाई (anvil) पर उन जैसा दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है, जिनका मानवतावाद भौगोलिक सीमाओं से भी परे था। हमारा मंतव्य केवल कुछ उदाहरण से ही भली- भांति स्पष्ट है।

1. अर्थशास्त्री: वे अद्भुत अर्थशास्त्री थे और इसका प्रमाण है लोकसभा के दस्तावेज़ में उपस्थित उनका वह भाषण जिसमें उन्होंने तत्कालीन नेतृत्व के आम भारतीय की प्रतिदिन 15 आने आय की हवाई घोषणा रूपी आंकड़ों की धज्जी उड़ाते हुए सिद्ध कर दिया था कि यह मात्र 3 आने है। भ्रामक, झूठी बातों का गुब्बारा  फोड़ने या यूं कहें कि भंडाफोड़ करने एवं साहस के साथ सच बोलने में उनकी कोई सानी नहीं थी। यदि व्यक्तिगत पसंदगी को ताक पर रखकर उनकी सेवा ली गई होती तो आज देश का नक्शा ही कुछ और होता। भारत कब का विश्व स्तर पर आर्थिक महाशक्ति बन गया होता।

2. मानवतावादी :  भौगोलिक सीमाओं से परे वे खालिस मानवतावादी थे और उनका यह चेहरा संसार के सामने तब प्रकट हुआ जब उन्होंने नस्लीय भेदभाव से ग्रस्त अमेरिका में कालों के प्रवेश से प्रतिबंधितएक रेस्तरां में अपनी पारंपरिक भारतीय वेषभूषा धोती, कुर्ता, सदरी और चप्पल सहित प्रवेश कर पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का जोखिम उठाया। विदेशी धरती पर किसी भारतीय का यह पहला अहिंसा का आग्रह लिया सत्याग्रह था एवं जब इस संवेदनशील प्रयास का पटाक्षेप अमेरिकी गृह विभाग द्वारा भारतीय दूतावास को जैक्सन में घटित दुर्व्यवहार के लिये क्षमा याचना युक्त खेद पत्र द्वारा हुई तो उन्होंने कहा : मुझसे माफ़ी माँगने से क्या मतलब।माफ़ी तो अमेरिकी राष्ट्रपति को दुनिया के समस्त अश्वेतों से मांगनी चाहिए जिनके प्रति गोरी चमड़ी वाले आज तक अन्याय करते रहे हैं।

3.  राष्ट्रभक्ति : राष्ट्रभक्ति दिखावे का प्रयोजन न होकर कुर्सी की लालसा से परे रगों में प्रवाहित होने वाला भाव हैजो उनमें बाल्यकाल से ही कूट कूटकर भरा था। उनकी उत्कट देशभक्ति की भावना ने उन्हें अनेकों बार अपनी राजनैतिक संगी साथियों के तंग नज़रिये तथा स्वार्थी सोच से टकराने पर विवश किया। वे आज़ादी उपरांत किसी पद के आकांक्षी तो कभी थे ही नहीं। उनका सोच तो समग्र भारतवासियों के कल्याण में निहित था।

- वे देश के विभाजन के सर्वथा विरुद्ध थे, किन्तु तत्कालीन राजनैतिक लालसा को भांपते हुए उन्होंने भारत पाक महासंघ का प्रस्ताव रखा था और यदि वही मान लिया जाता तो आज दोनों देशों में कम से कम अमन शांति तो होती।

- तत्कालीन गोवा पिछले 450 वर्षों से पुर्तगाल साम्राज्य का उपनिवेश था। लोहियाजी ने 1946 में ही इसे भी अजेंडा में सम्मिलित करवाने का प्रस्ताव रखा और जब आनाकानी देखी तो एकला चलो की तर्ज पर गोवा मुक्ति अभियान की योजना का सूत्रपात कर वहां प्रवेश करते हुए मडगांव में खुद की गिरफ्तारी से अभियान का श्रीगणेश किया। तत्कालीन राजनैतिक ईमानदारी के अभाव का ही परिणाम था कि गोवा को 1961 तक आज़ादी की प्रतीक्षा करनी पड़ी।

- वे सेना की मजबूती के बावजूद कश्मीर प्रसंग को संयुक्त राष्ट्र महासभा में ले जाने के न केवल विरुद्ध थे बल्कि इसे महान भूल मानते थे और ऐसा न हो पाने का परिणाम हम सब जानते हैं। 

4. सुधारवादी : सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ उनका रवैया जेहाद जैसी मानसिकता का स्वरूप था। यदि उनका जाति तोड़ो  का सुधारवादी सूत्र तथाकथित धार्मिक एवं राजनैतिक पुरोधाओं ने स्वीकारा होता तो न तो आज इतनी सामाजिक विषमता होती और न ही देश इतने खेमों में बंटा हुआ दिखाई देता।

5. भाषा से भातृत्व : हिन्दी के लिये उनका आग्रह भाषा से अधिक मैकाले मानसिकता मुक्ति का प्रयास था। अंग्रेजी से उन्हें कोई परहेज नहीं था। परहेज था तो सिर्फ यह कि वे मानते थे कि भारतीय भाषाओं का पोषण व विकास ही स्वाधीन सोच का सोपान बन सकता है।

वे अंतस में बहुत उदार एवं संवेदनशील थे। जब भारत सरकार ने रूस के पूर्व प्रधान मंत्री स्तालिन की पुत्री स्वेतलाना (जिसने भारतीय क्रांतिकारी बृजेश सिंह से शादी की थी) के यहां आकर बसने के निवेदन को भारत सरकार ने ठुकरा दिया तो उन्हें बहुत धक्का लगा, क्योंकि शरणागत की रक्षा तो भारतीय दर्शन का मूल भाव रहा है। स्वेतलाना ने भी सरकार की इस बेरुखी से आहत हो यह विचार छोड़ दिया और अंतत: स्विज़रलेंड जाकर में बस गईं।

कुल मिलाकर उनके चरित्र से यह बात भालिभांति उजागर होती है कि वे न तो वे सत्ता के लालची थे और न ही नाम के। यही कारण था कि गाँधी से लेकर आइंस्टीन, पर्ल एस. बक, श्रीमती रूज़वेल्ट इत्यादि तक अनेक विश्व प्रसिद्ध हस्तियाँ उनकी ईमानदारी पूरित बातों और आचरण की कायल थीं। वे तो सत्तासीनों के लिये अद्भुत उदाहरण थे एक फक्कड़ कबीर परंपरा युक्त संत। उन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि समझा। शादी के बंधन तक में नहीं बँधे। खानाबदोशी जीवन जिया और एक हरफनमौला के समान अनूठी मिसाल के साथ इस सुकरात ने धरा से विदाई ली।

इल्मो अदब के सारे खज़ाने गुज़र गए

क्या खूब थे वो लोग पुराने जो गुज़र गए

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

यात्रा- दापोली में तीन दिन- नीला सागर ... काली घटाएँ, सफेद लहरें

-प्रिया आनंद

दापोली एक कोस्टल हिलस्टेशन है और इसी तरह कोंकण क्षेत्र भी महाराष्ट्र की सबसे सुंदर जगह है। इसे कैंप दापोली भी कहा जाता है। दरअसल ब्रिटिश शासनकाल में यहाँ हाई लेवल के ब्रिटिश ऑफिसर रहे थे। यहाँ के ग्रेवयार्ड में उनकी कब्रें आज भी मौजूद हैं। महाराष्ट्र के रत्नागिरी इलाके में यह एक छोटा सा शहर है।  हम पुणे से 6 घंटे की लंबी ड्राइव पर दापोली पहुँचे। लॉक डाउन खुलने के बाद यह हमारी पहली आउटिंग थी रास्ते में हरियाली से सजे पहाड़ ...ऊँचाई से गिरते झरने और सड़क के दोनों ओर कितने ही रंगों में मुस्कुराते जंगली फूल थे। थोड़ा और आगे बढ़ने पर पहाड़ों की ऊँचाई बढ़ गई। पश्चिमी घाट के ये पहाड़ कच्चे नहीं;  बल्कि बेहद मजबूत चट्टानों  के हैं। हम सुबह आठ बजे चले थे, दोपहर दो बजे तक दि फर्न समाली रेजोर्ट पहुँचे। जंगल  में बना यह होटल लाल ईंटों से निर्मित है। और अपनी खूबसूरत वास्तु शैली के कारण जंगल के हरेपन में ही घुलमिल गया लगता है। हमारे वहाँ पहुँचते ही बारिश शुरू हो गई । बीच में थोड़ी देर के लिए रुकी  थी फिर लगातार जारी रही। ठंड थी इसलिए लंच लेने के बाद हम कहीं नहीं गए और रात को भी डिनर के बाद बिस्तरों में ही दुबक लिये मेरी नींद अक्सर पाँच बजे खुल जाती है। बाहर जाकर बालकनी से देखा तो सारे पेड़-पहाड़ घनी धुंध में खो गए थे बहुत दूर जलती हुई रोशनियाँ भी धुंध में बहुत धीमी चमक दे रही थीं। चारों ओर सिर्फ कोहरे का साम्राज्य था ... घना कोहरा और चिड़ियों की आवाजें। दस बजे तक धूप निकल आई ... बच्चे अब खुश थे वे बीच पर जाने की तैयारियों में व्यस्त हो गए। होटल से बीच थोड़ी दूर पर  ही था। 

दापोली अरबसागर के बेहद करीब है और यहाँ का समुद्रतट लगभग 50 किलोमीचर लंबा है। हालाँकि यहाँ सामान्य समुद्रतटों जैसी ही सारी विशेषताएँ हैं, पर यहाँ की रेत काली है। हम वहाँ पहुँचे तो तेज लहरों को देखकर चकित रह गए।  बीच से काफी दूर समुद्र में नावें आती -जाती दिख रही थीं। सफेद झाग लिये लहरें बहुत तेजी से आती थीं और  किनारे की काली रेत में आकर गुम हो जाती थीं। नारियल और सुपारी के पेड़ों से घिरा दापोली समुद्र तल से 800 फीट की ऊँचाई पर स्थित है । ब्रिटिश शासनकाल में यहाँ सैनिकों के शिविर होते थे। इसकी झलक आज भी यहाँ दिख जाती है।

दापोली, अंजारले, सारंग, मोपण, हरनाई, असद, खेरड़ी तथा मुरुड जैसे आस-पास के गाँवों के लिए प्रमुख शहर की भूमिका निभाता है। दापोली से पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर दो किले हैं इनका नाम कनक दुर्ग और स्वर्ण दुर्ग है। रोचक ही है कि कनकदुर्ग जहाँ भूमि पर बना हुआ है  स्वर्णदुर्ग समुद्री किला है। कहते हैं पहले इन दोनों किलों को एक सुरंग जोड़ती थी पर अब यह बंद है और नावों के द्वारा ही स्वर्ण दुर्ग तक जाया जा सकता है। मूलतः इन किलों को आदिलशाही वंश ने बनवाया, परंतु 1660 में शिवाजी महाराज ने  इन पर कब्जा कर लिया। यहाँ दाभोल रोड पर कोटजाई और धाक्ति नदियों के संगम के निकट गहरी घाटी में प्राचीन गुफाएँ हैं जिनकी नक्काशी का संबंध तीसरी सदी से लेकर चौदहवीं सदी तक का माना जाता है।

यहाँ के अंजारले गाँव की सुंदरता नारियल और सुपारी के पेड़ बढ़ाते हैं। यहाँ का बीच साफ सुथरा है और तट पर ढेरों सुंदर सीपियाँ और शंख  मिल जाते हैं। मुरुड बीच, कोंकण क्षेत्र के अत्यंत सुंदर और लंबे समुद्र तटों में से एक है। हरनाई, पोर्ट और बीच दोनों की भूमिका निभाता है। अंजारले गाँव का गणेश मंदिर बारहवीं सदी  में बना था  इसके अलावा भी  यहाँ कई दर्शनीय स्थान हैं।

कैसे जाएँ- यहाँ हवाई मार्ग,रेल मार्ग और सड़क मार्ग से जाया जा सकता है। रत्नागिरी का डोमेस्टिक एयरपोर्ट दापोली से 127 किलोमीटर की दूरी पर है, खेड़ रेलवे स्टेशन यहाँ से 29 किलोमीटर की दूरी पर है। सड़क मार्ग से  दापोली मुंबई से 220 किलोमीटर और पुणे से 185 किलोमीटर की दूरी पर है।

कविता- सुनो

-भावना सक्सेना

सुनो!
हर खाँचे में
सही बैठने को
छील देती हो
क्यूँ हर बार
ज़रा सा मन
कब समझोगी!
आदर्श
आखिर कुछ भी नहीं होते।
हर बार
हर किसी ने
गढ़ा है उन्हें
अपने लफ़्ज़ों में
अपनी सहूलियत से...

तुम तो उपजी भी
शायद
एक आस को तोड़
जैसे बंजर परती पर
उग आई हो अमरबेल
या कोई पीपल
पत्थरों का सीना चीर।
इस तपती
रेतीली भूमि पर
तुम्हारा होना ही
है नमन योग्य
फिर क्यों शर्मिंदा हो
अपने होने पर
कि बार-बार
खुद को तोड़
अपने टुकड़ों से
भरती हो दरारें,
आंसुओं के
महीन रेशम से
करती हो रफू
जिंदगी के ताने-बाने,
जोड़ते रहने की
फितरत में
ढल गई हो तुम!

दोषी हो!
तुम ही अपनी
कि मौन रहीं सदा
और सहमत रहीं।
गढ़ा जाता रहा तुम्हें
बरसों बरस
उनके अनुसार
उम्मीदों की छैनी से
छीली जाती रही,
चमक की आस में
घिसी जाती रही,
हौसलों की आँच में
तपाई जाती रही।

क्या समझी नहीं
अब तक
कितना भी तपो
किसी का कुंदन बन पाना
नहीं है आसान
क्योंकि छिल-छिल कर
अस्थि स्तर तक भी
तुम पाओगी
या तुमसे कहा जाएगा
कि बस ज़रा सा
और होता
तो बेहतर था
तुम कितना ही
छिलो, घिसो या तपो
वो ज़रा सा
कम रह ही जाएगा

जिन मानकों को
रखा गया है
तुम्हारे सामने
उनमें से कोई
नहीं थी संतुष्ट।
ना सीता, ना राधा,
और न ही पार्वती
देवियाँ होकर भी थीं
अभिशप्त ज़रा ज़रा।
सूखने दो आंसुओं को
इनके नमक से
करना है तुम्हें
सत्याग्रह
बाहर आओ
अनंत वर्जनाओं से
कि तुम्हें ही तो
रचनी है सृष्टि
समझाना है
स्वार्थ सिंझी दुनिया को
कि किसी रोज़
दुनिया की सब औरतें
एकजुट हो अगर
बांध लेंगी अपनी कोख
तो सिमट कर
मिट जाएगा संसार।