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Dec 6, 2020

किताबें- जाबाज़ वीरों की सत्य कहानियाँ

- स्वराज सिंह

पुस्तकः निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ

लेखिका: शशि पाधा

 प्रकाशक: प्रतिभा प्रतिष्ठान

नई दिल्ली, पृष्ठ: 150,मूल्य: 300/-

भारतीय जनमानस को प्रेरित करने वाली, देश के प्रति देशवासियों को उनका कर्तव्य याद दिलाने वाली जाबाज़ वीरों की सत्य कहानियाँ जो आज की पीढ़ी के लिए किसी भी धर्म ग्रंथ से बढ़कर है। देश धर्म से कहीं ऊपर होता है इसलिए मैं ऐसा कह रहा हूँ। निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ लिखने वाली लेखिका श्रीमती ‘शशि पाधा’ जी, जिनकी रगों में ही देश भक्ति रची बसी है। श्रीमती शशि पाधा जी हिंदी की जानी मानी हस्ताक्षर हैं। ‘निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ’ से पहले इनकी पुस्तक ‘शौर्य गाथाएँ’ बहुत ही लोक प्रिय रही। लेखिका के पति पैरा स्पेशल फोर्स में उच्च पद पर रहे। इन्होंने इन सभी योद्धाओं को बहुत नजदीक से देखा। ऐसे योद्धाओं की कहानियों को जन-जन तक पहुँचाना इनका जुनून बन चुका है। ऐसे वीरों की कहानियाँ लिखकर लेखिका, आधुनिक पीढ़ी को देश के प्रति उनके दायित्व को याद दिलाना और उनमें नैतिक मूल्यों का समावेश करना चाहती है।

इस पुस्तक में पहली ही कहानी ‘एक अंतहीन प्रेमकथा’ अशोक चक्र से सम्मानित एक जांबाज़ योद्धा लांसनायक मोहन गोस्वामी की कथा है जिसने सितंबर 2015 में कुपवाड़ा में 10 दिन के अंदर 11 आतंकवादियों को दोज़ख में पहुँचा दिया और अंत में अपने घायल साथियों की जान भी बचाई। इसी दौरान आतंकवादियों की गोलियाँ इस जाबांज़ की जांघ और पेट मे आकर लगती है और यह योद्धा वीर गति को प्राप्त हो जाता है।लेखिका मोहन गोस्वामी के परिवार से मिलती है। उनकी पत्नी ‘भावना’ जो बहुत ही दृढ़ निश्चय वाली महिला है। उनकी जिजीविषा और दृढ़ता, जीवन में आगे बढ़ने की उनकी ललक प्रेरणा दायक और अनुकरणीय है।

‘अपनी आत्मा का कप्तान’ एक ऐसे योद्धा और उसके परिवार की कथा है जिसको सुनकर रौंगटे खड़े हो जाते है। कीर्ति चक्र से सम्मानित शहीद कैप्टन दविंदर जस्स पैरा स्पेशल फोर्स का जवान था जो आतंकवादियों का खात्मा करते हुए शहीद हो गया। बहुत अल्प समय के लिए ही यह सेना में अपनी सेवाएँ दे सका। इनका सपना भी सेना में जाना था और कमांडो बनना था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद एम बी ए किया और डिलाइट कंपनी में बहुत अच्छी नौकरी पर थे, तभी उसे आई एम ए  से ट्रेनिंग के लिए पत्र आया। वह सब कुछ भूलकर अपना सपना साकार करने के लिए ट्रेनिंग के लिए देहरादून चला गया। कैप्टन दविंदर जस्स  की कथा के साथ-साथ उनके परिवार की कहानी भी प्रेरणा देने वाली है।

‘मिट्टी का मोह’ 1965 भारत पाकिस्तान युद्ध की एक ऐसी कथा है, जो लेखिका के पति केशव पाधा से जुड़ी है। इस कथा में बर्की गाँव में रहने वाले चिरागदीन है ,जो वृद्ध और पत्नी के बीमार होने के चलते अपना गाँव नहीं छोड़ सके। 1965 के युद्ध मे बर्की गाँव भारत के कब्जे में आ गया था। काफी दिन इस गाँव में भारतीय सेना रही। इन बुजुर्ग लोगों से भारतीय सैनिकों की आत्मीयता बढ़ गई। आखिर हैं तो इंसान ही। लेखिका के पति ने एक दिन चिरागदीन से उनकी इच्छा पूछी। उन्होंने कहा मेरा जन्म जालंधर के पास एक गाँव मे हुआ था। उसने कहा आप मुझे मेरे गाँव ले जाइए। मरने से पहले अपना जन्म स्थान देखना चाहता हूँ। कैप्टन केशव पाधा ने उनकी इस इच्छा को पूरा किया। बाद में ताशकंद समझौते के कारण भारतीय सेना को वापस आना पड़ा। इस वृद्ध ने लेखिका के पति कप्तान पाधा को एक कटोरा मिट्टी औए एक कुरान की प्रति भेंट की लेखिका ने इस अमूल्य भेंट को सदा  सँभाल कर रखा।‘मिट्टी का मोह’ कथा मर्म को छू लेने वाली है। यह भावनाओं को छूने वाली एक ऐसी कथा जिसको पढ़ने के बाद कोई भुला नहीं सकेगा।

‘उद्यम से अधिकार तक बढ़ते कदम’ नियति से लड़ने वाले और उसे परास्त करने वाले ऐसे संकल्पी सैनिक की प्रेरक कथा है, जिसका विद्यालयी पाठ्यक्रम में होना बहुत जरूरी है। नवीन गुलिया ने तीन साल एन डी ए की तैयारी की और  परीक्षा पास कर इंडियन मिलिट्री अकादमी में ट्रेनिंग के लिए देहरादून चला गया। नियति देखिए कि पासिंग आउट परेड की पूर्व संध्या पर एक बाधा दौड़ पार करते समय अपने किसी साथी का हल्का -सा धक्का लगने से संतुलन बिगड़ने से नौ फिट की दीवार से सिर के बल नीचे गिरे। गिरने से गर्दन के पास मस्तिष्क से जुड़ने वाली रीढ़ की हड्डी टूट गई। उसका शरीर पूरी तरह से पक्षाघात का शिकार हो चुका था। इलाज के लिए देहरादून से दिल्ली और फिर इन्हें पुणे के सैन्य अस्पताल ले जाया गया। शल्य चिकित्सा के द्वारा डाक्टर्स ने उनकी रीढ़ की हड्डी को जोड़ा। लगभग दो वर्ष तक सैन्य अस्पताल में रहने के बाद नवीन गुलिया को सेना से सेवानिवृत्त कर दिया गया। उनके सेवानिवृत्ति के प्रमाणपत्र पर लिखा था-100 प्रतिशत Disabled for life । पुणे में रहते हुए ही इन्होंने 99 प्रतिशत अंको के साथ दो साल का कम्प्यूटर कोर्स पास कर लिया था। इनकी संकल्प शक्ति का कमाल है कि इन्होंने 18632 फिट ऊँचे मार्सिमिक दर्रे पर टाटा कंपनी द्वारा उपलब्ध कार से पहुँचकर ‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड’ में अपना नाम दर्ज कराया। ( यह कार कुछ इस तरह बनाई गई थी कि जिसे विकलांग नवीन गुलिया जी चला सके)  इनके साथ इस अभियान में कई पत्रकार भी थे। इनकी यह कथा बहुत ही प्रेरणा दायक है। ऐसे जीवट वाले व्यक्ति समाज के लिए अनुपम उदाहरण है जो हताश निराश व्यक्तियों में आशा का संचार कर सकते हैं।आज भी ये गुरुग्राम के पास अपने ग्राम ‘बरहाना’ सामाजिक कार्यो में लगे है और अनेक युवाओं को भावी जीवन के लिए तैयार कर रहे हैं। इनका मानना है-‘मैं एक सैनिक हूँ। मैं फौजी सैनिक न बन सका,किन्तु एक सामाजिक सैनिक तो हूँ।आज की सबसे बड़ी लड़ाई समाज सुधार की लड़ाई है और इस लड़ाई के मैदान में मैं एक अथक योद्धा हूँ।’

‘वीर स्थली का सिंह नाद’ में लेखिका ने 1 जुलाई 2016 को 9 पैरा स्पेशल फोर्सेस के 50 वें स्थापना दिवस का वर्णन किया। इस समारोह सेना में सेवानिवृत्त हुए अधिकारी और इस यूनिट के शहीद हुए सैनिकों के परिवार भी आए हुए थे। लेखिका भी सपरिवार समाहरोह में आमंत्रित थी। लेखिका ने 9 पैरा स्पेशल फोर्सेस के योगदान और इससे जुड़ी स्मृतियों को सुंदरता से उकेरा है। जिससे ये क्षण और भी यादगार बन गए।

‘अनाम सैनिक’ में लेखिका ने पूर्वोत्तर फैले उग्रवाद को समाप्त करने के लिए चलाए गए अभियान का उल्लेख किया है। के1 पैरा स्पेशल फोर्सेस की कमान लेखिका के पति ‘कर्नल पाधा’ ने सँभाल रखी थी। इन सभी सैनिकों को हैलीकॉप्टर द्वारा जंगल में उतारा गया। रात्रि को विश्राम करने के लिए इन्होंने एक टीले को चुना। वहाँ रात गुजारने के लिए ज़मीन खोदते है तो उन्हें वहाँ दो हैलमेट,अस्थि अवशेष और दो जापनी रायफल्स मिली। जाँच करने पर अनुमान लगाया  कि ये द्वितीय विश्व युद्ध में किसी हमले में मारे गए दो जापानी सैनिकों के अस्थि अवशेष हैं और उन्हीं की ही ये रायफल्स हैं। बाद में यूनिट से धर्म गुरु को बुलाकर उनका संस्कार किया गया और वहाँ एक चिह्न लगाया-‘विश्व युद्ध में शहीद हुए दो गुमनाम जापानी सैनिकों का स्मृतिस्थल।’

लेखिका ने युद्ध और युद्ध के बाद के अनेक पक्षों को अपनी इस पुस्तक में बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। इस प्रकार की रचनाएँ आज के समाज के लिए प्रेरक और मार्गदर्शक है।

Email- swarajharipur@gmail.com)

ग़ज़ल- अधूरा रह गया

- रमेशराज

 

पत्थरों ने मोम खुद को औ’ कहा पत्थर हमें 

प्रेम में जज़्बात के कैसे मिले उत्तर हमें।

 

आप कहते और क्या जब आपने डस ही लिया

अन्ततः कह ही दिया अब आपने विषधर हमें।

 

इस धुँए का, इस घुटन का कम सताता डर हमें 

तू पलक थी और रखती आँख में ढककर हमें।

 

साँस के एहसास से छूते कभी तुम गन्ध को 

आपने खारिज किया है आँख से प्रियवर हमें।

 

आब का हर ख्वाब जीवन में अधूरा रह गया

देखने अब भी घने नित प्यास के मंजर हमें।


 सम्पर्कः ईशानगर , अलीगढ़, 

 E-mail : rameshraj5452@gmail.com

कहानी- पूरा चाँद अधूरी बातें

-भावना सक्सैना

पढ़ते-पढ़ते आँख लग गयी थी शायद… खुली तो देखा रात बहुत गहरा चुकी थी। उठकर कुछ और करने का साहस न था तो उसने सोचा कि वापस नींद की गिरफ्त में खो जाना ही बेहतर होगा। टेबल लैंप बुझाया, तो चाँद भीतर चला आया। नर्म रोशनी पसर गई उसके ऊपर। नज़र चाँद पर ठहर गई। चाँद पूरा सा था… उसे देखती सोचने लगी, ये पूरा है या पूरा- सा है! जो पूरा दिखता है वह किसी के बिना कितना अधूरा होता है। अपने आप में क्या कभी पूरा होता है कुछ… सोचें तो किसी से मिलकर भी कहाँ पूरा हो पाता है, पूर्णता में दोष रहता ही है। बस एक ही तो है जो पूर्ण है! उसी से पूर्णता लेने के प्रयास में सब हैं और वह पूर्ण दे दे तब भी पूर्ण रहता है और हम सब कुछ लेकर भी अपूर्ण रहते हैं। 

जीवन में कितना कुछ रह जाता है। न चाहते हुए भी छूट जाता है और कभी तो जानबूझकर छोड़ना भी पड़ता है। अधूरी बातें एक- एक कर सामने पसरने लगीं। जब भी इन अधूरे टुकड़ों को समेटना चाहा है, उसे लगा है कि ये अधूरे टुकड़े अनन्त हैं। ये अनन्त चारों ओर गहमागहमी उत्पन्न करते हैं, फिर क्यों मन में एक शून्य व्याप्त हो जाता है। शायद अनन्त और शून्य एक ही हैं। शून्य, उसके आगे शून्य और, और आगे और भी बड़ा शून्य…  समझ नहीं आता कि क्या है जिंदगी में... जो है वो क्यों है और जो नहीं है वो क्यों नहीं है।

जाना ही नहीं है जब कहीं तो दौड़ते क्यों हैं?

क्या चाहिए? पता नहीं! क्यों चाहिए? पता नहीं। कभी उसने कुछ इसलिए चाहा कि वो होना चाहिए , तो कभी इसलिए कि वो किसी और के पास था और कभी तो सिर्फ इसलिए कि सब कहते थे वह उसे नहीं मिल सकता। जब- जब किसी चीज़ पर रोक लगी उसे पाने की उत्कंठा और बढ़ी। उसने अपनी ज़िद पूरी की, ज़िद में भी, नाराज़गी में भी... जहाँ तक का उसे याद आता है एक वक्त के बाद से उसने सिर्फ मन का सुना, मन का किया, आज़ाद कर लिया खुद को बंदिशों से और पंख पसार दिए प्रेम के खुले आकाश में। यह ज़रूर बाद में जाना कि बन्दिशें कभी समाप्त नहीं होतीं सिर्फ रूप बदलती हैं, विशेष रूप से स्त्री जाति के लिए। ये बंदिशें कभी औरों की लगाई होती हैं तो कभी अपनी ही, कभी प्रेम की होती हैं तो कभी नाराज़गी की। बहुत किया मन का फिर भी कभी आँख मीच कर सोचा तो पाया कि छोटी- छोटी कितनी ही बाते हैं जो नहीं की, कभी सभ्य होने के शगल में तो कभी अनजान, अनदेखी, अनचीन्ही बेड़ियों में जकड़े होने के कारण।

बहुत सी बातें हैं जो करने को दिल चाहता है, लेकिन कर नहीं पाता, भीतर का ही कुछ रोकता है उसे, उस नुक्कड़ की गुमटी पर बैठकर चाय पीने से जहाँ दो बड़े-बड़े पत्थर पर लकड़ी का एक लंबा तख्ता रखकर चायवाले ने उसे बेंच का आकार दे दिया है। उस चायवाले को स्टोव में पंप भरकर स्टोव की लौ और तेज़ करते हुए देखने और पीछे की ओर कप धोते लड़के को बैठकर देखना शायद उसकी क्लास स्वीकार नहीं करेगी। वो फेन मट्ठियाँ और यहाँ तक कि काँच के मर्तबान में रखी रंगबिरंगी मिठाइयाँ खाने को आज भी जी चाहता है, लेकिन वह रोज़ उसके पास से सैर करते हुए आगे बढ़ जाती है, कभी रुककर चाय नहीं पी वहाँ उसने। 

अकसर खयाल आता है कि काश अदृश्य होने की शक्ति होती उसके पास तो वहीं बैंच पर अदृश्य हो बैठ रहती और देखती व सुनती कि वहाँ जो एक हाथ में चाय औऱ दूसरे में सिगरेट फँसाकर खड़े होते हैं , वो इतनी संजीदगी से किस मसले पर चर्चा कर रहे होते हैं। 

 क्या ज़िन्दगी के संजीदा मसलों का हल नुक्कड़ की चर्चाओं में होता है? वह नहीं जानती; लेकिन कई बार उसे लगता है कि शायद ये नुक्कड़ की चर्चा न हो तो देश की अर्थव्यवस्था तो डूब ही जाएगी। न जाने वो कौन सा दिन होगा कि वह उस गुमटी पर चाय बनाने को कहकर वहाँ खड़े बुद्धिजीवियों से कह पाएगी कि सुनो, ये दुनिया ये देश तुम्हारे विमर्श से नहीं चलता। शायद ऐसा कभी हो ही न...

ज़िन्दगी के रेलमपेल में दौड़ते -भागते और रोज़ाना के रास्तों से गुजरते कितने चेहरे सामने आते हैं, जिन्हें देखने के इस तरह अभ्यस्त हो जाते हैं कि कोई परिचय या बात न होने पर भी वह ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाते हैं। कुछ को देख सहज ही एक स्मित उभर आती है, जिसके प्रत्युत्तर में मिली मुस्कान दिन रोशन कर देती है।

कुछ हफ्ते पहले तक सुबह रसोई में काम करते देखती थी पीछे वाली बुजुर्ग महिला को। शायद अकेली रहती थी। नियम से 8 बजे तक उनका तौलिया बालकनी में सूखने आ जाता था।  शायद उनके घर के सामने वाली बालकनी में  धूप कम आती होगी, तो सर्दियों में पीछे ही कुर्सी डालकर बैठ जाती थी। छुट्टी होती तो  सारा दिन उसकी नज़रें वहीं घूमती रहती। बहुत बार मन किया कि उनसे जाकर मिले और उन्हें अपना फोन नंबर दे आए कि आंटी कभी भी जरूरत पड़े तो आप मुझे बुला सकती हैं। इस उम्र में भी उन्हें अपने सभी काम स्वयं करते देख एक गुनगुनी- सी मुस्कान फैल जाती है उसके चेहरे पर। सुबह हाथ में अखबार और दोपहर में कोई पुस्तक, शाम की ढलती धूप में चाय की प्याली। कभी वह पीछे की बालकनी में शाम को सूखे कपड़े उठाने जाती, तो मुस्कुराहटों का आदान प्रदान हो जाता था। अब कई दिनों से वह दिखाई न दी, तो बेचैनी बढ़ती जा रही है उसकी। किससे पूछे कि आण्टीजी कहाँ गई। फिर टहलने के बहाने पिछली गली में चली गयी थी एक रोज़ तो पता लगा था कि आण्टीजी कुछ अस्वस्थ हुई, तो उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया था। घर के आगे 'फ़ॉर सेल' का बोर्ड लगा था। उसका दिल रो उठा था… काश वह जाकर अपने मन की बात कह आई होती। वह कह भी आई होती, तो क्या उनके लिए कुछ कर पाती? कितने दिन तक उस बालकनी की खाली कुर्सी को देख मन में यही आता रहा था कि जीवन की परिणति कैसी होती है, कितने मन से उल्लास से परिवार बनाने वाले अकेले रह जाते हैं खाली नीड़ में।

एक लंबी सांस लेकर करवट बदली, तो खिड़की के बाहर के पेड़ की छाया से दीवार पर बन रही आकृतियों में उसे वो बुज़ुर्ग दंपती नज़र के आगे कौंध गए, जो रोज़ाना सामने वाले पार्क में कीर्तन में जाते थे। महिला जिस अदा से तैयार होती हैं, उन्हें देख दिल खुश हो जाता है। बहुत बार मन चाहा कि आंटी को कहा जाए कि आंटी आप बहुत सुंदर दिखती है आज भी, ईश्वर करे आप दोनों सदा यूँ ही साथ रहें हमेशा। लेकिन उस रोज जब ऑफिस से लौटते हुए यह सोचकर खुलकर मुस्कुराई कि आज पक्का बोलना है और आण्टी जी ने ब्लेंक -सा लुक दिया, तो शब्द भीतर ही जज़्ब हो गए। फिर एक सीख मिली कि ज़रूरी नहीं कि जैसा आप सोचते हैं, सामने वाला भी वैसा ही सोचता हो। वह आपकी भावनाओं से अलहदा सिर्फ आपका आवरण देखता है और अपने भरम बुनता है। उसके भीतर अपनी ही कहानियाँ होती हैं। 

हर व्यक्ति अपने भीतर एक अलग संसार लिये घूमता है। आप उसकी दुनिया में वहीं तक पहुँचते हैं, जहाँ तक वह अनुमति दे। और बहुत बार तो सामने वाला द्वार खोल बैठा होता है, तब भी आप उसके भीतर उतरने का साहस नहीं जुटा पाते कि आपको लगता है आप मन पर एक और बोझ नहीं उठा पाएँगे। मन हर बार किसी के दुख पर बेज़ार होता है, आहत होता है और फिर उसका उपचार करने के लिए एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। 

 बस यही तो कारण था कि वह एक बार फिर छिलने का साहस न जुटा पाई थी।

कार्यालय परिसर के गेट पर खड़े गार्ड दिनचर्या में शुमार हैं, उनकी ड्यूटी बदलती रहती हैं, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे रच बस गए हैं कि कुछ दिन न दिखें तो बेचैनी होने लगती है। राजस्थान वाली मुस्कुराती हुई गार्ड जिसे हेलो बोलने की आदत पड़ गई थी, जब कई दिन बाद दिखी और वह भी कुछ बुझी- बुझी- सी तो पूछने का बहुत मन था कि इतने दिन कहाँ थीं लेकिन मुस्कुराहट में सिमटे रिश्ते को शब्द न मिले। फिर वही चौड़ी मुस्कान के बीच से दोनों गुज़र गए थे और उस दिन के बाद वह फिर नज़र न आई। अब कहाँ खोजे उसे, बस प्रार्थना में याद करती है उसे कि जहाँ हो वह मुस्कुराती रहे।

वह पान वाला जिससे करीब 10-12साल पहले बड़े बेटे के लिए चिप्स खरीदती थी। बरसों हो गए उससे कुछ भी खरीदे; लेकिन उसकी मुस्कान वैसे ही खिलती है। कभी कभी यूँ ही जाकर उससे कुछ टॉफी और चिप्स खरीद लेती थी… उन टॉफियों में बचपन नहीं मिलता; लेकिन उस बुज़ुर्ग की मुस्कान मिल जाती। फिर जब लम्बी छुट्टी के बाद बहुत दिन बाद गुज़री उधर से तो वहाँ से उसका खोखा गायब था…  गार्ड से पूछा, तो पता लगा वह भी नया था, उसे कुछ नहीं मालूम। ऐसी न जाने कितनी मुस्कानें चलते- चलते मिलीं जीवन में और फिर खो गईं।

वो रिक्शावाला जिसके रिक्शे में बमुश्किल चार- पाँच बार बैठी होगी, लेकिन फिर भी वो हर दिन आवाज़ लगाता है यह जानते हुए भी कि जरा -सा आगे खड़ी गाड़ी उसे ही लेने आई है। उसकी गुहार सुन मन करता है रोज़ का रिक्शा लगा ले, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाती। क्या एक को बाँध देना अन्य से अन्याय न होगा, तो चलती रहती है। जब गाड़ी नहीं आती, तो जो सामने मिलता है वही ऑटो या रिक्शा ले लेती है। आज ही तो,  ऑटो लिया तो देखा चालक बहुत बुज़ुर्ग थे। मन कर रहा था उन्हें एक ओर बिठाकर पूछे कि क्या मजबूरी है कि वह इस उम्र में भी काम कर रहे हैं। नहीं कह पाई, वो जो आगे इंतजार कर रहा था उस तक पहुँचने को देर हो रही थी।

बस प्रारब्ध खींचता जाता है और नियति की डोर से खिंचते हुए न जाने कितनी बातें छूट जाती हैं पीछे। कितने लम्हे यूँ खो जाते हैं संकोच में, फिसल जाते हैं, पर मन पर एक छाप एक मलाल छोड़ जाते हैं… और मन भटकता, उड़ता फिरता है अधूरी चाहतों में। 

सोने की कोशिश में उसने फिर आँखें बन्द कर लीं और फिर उसकी बन्द आंखों में रोशनी के दो टुकड़े तैर गए। वह अक्सर सोचती है कि बन्द आँखों में जो दो रोशनी के टुकड़े, रहते हैं आँखें खोलने पर बिखर, गायब क्यों  हो जाते हैं... यही जीवन है शायद, हर पल कुछ छोड़ता बिखरता दूर जाता सा… इसी एहसास के साथ आँख फिर बंद हुई और नींद ने आँचल में समेट लिया उसे। शायद नींद में ही पूर्णता है!

E-mail : bhawnavsaxena@gmail.com

नवगीत- जागो! गाँव बहुत पिछड़े हैं

- शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’

बंसी बजती है विकास की?

कहो! आज तक इन गाँवों में,

जागो! गाँव बहुत पिछड़े हैं।

 

चकबंदी के पाँव गाँव की,

पगडण्डी को मिटा गए हैं,

नई लकीरों से खेतों को,

एक सीध में  लिटा गए हैं,

अभी तलक ‘दुखिया’ के तन पर,

धोती वही पुरानी जर्जर,

झूल रहे मैले चिथड़े हैं ।

 

धुआँ चिमनियों का उठता है,

आसमान होता है काला,

कागज में सोया रहता है,

वर्तमान का नया उजाला,

पेड़ कटे, फसलों की खेती,

ईंटों से ही भरी पड़ी है,

भदई से फागुन बिछड़े हैं ।

 

कुछ झोंपड़ियाँ सुप्त पड़ी हैं,

बस्ती में है गहन अँधेरा,

झाँका है प्रतिदिन पूरब से,

उगता सूरज, नया सवेरा,

महलों में सीमेंट घुसा है,

लानों में दूबों की मस्ती,

डीहों पर लेटे चिपड़े हैं ।

 

शिक्षा की मंडी में केवल,

होती है अब कानाफूसी,

ठेके लेने देने में है,

तनिक नहीं कोई कंजूसी,

सूरा-सुराही के चक्कर में,

प्रचलन में बदलाव हुआ है,

शिष्टाचार बिके, बिगड़े हैं।


सम्पर्कः 'शिवाभा' ए-233 गंगानगर , मेरठ-250001 उ.प्र., दूरभाष- ९४१२२१२२५५

क्षणिकाएँ- स्मृतियाँ

- रश्मि शर्मा

जंगल में खिला है पलाश

स्मृतियाँ हैं तुम्हारी

है बैंजनी आकाश

और

सूखे पत्तों से घिरा मधुमास।

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स्मृतियों में है

कोई सुगन्ध, कुछ रंग

गुजऱ कर भी कहाँ

गुजरता है सब कुछ जीवन से..।

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स्मृतियों में बसी होती है

गोधूली बेला

और

गोधूली बेला में

स्मृतियों के सिवा कुछ नहीं बचता....। 

 

सम्पर्क: राँची, झारखंड