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Nov 3, 2020

व्यंग्य- दिवाली पर बल्ले-बल्ले! उर्फ किस्सा मुफ़्तेश्वर जी का

- गिरीश पंकज

अफ़सर जी का पूरा जीवन मुफ़्तखोरी का पर्याय बन चुका है ।  मज़े की बात यह है कि वे अपनी मुफ़्तखोरी पर कस्तूरी मृग की तरह मगन रहते हैं। रहना भी चाहिए। हमारे कने (यहाँ) कहा भी तो गया है, मुफ़्त का चंदन घिस मेरे नंदन। (कुछ लोग नंदन की जगह लल्लू शब्द का प्रयोग भी करते हैं । नंदन हो या लल्लू, मुफ़्त का चंदन लगाने का परमानंद ही अलग होता है! ) तो दिवाली पर अफ़सर जी का जलवा देखते ही बनता है। मुफ़्त के पटाखे, मुफ़्त की मिठाइयाँ, मुफ़्त के उपहार। कैश अलग। इतना कि पूरी फैमिली एक बार फॉरेन टूर कर के आ जाए। कभी-कभी ऐसे फॉरेन टूर उनके लगते भी रहते हैं । लोगबाग उन्हें फोकटवाद के प्रणेता के रूप में भी अब जानने लगे हैं। दफ़्तर का हर कोई अफ़सर जी के प्रेरक-चरित्र की चर्चा करता है और लक्ष्मी मैया यही मनाता है कि काश, उनके बच्चे भी इसी गोत्र के अफ़सर बनें।  ऐसी अफ़सरी के क्या कहने, जो मालेमुफ़्त दिल-ए-बेरहम का सहज-सुख लूटती है । सबने उनका  बड़ा प्यारा-सा नाम रख दिया है, मुफ़्तेश्वर। किसी कवि ने अफसर-प्रजाति की प्रशंसा में क्या खूब कहा है कि-

अफ़सर अफ़सर एक है, भेद नहीं है कोय।

अफ़सर लूटे सुख सदा, बाकी बैठे रोय।।

अफ़सर बनिया पुत्र जी,पिता दे रहा ज्ञान।

दोनों हाथ बटोरियो,यही समय का ज्ञान।।

अफ़सर जी की मुफ़्तखोरी की लत की क्या कहें। उस दिन तो हद हो गई, जब उनके पिताजी स्वर्गवासी ( स्वर्गवासी ही हुए होंगे!) हो गए,तो उन्होंने मातहत को फ़ोन किया, ''रामलाल, फादर इज डेड। कम सून। एंड लकड़ियों के लिए फॉरेस्ट वाले पांडे जी से बात कर लो।''

रामलाल बड़बड़ाया, ''साला, कंजूस। बाप मर गया, तो इसे लकड़ी भी फोकट की चाहिए। अरे, कम-से -कम पिताजी का अंतिम संस्कार तो अपने पैसों से कर दे रे। लेकिन नहीं। अगर ऐसा हो गया, तो काहे का अफ़सर।'' अफ़सरी की परिभाषा क्या है।

 अ से आओ। अ से अकसर भी।

फ़ से फोकट। 

स से सामान और 

र से रकम रख जाओ। आओ फोकट का सामान और रकम लाओ 

यानी अफ़सर।

जिस अफ़सर के घर दिवाली क्या, साल भर ही फोकट का राशन-पानी आए, परिवार फोकट का फल-फ्रूट से लेकर ड्राई फ़ूड तक खाए, जो फोकट में सपरिवार सनीमा देखे, फोकट में सपरिवार मीना बाज़ार आदि का आनंद लूटे, सरकारी गाड़ी को जो बैल की तरह जोतता रहे ;ऐसे हर अफ़सर का नागरिक अभिनंदन होना चाहिए।

कभी-कभी मैं मूरख ख़ल कामी सोचता हूँ , एक मुफ़्तवीर अफ़सर की औलादें कैसी निकलती होंगी। लेकिन सच कहूँ, यह भावुकता वाली बात होगी। मुफ्तखोरी करने वाले अफसरों की औलादें  अकसर मोटी-ताजी होती हैं  उनके चेहरे की चमक बता देती है कि इन दिनों मुफ़्तखोरी का लेबल क्या चल रहा है। और मज़े की बात यह है कि मुफ़्तखोरी करते-करते उनकी संतानें भी अकसर अफ़सर बन ही जाती है। इससे एक बात तो यह साबित होती है कि मुफ्तखोरी अभिशाप नहीं, वरदान ही है। वो मूर्ख है, जो सोचता है कि मुफ़्तखोरी में कोई नुकसान है। कुछ नहीं होता ।पहले कभी होता होगा कि फोकट का माल पचता नहीं ।  अब तो लोग जबरदस्त तरीके से पचाते हैं और डकार भी नहीं देते।

जो अफ़सर मुफ़्तखोरी को अपना नौकरीसिद्ध अधिकार समझता है , वह अपना दान- पुन्न भी फोकट में करना चाहता  है।  जैसे कोई पहुँचा, ''सर ! गणेश पूजा के चंदा दे दें'', तो अफ़सर उदार होकर बोलेगा, ''क्यों नहीं, क्यों नहीं''। फिर फोन लगाकर किसी को निर्देश देगा, ''हेलो फलाने , अरे भाई कुछ लोगों को आपके पास भेज रहा हूँ। इन्हें चंदा दे देना।''

बस हो गया दान-पुण्य।

मुफ्तखोरी करते-करते कुछ अफ़सर इतने काइयाँ  हो जाते हैं कि दवाइयाँ तक फोकट की चाहते हैं। जैसे मुफ़्तेश्वर जी। इसके लिए बड़ी चालाकी से हरकतें करते हैं । दफ्तर के कुछ कम भ्रष्ट मातहत अफ़सर को बुलाकर कहेंगे, ''यार फलाने, कुछ दवाइयाँ है। ले आना।''

फलाने मौन खड़ा है। अब सर जी पैसा दें, तो दवाइयाँ लाऊँ । लेकिन  अफ़सर उसकी हरकत देखकर के धीरे से बोलता है , ''अरे, लौट कर आओ। पैसे दे देता हूँ।''

फलाने लौटता है । अब उसकी हिम्मत कैसे हो कि पैसे माँग ले।  अफ़सर जानता है कि फलाने उसकी परंपरा का लुटेरा है । चोर का मालचांडाल खाए, तो बुरा क्या मानना।  फलाने जानता है कि बॉस ने मुफ़्त में दवाइयाँ हड़पी है । इसका मतलब यह है कि कुछ दिनों के लिए मैं खुलकर का भ्रष्टाचार का खेल खेल सकता हूँ।

मुफ़्तखोर अफ़सरों के किस्से बड़े रोचक लगते हैं। सरकारी महकमे में बड़े चर्चित रहते हैं। मगर जो अफ़सर ईमानदारी के साथ जीते हैं,उनके बारे में यही कहा जाता है, मूर्ख है साला। ढोंगी। आदर्शवाद दिखाता है।आदि आदि। मुफ्तखोर अफ़सर भी अपनी भड़ास कुछ इसी तरह निकालते हैं । उनका परिवार फोकटवाद का पर गदगद रहता है।  उसकी भड़भड़िया औरत माल-ए-मुफ्त खाकर मुटाती रहती है और  आस-पड़ोस में इतराती रहती है। वो कहती है,  ''हमारे ये बड़े पॉवररफुल हैं।  हमको सब कुछ फोकट में मिल जाता है । दिवाली के अवसर पर न हमें पटाखे खरीदने पड़ते हैं और न मिठाइयाँ। इतना माल आ जाता है कि हम कुछ लोगों को बाँट कर फोकट का पुण्य अर्जित कर लेते हैं।''

अफ़सर की  पत्नी समझदार है। वह यह  नहीं कहती कि  उसके हसबैंड मुफ्तखोर है।  उसकी जगह वह कहती है पॉवरफुल है।  वह जानती है कि ऐसा कहना और सोचना पाप है, मगर वह बार-बार पॉवरफुल पॉवरफुल बोल कर पति मुफ़्तेश्वर को पतिदेव या पति परमेश्वर बनाए रखती है। पत्नी को वह फिल्मी गीत अकसर याद रहता है,  भला है या बुरा है। जैसा भी है। मेरा पति मेरा देवता है।

अफ़सर के बच्चे अपने मित्रों से कहते हैं,  ''हमारे यहाँ तो सब चीज फोकट में आती है, बे। मेरे पिताजी बहुत बड़े ऑफिसर हैं। जानते हो,जब मेरे दादाजी मरे थे न, तो दफ़्तर के लोगों ने सारा इंतजाम किया था । फ़ादर को एक पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ा था । ऐसे हैं मेरे फादर।''

अफ़सर मुफ़्तखोरी के अवसर तलाशते रहता है। होटल जाएगा तो फोकट की थाली चाहिए। यात्रा करेगा, तो फोकट में टिकट मिल जाए। मज़े की बात यह भी है  कि जो जितना भ्रष्ट होता है, उतना आदर्शवादी भी होता है। कमाल है। वह नैतिकता की, कला की बात करेगा। साहित्य की चर्चा करेगा और करुणा तथा ईमानदारी को साहित्य की मुख्यधारा भी बताएगा। कभी-कभी मुफ़्तखोर अफ़सर कविताएँ  भी लिखने लगते हैं।  और अपनी सारी बुराइयाँ दूसरे चरित्र पर मढ़कर  महान कवि के रूप में चर्चित भी हो जाते हैं। केवल उसकी आत्मा जानती है , वह कैसी मस्त-मस्त चीज है। उसकी कविता भी बड़ी कमाल की होती है। पिछले दिनों उसका काव्य-संग्रह भी छपा।  उसका शीर्षक अद्भुत था, 'करुणा की कोख से जन्म लेती है कविता'।  और  संग्रह की कविता भी  फाडू किस्म की थी। कुछ इस तरह कि-

मैंने ईश्वर को याद किया तो

सबसे पहले कहा करुणा

मैंने अंतिम व्यक्ति को देखा तो

मैंने कहा दया

मैंने पिता को देखा तो कहा ईमान

मैंने जब पुण्य की कल्पना की

तो मुँह से निकला  शब्द मेहनत।

मैं बात यूँ ही नहीं करता कोरी ।

मुझे सख़्त नफ़रत है उस शब्द से

जिसका नाम है हरामखोरी।

अफ़सर मुफ़्तेश्वर जी का फोकट वाद फल-फूल रहा है। उनके कारण उनका पूरा दफ्तर इस बीमारी की चपेट में है।  पिछले दिनों अफ़सर जी की मां परलोक सिधार गई।  फोकट में आई दवाइयाँ भी माँ को ना बचा सकीं। अफ़सर ने फौरन फोन लगाया, ''शर्मा माँ नहीं रही।''

शर्मा जी घर पधारते हैं । घर पहुँचकर सारा बंदोबस्त करते हैं । अफ़सर को खुश रखने के लिए इससे बेहतर और मौका कुछ हो नहीं सकता। अफ़सर की माता के अंतिम संस्कार तक में अफ़सर की पॉकेट से फूटी कौड़ी नहीं लगी । यह कितनी बड़ी सफलता है । अफ़सर  को जीवन में और क्या चाहिए कि उसका सारा काम फोकट में हो जाए। पिता मरे तो अंतिम क्रिया फोकट में हुई। माता चल बसी , तो भी सब कुछ मुफ़्त में हो गया।  किसी भी अफ़सर की सफलता का यही तो पैमाना है।

आजकल कुछ लोग अपने बच्चों को समझाते हैं,  मेहनत करो। लगन से पढ़ो ।अच्छे मनुष्य बनो या न बनो पर अफ़सर जरूर बनना  देखो पड़ोस के अफ़सर अंकल को। सब कुछ मुफ़्त में आता है उनके यहाँ। ये होता है अफ़सर बनने से। टीचर आदि बनोगे तो फटीचर ही रह जाओगे।

अफ़सर का बच्चा अपने पिताश्री से कहता है,  ''डैड, क्या कोई ऐसा व्यक्ति मुफ़्त में नहीं मिल सकता, जो परीक्षा में मेरे सवालों को  फोकट में हल कर दे ?''

अफ़सर खुश हो जाता है, यह सोच कर कि बेटे का भविष्य उज्ज्वल है।  वह उसी रात एक कविता लिखता है-

बचपन से ही पुत्र का 

मुफ़्तखोरी के प्रति रुझान है। 

यानी बन्दा बड़ा ही 

भाग्यवान है। 

अब बड़ा होकर जरूर अफ़सर बनेगा।  

अपनी ही हाँकेगा

दूसरे की नहीं सुनेगा।

बच्चा बचपन से ही समझदार है । 

वह अ से अनार नहीं,  

अ से अफ़सर का पाठ पढ़ रहा है।

अभी से ही अपना

शानदार भविष्य गढ़ रहा है।

सम्पर्कः सेक़्टर -3, एचआईजी - 2 , घर नंबर- 2 , दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010, मोबाइल : 9425212720, 877 0969574 

दो ग़ज़लें

- डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल


1. नन्ही-सी लौ

न हो दुख-दर्द का साथी तो तन्हा काट देता है
मुसीबत में भी इंसाँ वक़्त अपना काट देता है


नहीं होती है ताक़त जिनमें तूफ़ानों से लड़ने की
उन्हीं शाखाओं को आँधी का झोंका काट देता है


अगर फैलाव में पानी के बाधा बनने लगता है
ख़ुद अपना ही किनारा आप दरिया काट देता है


मजा ये है कि सबके साथ हँसते-खेलते गुज़रे
वो जीवन क्या, जिसे इंसाँ अकेला काट देता है


बहुत नन्ही-सी लौ दीपक की है, लेकिन ये कहती है
अँधेरी रात का परदा उजाला काट देता है




2. ओस की बूँदों में

धूप बनकर फैल जाओ, चाँदनी बनकर जियो
घुप अँधेरा छा न जाए, रोशनी बनकर जियो


फूल बन-बनकर बिखरती है, तपन देती नहीं आग
बनकर ख़ाक जीना, फुलझड़ी बनकर जियो


आज तक जीते रहे हो, अपनी-अपनी जिदगी
दोस्तो! इक-दूसरे की जिंदगी बनकर जियो


ओस की बूँदों में ढलकर तुम अगर बिखरे तो क्या
दूर तक बहती हुई शीतल नदी बनकर जियो


आदमी के रूप में पैदा हुए तो क्या हुआ?
बात तो तब है कि सचमुच आदमी बनकर जियो

 

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कविता - ज्योति जगाएँगे

 - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

शुभ संकल्प हृदय में जागें,

दुनिया को सुखी बनाएँगे।

रोग-शोक घर-घर से भागें,

मिल ऐसी ज्योति जगाएँगे।

 

दीप हमारे मन की ताकत,

आशा का उजियारा है।

दीप नाश की कालरात्रि का,

 हर लेता हर अँधियारा है।

घर जलाने वाले  कभी क्या, 

आँगन में दीप जलाएँगे?

जो मरघट में पूजा करते, 

वे  गीत नाश के गाएँगे।

 

जिनके मन की दया मरी है, 

अब उनका शोक मनाना क्या!

परहित जिनके लिए पाप है, 

उनके नाम गिनाना क्या!

विष-बाणों से करें आरती, 

अब उनको क्या समझाएँगे!

हम तो उजियारे के रक्षक,

जो सिर्फ रोशनी लाएँगे।

कविता- दीपावली मनाएँ कैसे

 - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

अभी दशानन मरा नहीं है

प्रियवर, दीप जलाएँ कैसे

दीपावली मनाएँ कैसे? 

उन्मादी उन्मुक्त निशाचर

अट्टहास करते,हर पल छिन।

जनकसुता बंदिनी अभी तक,

काट रहीं दुःख के दिन,गिन- गिन।

अब भी कई अहल्याओं के ,

छल से होते चीर-हरण।

शबरी अब तक बाट जोहती,

कब आएँगे रघुनन्दन।

 

राजपथों पर भी दामिनियाँ 

डरी- डरी- सी चलती हैं

नरपशुओं की गिद्ध दृष्टि से

अपनी लाज बचाएँ कैसे.

प्रभु जी ,घर अब जाएँ  कैसे?

 

पुतले फूँकें, दीप जलाएँ,

सदियों की परिपाटी है।

किन्तु अभी तक  रावण की

अगणित छायाएँ बाकी हैं।

इतिहासों के काले पन्ने

ये छायाएँ खोल रही हैं

विद्वेषों की विषम कालिमा,

वर्तमान मे घोल रही हैं।

 

आओ हम सब मिलकर सोचें

असफल इन्हें बनाएँ कैसे,

इतना कलुष मिटाएँ कैसे।

दूर धरा से तम हो सारा,

ऐसे दीप जलाएँ कैसे?

संस्मरण- नन्ही-सी परी

- प्रगति गुप्ता
सरकारी अस्पतालों की दिनचर्या के बारे में जितना सोचें, उतना ही लगता है कि हम बहुत कम सोच पाए है। इधर से उधर दौड़ते मरीज़ों के रिश्तेदार व परिचित, अस्पताल में बदहवास से ही नज़र आते हैं। किसी को दवाई लेने की जल्दी ,तो कोई डॉक्टर के आने की राह देख रहा होता है। कब डॉक्टर देखे और इलाज़ शुरू हो! तो दूसरी तरफ मरीज़ का इलाज़ पूरा हो जाने के बाद उसको छुट्टी दिलाने के लिए औपचारिकताएँ  पूरी करवाने में जुटे मरीज़ के रिश्तेदार। इस भाग-दौड़ का सोचे तो ,जाने कितना कुछ स्वयं में बहुत कुछ कहता हुआ सा लगता है ।

उस दिन मुझे अपनी एक मित्र अलका की माताजी को देखने,अपने ही शहर के सरकारी अस्पताल में जाना था। वहाँ पर हुआ एक अनुभव, न सिर्फ मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर गया;  बल्कि मेरी आँखों से नमी बनकर भी उतर आया। कई दिन लग गए मुझे उस दर्द भरे अनुभव के प्रभाव से निकलने में।

पोस्ट ऑपरेटिव वार्ड में,आंटी को ऑपरेशन के बाद शिफ्ट किया गया था। पचास की उम्र में अत्याधिक रक्तस्त्राव होने से उनके बच्चेदानी का ऑपेरशन किया गया था। अस्पताल के प्रवेश द्वार से चलकर कई गलियारों को क्रॉस करके पोस्ट ऑपरेटिव वार्ड तक पहुँचने में, मेरा हर गलियारे में बैठे हुए मरीज़ों के रिश्तेदार के साथ सामना हुआ।

लगभग सभी रिश्तेदार अपने-अपने बीमार रिश्तेदारों की परेशानियों से त्रस्त दिखाई दे रहे थे। उन सभी मरीज़ों का अवलोकन करते हुए मैं आंटी के पास पहुँची। उनकी तबियत की जानकारी ली, तो पता चला कि आंटी की तबियत अब काफ़ी ठीक हो चुकी थी और वो पहले से काफ़ी बेहतर महसूस कर रही थी। उनके साथ थोड़ा समय गुज़ारने के बाद जैसे ही मैंने आस-पास ऑपेरशन किए हुए मरीज़ो पर नज़र डालना शुरू किया, तो पास ही के बेड पर क़रीब-क़रीब नौ-दस साल की बहुत ही प्यारी-सी बच्ची के हाथ और पाँव को बँधा देखा। मेरे अंदर ही अंदर न जाने कितने प्रश्नों ने उमड़कर, मुझे बहुत कुछ जानने-पूछने को मज़बूर कर दिया।

‘क्या हुआ होगा इस बच्ची को? क्यों इसको डोरियों से बाँधकर रखा है।’...बार-बार उमड़ता यही प्रश्न मुझे बैचेन कर रहा था। मैंने तब उस बच्ची के पास बैठी औरत से पूछ ही लिया-

‘क्या हुआ है इस नन्ही-सी जान को?.....आप क्या लगती हैं इस बच्ची की?...अगर बुरा न माने तो मुझे जवाब जरूर दीजिए’....

‘अम्मा हूँ इसकी मैं। इसका नाम परी है बाज़ी। आज से नौ बरस पहले जन्मी थी मेरे घर। सुंदर इतनी कि परियों जैसी। इसके अब्बा और मैंने तभी सोच लिया था, इसका नाम परी रखेंगे...सोचा था ख़ूब पढ़ाएँगे इसको। बड़ा इंसान        बनाएँगे...पर सोचे से कुछ हुआ है क्या बाज़ी?..

‘इसके अब्बा और मैं,मजूरी करने को इधर-उधर फिरते हैं, ताकि दोनों को पढ़ा सकें...छोटा भाई भी है इसका। पहली कलास में पढ़ता है’...

‘बाज़ी!इसके पैदा होने के दो-तीन बरस तक, हमको पता ही नहीं चला कि हमारी परी दिमाग से बहुत कमज़ोर है।....हर कोई इसको बहला-फुसलाकर अपने पास ले जाता। जब हम पूछते,यह कुछ भी बताने या कहने में सब भूल जाती थी। कभी-कभी असामान्य-सी हरकतें भी करती थी। सात-आठ साल की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते इसकी असामान्य-सी हरकतें बढ़ने लगी तो हम दोनों का जी घबराने लगा था। तब हम इसे लेकर डॉक्टर के पास भागे। डॉक्टर भी क्या करते?...जन्मजात बच्चो में आई हुई कमी कोई सुधार सका है

क्या?....बाज़ी! हम लोगों के यहाँ चूल्हा भी, दोनों के काम पर जाने से ही जलता है, तो आप ही बताओ,परी की चौकीदारी कौन करता?..लड़की जात कोई भी इसकी मासूमियत से खेल सकता था न।.....कितनी ही बार काम से लौटकर जब मैं घर पहुँचकर अपनी परी को खोजती....तो परी कभी किसी के यहाँ तो कभी किसी दूसरे के घर पर मिलती।...

हमारी बस्ती के सभी लोगों को,इसकी मानसिक स्थिति का पता चल गया था।....और बाज़ी! सच बताऊँ मुझे अक्सर ही कुछ अनजान से निशान इसके शरीर पर दिखते थे। बहुत डर लगने लगा था मुझे इसकी देखभाल को लेकर। कई-कई रातें मेरी जागते हुए कट जाती कि कल अगर में काम पर गई और मेरी परी के साथ कोई हादसा हो गया तो। परी के साथ-साथ मेरी ज़िंदगी  को भी गरहन लग जाएगा बाज़ी।...

‘आप ही बताओ क्या मैंने जुल्म किया है अपनी परी के साथ?......इसकी बच्चेदानी डॉक्टर से सलाह कर निकलवा दी मैंने।... किस-किस से बचाती मैं अपनी नन्ही परी को।...

‘मैं बहुत बेबस माँ हूँ बाज़ी, जिसने अपनी बेटी की मासूमियत को बचाने के लिए, भगवान से माफी माँगकर ही ऐसा काम किया है। आप बताओ न बाज़ी  गलत किया मैंने क्या?...मैं सब सज़ा भुगतने को राजी हूँ। पर नहीं भोगने दूँगी इसे, किसी ऐसे दरद को, जिसके लिए वो जानती भी नहीं ...समझती भी नहीं’....

ऐसा बोलते- बोलते सुबकने लगी थी वो...और मैं.. निःशब्द कभी परी को तो कभी उसकी माँ को, नम आँखों से निहार रही थी। बातों को सुनते-सुनते कब मेरा हाथ परी के बालों को सहलाने लगा, मुझे पता ही नही चला। परी का सिर अपने हाथों से जाने कब तक सहलाती रही। मुझे इसका भान ही नही रहा। जैसे ही सुध आई,परी की माँ के कंधे पर हाथ रख ,उसके निर्णय पर अपनी सहमति जतादी। फिर वहाँ से निःशब्द उठकर,एक अनकहा-सा दर्द अपने में समेट ,चुपचाप ही अस्पताल की सीढ़ियां उतरकर बाहर तो निकल आई।

पर मेरा दिमाग़ भाँय- भाँय कर रहा था कि क्या हो गया है समाज को। लोगों की पाशविक प्रवृत्तियों को, जहाँ शरीर की भूख़ इंसान को पागल बना देती है। इंसानपरी जैसी मासूम को भी अपनी वासना का शिकार बना सकता है। जहाँ मासूम किसी मानसिक विकृति से ग्रस्त है...इंसान की आत्मा उसको बिल्कुल नहीं कचोटती, उसके घिनौने कृत्य के लिए।

आदमी अपनी हवस के आगे इतना कायर हो जाता है। कि एक माँ की ममता उसे, अपने बच्चे की हिफाज़त के लिए इतना बड़ा निर्णय लेने पर मजबूर कर देती है। न जाने कितने दिनों तक, नन्ही-सी परी और उसकी माँ मेरे हृदय को द्रवित करते रहे।

आज भी जब यह ख़याल मेरे जहन में आता है। मैं अपनी आँखों को नम होने से नहीं रोक पाती।