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Jan 27, 2018

मनोविज्ञान

लिफ़ाफ़ा देखकर मजमून भाँपना
- डॉ. डी बालसुब्रमण्यन
अक्सर लोग पहली बार मिलने पर ही व्यक्ति के बारे में उसकी शक्ल-सूरत के आधार पर राय कायम कर लेते हैं। यह वैसे ही है जैसे किसी किताब के कवर को देखकर राय कायम कर ली जाए। अक्सर हम किसी व्यक्ति का चेहरा  देखकर उसे ईमानदार और भरोसेमंद (या गैर-भरोसेमंद) मान लेते हैं। मेरी पत्नी शक्ति के पास यह शक्ति है और आम तौर पर वह सही भी होती है। तो क्या किसी व्यक्ति का चेहरा उसके चरित्र का आइना होता है? मनोवैज्ञानिक पिछले कई सालों से इस पहलू का अध्ययन कर रहे हैं और चेहरे की विश्वसनीयता पर कई पर्चे भी प्रकाशित किए गए हैं।
आम सहमति यह दिखाई देती है कि शायद व्यक्ति का चेहरा उसके भरोसेमंद होने का सूचक होता है। इस तरह का एक हालिया अध्ययन चीन के वेन्ज़ाऊ मेडिकल युनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने किया है। उनका शोध पत्र बच्चों द्वारा चेहरे के आधार पर विश्वसनीयता का निर्णय: चेहरे के आकर्षण के साथ संगति और सम्बंधफ्रंटियर्स इन साइकॉलॉजी के 15 जून के अंक में प्रकाशित हुआ था।
इस मुद्दे पर पहले किए गए अध्ययन यह बताते हैं कि वयस्क लोग किसी अनजान व्यक्ति का चेहरा देखकर सेकंड के एक अंश में ही उस व्यक्ति की विश्वसनीयता को लेकर निर्णय कर लेते हैं। यह भी जानी-मानी बात है कि शिशु भी ऐसा करते हैं, वे किसी व्यक्ति के चेहरे को देखकर या तो चुप रहते हैं या रोने की प्रतिक्रिया देते हैं। तो क्या यह निर्णय की प्रक्रिया शैशवावस्था से ही शुरु हो जाती है और युवावस्था तक बनी रहती है? क्या यह उम्र और अनुभवों के साथ मज़बूत होती जाती है या इसमें कोई परिवर्तन होता है? यह सवाल है जिसे वेन्ज़ाऊ के शोधकर्ताओं ने संबोधित किया था। उन्होंने 8, 10 और 12 साल की उम्र के 101 लड़के-लड़कियों के साथ यह शोध किया। साथ ही उन्होंने 20 साल की उम्र के 37 विद्यार्थियों का एक तुलनात्मक समूह भी बनाया था।
यह प्रयोग दो चरणों में किया गया था। पहले चरण में 200 चेहरे दिखाए गए जिनके हाव-भाव उदासीन थे। प्रतिभागियों से पूछा गया कि क्या इनमें से प्रत्येक चेहरा विश्वसनीय था, इसके लिए तीन विकल्पों - विश्वसनीय/कुछ कहा नहीं जा सकता/अविश्वसनीय - में से किसी एक बटन को दबाना था। वे अपना निर्णय 0 से 3 रेटिंग स्केल पर भी दे सकते थे। जब प्रतिभागी इस प्रक्रिया से परिचित हो गए तब उनका औपचारिक टेस्ट लिया गया और उनसे प्राप्त स्कोरों का विश्लेषण किया गया। कुछ समय के अंतराल के बाद इन्हीं बच्चों पर दूसरा टेस्ट किया गया। इस बार स्क्रीन पर 200 चेहरे देखने के बाद सहभागियों को निम्नलिखित 3 विकल्पों में से एक चुनना था: आकर्षक/कुछ कहा नहीं जा सकता/अनाकर्षक
जब इन दोनों टेस्ट के रिज़ल्ट का विश्लेषण किया गया तो वैज्ञानिकों ने विश्वसनीयता और आकर्षण के बीच ठोस सम्बंध पाया - विश्वसनीय चेहरा आकर्षक होता है, या यों भी कह सकते हैं कि आकर्षक चेहरा विश्वसनीय होना चाहिए। और इन दोनों के बीच सह-सम्बंध उम्र के साथ बढ़ता जाता है। साथ ही विश्वसनीयता और आकर्षण के बीच का यह सह-सम्बंध लड़कियों के मामले में ज़्यादा देखा गया बनिस्बत लड़कों के।
हालांकि इस प्रयोग में पूर्वी एशियाई चेहरों का उपयोग किया गया था मगर अन्य स्थानों पर किए गए अध्ययन बताते हैं कि इस तरह के सह-सम्बंधों पर नस्ल या लिंग का बहुत असर नहीं होता। गलत हो या सही, आकर्षकता विश्वसनीयता का विश्वव्यापी संकेत लगता है। रूढ़ विचार यही लगता है कि सुंदरता अच्छाई है
यह सह-सम्बंध मात्र विश्वसनीयता से आगे जा सकता है और यहाँ तक कि व्यक्ति की अन्य चारित्रिक विशेषताओं पर भी लागू किया जा सकता है जिसे भारत में सामुद्रिका लक्षणम कहते हैं। सिद्ध लोगों ने कहानियाँ- कविताएँ लिखी हैं (देखें  siththarkal.com)। वे इस आकर्षक-विश्वसनीय सह-सम्बंध के परे गए थे और कुछ रचनाओं के बीच सह-सम्बंध बताए थे: जैसे मछली जैसी आंखों वाला मुक्त विचारक होगा, मोटे बालों वाला विलासिता पसंद करेगा, या सुंदर मुख वाला गुस्सा नहीं करेगा।
निश्चित रूप से कई पाठकों को चिंता होगी कि कहीं इस तरह के सह-सम्बंध बहुत सरलीकृत या भ्रामक न हों क्योंकि (1) इनमें मस्तिष्क और गहरे संज्ञान को नज़रअंदाज़ किया गया है, (2) हो सकता है कि अनाकर्षक चेहरे वाला व्यक्ति विश्वसनीय हो और (3) क्या किसी का चेहरा दुर्घटना में विकृत हो जाए तो वह अचानक अविश्वसनीय हो जाता है? सुंदरता की रूढ़ छवि (ज़्यादा आकर्षक लोग होशियार, मिलनसार और सफल होते हैं) को आइना दिखाने वाला मुहावरा है कि सुंदरता तो बस सतही होती है। वास्तविक महत्व तो दिमाग का है। और क्या यही वह चीज़ नहीं है जो हमें पूर्वाग्रहों, भेदभाव और असमानता की ओर ले जाती है? किसी भी जीव वैज्ञानिक सह-सम्बंध को सामाजिक कारक के साथ रखकर देखना ज़रूरी है। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो अपनी मानसिक उम्र में हम अभी तक बच्चे ही बने हुए हैं। या जैसा कि कहा जाता है सुंदरता वही है जो सुंदर काम करे।


हम क्या करते हैं, उसी से हम सुंदर बनते हैं, मात्र सतही शक्ल-सूरत से नहीं। सच्ची खूबसूरती केवल यह नहीं होती कि चेहरा सुंदर है या शरीर सुंदर है, बल्कि इससे परिभाषित होती है कि आप दूसरों के साथ कैसा बर्ताव करते हैं। (स्रोत फीचर्स)

इस जहान में

इस जहान में
देवमणि पांडेय

परवाज़ की तलब है अगर आसमान में
ख़्वाबों को साथ लीजिए अपनी उड़ान में

मोबाइलों से खेलते बच्चों को क्या पता
बैठे हैं क्यूँ उदास खिलौने दुकान में

ये धूप चाहती है कि कुछ गुफ़्तगू करे
आने तो दीजिए उसे अपने मकान में

लफ़्ज़ों से आप लीजिए मत पत्थरों का काम
थोड़ी मिठास घोलिए अपनी ज़बान में

जो कुछ मुझे मिला है वो मेहनत से है मिला
मैं खुश बड़ा हूँ दोस्तो छोटे मकान में

हम सबके सामने जिसे अपना तो कह सकें
क्या हमको वो मिलेगा कभी इस जहान में

उससे बिछड़के ऐसा लगा जान ही गई
वो आया,जान आ गई है फिर से जान में

एक पेड़ की दुनिया

एक पेड़ की दुनिया
 दीपाली शुक्ला
एक पेड़, शीशम का पेड़। इस पेड़ के इर्द-गिर्द तरह-तरह के पेड़ हैं। सब हरे-भरे हैं बस शीशम के पेड़ को छोड़कर। यह सूखा है, भूरे खुरदरे तने और उसके चारों तरफ लटकी सूखी लताओं के अवशेषों को लिए खड़ा है। इसके पड़ोसी बेर और सेमल मौसम बदलने पर अपने पत्तों को हवाओं में लहरा देते हैं। बाकी पेड़ों पर परिंदों की बसाहट समय के साथ करवट लेती है पर शीशम की सूखी डालियाँ हर मौसम में गुलज़ार रहती हैं।
कल का ही किस्सा है सात भाई चिड़ियों का एक पूरा का पूरा कुनबा डालों पर मोतियों की तरह खुद ही सज गया था। ठंड के कारण कितनी ही एक साथ सटकर नींद का मज़ा ले रही थीं। कुछ सुबह के आने के साथ अपनी चोंच को पैना कर रही थीं खुरदरे तने से रगड़कर। उनके इर्द-गिर्द बुलबुल उड़ान भर रही थी। गौरैया भी उनको आ-आकर देख रही थीं।
इस किस्सेा से पहले की एक बात याद आई। अभी थोड़े ही दिन पहले की। भोजन की तलाश में मोरनियाँ और उनके नन्हे एक कतार में शीशम के पेड़ के आसपास से गुज़र रहे थे। मोरनियों को आकर्षित करने के लिए मोर आवाज़ कर रहे थे। पर इधर मोरनियों को तो जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था। बच्चों के साथ नरम पत्तियों को चबाने में मशगूल थीं। आकर्षित करने की कवायद में एक मोर ने आखिरकार शीशम की एक शाख का सहारा लिया। काफी देर वह डाल पर बैठा आवाज़ देता रहा, देता रहा। फिर फुरर्र से उड़कर बेर के झुरमुट में खो गया।
शीशम के पक्के-पक्के दोस्तों में शामिल है कोयल, नर भी मादा भी। इनकी दोस्ती काफी पुरानी है। जब पेड़ पत्तियों से लदा-फदा था तब भी और जब आज वह सूखा दरख्त है तब भी कोयल बतियाती दिखती हैं इससे। मुझे नहीं पता कि कोयल की कितनी पुश्तें अब तक इस पेड़ पर बसती आई हैं। सुबह-सुबह ढेर सारी कोयल पेड़ पर एक दुनिया की बसाहट करती हैं। जो एक-दूसरे से बात नहीं करतीं वो मुँह फेरकर बैठती हैं। शीशम की डालों पर बार-बार पंखों को फड़फड़ाकर हवा करती हैं। चोंच को रगड़ती हैं। कई बार मादा कोयल शीशम पर घंटों बैठती है। कितनी बातें कहती सुनती है शीशम से। शीशम ही सुलह भी करवाता है देखा है मैंने।
कितनी बार जब बारिश के बाद पंखों को सुखाने के लिए बुलबुल और गौरेया आपस में लड़ती हैं तो शीशम दोनों के बीच बंटवारा करता है शाखों का। फिर वह पंखों से झरते पानी की बौछारों को समेटता है ताकि उसके तले नन्ही चीटियाँ भीगे नहीं।
हमेशा नहीं पर कभी-कभार शिकरा भी शीशम पर आराम फरमाता दिखता है। उस दिन चहुँओर बस मौन होता है। बाकी परिन्दे आसपास नहीं होते। तब हवा का बहाव भी बेहद सहमा होता है। शिकरा पेड़ के रंग को यूँ लपेटता है कि दोनों को अलग करना आसान नहीं।
जब शीशम हरियल था तब पतरंगी भी अक्सर शीशम से हरीतिमा लेने आती थी। दोपहर की तेज धूप में पत्तियों के बीच पतरंगी की चमक का क्या कहना! बीच-बीच में पतरंगी शीशम को अपनी उड़ान भी दिखाती। पर अब पतरंगी इस दरख्त पर नहीं आती। शीशम के पड़ोसी पलाश की पत्तियों से झाँकती है इन दिनों।
एक और दोस्त है जिसे किसी से बात करने की फुर्सत ही नहीं मिलती सिवाय शीशम के। वह ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर, एक शाख से दूसरी पर दौड़ती रहती है शीशम को अपनी छबरी पूँछ से गुदगुदी करती। कुनकुनी धूप का आनंद लेने के लिए वह तने पर आँखें मूंदें रहती है। किसी-किसी दिन तो बस गिलहरियों का एक के पीछे एक दौड़ने का सिलसिला थमता ही नहीं। तब शीशम को एक नया रंग मिलता है।
शीशम की दुनिया की यह कहानी और उसके किरदार अभी बहुत हैं पर यह सिलसिला अभी यहाँ रोकती हूँ। क्योंककि मुझे अब शीशम की दुनिया में ताक-झाँक करनी है।

ताकि बहुर सकें हिन्दी के दिन

ताकि बहुर सकें  हिन्दी  के दिन
- जगदीप सिंह दाँगी
हिंदी विश्व के सबसे बढ़े लोकतंत्र भारत की राजभाषा है। यह देश में सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। चीनी भाषा के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।  हिन्दी  बोलने वाले विश्व की सबसे बड़ी भाषाओं में गिने जाते हैं। यहाँ तक की प्रवासी भारतीयों की सांस्कृतिक भाषा भी  हिन्दी  है। दुनियाभर के देशों में  हिन्दी  को बढ़ावा मिल रहा है और कई जगह  हिन्दी  को प्रमुख विषय के रूप में पढ़ाया भी जाने लगा है। रूस और चीन जैसे देशों में भी आज काफी संख्या में  हिन्दी  बोली और पढ़ाई भी जा रही है।  हिन्दी  ने अपना वर्चस्व अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, एशिया, ऑस्ट्रेलिया महाद्वीपों के तिरानवे देशों में फैला रखा है।  हिन्दी  अपने स्वप्रयास से विश्व के कोने-कोने में पहुँची है। पीपुललिंग्विस्टिकसर्वे के अनुसार भारत में 780 भाषाएँ बोली जाती हैं तथा भारतीय संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाओं की संख्या 22 है। वर्तमान में देश की कुल जनसंख्या में से 65प्रतिशत लोग  हिन्दी  भाषा को जानने व समझने वाले हैं। मात्र 5प्रतिशत लोग अँग्रेज़ी भाषा को जानते व समझते हैं; शेष 30प्रतिशत में गैर  हिन्दी  और अँग्रेज़ी भाषी लोग यानी के तमिल, तेलुगू, बांग्ला आदि भाषाओं को जानने वाले हैं।
तकनीकी के इस दौर में इंटरनेट, टी.वी.हिन्दी  सिनेमा, दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों ने  हिन्दी  के प्रचार-प्रसार में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह किया है।  हिन्दी  की लोकप्रियता को देखते हुए कई विदेशी चैनलों ने अपने कार्यक्रम  हिन्दी  में प्रसारित करने प्रारम्भ कर दिए हैं जैसे डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफी आदि। इसके अतिरिक्त कई विदेशी फिल्में और धारावाहिक भी  हिन्दी  में आ रहे हैं। 
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी  हिन्दी  अब अपने पंख फैला रही है देश के कुछ विश्वविद्यालयों ने तकनीकी से सम्बन्धित उच्चस्तरीय पाठ्यक्रमों को  हिन्दी  माध्यम में  प्रारम्भ कर दिए हैं। आज कंप्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स, इंफ़ार्मेटिक्स एवं लैग्वेज इंजीनियरिंग जैसे उच्चस्तरीय (स्नात्कोत्तर, एम.फिल., पी-एच.डी.) पाठ्यक्रम  हिन्दी  माध्यम में उपलब्ध हैं साथ ही विभिन्न कोर इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम भी  हिन्दी  में उपलब्ध हैं। इन सबके बावजूद भी अगर  हिन्दी  के अच्छे दिन नहीं आए तो फिर इस पर गंभीरता से चिंतन-मनन कर वह कारण खोजना चाहिए जोकि  हिन्दी  की उन्नति में बाधक हैं? इन बाधक कारणों को खोज कर इन्हें दूर करने की दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए।
मुझे कुछ कारण दिखते हैं जोकि इस प्रकार से हैं-
किसने किया यह हाल, आप किसको दोषी कहते हो ।
मैं भी दोषी, आप भी दोषी, और किसे दोष देते हो ।
पहली बात सर्वप्रथम देश में  हिन्दी  को उसका वाजिब हक मिलना चाहिए जिसकी वास्तव में वह हकदार है। संवैधानिक तौर से  हिन्दी  को देश की राष्ट्र भाषा घोषित होनी चाहिए। इस बाबत  हिन्दी  को और अधिक समृद्ध और प्रभावी बनाने के लिए भारत की अन्य भाषाओं को  हिन्दी  से जोड़ऩे पर प्रयास की जरूरत है।  हिन्दी  को देश की राष्ट्र भाषा बनाने के लिए ऊपर उल्लिखित 30 प्रतिशत गैर  हिन्दी  और अँग्रेज़ी भाषी लोगों को  हिन्दी  से जोड़ऩा अनिवार्य है इन 30प्रतिशत लोगों को यह भी देखना और समझना चाहिए कि दुनियाभर के देशों में  हिन्दी  को बढ़ावा मिल रहा है और कई जगह  हिन्दी  को प्रमुख विषय के रूप में पढ़ाया भी जाने लगा है। रूस और चीन जैसे देशों में भी आज काफी संख्या में  हिन्दी  बोली और पढ़ाई भी जा रही है। इस लिहाज़ से भी राष्ट्र-हित में  हिन्दी  के समर्थन में इन लोगों को आगे आना चाहिए; क्योंकि अपने ही अपनों को सम्मानित व अपमानित कर-करा सकते हैं। जब किसी सम्मानीय का उसके अपने घर में सम्मान होगा तभी तो बाहर बाले भी उसे सम्मान की दृष्टि देखेंगे और उसे ससम्मान अपनाएँगें भी।
दूसरी बात देश की सभी सरकारी नौकरियों में अँग्रेज़ी भाषा की अनिवार्यता ख़त्म कर  हिन्दी  भाषा की अनिवार्यता होनी चाहिए तथा निम्न एवं उच्च शिक्षा का माध्यम एवं पठन-पाठन की संपूर्ण सामग्री का  हिन्दी करण होना कारूरी है। आजकल हम कई बार समाचारों में देखते हैं कि अब तो चपरासी और निम्न स्तर की नौकरियों की भर्तियों के लिए भी कई एम.बी.ए. और इंजीनियरिंग जैसी डिग्री वाले भी आवेदन कर रहे हैं। इसकी मूल वजह है सभ्य समाज द्वारा अँग्रेज़ी के सापेक्ष  हिन्दी  की उपेक्षा। देश में आज भी अधिकांश बच्चे हायर सेकेण्डरी तक हिन्दी  माध्यम में पढ़ते हैं लेकिन उच्च शिक्षा में जाते हैं तो माध्यम अँग्रेजी हो जाता है और वह बच्चा उस अँग्रेज़ी को समझने में ही अपनी आधी से ज्यादा ऊर्जा नष्ट कर चुका होता है और बची-खुची ऊर्जा ही कुछ विषयक ज्ञान को प्राप्त करने में लगा पाता है।  इससे वह सिर्फ़ और सिर्फ़ अधकचरा ज्ञान ही प्राप्त कर पाता है। आज यही वजह है कि देश में लाखों इंजीनियर बेरोज़ग़ार घूम रहे हैं। जब-तक रोज़गार  हिन्दी  प्रधान नहीं होगा तब तक  हिन्दी  के अच्छे दिन आना संभव नहीं है।
देवनागरी लिपि आधारित लगभग 12 भारतीय भाषाएँ ,जोकि  हिन्दी  के आस-पास हैं एवं इससे काफी मिलती-जुलती भी हैं; जिनमें भोजपुरी, मैथिली आदि प्रमुख हैं। यह सभी अपनी-अपनी अलग-अलग भाषाओं को  हिन्दी  से पृथक् कर देख रहे हैं और प्रोजेक्ट चला रहे हैं इससे भी  हिन्दी  टूट रही है और कमज़ोर हो रही है।  हिन्दी  की उन्नति के लिए इन्हें  हिन्दी  से जुडऩा चाहिए, न कि पृथक् होना चाहिए।
आज तकनीकी बहुत आगे बढ़ चुकी है फिर भी अँग्रेज़ी के मुकाबले  हिन्दी  में बहुत कम काम हुआ है। गूगल वाइसटाइपिंग रोमन एवं अँग्रेज़ी के लिए मौजूद है ,लेकिन देवनागरी  हिन्दी  के लिए तो अभी भी अभाव ही है। मशीनी अनुवाद एक बहुत ही जटिल कार्य है सीडेक एवं ट्रिपल-आईटी वर्षों से इस प्रणाली के विकास हेतु प्रयासरत है लेकिन आज भी सफलता से बहुत दूर हैं। जब तक सभी भारतीय भाषाओं का मानक एवं पूर्ण कॉर्पस नहीं बनेगा तब तक मशीनी अनुवाद आधा अधूरा ही रहेगा। यदि सिलसिले बार एवं एक जुनून के साथ यह कार्य किया जाए तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है। 
आज सूक्ष्मतम जानकारी से लेकर विशाल जानकारी इंटरनेट के माध्यम से कंप्यूटर पर उपलब्ध है। जिसका उपयोग कर व्यक्ति इसका लाभ उठाने लालायित है, पर आज भी इसकी सबसे बड़ी बाधा है भाषा की समझ। आज इंटरनेट की लगभग 80प्रतिशत सामग्री अँग्रेज़ी में ही उपलब्ध है। हमारे देश में हज़ारों लाखों नागरिक हैं, जो कि सफल व्यापारी, दुकानदार, किसान, कारीगर (मिस्त्री), शिक्षक आदि हैं; यह सभी अपने-अपने कार्य क्षेत्र में कुशल एवं विद्वान हैं, लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि यह सब अँग्रेज़ी भाषा के जानकार भी हों। ग्रामीण परिवेश में रहने वाले कृषक, कारीगर जो कि इस देश की उन्नति का मूल आधार हैं, यदि इन्हें और अच्छी तकनीकी की जानकारी अपनी ही निज भाषा  हिन्दी  में मिले तो सोने में सुगन्ध होगी! अत: हमें  हिन्दी  के और अधिक प्रचार प्रसार एवं विस्तार के लिए ज़्यादा से ज़्यादा  हिन्दी  ई-सामग्री को इंटरनेट पर स्थापित करने हेतु कार्य करने की जरूरत है। ताकि इंटरनेट पर  हिन्दी  सामग्री का प्रतिशत और बड़ सके तथा तकनीकी के क्षेत्र में  हिन्दी  एक समृद्ध विशाल वट वृक्ष के रूप में परिवर्तित होते हुए विश्व-पटल पर पूर्णरूप से स्थापित हो सके।
आजकल कुछ विद्वान हिंग्लिश को बढ़ावा दे रहे हैं जोकि किसी भी कोण से  हिन्दी  के हित में उचित प्रतीत नहीं होती है। एफ.एम. रेडियो पर आप सुन सकते हैं कि एंकर किस प्रकार से फूहड़पन फैला रहे हैंहिन्दी  के नाम पर हिंग्लिश परोसते हैं और वह भी अभद्र एवं अश्लील सांकेतिक भाषा का सहारा लेकर।  हिन्दी  सभ्य समाज को और देश के मुखियों को इन पर लगाम लगाना चाहिए।
हिन्दी क्षेत्र के नागरिकों से मेरी अपील है कि  हिन्दी  को उसका वाजिब हक दिलाने के लिए प्रयास कीजिए। मैंने अभी तक दो बार विश्व  हिन्दी  सम्मेलनों में शिरकत की और महसूस किया कि सरकार जितना धन  हिन्दी  के नाम पर इन विश्व  हिन्दी  सम्मेलनों पर मेज़बानी में खर्च करती है , अगर वह उसका एक चौथाई मात्र खर्च  हिन्दी  पर काम करने वालों पर खर्च करे; तो  हिन्दी  की स्थिति बहुत कुछ सुधर जाए और सच में  हिन्दी  के अच्छे दिन आ जाएँ। धन्यवाद!
लेखक परिचय-  महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में एसोसिएट प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय हिन्दी सॉफ्टवेयर विकास कार्य। निरंतर 15 वर्षों से हिन्दी भाषा में कंप्यूटर सॉफ्टवेयर का विकास कार्य। अनेक राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत, उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स- 2007 एवं लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स- 2015 में ससम्मान दर्ज। हिन्दी भाषा को सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पूर्ण रूप से स्थापित कर अन्य सभी भाषाओं के साथ संयोजन करने का उनका प्रयास। सम्प्रति: एसोसिएटप्रोफ़ेसर, प्रभारी निदेशक, प्रौद्योगिकी अध्ययन केंद्र, प्रभारी विभागाध्यक्ष, कंप्यूटेशनललिंग्विस्टिक्स विभाग, भाषा विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय  हिन्दी  विश्वविद्यालय, वर्धा। मो. 09921118136, 09826343498, 

हो सबका अभिमान

 हो सबका अभिमान
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
कहीं रहूँ सुखकर बहुत, सारा ही परिवेश।
मधुरिम हिन्दी गीत जब, बजते देश-विदेश।।1
तुच्छ बहुत वह जन बड़ा’, निन्दित उसका ज्ञान।
अपनी हिन्दी का नहीं, जिसके मन सम्मान।।2
करना सीखा है सदा, सबका ही सम्मान।
लेकिन क्यों खोनी भला, खुद अपनी पहचान।।3
कटीं कभी की बेडिय़ाँ, ज़ादी त्योहार।
फिर क्यों अपने देश में, हिन्दी है लाचार।।4
हिन्दी मन की दीनता, अँग्रेजी सरताज।
कैसे मानूँ भारती, पाया पूर्ण स्वराज।।5
कितनी मीठी बोलियाँ, बहे मधुर रसधार।
सबको साथ सहेज कर, हो हिन्दी विस्तार।।6
एक राष्ट्र की अब तलक, भाषा हुई, न वेश।
सकल विश्व समझे हमें, जयचंदों का देश।।7
अपने अपनाए नहीं, गैरों को जयमाल।
मन ही मन करती रही, हिन्दी बहुत मलाल।।8
चली प्रगति के पंथ पर, हुई बहुत अनमोल।
सजते अंतर्जाल पर, मोती जैसे बोल।।9
विविध विधा के संग सखि, पाया है विस्तार।
सहज, सरल हिन्दी  हुई, वाणी का शृंगार।।10
शुभ्र चंद्रिका सी खिले, कभी तेजसी धूप।
कितने ग्रन्थों में सजा, हिन्दी रूप-अनूप।।11
ममता बरसी सूर से, तुलसी जपते राम।
वाणी अमर कबीर की, मीरा रत्न ललाम।।12
सम्पर्क: एच-604, प्रमुख हिल्स, छरवाडा रोड, वापी, जिला- वलसाड, गुजरात (भारत),
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