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Nov 13, 2015

हाथा

धन- धान्य की 
रक्षा का लोक-चित्र    
हाथा (एक प्रकार का भित्ती चित्र) छत्तीसगढ़ में दीपावली के समय दीवारों पर बनाया जाने वाला रंगोलीमांडना जैसी ही एक लोक कला है। हाथा देने के पीछे लोक मान्यता है कि इससे घर में आई फसल और पशु धन को किसी की नजर नहीं लगती और वे सुरक्षित रहते हैं। चूंकि दीपावली के समय ही फसल कट कर घर में आ चुकी होती है अत: उसकी सुरक्षा भी आवश्यक होती है।
हाथा देने की परम्परा लक्ष्मी पूजा के बाद दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की सुबह तथा मातर के दिन और कीर्तिक माह में  जेठौउनी (देव उठनी) तक बनाया जाता है। 
गाँव की रऊताईन (राऊत महिलाएँ) अपने- अपने मालिकों (दाऊ या गौटिया) के घर दो- तीन के समूह में आशीष देते हुए गीत गाती हुई जाती हैं और दीवारों पर हाथा देने की रस्म पूरा करती हैं। हाथा देने के लिए चावल आटे का इस्तेमाल किया जाता है, तथा उसमें खूबसूरती लाने के लिए वे रंगों का भी प्रयोग करती हैं। आजकल तो कृत्रिम रंग का उपयोग होने लगा है, जबकि पहले गेरू मिट्टी तथा पेड़ों के छाल और पत्तों से रंग बनाए जाते थे। जब रऊताईन  हाथा देने का कार्य संपन्न कर लेती है तब घर मालिकिन उन्हें चावल, दाल, सब्जी, नमक, मिर्च और दीवाली पर बने पकवान जिसमें पूड़ी और बड़ा प्रमुख होता है, आदि भेंट स्वरूप उन्हें देती हैं।
इस परम्परा का हाथा नाम क्यों पड़ा इस पर यदि विचार करें तो यही समझ में आता है कि चूंकि हाथा, हाथ की उंगलियों से दिया जाता है इसलिए इसका लोक नाम
हाथा पड़ा है। राऊत महिलाएँ अपनी दो उंगलियों को रंग और चावल के आटे में डूबो- डूबो कर विभिन्न आकृतियां बनाती हैं। अब तो हाथा देने के लिए वे बबूल की डाली का उपयोग करने लगी हैंजिसका उपयोग गाँव में दातौन के लिए किया जाता है। (यह दाँत के लिए जड़ी-बूटी का काम करता है नीम के डंठल की तरह)
हाथा की आकृतियँं भिन्न -भिन्न होते हुए भी उनमें एक समरसता होती है, वे मंदिर की आकृति में ऊपर की ओर नुकीले आकार में ढलती जाती हैं।  परंतु इसके लिए कोई एक नियम नहीं होता। हर कलाकार को स्वतंत्रता होती है कि वह अपनी कला का खूबसूरती से प्रदर्शन करे। कुछ लोग हाथा देना को मांडना और रंगोली या अल्पना से तुलना करते हंै पर वास्तव में न ये रंगोली है न मांडना और न ही अल्पना, उसका एक प्रकार जरूर कह सकते हैं क्योंकि इस तरह दीवरों, आँगन तथा पूजा स्थान पर रंगों से आकृति बनाए जाने की परम्परा भारत के लगभग हर प्रदेश में कायम हैं, जो किसी न किसी रूप में सुख समृद्धि तथा टोटके के रूप में विद्यमान हैं।
हाथा घर के कुछ प्रमुख स्थानों पर ही दिए जाते हैं- जैसे तुलसी चौरा में घी का हाथा दिया जाता है। जिस कोठी में धान रखा जाता हैं वहाँ और गाय कोठे में भी हाथा देना जरूरी होता है। घर के प्रमुख दरवाजे में भी एक हाथा दिया जाता है। एक हाथा रसोई घर में, जिसे सीता चौक कहा जाता है, देना जरूरी होता है। सीता चौक को पवित्र माना जाता है और लोगों की ऐसी धारणा है कि जिस स्थान पर सीता चौक बनाया जाता है वह स्थान पवित्र हो जाता है, इसीलिए पूजा के स्थान पर यह आकार बनाया जाता है। इसे पवित्र मानने के पीछे भी एक कथा जुड़ी हुई है- कहते है कि पावर्ती जब शंकर भगवान को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करती है और पूजा के लिए फूल सजाकर चौक पूरती है , उस चौक ( अल्पना) का आकार इसी सीता चौक की तरह था। यद्यपि इसका नाम सीता चौक क्यों पड़ा इसके बारे में अभी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाई।
 गोवर्धन पूजा के दिन राऊत सोहई बांधने के पूर्व रसोई में बने घी के हाथा के ऊपर, गाय का गोबर साथ में  नई फसल का नया धान लेकरदोहा पारते (कहते) हुए नाचते- गाते आते हैं और उस हाथा के ऊपर गोबर तथा धान का गोला चिपका कर अपने मालिक की सुख समृद्धि की कामना करते हुए आशीष देते हैं। इसी समय राऊतों को भी नारियल कपड़ा आदि उपहार में दे कर उनका सम्मान करने की परंपरा है।
इसके बाद  गांव के सब राऊत मिलकर  सोहई (एक प्रकार का हार जो पशुओं के गले में बांधने के लिए दीपावली के अवसर पर ही बनाएं जाते हैं) बांधने चले जाते हैं। दीपावली में गोवर्धन पूजा के दिन खास बात यह है कि इस दिन लगभग सभी कार्य राऊत रऊतईन द्वारा ही संपन्न होता है।  हाथा बनाने के साथ गोवर्धन पूजा के दिन रऊताईन, गाय कोठे में दरवाजे के पास गोबर से प्रतीक स्वरूप देवता बनाती हैं, घर मालकिन जिसकी विधि विधान  के साथ पूजा करती है और उसके गाय उसे रौंदते हुए कोठे में प्रवेश करती है।
 इन सबके साथ गाय की पूजा करके नए चावल की  खिचड़ी खिलाना गोवर्धन पूजा के दिन का सबसे प्रमुख अंग होता है, घर वाले गाय को खिचड़ी खिलाने के बाद ही अन्न ग्रहण करते हैं। (उदंती फीचर्स)

दियारी

फसल, अन्न और पशु के साथ  खुशहाली का पर्व 
              - संजीव तिवारी
भारतीय सनातन परम्परा के अनुसार कार्तिक महीने में दीपों के उत्सव का त्योहार दीपावली संपूर्ण भारत में मनाई जाती है। पत्रपत्रिकाएँ, शुभकामना संदेश दीप और लक्ष्मी के तत्सम तद्भव शब्दों के लच्छेदार वाक्यांशों से भर जाते है। आखिर ऐसा हो भी क्यों ना, क्योंकि यह हमारा महत्त्वपूर्ण त्यौहार जो है।  अलग अलग स्थानों और आख्यानों में इसे मनाने के पीछे कारण जो भी रहे हों किन्तु सभी का केन्द्र धन, आनन्द और दीप से है। परम्पराओं में जन के लिए धन का मूल अर्थ धान्य से है जो हमारे देश का मूल है। लम्बे इंतजार और कठिन श्रम के उपरांत धान्य जब हमारे घर में आये तो उत्साह तो निश्चित है, उसके स्वागत में दीप जलाना हमारी परम्परा है। इस त्योहार की परिकल्पना इसी से आगे बढ़ती है, कल्पना कीजिये ऐसे समय की जब रोशनी का माध्यम सिर्फ दीप रहा होगा। अमावस की रात को अनगिनत दीप जब जल उठे होंगें। जन स्वाभाविक रूप से नाच उठा होगा।
श्रम के धान्य स्वरूप से परे दीपों के इस पर्व का छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में सीधा संबंध कृष्ण से भी है जो असल मायनों में धुर विद्रोही रहे हैं, वर्तमान परिवेश में वामपंथी। चाहे उनका जन शिक्षण का उद्देश्य इंद्र की पराधीनता के विरूद्ध हो या कंस के अराजकता के विरूद्ध। जननायक कृष्ण के वंशज यादवों के लिए वैचारिक जीत के उत्साह का यह पर्व छत्तीसगढ़ में इनके दोहों, गुडदुम बाजों और नृत्य से आरम्भ होता है।
कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था होने के कारण पशुओं के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता और इन पशुओं के पालक होने के कारण यादवों के सामाजिक महत्व को भी नकारा नहीं जा सकता। इन्हीं के आगाज से आरंभ देवारी सुरहुत्ती यानी घनतेरस से शुरू होकर जेठउनी यानी देव उठनी तक चलने वाला लम्बा त्योहार है। यही वो समय है जब किसानों की फसलें खलिहान या घर पर होती है, किसानों के श्रम का फल उसे मिलता है और धन के रूप में धान्य उसके घर में होता है। इसी धान्य लक्ष्मी के स्वागत में हम दीप जलाते हैं एवं खुशियाँ मनाते हैं। दीप और धान्य के अंतरसंबंधों को आप इस बात से समझ सकते हैं कि दीपावली के पहले या बाद में भी जब धान को मींज कर उसे साफ कर खलिहान में एक जगह इक_ा किया जाता है जिसे रास कहा जाता है उसके ऊपर शंकु पर दीपक रखा जाता है फिर पूजा के बाद धान की नपाई होती है। यानी दीप का स्थान सर्वोच्च है अन्न से उपर क्योंकि दीप प्रतीक है, राह दिखाता है।
प्राकृतिक कारणों से स्वाभाविक रूप से बरसात में घर के दीवार खराब हो जाते हैं उन्हें साफ करके उसमें नया रंग रोंगन की आवश्यकता पड़ती है। बरसाती प्रभाव व आद्रता एवं संक्रामक बीमारियों से लड़ते मनुष्य और कृषि कार्य में लगे पशुओं के लिए भी यह मौसम उनमें नई उर्जा का संचार करने एवं रोग प्रतिरोधक शक्ति का विकास करने में सहायक होता है। पशुओं के कोठे लीपे पोते जाते हैं, उन्हें सोहई बांधा जाता है, उनका श्रृंगार किया जाता है। कोठा सहित पूरे डीह डोंगर यानी गाँव के हर जगह दीपक जलाया जाता है।
छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों के साथ ही बस्तर के आदिवासी के लिए यह 'दियारी' खेतों में खड़ी फसल के पूजन का त्यौहार हैं जो कार्तिक माह में ही तीन दिन का होता है। परम्परानुसार पहले दिन खेतों में खड़ी फसल की बालियों का नारायण राजा के साथ विवाह तथा चरवाहे पशुपालकों के यहाँ जाकर गौशाला में बैल और गायों के गले में पवित्र धागा बांधकर भेंट प्राप्त किया जाता हैं, पशुपालकों के द्वारा चरवाहों को धान भेंट में दिया जाता है। दूसरे दिन बैलों को लाल टीका लगाकर खिचड़ी खिलाई जाती है, तीसरे दिन गोठान पूजा जात्रा किया है जिसमें बैलों को सजा कर सींगों पर लाल कपड़ा बांध कर दौड़ाया जाता है। बाद में घर की महिलाएँ चरवाहों को सूपा भर अनाज दान में देती है। फलस, अन्न और पशु इन तीनों के संयोंग से प्राप्त ऐश्वर्य खुशहाली का नाम ही दियारी या देवारी है। इसी दियारी में बनाये जाने वाले धान के बालियों से निर्मित झालर के संबंध में लाला जगदलपुरी की एक हल्बी गीत 'उडी गला चेडे' प्रासंगिक है  'राजे दिना/ धन धन हयं/ उछी उडी करी आयते रला/ बसी-बसी करी खयते रला/ सेस्ता धान के पायते रला / केडे सुन्दीर / चटेया चेडे/ सरी गला धान/ भारी गला चेडे/ एबर चेडे केबे ना आसे/ ना टाक सेला/ कमता करबिस/ एबर तुय तो 'खड' होयलिस/ एबर तोके फींगीं देयबाय/ गाय खयसी/ चेडे गला/ आउरी गोटे 'सेला' उगर। '
लटक झूल रहा था नीचे धान की बालियों का एक झालर। टंगा हुआ था 'सेला' दरवाजे के चौंखट पर। अपनी शुभ शोभा छिटकाये दर्शनीय। एक दिन एक सुन्दर गौरैया आई, और उसने दोस्ती  गाँठ ली 'सेला' से। रोज रोज वह उड उड कर बार बार आती रही थी। बैठ कर सेला धान को खाती रही थी। भूख बुझाती रही थी। एक सुन्द र गौरैया । धीरे धीरे कम होते गये सेला के लटकते झूलते दाने । और एक दिन ऐसा आया कि सेला के पास शेष नहीं रह गया एक भी दाना । चिडिया उड गई। 'चिडिय़ा अब कभी नहीं आएगी रास्ता मत देख सेला ' सेला से उसकी आत्माई कह रही थी 'अब तो तू रह गया है केवल घाँस, गौरैया के लिए अब रखा क्यो है तेरे पास तेरे इस अवशिष्टत भाग से गौरैया को क्या  लेना देना उसे चाहिए दाने गौरैया की दोस्ती तुझसे नहीं तेरे दानों से थी अब तुझे चौखट से उतार कर बाहर फेंक देंगे, गइया खा जायेगी गौरैया गई एक नए 'सेला' की खोज में।

छत्तीसगढ़ः मेला-मड़ई- सांस्कृतिक विविधता का सतरंगी रूप


                    - त्रिजुगी कौशिक
मेला यानि खुशियों का मेला अर्थात चटख रंगों में सजे-धजे बच्चे, किशोर व युवक-युवतियों का झुंड। हंसती खिलखिलाती... किलकारियों से गुंजती आवाजों का मेला। जहाँ  उल्लास है, उमंग है, लाल-पीला-हरा चटख रंग है...। आकाश में झूलते-झूले, हिंडोले हैं। नाचते-कूदते भालू बंदर हैं, नाचा नौटंकी, जादू, रंग बिरंगी चूडिय़ाँ, सिन्दूर टिकली, फीता व बुन्दा की सजी-धजी दुकानें, गुब्बारे, खेल-खिलौने व फिरकनियां। उस पर जलेबी, मिठाई व बताशा और उखरा की दुकानें समझों यहीं भरा है... खुशियों का मेला, जहां बचपन गुम जाता है।
 यह है भारतीय संस्कृति का सांस्कृतिक सामाजिक विविधता भरी जीवनशैली का एक रूप। हमारे देश का लोकानुरंजक मौलिक संस्कृति का संतरंगा ग्राम्य स्वरूप प्रचलित व विख्यात है। इन मेलों के मूल में कोई न कोई अन्र्तकथा है, संवेदना है, व आदि लोक परंपरा है यही कारण हैं कि इनका धार्मिक सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक स्वरूप कभी मिटता नहीं।
    हाट बाजार व मेले में काफी अंतर है। मेला शब्द में एक रोमांच है, उत्तेजना है। मेला मानो मिलन शब्द से बना है। मिलने का यह स्वरूप कुछ अलग है ... जैसे यहाँ आकर हर कोई खो जाना चाहता है। हमारी भारतीय संस्कृति में मेले मड़ई का स्थान सांस्कृतिक सामाजिक विविधता के साथ उल्लास के प्रसंग से जुड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारतीय मेले के या तो धार्मिक कारण हैं या आर्थिक सुखहाली का पूर्वानुमान। कुछ भी हो पर ग्रामीण मेला का रूप सतरंगी होता है। मेलों का मौसम वर्षा ऋतु के पश्चात फसल आगमन से प्रारंभ होता है। छत्तीसगढ़ का मेला कार्तिक पूर्णिमा महादेव घाट से प्रारंभ होकर फागुन मड़ई दंतेवाड़ा तक अनवरत चलता रहता है ...
कर्णेश्वर मेला - रायपुर जिले का आदिवासी बहुल क्षेत्र सिहावा जहँं महानदी का उद्गम है, जो शृंगी ऋषि के तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध है। वहां माघ पूर्णिमा पर कर्णेश्वर मेला का आयोजन होता है यह तीन दिनों तक रहता है।
राजिम मेला - महानदी के किनारे रायपुर जिले का दूसरा महत्वपूर्ण मेला राजिम है। राजीव लोचन मंदिर और कुलेश्वर महादेव के मंदिर क्षेत्र में फैला राजिम का मेला यहां का महत्वपूर्ण मेला है। राजिम का मेला माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक रहता है राजिम के पास ही चम्पारण्य नामक महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली है वहाँ चम्पारण्य का मेला भरता है।
सिरपुर का मेला - राजिम मेले के साथ ही रायपुर जिले का सिरपुर में भी माघ पूर्णिमा से शिवरात्रि तक मेला भरता है। श्रीपुर के नाम से प्रसिद्ध यह स्थान शरभपुरीय व सोमवंशी राजाओं की राजधानी रही है। सिरपुर में प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर है जो सोमवंशी राजा महाशिवगुप्त बालार्जुन का स्मरण दिलाता है। ईंट से बनी यह आठवीं शताब्दी की अनुपम कृति है जिसे महारानी ने बनवाया है। सिरपुर में गंधेश्वर मंदिर स्वास्तिक विहार, आनंद प्रभुकुटी विहार एवं बौद्धों के प्राचीन स्मारक हैं।
गिरौदपुरी मेला - कसडोल विकासखंड के ग्राम गिरौदपुरी में सतनाम पंथ गुरु संतघासीदास की जन्म स्थली है छत्तीसगढ़ के सामाजिक क्रांति के प्रणेता महान संत गुरु घासीदास ने 18 दिसम्बर 1750 में जन्म लिया था। यह स्थान सतनामियों की प्रसिद्ध तीर्थ स्थली है। यहां का मेला भव्यतम होता है। यह 18 दिसम्बर  को भरता है।
खल्लारी मेला - रायपुर जिले के बागबाहरा विकासखंड के गाँव खल्लारी में चैत पूर्णिमा पर मेला भरता है खल्वाटिका के नाम से चर्चित यहां एक ऊंची पहाड़ी पर खल्लारी माता का मंदिर है।
दामाखेड़ा का मेला - मेले की इस शृंखला में सिमगा विकासखंड का दामाखेड़ा का माघ मेला महत्वपूर्ण कड़ी है। दामाखेड़ा कबीरपंथियों की तीर्थभूमि है। माघ पूर्णिमा पर यहां सद्गुरु कबीर साहब धर्मदास वंशावली प्रतिनिधि सभा द्वारा मेले का आयोजन होता है। इस मेले में कबीरपंथी देशभर से आते हैं।
बस्तर के मेले मड़ई - बस्तर जिला का महापर्व बस्तर 'दशहरा' और रथयात्रा पर 'गोंचा' दो बड़े मेले मड़ईयों में गिनी जा सकती है, पर इसे मेला की संज्ञा देना पर्याप्त नहीं है।
भद्रकाली का मेला- शिवरात्रि के दिन इंद्रावती गोदावरी के  संगम  पर भद्रकाली का मेला भरता है यहां भद्रकाली का एक छोटा सा मंदिर टीले पर स्थित है।
कहा जाता है काकतीय वंश के महाराजा प्रताप रूद्रदेव ने वारंगल में मुगलों से परास्त होकर राज्य विहीन होकर बस्तर प्रवेश किया था। तब उन्होंने भद्रकाली में यह मंदिर बनवाकर देवी दन्तेश्वरी की पूजा की थी। यहां उन्हें दिव्य तलवार देवी से वरदान स्वरूप मिला था जिसके बल पर उन्होंने बस्तर में अपना राज्य स्थापित किया था।
नारायणपुर मंडई - बस्तर जिले का सबसे आकर्षक मुरिया मड़ई माघ महीने के शुक्ल पक्ष में बुधवार को भरता है। अबूझमाड़ क्षेत्र से जुड़े होने के कारण मड़ई में भारी भीड़ जुटती है। मड़ई के दिन देवी मंदिर में पुजारी द्वारा पारंपरिक विधि से पूजा-पाठ किया जाता है। यहां कई सिरहा उपस्थित रहते हैं।
शाम होते ही देवी-देवताओं के छत्र, विशाल सिरहा गुनिया का समूह आंगादेव सहित साप्ताहिक बाजार स्थल पर इकट्ठे होते हैं। मंडई का आकर्षण है सामूहिक नृत्य चेलिक  मोटियारियों का झुंड। युवक कमरे में घंटी बांधें घंटों नाचते गाते हैं।
छोटपाल मड़ई - यदि ठेठ माडिय़ा का आनंद उठाना हो तो गीदम के पास का छोटपाल मंडई का आनंद लीजिए। सैकड़ों की संख्या में यहां माडिया आदिवासियों की जमघट होती है। इसी तरह बस्तर व करपावण्ड की मड़ई दीवाली के बाद होती है।
दन्तेवाड़ा की फागुन मड़ई - दन्तेवाड़ा की फागुन मड़ई होली के समय की मड़ई है। होली के एक सप्ताह पूर्व मड़ई नृत्योत्सव प्रारंभ हो जाता है। प्रतिदिन दंतेश्वरी मंदिर से डोली व छत्र निकलता है तथा मेड़का डोंनका नामक स्थान पर ग्रामवासियों द्वारा गौरमार आखेट नृत्य किया जाता है। अंतिम दिवस होली के दिन दन्तेवाड़ा में थाने के सामने विशाल मेला भरता है।
धूमधाम से मां दंतेश्वरी की डोली व छत्र का जुलूस निकलता है। रंग गुलाल चढ़ाने के बाद होली खेलना प्रारंभ किया जाता है। इस तरह बस्तर में प्रति सप्ताह कहीं न कहीं फागुन मड़ई के पूर्व मड़ईयां भरती है। जहां आदिवासी सम्मिलित होकर अपने-अपने क्षेत्र के देवी-देवता के छत्र के साथ उपस्थित होकर सारी रात नाच गाकर अपना उल्लास प्रकट करते हैं। मड़ई इनके लिए वर्षिकोत्सव की तरह होता है। यहां आकर वे अपनी कला को उन्मुक्त होकर प्रकट करते हैं।
सरगुजा जिले के मेले- सरगुजा जिले में अनेक स्थानों में मेले भरते हैं। जिनमें प्रमुख मेलें हैं। कुसमी, कुदरगढ़, सीतापुर, शंकरगढ़, डीपाडीह, दुर्गापुर, रामगढ़ और देवगढ़। सरगुजा के रामगढ़, कुदुरगढ़ व देवगढ़ के मेले में मूलत: धार्मिक भावना निहित है।
कुसमी मेला - प्राचीन कालीन है इसे जात्रा मेला भी कहते हैं। कुसमी मेला जिस दिन भरता है। युवक-युवतियां नाच गान करते हैं। ये गांव से नाचते हुए मेले के चबूतरे तक  पहुंचते हैं ये चबूतरे के चारों ओर घूम घूमकर नाचते हैं। इन दिन चना, मुर्रा मांगकर खाने का रिवाज हैं।
कुदुरगढ़ मेला - यह चैत्र नवरात्रि में भरता है। यहँं एक देवी का मंदिर है वहां एक सुराख है। इस सुराख की गहराई अनंत है। यहां बकरे की बलि दी जाती है खून उसी सूराख में समा जाता है। यहां श्रद्धालु नारियल चुनरी भी चढ़ाते हैं। कुदरगढ़ अंबिकापुर से 25 किमी की दूरी पर है। इस मेले को घिर्रा भी कहते हैं।
घिर्रा - घिर्रा यानि मेले का पहला दिन युवकों का उत्सव का होता है और दूसरा दिन बाजार का होता है। सरगुजिहा भाषा में घिर्रा का अर्थ मदमस्त होकर दौडऩा कूदना होता है। सरगुजा जिले में फसल की कटाई के बाद पूस माह में गाँव-गाँव में घिर्रा का आयोजन होता है।
बिलासपुर जिले के मेले- बिलासपुर जिले के प्रमुख मेलों में शिवरीनारायण रतनपुर, मल्हार, पीथमपुर है। बिलासपुर में माघ पूर्णिमा में बिल्हा में रतनपुर में, सेतगंगा (मुंगेली), बेलयान (तखतपुर) सागर व शिवरीनारायण में मेला भरता है। मकर संक्रांति में लखनघाट (मरवाही), मदकू (पथरिया), सेमरताल (लोरमी), पीथमपुर (जांजगीर) मेला का आयोजन होता है। महाशिवरात्रि में मल्हार (मस्तूरी) चारीडीह बिलासपुर में होता है। इसके साथ ही किरारी (मस्तूरी), पथरगढ़ी (पथरिया) में तथा कटघोरा में जनवरी में मेला भरता है।
राजनांदगांव के मेले- राजनांदगँंव में डोंगरगढ़ का मेला क्वार चैत्र में नवरात्रि मेले का नाम से आयोजित होता है। जहां मां बम्लेश्वरी की मूर्ति स्थापित है।
भोरमदेव का मेला- भोरमदेव (कवर्धा) का मेला रामनवमी के अवसर पर होता है। कवर्धा तहसील मुख्यालय से 16 किमी पर स्थित ऐतिहासिक शिवमंदिर है जहाँ यह मेला भरता है। यह तीन दिवसीय मेला है। यहां का मंदिर 4 सौ वर्ष पूर्व नाववंशी राजा द्वारा निर्मित कराया गया है। जो खजुराहो के मंदिर के समान है। ऐसी मान्यता है कि यहां सन्तानहीन व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होती है।
मोहरा मेला- मोहरा राजनांदगांव नगरपालिका सीमा पर नदी किनारे स्थित गांव है जहां शिवजी मंदिर है यहां कार्तिक पूर्णिमा पर मेला भरता है।
दशरंगपुर मेला- दशरंगपुर तहसील मुख्यालय कवर्धा से लगभग 15 किमी पर स्थित एक गांव है यहां शिवमंदिर है। यहां शिवरात्रि पर मेला भरता है।
दुर्ग जिले के मेले मड़ई- दुर्ग जिले में शिवनाथ नदी के किनारे बसा दुर्ग से 12  कि.मी. स्थित ग्राम चंगोरी में शिवरात्रि पर मेला भरता है। यहां शिव का मंदिर है। बेरला विकासखंड में जहां-जहां शिवमंदिर हैं वहां भी मेला भरता है। साजा विकास खंड में अकलवारा में दो दिवसीय व सहलपुर में दो दिन का मेला भरता है। माघी पूर्णिमा में साजा क्षेत्र के दही-मही में मेला भरता है। गुंडरदेही विकासखंड के ग्राम चौरेले में भी माघी पूर्णिमा को मेला भरता है।
रायगढ़ में मेला - रायगढ़ जिले में श्री कृष्ण के जन्म पर रायगढ़ में जन्माष्टमी में मेला भरता है। यह मेला रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक लगभग 10 दिनों का होता है। यह गौरीशंकर मंदिर के निकट भरता है।
शिवरात्रि मेला - यह मेला धर्मजयगढ़ विकासखंड के ग्राम कापू में भरता है। यह मेला 'किलकिला मेला' नाम से प्रसिद्ध है। लोग माण्ड नदी में नहाकर - शिवमंदिर में जल चढ़ाते हैं। यह सात दिनों तक रहता है।
दशहरा मेला - दशहरा मेला मुख्यत: रायगढ़ खरसिया सारंगढ़, लैलूंगा व जशपुर में भरता है। यह एक दिन का होता है।
पोरथमेला - यह मेला सारंगढ़ तहसील के ग्राम पोरथ में मकर संक्रांति पर भरता है। यह महानदी के किनारे भरता है।

इस तरह मेले मड़ई छत्तीसगढ़ की संस्कृति का एक अंग है। जो इनके  लिए मनोरंजन का साधन तो है ही साथ ही  एक ऐसा मिलन स्थल है जहां लोग अपने संगी- साथी और नाते -रिश्तेदोरों से मिलते हैं और सुख- दुख बांटते हैं।

छेरछेरा

अन्नदान का महोत्सव
- श्यामलाल चतुर्वेदी
छत्तीसगढ़ी की अर्थ व्यवस्था कृषि के धुरी पर घूमती है। यहाँ आज भी अस्सी प्रतिशत से अधिक परिवारों की आजीविका कृषि पर निर्भर करती है। दिन रात कार्यरत रह कर, चराचर के समस्त जीवों को जीवनदान देने वाला किसान मौन साधक होते है। अनेक जोखिमों के बाद जब फसल काट कर अपने कोठे में लाता है तो राहत की साँस लेता है। धान को बोने से लेकर उसकी कटाई और मिंजाई तक उसकी फसल को पशु, पक्षी चूहे, चोर और कीट पतंग देखे मन देखे चाटते रहते हैं। फिर भी किसान को परम संतुष्टि का अनुभव तब होता है जब वह समारोह पूर्वक अपनी फसल के कुछ अंश का दान करता है। स्वेच्छा से धान की फसल के अंशदान का महायज्ञ छेर छेरा कहलाता हैं। अन्नदान का यह महायज्ञ पौष पूर्णिमा के दिन समारोहपूर्वक होता है।
छत्तीसगढ़ के किसान को छेर-छेरा की उत्फुल्लता के साथ प्रतीक्षा रहती है। घरों की साफ-सफाई और लिपाई पुताई करने के बाद अन्नदान के सामूहिक अनुष्ठान का यजमान छत्तीसगढ़ का किसान पौष पूर्णिमा के आने तक मन-प्राण से अपने सामाजिक दायित्व के निर्वाह के लिए तैयार हो जाता है।
सुबह होते ही गाँव भर के अमीर गरीब अभिजात्य और अन्त्यज सभी वर्गो के बच्चे-बच्चियाँ टोकरियाँ लिये हुए घर-घर छेर-छेरा के लिए निकल पड़ती है। समूह में साधिकार घोष करते जाते हैं छेर-छेरा माई कोठी से धान निकालो और उसे बाँटो। बाल भगवान की घर के सामने सुबह से समूह में उपस्थित टोली और उसकी अधिकारिक  यह बोली क्या अमीर क्या गरीब सबके दरवाजे ही भीड़। गरीब भी यथाशक्ति सबको थोड़ा-थोड़ा ही सही अत्यधिक आन्नद से अन्न दान करता है। उसके दरवाजे धनिक निर्धन सभी घर के बच्चे खड़े होते हैं। दौलत की दीवार टूट जाती है जाति का भेद मिट जाता है। एकात्मता का अनोखा अनुष्टान होता है छेर-छेरा। नौकर के भी दरवाजे मालिक का बेटा खड़ा रहता है, गरीब की गली में अमीर का लाड़ला याचक बना घूमता है। सब लोग सबको देते हैं, सब लोग सबसे लेते हैं। यहाँ परिणाम का प्रश्न नहीं परिणाम की प्रसन्नता प्राप्त करना सबका अभीष्ट है। यदि कोई धान बाँटने में कंजूसी करता है तो ये बच्चे अपने बेलाग व्यंग्य बाणों से उनकी कृपणता पर निर्भीकता से आधात करने से भी नहीं चूकते। अहंकार का भी परिष्कार हो जाता है। सर्वत्र समभाव का साम्राज्य होता है। उदारता की भावना उद्वेलित होती है। कई छोटे बच्चे अपने यहाँ गोद में अपने छोटे भाई-बहन को लेकर निकले रहते हैं और उसके लिए भी हिस्सा वसूलते हैं। यहाँ इंकार करने वाला भी कौन है? शास्त्रों में कहा गया है बाँटकर खाओ सबकी सम्पदा में सबका हिस्सा है। किसी को खाली हाथ न लौटाओ। छत्तीसगढ़ में इस भावना को आचरण में उतारा जाता है। अन्न वितरण के बाद पर्व के उल्लास का दूसरा अध्याय प्रारंभ होता है। डंडा नाचने वालो के दल हाथों में डंडे लिए झांझ मजीरा मांदर आदि के साथ घरों घर जाकर आँगन में डंडा नाच करते हैं। इस नाच की अनेक शैलियाँ हैं जिनमें रेली, माढऩ, गुनढरकी मंडलाही, तिनडंडिय़ा, दूडंडिय़ा आदि प्रचलित है।
इस नाच के साथ गाए जाने वाले लोक गीतों में जन-जीवन की व्यथा कथा इतिहास, भगवान के स्वरूप वर्णन आदि के साथ हर्ष विषाद उल्लास के वृत चित्र उभरते हैं। निरक्षर नर्तकों के गीतों की बानगी देखिए।
 तरि हरि नाना, ना मोरि नाना,
नाना रे भाई नान गा।
परथम बन्दौं गुरू आपना,
फिर बन्दों भगवान गा।
 क्या स्पष्ट धारणा है? कबीर के समान असमंजस नहीं है कि गुरू गोविंद दोऊ खड़े, काकेलागू पांय ये तो साफ कहते हैं सबसे पहले अपने गुरू की वन्दन करता हूँ फिर बाद में भगवान की स्तुति। एक गीत में विरह की व्याकुता की झलक देखिए:-
मैं तो नई जानौं राम, नई जानौं राम,
जिया बियाकुल पिहा बिना
(हे राम। मैं नहीं जानती, नहीं समझती कि क्यों प्रियतम के बिना मेरे प्राण व्याकुल है) इस पद की अगली पंक्ति में नायिका कहती है:-
कच्चा लोहा सरौता के,
सइंया हे नदान।
फोरे न फूटय सुपरिया,
बिना बल के जवान।
जियरा बियाकुल पिहा बिना।
मेरा बालम अपरिपक्व है, पूर्ण वयस्क नहीं है, उसकी सामथ्र्य का सरौता अभी कच्चा है। उससे सुपारी नहीं फूट सकती। अपेक्षित बलविहीन जवान, अभी नादान है। फिर भी उसके वियोग में मेरे प्राण बेजार हैं, बेकल हो रही हूँ।
एक मनोरंजक विचित्रता इस गीत में देखिए-
बावा कोड़ाइस, तिन डबरी,
दू सुक्खा एक म पानी नहीं।
तेमा पेलिन, तिन केंवटा
दू खोरवा एक के गोड़े नहीं।
आमन पाइन तिन मछरी,
दू सरहा एक के पोटा नहीं।
भोला बेंचिन, तिन रूपया।
दू खोटहा, एक चलय नहीं।
ये किस्सा ल समढ़ लेहा गा,
नई जाने तउन अडहा ये गा। 
 क्या दिलचस्प कल्पना है? बाबा जी ने तीन तालाब खोदवाये जिसमें से दो सुखे और एक में पानी नहीं। उसमें मछली लाने तीन मछुआरे घुसे जिसमें दो लँगड़े और एक के पाँव ही नहीं है। उनको तीन मछलियाँ मिली जिसमें से दो सड़ी हुई थी और एक मछली की आँते नहीं थीं। उसे तीन रूपये में बेचा गया  तो दो सिक्के मिले खोटे और एक ऐसा जो बाजार में चला ही नहीं।
अब गौर कीजिए कथा के उस निरक्षर लोक गायक के चातुर्य कौशल को जिसने इस अटपटे अनबूझ कथानक को नहीं समझ पाने की बात कबूलने के पहले से यह घोषित कर दिया कि नासमझी बताने वाले मूर्ख कहे जायेंगे।
डंडा नाचने वालों को धान देकर बिदाई दी जाती है। गाँव-गाँव में डंडाहारों के नाच गान से वातावरण संगीतमय हो जाता है। घरों-घर पकवान बनाए जाते और इष्ट मित्रों के साथ खाये जाते हैं।

इस तरह अन्नदान का यह सामूहिक महोत्सव सम्पन्न हुआ करता है। 

गउरा परब

        एक पतरी रैनी-झैनी
                        - संजीव तिवारी
छत्तीसगढ़ में भारत के अन्य प्रदेशो की भाँति दीपावली का त्योहार बड़े उत्साह एवं धूम धाम से मनाया जाता है। अलग-अलग प्रदेशों में त्योहारों को मनाने की अपनी अलग-अलग लोक परम्परा है। छत्तीसगढ़ में भी इस त्योहार को मनाने की अपनी एक विशिष्ठ परम्पमरा है जो इस प्रदेश के कृषि आधारित जीवन को प्रदर्शित करता है। श्रम के प्रतिफल स्वरूप प्राप्त धन-धान्य रूपी लक्ष्मी के घर में आने का उत्साह, लोक मानस को स्वाभाविक रूप से उत्सव मनाने के लिए विवश करता है। यही भाव लोक आराधना का दीपोत्सव बनता है जो छत्तीसगढ़ में  राउत नाच एवं गौरा उत्सव के रूप में सामने आता है। यह धान्य देवी के घर में आने का समय होता है अत: गाँव वाले अपने घरों को लीपते पोतते हैं और रात्रि में एकाधिक दीप जलाते हैं।  धनतेरस यानी सुरहुत्ती के दिन से दीपावली यानी देवारी तक घरों, गौठानों, खलिहानों में दीप आलोक फैलाते हैं। 
छत्तीसगढ़ में राउत नाच के गुडदुम और दोहों के स्वर दशहरा के बाद से ही सुनाई देनें लगते हैं जो यादवों का प्रमुख लोक नृत्य है। इन्हीं स्वर लहरियों के साथ ही रात में महिलाओं के सामूहिक स्वर में गौरा गीतों की गूँज भी बिखरती है। कार्तिक मास में  छत्तीसगढ़ के प्रत्येक गाँव में गउरा पूजा की परम्परा है, मान्यता है कि आरंभिक अवस्था  में यह गोडों के द्वारा मनाया जाता था, कुछ लोग इसे सारथी जाति के लोगों के द्वारा आरंभ किया हुआ मानते हैं। वर्तमान स्वरूप में गउरा पूजा की इस परम्परा को सामूहिक रूप से प्रत्येेक जाति और धर्म के लोग मना रहे हैं। यद्यपि गउरा पूजा के मूल विधि विधानों का दायित्व, अब भी अधिकाशंत: गाँवों में गोंड या सारथी लोग ही निभाते हैं। भारत के अन्यध क्षेत्रों में राजस्था न के मीणा समुदाय के लोगों के द्वारा लगभग इसी प्रकार से गउरा उत्सव मनाये जाने की परम्परा है।
छत्तीसगढ़ में गउरा पूजा का आरंभ दशहरे के दिन से आरंभ होता है। इस दिन गाँव के बीच में बने चबूतरे जिसे सामान्य गउरा चौंरा कहते हैं, एक छोटा गड्ढा खोदकर मुर्गी का अण्डा, तांबें का सिक्का व सात प्रकार के फूल को सात महिलाएँ मूसल से कुचलती हैं। इस परम्परा को 'फूल कुचरना' कहा जाता है और इसी के साथ 'गउरा पूजा' आरंभ हो जाता है। फूल कुचले गए गड्ढे को बेर की कटीली डंगाल से ढककर उस पर एक पत्थर रख दिया जाता है ताकि  इस स्थान को कोई अपवित्र ना करे।
इस दिन से दीपावली तक प्रत्येक संध्या उक्त स्थान पर महिलाओं के द्वारा गौरा गीत गाए जाते हैं। दीपावली के दिन, गाँव के किसी पवित्र स्थान से मिट्टी खोदकर लाई जाती है और बढ़ई के द्वारा बनाएँ गए लकड़ी पर गाँव के किसी व्यक्ति के घर में शिव व पार्वती की प्रतिमा बनाई जाती है। शिव का वाहन बैल और पार्वती का वाहन कछुआ बनाया जाता है। दोनों का शृंगार चमकीले कागजों और धान की बालियों से की जाती है। प्रतिमा निर्माण के बाद दोनों का विवाह पारंपरिक रूप से आरंभ करने के पूर्व गाँव के बइगा, प्रतिष्ठित जन आदि को बुलाने के लिए बाजे-गाजे के साथ लोग उनके घरों में जाते हैं-
 'भड़-भड़ बोकरा,
तोर दुवारे तोर अटारे....'
गाते हुए उन्हें लेकर पूजा स्थल में आते हैं।
गउरा पूजा के इस लोक परम्पंरा में जो 'गउरा गीत' गाए जाते हैं उन्हें महिलायें ही गाती हैं। गीत में संगत गाँव के सहज उपलब्धम वाद्य मोहरी, सींग बाजा, दफड़ा, झांझ, मजीरा और मांदर आदि होते हैं। गउरा गीतों में मुख्यतया शिव पार्वती के शृंगार वर्णन, देवी देवताओं का आवाहन, पूजा और विवाह से संबंधित व्यक्तियों से सहयोग की प्रार्थना, महादेव के बारात का वर्णन आदि  आता है। यह गीत, नृत्य प्रधान लोक गीत नहीं है; किन्तु इन गीतों में वाद्य के साथ जो आध्यात्मिक प्रभाव उत्पन्न होता है उससे नृत्यन स्वाभाविक रूप से प्रकट हो जाता है। कहते हैं कि नृत्य उत्साह के क्षणों को व्यक्त करने का भाव है तो इस लोक गीत में गौरा-गौरी के विवाह का उत्साह समय-समय पर नृत्य में बदलता है।
मिट्टी से मूर्ति का निर्माण होता रहता है, गीत वाद्य के साथ गाए जा रहे हैं और अचानक मूर्ति के आकार लेते ही लोक को ज्ञात होता है कि यह तो हमारे ईश्वर शिव हैं, इनका अवतार हो गया। बढ़ई के द्वारा लकड़ी को खराद कर बनाये गए सांचे के सहयोग से  बाम्बीक की मिट्टी से शिव प्रकट होते हैं और लोक कंठ से स्वर फूटता है। 
धिमिक-धिमिक बाजा बाजे,
कहंवा के बाजा बाजे
राजा हो मोर इसर देव,
लेवत हे अवतारे
कहंवा के बाजा आए
कहंवा के इसर मोर जती
जनामना कहंवा लिए अवतार
कै तोला कून्दे  कुन्दकरवा,
के सच्चाय ढारे हे सोनार
भिंभोरा माटी मोर बहिनी जनामना,
बढ़ई घर लेहेंव अवतार ...
शिव की मूर्ति के निर्माण के बाद उसका शृंगार किया जा रहा है, मूर्ति के साथ साथ एक मंडप का भी निर्माण किया जा रहा है जिसमें हंस, कबूतर आदि पक्षी सज रहे हैं ऊपर में हनुमान झूल रहा है। मिट्टी आकार ले रही है और लोक स्वर में अपने ठाकुर देव को निरंतर जोहार रही है-
जोहार-जोहार मोर
ठाकुर देवता
जोहार लागेन तुंहार 
ठाकुर देंवता के मढ़ी लता छवावै
ढूलेवा परेवा हंसा
तरी झूले हंसा परेवा
उपर झूले हनुमान
हंसा ला देबो हम मूंगा मोती
परेवा ला चना के दार
जोहार-जोहार मोर ठाकुर देवता ...... 
मिट्टी के मूर्ति को सजाने के बाद विवाह आरंभ हो गया है कुछ वैवाहिक कार्यक्रम सम्पन्न हो गए है। रात भी आधी हो गई है, गाँव वालों के साथ ही गउरा गउरी ऊँघ रहे हैं। लोकगीत सभी को चैतन्यब करने के लिए स्फुटित होता है -
एक पतरी रैनी -झैनी
राय रतन दुरगा देबी
तोर सीतल छाँव माय
जागो गउरी जागो गउरा 
जागो सहर के लोग
झाँई झूँई फूले झरे सेजरी बिछाए
सुनव-सुनव मोर ढोलिया बजनिया
सुनव-सुनव मोर गाँव के गौंटिया
सुनव-सुनव सहर के लोग  
जागो गउरी जागो गउरा...
बारात आ गई, शिव के औघढ़ रूप और विचित्र बरातियों को देखकर पार्वती की माता मैना रोने लगी। गीत गाती महिलायें प्रश्नोत्तर शैली में गउरा गीत गाते हुए मैना और  शिव के बीच हो रही बातों को पदों में ढालती हैं - 
हो महादेव दुलरू बन अइस,
 धियरी गउरा हासिन वो
मैंना रानी रोए लागिस,
भूत परेतवा नाचिन वो
कइसे पायेंव माथ के चंदा,
गंगा कइसे पायेंव हो
तन में सांप लगायेव कइसे,
काबर भभूत रमायेंव हो
गउरा बर हम जोगी बन गेन,
अंग भभूत रमायेन वो
नांदी बइला चढ़के बन बन,
अड़बड़ अलख जगाएन वो
आँवर होगे भाँवर होगे,
खाएन बरा सोंहारी वो
गउरा महादेव इसर हमारे,
हमर बाप महतारी वो .......
इसी तरह के बीसियों पारम्परिक गउरा गीतों के साथ गउरा गउरी का विवाह सूर्योदय तक संपन्न होता है। उसके उपरांत जूलूस के रूप में गौरा-गौरी को महिलाएँ सिर में उठा कर नदी या तालाब की ओर विसर्जन के लिए निकलती हैं। इस जूलूस में गौरा गीत दैवीय उत्तेजना को बढ़ाता है और साथ चलने वाले भावातिरेक में नाचने लगते हैं जिसे गउरा चढऩा कहते हैं। महिलाएँ अपने बालों को खुला करके झूमने लगती हैं, पुरुष भी नृत्य करने लगते हैं। इन्हें  शांत करने के लिए साथ चल रहा बइगा इन्हें वनस्पत्तियों की बेल से बने सोंटे से मारता है। जुलूस आगे बढ़ता है और गाँव के लोग इसके साथ हो लेते हैं। नदी या तालाब में गउरा-गउरी का विर्सजन होता है और गाँव के लोग अपने गाँव में खुशहाली के लिए प्रार्थना करते हुए अपने अपने घर की ओर प्रस्थान करते हैं। प्रतीकात्मक रूप से शिव आराधना के उद्देश्य से, सम्पूर्ण दीपावली की रात उत्साह और उमंग में जागते लोग शिवपद प्राप्त होने की संतुष्टि के साथ अगले त्योहार के इंतजार में जुट जाते हैं।
आवत देवारी लहुर लउहा,
जावत देवारी बड़ दूर,
जा जा देवारी अपन घर,
फागुन उड़ावै धूर।

सम्पर्क: सूर्योदय नगर


खण्डेलवाल कालोनी, दुर्ग (छ.ग.)
मो. 09926615707Email- tiwari.sanjeeva@gmail.com