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Sep 26, 2013

प्राथमिक शिक्षा से लोकतंत्र का प्रशिक्षण

प्राथमिक शिक्षा से लोकतंत्र का प्रशिक्षण
-भारत डोगरा
राजस्थान में प्रायमरी कक्षा तक के छात्रों को लोकतंत्र में प्रशिक्षित करने का एक अनूठा प्रयोग 'बाल संसदके नाम से किया गया है। 'बाल संसदका चुनाव अजमेर और जयपुर जि़लों में चल रही लगभग 90 रात्रि शालाओं के छात्रों द्वारा किया जाता है। इन रात्रि शालाओं में प्राय: गाँवों के सबसे निर्धन व कमज़ोर आर्थिक स्थिति के परिवारों के वे छात्र पढऩे आते हैं, जो विभिन्न कारणों से दिन के स्कूल में नहीं जा पाते हैं। ये छात्र प्राय: उन परिवारों से हैं जिनके माता-पिता दोनों मज़दूरी करने जाते हैं। इस स्थिति में ये बच्चे ही पशु चराने जाते हैं या छोटे भाई-बहनों की देखरेख करते हैं। शाम के समय वे रात्रि शाला में आ जाते हैं जहाँ रात के 9-10 बजे तक पढ़ते हैं, गीत गाते हैं, खेलते हैं।
रात्रि शालाओं में लोकतंत्र के प्रशिक्षण का अनूठा प्रयोग बाल संसद के रूप में किया गया है। लगभग 60 से 70 बच्चे एक सांसद को चुनते हैं। विभिन्न उम्मीदवारों के लिए वोट डालने, उम्मीदवार के प्रतिनिधि की उपस्थिति में वोट गिनने आदि की पूरी प्रक्रिया अपनाई जाती है। निर्वाचित सांसदों द्वारा प्रधानमंत्री का चुनाव होता है और फिर मंत्रिमंडल का गठन होता है। जहाँ एक ओर वित्तमंत्री, गृहमंत्री, पर्यावरण मंत्री आदि चुने जाते हैं वहीं कुछ मंत्री स्थानीय ज़रूरतों के अनुसार होते हैं, जैसे पुस्तकालय मंत्री, बाल मेला मंत्री आदि।
एक बाल संसद का गठन ढाई वर्ष के लिए होता है। अभी तक सात बाल संसदों का गठन यहाँ हो चुका है। इस वर्ष यहाँ की सातवी बाल संसद अपना कार्यकाल पूरा कर रही है।
प्रधानमंत्री अन्य मंत्रियों की सहायता से विभिन्न रात्रि शालाओं का दौरा करती हैं व जब जहाँ जो कमी पाई जाती है, उसे पूरा करने के लिए सहयोगी संस्था बेयरफुट कॉलेज के सम्बंधित विभाग को निर्देश दिए जाते हैं।
उदाहरण के लिए यदि सौर ऊर्जा से होने वाली प्रकाश व्यवस्था में कोई कमी है तो बेयरफुट कॉलेज के सोलर विभाग को ज़रूरी निर्देश दिया जाता है कि इसे ठीक किया जाए व पेयजल की उपलब्धि में कमी हो तो जल विभाग को कहा जाता है। इन विभिन्न विभागों के सचिवों को बाल संसद की बैठक में आना होता है। पर्यावरण मंत्री को यह फिक्र करनी होती है कि आसपास पेड़-पौधे लगाने व सफाई रखने का कार्य ठीक हो पा रहा है या नहीं, जबकि स्वास्थ्य मंत्री की चिंता का एक मुख्य विषय यह होता है कि सभी बच्चों की नियमित स्वास्थ्य जाँच का जो नियम है उसका पालन हो रहा या नहीं।
कुछ रात्रि शालाओं में टिन शेड की सही व्यवस्था समय पर न हो पाने पर बाल संसद के नवीनतम अधिवेशन में चिंता प्रकट की गई है व प्रधानमंत्री ने इस बारे में कड़े निर्देश दिए हैं। इस अधिवेशन में प्रधानमंत्री नीरजा नाम की छात्रा व शिक्षा मंत्री हेमराज ने संस्था के विभिन्न उपकेंद्रों के प्रतिनिधियों से विस्तृत जानकारी माँगी कि शिक्षा से वंचित कुछ बच्चे अभी तक रात्रि शालाओं में क्यों प्रवेश नहीं पा सके हैं। दूर-दूर से आए विभिन्न प्रतिनिधियों ने अपने सर्वेक्षणों के आधार पर जानकारी दी कि किस समस्या के कारण ये बच्चे अभी रात्रि शाला में नहीं आ रहे हैं। एक मुख्य वजह यह सामने आई थी कि कुछ बच्चों के माता-पिता मज़दूरी के लिए अन्यत्र पलायन कर गए हैं।
बाल संसद की किसी बैठक में कौन से मुद्दे चर्चित होते हैं इसका विस्तृत एजेंडा तैयार करके वितरित किया जाता है। इससे यह जानकारी में भी रहता है कि जो कार्रवाइयाँ पहले बताई गई थी या निर्देश दिए गए थे, उनका पालन किस हद तक हुआ है। उदाहरण के लिए नवीनतम बैठक में जो कागज़ात वितरित हुए हैं, उनमें बताया गया है कि किस कार्यशाला में सुधार को कहा गया है, किसका स्थान परिवर्तन करना पड़ा व किस शाला में कोई समस्या अभी भी बनी हुई है।
ये छात्र अभी बहुत कम उम्र के हैं अत: बेशक अभी यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया संस्था के शिक्षा विभाग की देखरेख में उसकी सहायता से ही चलती है पर बार-बार छात्रों को खुलकर बोलने व आगे आने के लिए प्रोत्साहित भी किया जाता है। इस उदाहरण से सीखकर हम अपने विद्यालयों के संचालन में छात्रों की भागीदारी को व्यापक स्तर पर बढ़ा सकते हैं; जिससे उनकी रचनात्मकता को तरह-तरह से खिलने का मौका मिलेगा व साथ ही लोकतंत्र का प्रशिक्षण भी स्कूलों से बहुत रोचक ढंग से मिलेगा। (स्रोत फीचर्स)  

लोक मान्यता

मायके का दुलार

और तीजा तिहार

- डॉ. पीसी लाल यादव
 भारतीय संस्कृति में बड़ी विविधता है। इस विविधता का कारण यहाँ विभिन्न धर्मो और विभिन्न संस्कृतियों का समन्वय है। कहीं-कहीं इस विविधता का प्रमुख कारण यहाँ की आंचलिक जीवन-शैली और उसकी लोक संस्कृति भी है। किसी तीज त्योहार या पर्वों के पीछे उसकी वैदिक मान्यता के स्थान पर उसकी लोक मान्यता ज्यादा प्रभावी और असरदार होती है ; इसीलिए भारतीय जीवन और संस्कृति बहुरंगी है। जैसे स्थान-स्थान की पृथक्-पृथक् आबो-हवा में एक पौधा या जीवनजन्तु का रंग बदलकर भिन्न हो जाता है। भारत की भौगोलिक स्थितियों की भिन्नता भी यहाँ की सांस्कृतिक भिन्नता का प्रमुख कारण है। तीज-त्योहार भी इससे अप्रभावित नहीं है। जैसे हरतालिका व्रत का छत्तीसगढ़ लोक जीवन में तीजा हो जाना।
गाँव में रहकर लोक को देखने-सुनने का खूब अवसर मिलता है। तब लोक की इन्द्रधनुषी छवि से हृदय सम्मोहित हुए बिना नहीं रहता है। नाचा में कुछ गीत सुनने को मिलते थे तब उनकी ओर ध्यान नहीं गया। आज जब उन गीतों के बारे में सोचता हूँ तब लगता है कि कोई भी लोकगीत अकारण नहीं गाया  जाता। उनके पीछे कोई न कोई लोकजीवन से जुड़े सन्दर्भ होते हैं। यह टटोलने पर अब मिलता है। नाचा में परी अपने भाई की बाट जोहते हुए गाती है-
पोरा के रोटी धर के, भैया मोर आवत होही,
तीजा लेगे बर मोला भैया मोर आवत हो ही।
और इसी नाचा में गाये जाने वाले अग्रलिखित लोकगीत का दूसरा पक्ष यह भी है-
तीजा बड़ दुख दाई गा तीजा बड़ दुखदाई,
नरतन हार खाके भाई, तीजा बड़  दुखदाई।
इन दोनों गीतों में पहले तीजा आगमन पर उल्लसित बहन द्वारा भाई की प्रतीक्षा और दूसरे गीत में भाई या बाप के अन्तर्मन की पीड़ा मुखरित हुई है। इन गीतों के माध्यम से छत्तीसगढ़ में तीजा का महत्व मुखरित होता है। आगे यह भी कि- 
सावन मनाबो हरेली भादो तीजा रे तिहार,
कातिक मनाबो देवारी, फागुन उडय़ रे गुलाल 
ये पंक्तियाँ यहाँ के लोक जीवन में तीज त्यौहारों के मर्म और उसके लोक प्रभावों को स्पष्ट करती हैं।
तीजा भादो मास के शुक्ल पक्ष में तृतीया को मनाया जाता है। इसे सामान्यत: हरतालिका व्रत भी कहा जाता है। हरतालिका विवाहित महिलाओं द्वारा अखंड सौभाग्य की कामना से रखा जाता है।
कहीं-कहीं कुँवारी लड़कियाँ भी सुयोग्य वर की कामना से उपवास करती हैं। पुराणों में यह बात उल्लिखित है कि पार्वती ने वर के रूप में शिव को प्राप्त करने के लिए इस दिन घोर तपस्या की थी। इसी की स्मृति में महिलाओं द्वारा हरतालिका व्रत व उपवास रखा जाता है। यह एक सामान्य सी जानकारी है, किन्तु हरतालिका अर्थात तीजा का छत्तीसगढ़ में विशिष्ट महत्त्व है। ऊपर मैंने जिन लोकगीतों की चर्चा की है, उसके केन्द्र में यही तीजा है।
तीज त्योहार लोक जीवन में रंग भरते हैं और उमंग भी। तीजा के समय बेटी व बहनों को पिता या भाई द्वारा लिवा कर लाया जाता है। बेटी और बहन के लिए यह त्योहार आनंद व उमंग लेकर आता है। ये जब मायके आती हैं तो इनकी खुशियों का कोई ठिकाना नहीं रहता। पुरानी सखी सहेलियों से भेंट, माँ-बाप, भाई-बहन का बिछड़ा हुआ साथ, बड़े बूढ़ों का सान्निध्य व आशीर्वाद जैसे सब कुछ जीवन में लौटकर आ जाता है। वही नदी-नाले, घाट-घटौन्दे, बाग-बगीचे, खेत-खार, घर-द्वार जो विवाह के पूर्व सब बचपन के साथी थे। इन सबसे मिलकर जैसे सपनों को पंख लग जाते हैं। ससुराल की बंदिशों से कुछ समय के लिए मुक्ति मिलती है। ये बहन, बेटियाँ मायके आकर चिड़ियों की तरह फुदकती हैं और झरनों की तरह गाती हैं। लाज और संकोच छूट जाते हैं, स्नेह-प्यार व मया-दुलार पाकर जैसे क्लांत चेहरा फूल की तरह खिल-खिल जाता है। ये सारी खुशियाँ  मिलती हैं, तीजा में मायके आने पर। तब बेटी क्यों न जोहे बाट अपने बाप की? बहन क्यों न ताके राह अपने भाई की?
 उन बहन बेटियों का आनंद द्विगुणित हो जाता है जिन्हें तीजा से आठ-दस दिन पहले ही लिवा कर ले जाया जाता है। किन्तु मायके पक्ष व ससुराल पक्ष में कार्य की अधिकता या व्यस्तता के कारण पोरा के बाद मायके जाने वाली बहन बेटियों का धीरज लेनहार भाई की प्रतीक्षा में जवाब दे जाता है। फिर भी उसे आशा है कि उसका भाई पोला त्योहार की रोटी (व्यंजन) लेकर उसे लेने आएगा; इसलिए। प्रतीक्षातुर बहन के कंठ से यह लोकगीत झरता है- नव व्याहता बेटी के लिए तो यह और भी परीक्षा की घड़ी होती है।
पोरा के रोटी धर के, भैया मोर आवत होही, 
तीजा लेगे बर मोला, भैया मोर आवत होही।
 तीजा के पहले दिन उपसहिन करू भात खाती हैं। इसमें करेले की सब्जी की अनिवार्यता होती है वे पास पड़ोस में रिश्तेदारों के घर जाकर देर रात तक खाती हैं। खाना कम, मान रखना ज्यादा। तीज के दिन मौनी स्नान करती है। इस दिन नीव व सरफोंक के दातुन का अपना वैज्ञानिक महत्त्व है। उपवास की साधना में ये ज्यादा सहायक होते है। लोक की ऐसी मान्यता है। फिर आठों पहर रात्रि में जागकर फुलौरा सजाकर शिव पार्वती की पूजा करती है। अपने अखंड सौभाग्य की कामना लिए एक नारी ही तो है जो धरती की तरह सबकुछ सहन कर दूसरों की मंगल के लिए व्रत उपवास करती है। कभी बेटे के लिए बहुरा चौथ, कभी पति के लिए करवा चौथ और हरतालिका, पर अपने लिए किसी से भी कुछ नहीं माँगती। इस पर भी उसे क्या मिलता है? तिरस्कार, अपमान और उपेक्षा। सब सहती है, क्योंकि वह माँ है, इसलिए पूजनीय है, महान है।
तीजा रहने वाली तीजहारिन को साड़ी उपहार में दी जाती है। यहाँ उक्ति भी प्रचलित है-मइके के फरिया अमोल अर्थात मायके से कपड़े का टुकड़ा भी मिलता है तो अनमोल होता है। यह है छत्तीसगढ़ की अपनी लोक- परम्परा जिसका निर्वाह लोक जीवन में न जाने कब से हो रहा है। इस दिन माताएँ बेटियों के लिए चूड़ियाँ, फीते सिंदूर लेकर देती हैं। तुरकिन घर-घर घूमकर तीजहारिनों को चूड़ियाँ  पहनाती है। तीजा की यह अनोखी परम्परा अन्यत्र शायद दुर्लभ हो।
छत्तीसगढ़ में मामा द्वारा भांजे -भांजियों को चरण छूकर प्रणाम करने की परम्परा है। विद्वानों का कथन है कि छत्तीसगढ़ को पहले दक्षिण कौशल कहा जाता था। यहाँ के राजा भानुमंत की बेटी कौशिल्या, राजा दशरथ को  ब्याही गई थी। अत: कौशिल्या छत्तीसगढ़ की बहन हुई और उनका पुत्र राम भांजा। इसीलिए यहाँ भांजा को राम के रूप में प्रतिष्ठित कर मामा द्वारा भांजे को चरण छूकर प्रणाम किया जाता है। इस दृष्टि से बहनों के साथ तीजा के समय उनके बच्चे अर्थात् भांजे-भांजी भी आते हैं। उन्हें भी नये कपड़े देकर मामा उनके चरण छूकर यश का भागी बनता है ; इसीलिए छत्तीसगढ़ में तीजा का अपना अलग महत्त्व है।
अब इसका दूसरा पक्ष दूसरे गीत के माध्यम से, जिसमें तीजा को दुखदायी कहा गया है। यह गीत हमें सोचने के लिए विवश करता है। कि आखिर वह कौन सी स्थितियाँ होंगी, जिसके कारण तीजा दुखदायी साबित होती है।
तीजा बड़ दुखदायी गा,
नर तन हार खाके भाई,
तीजा बड़ दुखदायी।
यह परिस्थितियाँ उन भाइयों के लिए हो सकती हैं, जिनकी बहनें नहीं हैं। यही बात बाप और बेटी के सन्दर्भ में कही जा सकती है। तब भला सोचिए इन परिस्थितियों में उन पर क्या गुजरती होगी? जिन भाइयों की बहन नहीं है या बहनों के भाई नहीं है, जिस बेटी का बाप गुजर गया हो या उस बाप की बेटी गुजर गयी हो तब तीजा दुखदायी है। निश्चित रूप से दुखदायी है।
हरतालिका का लोक रूप तीजा के पीछे बहन बेटियों की अखंड सौभाग्य कामना की जो भावना है, वह लोक मंगलकारी होने का सूचक है। तीजा का स्वरूप अन्यत्र जहाँ भी, जैसा हो लेकिन छत्तीसगढ़ में इसकी उज्ज्वल परम्परा लोक को प्यार-दुलार और ममता के सूत्र में बाँधती है। छत्तीसगढ़ के तीज त्योहारों की लोक परम्परा का यह अनूठा चरित्र यहाँ के लोक जीवन को आकाशीय ऊँचाई प्रदान करता है। (  रामहृदय तिवारी द्वारा संपादित  पत्रिका- "लोकरंग अरजुन्दा " से )

प्रेरक

क्षमा

एक दिन बुद्ध ने भूमि पर घिसटते हुए एक लंगड़े योगी को देखा।
मैं अपने पापों का फल भोग रहा हूँ- योगी ने कहा।
तुमने कितने पापों का फल भोग लिया है?
यह तो मैं नहीं जानता।
और कितने पापों का फल भोगना शेष है?
मैं यह भी नहीं जानता।
बस करो अब रुकने का समय आ गया है। ईश्वर से क्षमा माँगना बंद करो और उनसे क्षमा मांगो जिन्हें तुमने आहत किया।

क्षमादान का मूल्य

क्षमादान की शक्ति और उसके महत्व का मोल वही आँक सकते हैं जिन्हें क्षमादान मिला होता है।
कुछ तीर्थयात्रियों का दल मंदिर में दर्शन कर रहा था। उनमें से एक श्रद्धालु को ईश्वर की उपस्तिथि का अनुभव होने लगा। वह समाधि में चला गया और उसने ईश्वर से कहा- भगवन, कृपया मुझे एक यही वरदान दीजिये कि आप मुझसे कभी भी रुष्ट न हों।
मैं तुम्हें यह वरदान नहीं दे सकता ईश्वर ने कहा- यदि तुम मुझे कभी रुष्ट नहीं करोगे तो मैं भी तुम्हें कभी क्षमा नहीं कर सकूँगा। ऐसी स्थिति में तुम दूसरों के प्रति करुणा और दया का भाव भी विस्मृत कर दोगे।
सभी के प्रति अपने ह्रदय में अपार प्रेम का भाव रखो। मैं तुम्हें सदैव क्षमा करता रहूँगा ताकि तुम इस सद्गुण को न बिसरा दो। 
(हिन्दी ज़ेन से)

दो ग़ज़लें

                      1.आँसू बचाए नहीं ?

                                                    - ज़हीर कुरैशी

                      जिन्दगी में जो आए नहीं,
               हम उन्हें भूल पाए नहीं।

                         सात फेरों के पश्चात् भी,
                         आप दिल में समाए नहीं।

               ऐसे महलों के मालिक हैं हम,
               जो कभी जगमगाए नहीं।

                          वो है मित्रों में सबसे सफल,
                          जिसने मौके गँवाए नहीं।

               खुल के रोने को... एकान्त में,
               तुमने आँसू बचाए नहीं?

                         सच- बयानी के कारण भी, यार,
                         हम किसी को सुहाए नहीं।

               पूरी उसकी दुआ हो गई,
               हाथ जिसने उठाए नहीं।

                    2.याद-दर-याद

                        दूर तक... भीनी खुशबू भी है,
                चाँदनी रात है, तू भी है।

                          कितनी मुश्किल से बरसों के बाद,
                          साथ लैला के मजनू भी है।

               चाँद को चूमने के लिए,
               कल्पना का पखेरू भी है।

                         आँसुओं की घटा है, मगर,
                         भावनाओं पे काबू भी है।

             तोलकर बोलने के लिए,
             मन के अंदर तराजू भी है।

                        बात होती नही उसके बाद-
                        प्यार चुप्पी का जादू भी है।

                     फिल्मी की रील-सा है अतीत,
                      याद-दर-याद की 'क्यू’  भी है।

सम्पर्क:  108, त्रिलोचन टॉवर, संगम सिनेमा के सामने, गुरूबख्श की तलैया, स्टेशन रोड, भोपाल-462001 (म.प्र.), मो. 09425790565, Email-poetzaheerqureshi@gmail.com

लाला जी के चले जाने का अर्थ

लाला जी के चले जाने का अर्थ
 - हरिहर वैष्णव

लाला जगदलपुरी। एक ऐसा नाम जिसे छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की जीवित किम्वदन्ती, बस्तर का चलता-फिरता ज्ञान-कोश, अक्षरादित्य आदि आदि कहा जाता रहा है। किन्तु आज 93 वर्षीय वह चलता-फिरता ज्ञान-कोष हमारे बीच नहीं है। 14 अगस्त की संध्या 7.00 बजे उस साहित्य-ऋषि ने अपने डोकरीघाट पारा (जगदलपुर, बस्तर- छत्तीसगढ़) स्थित निवास पर अन्तिम साँसें लीं। अन्तिम साँसों के पहले तक यद्यपि वे रोग-शय्या पर पड़े हुए थे ; तथापि उनके ज्ञान का भण्डार तब भी अक्षुण्ण रहा था। तब भी, यदि कोई उनसे कुछ माँगने गया तो वह खाली हाथ नहीं लौटा। हाँ, कभी-कभी स्मृति-लोप की स्थिति में चला जाने वाला दण्डक वन का यह साहित्य-ऋषि मूल प्रसंग से थोड़ी देर के लिये भटक भले ही जाता रहा हो किन्तु स्मृति लौटते ही आपके साथ समरस हो जाता था। कई बार आपसे पूछता था- और सब ठीक है, ?
इन साहित्य-मनीषी को हम सब लालाजी के नाम से जानते थे, जानते हैं और जानते रहेंगे। जहाँ तक मैं जानता हूँ, लालाजी के सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति ने उनसे कुछ-न-कुछ पाया अवश्य ही है किन्तु उन्हें दिया कुछ भी नहीं। दरअसल कोई उन्हें कुछ दे ही नहीं सकता था और फिर उन्होंने स्वयं भी कभी इसकी अपेक्षा नहीं की। उन्होंने याचना तो कभी की ही नहीं। वे हमेशा दाता बने रहे। लालाजी अत्यन्त स्वाभिमानी व्यक्ति रहे हैं। तब भी, जब वे रोग-शय्या पर थे, तो भी उनका स्वाभिमान जस-का-तस बना रहा। स्वाभिमान खोने का पाठ उन्होंने पढ़ा ही नहीं। अपने संपर्क में आये लोगों से भी यही कहा, स्वाभिमान मत खोयें। उसे बनाये रखें। लालाजी के स्वाभिमान की बातें उनके सम्पर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति जानता है। किन्तु कई लोग उनके इस स्वाभिमान को उनकी हेकड़ी बताते नहीं चूकते।
बहुत सम्भव है कि पढऩे-सुनने वालों को यह अतिशयोक्ति लगे किन्तु मैं जानता हूँ कि मेरे लिये लालाजी के चले जाने का अर्थ मेरा स्वयं का चला जाना है। मुझे लालाजी से जितना स्नेह मिला, जितना मार्गदर्शन मिला उसे सहेज पाना मेरे लिये सम्भव नहीं है। कल्पना कीजिए कि क्या महासागर को कोई अपनी बाँहों में समेट सकता है? लालाजी से मिले स्नेह और आशीर्वाद के महासागर को बाँहों में समेटना क्या मेरे लिये सहज है? कतई नहीं। वस्तुत: आज यदि मैं बस्तर की वाचिक परम्परा पर थोड़ा-बहुत काम कर पाया हूँ तो निश्चित ही इसके पीछे कीर्ति-शेष लालाजी का ही हाथ रहा है। उनका आशीर्वाद रहा है। कदम-कदम पर मेरा मार्गदर्शन करते लालाजी से कई बार मतभेद भी हो जाया करते थे किन्तु वे मतभेद आपसी विचार-विमर्श के बाद दूर भी हो जाया करते थे। मैं इस बात से गौरवान्वित हूँ कि अपने अन्तिम समय से कुछ पहले तक भी वे मुझे बराबर याद किया करते थे और भले ही अपने ही परिवार के सदस्यों को न पहचान पाते रहे हों ; किन्तु मुझे पहचान जाते थे। मेरे लिये जगदलपुर जाने का अर्थ ही था लालाजी से भेंट करना। किन्तु कभी-कभार यदि बहुत ही व्यस्तता के कारण या समयाभाव के कारण मैं उनसे नहीं मिल पाता तो तकलीफ दोनों को होती थी। मैं अधूरापन महसूस करता तो वे भी यही महसूसते थे।
मेरी उनसे पहली भेंट हुई थी 1971-72 में, जब मैं बी. ए. प्रथम वर्ष का छात्र था और उसी बीच उन्होंने जगदलपुर से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक 'अंगारा’ में मेरी पहली रचना प्रकाशित की थी और मुझे पत्र भी लिखा था। पत्र मिलने और रचना ('ध्यानाकर्षण’  शीर्षक कविता) प्रकाशन के बाद मैं अपने मित्र केसरी कुमार सिंह के साथ उनसे उनके निवास (कवि निवास) में मिला था। उसके बाद इन 40-41 वर्षों में उनसे न जाने कितनी बार भेंट हुई। प्रत्येक भेंट में उनसे ऊर्जा मिली, उनका आशीर्वाद मिला और मिला अथाह प्यार। फिर अन्तिम भेंट हुई थी 17 मार्च 2013 को। उस भेंट का जिक्र बाद में। उससे पहले 11 मार्च, 2013 की भेंट का पूरा चित्र-
इस दिन उनके और मेरे सह-सम्पादन में नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'बस्तर की लोक कथाएँ’ की प्रतियाँ ले कर मैं और नेशनल बुक ट्रस्ट में सहायक संपादक (हिन्दी) पंकज चतुर्वेदी जी उनसे मिलने पहुँचे थे। बात पहले से तय थी ही। पंकज चतुर्वेदी जी लाला जी से मिलने को उत्सुक थे। और 10 मार्च को कोंडागाँव में इस पुस्तक के लोकार्पण के बाद हम दूसरे दिन यानी 11 मार्च को सवेरे 09.30 बजे के आसपास जगदलपुर के लिये रवाना हो गये। 11.00 बजे के आसपास हम जगदलपुर पहुँचे। मैंने रास्ते में बस्तर की लोक-भाषा हल्बी के अन्यतम कवि श्री सोनसिंह पुजारी जी के विषय में पंकज जी को बताया था। वे उनसे भी मिलने को उत्सुक थे। हम सबसे पहले श्री पुजारी जी के घर पहुँचे। थोड़ी देर उनसे चर्चा की और लगभग 11.30 बजे हम लालाजी के निवास जा पहुँचे। हमने उनके घर में प्रवेश किया तो पाया कि उनके कमरे का दरवाजा बन्द है और वे 'आओ रे, भोजन कराओ रे’ कह रहे थे। उनकी उस आवाज में जो पीड़ा थी, जो रुदन था, उसे सुनकर मैं, पंकज जी और खीरेन्द्र यादव तीनों ही द्रवित हो गये थे। मैंने दरवाजा खोलने का प्रयास किया किन्तु वह खुला नहीं। मुझे चिन्ता हो आई कि यदि दरवाजा भीतर से बन्द है तो उन्हें किस तरह भोजन कराया जाएगा? अभी हम इसी दुश्चिंता से दो-चार हो ही रहे थे कि सामने वाले मकान से एक महिला आईं और बताया कि लालाजी के अनुज के. एल. श्रीवास्तव जी की पुत्र-वधू कल्पना श्रीवास्तव आ रही हैं। वे ही हमें कमरे के भीतर ले चलेंगी। भतीजे विनय श्रीवास्तव की पत्नी कल्पना आईं और कमरे का दरवाजा धकेल कर खोला। तब हमारी समझ में आया कि दरवाजे का पल्ला नीचे झुक कर फर्श पर टिक गया था और इसीलिए वह हमसे नहीं खुला था। बहरहाल। कल्पना के साथ हम तीनों ने भीतर प्रवेश किया। भीतर पहुँच कर हम तीनों ने लालाजी को प्रणाम किया। वे हम में से किसी को भी नहीं पहचान पाये। पंकज जी ने बस्तर की लोक कथाएँ की एक प्रति लाला जी के हाथ में दी। कल्पना बताने लगीं, ताऊ जी। आपसे मिलने आये हैं। ये आपकी पुस्तक छप गयी।
यह सुन कर वे कह उठे- बड़ी कृपा हुई। फिर हँसने लगे।
कल्पना ने टार्च उनके हाथ में थमायी। लालाजी ने बिस्तर पर लेटे-लेटे ही टार्च की रोशनी में पुस्तक का मुख-पृष्ठ देखा और प्रसन्न हो कर बरबस अपनी चिरपरिचित दबंग आवाज में बोल पड़े, वाह, वाह! बहुत बड़ा काम किया आपने। बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य किया है आपने। मैं बधाई देता हूँ आपको। फिर पूछने लगते हैं, सब ठीक है?
पंकज जी कहते हैं, बस! आशीर्वाद आपका।
सब आनन्द है? लालाजी फिर पूछते हैं। मैं केवल जी। कहता हूँ।
फिर पंकज जी पुस्तक की शेष प्रतियाँ भी उनके सिरहाने रख कर कहते हैं, ये सभी पुस्तकें आपके लिए।
मैं पंकज जी को लालाजी के पास बुलाता हूँ और परिचय कराता हूँ, लालाजी, आप दिल्ली से आये हैं। पंकज चतुर्वेदी जी हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट में संपादक। आपसे व्यक्तिगत रूप से मिलने, आपका आशीर्वाद लेने आए हैं। किन्तु वे सुन नहीं पाते।
मुझसे कहने लगते हैं, आप कोंडागाँव से आये हैं।
जी, कोंडागाँव से। मैं हरिहर। मैं जवाब देता हूँ।
 इसके साथ ही मैं उनसे अनुमति लेने को उद्यत होता हूँ। वे उत्तर में फिर से अपने हाथ जोड़ देते हैं और मैं उनके हाथ अलग कर देता हूँ। वे फिर से कहने लगते हैं, आप आए, बड़ा आनन्द आ गया। मैं याद करता रहता हूँ। 93 वर्ष का हो गया हूँ मैं। पत्रिकाएँ नहीं आती हैं। बहुत कम आती हैं; क्योंकि लोग समझ गए हैं कि ये लिख-पढ़ नहीं सकते। ऐसा समझ रहे हैं, लोग। तो ठीक है। स्वागत है तुम्हारी समझ का। इसके बाद वे पंकज जी की ओर मुखातिब होते हैं और पूछने लगते हैं, आप? आपका परिचय?
पंकज जी कहते हैं, मैं दिल्ली से आया हूँ। मैं नेशनल बुक ट्रस्ट में संपादक हूँ।
फिर मैं एक कागज पर पंकज जी का नाम आदि लिख कर देता हूँ। वे उसे टार्च की रोशनी में पढऩे का प्रयास करते हैं और पूछने लगते हैं, क्या नाम है?
पंकज चतुर्वेदी। पंकज जी कहते हैं।            
वे पूछते हैं, यहीं के हैं?
मैं दिल्ली से आया हूँ। पंकज जी कहते हैं। इसके बाद कल्पना पंकज जी के विषय में बताने लगती हैं कि इन्होंने ही आपकी किताब छापी है और दिल्ली से आये हैं। लेकिन वे फिर से कह उठते हैं, कोंडागाँव से? अब मैं फिर से एक कागज पर लिख कर देता हूँ।
 कल्पना बताने लगती हैं कि वे थोड़ी-थोड़ी देर में भूल जाते हैं। शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं। भोजन भी पहले की अपेक्षा अधिक करते हैं। वे पहले बैठ कर खाते थे किन्तु हड्डी टूट जाने के कारण अब बैठा नहीं जाता। लेटे-लेटे ही खाते हैं। उन्हें चम्मच से खिलाना पड़ता है। अपने हाथों से नहीं खाते। पहले तो कई सालों से वे केवल एक ही समय भोजन किया करते थे किन्तु अब दोनों समय भोजन करते हैं। खुराक अच्छी है। सुबह चॉकलेट और पपड़ी खाते हैं। कल्पना बताती हैं कि अब उनके भोजन का समय हो गया है। यह सुन कर हम लालाजी से अनुमति ले कर उनके कमरे से बाहर आ जाते हैं। इसके बाद हम जाते हैं कल्पना के घर। वहाँ कल्पना हमें बताती हैं कि लालाजी की कुछ सामग्री उन्होंने सम्हाल कर रखी हुई है। मैं उस सामग्री को देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाता और उनसे निवेदन करता हूँ कि वे वह सामग्री मुझे दिखाएँ। वे लालाजी के कमरे से वह सामग्री ले कर आती हैं और हमें दिखाती हैं। एक झोले में कुछ पुराने पत्र, दो ध्वनि रूपकों (राजमहल और मुखौटा) की पाण्डुलिपियाँ और छोटी-छोटी डायरियाँ हैं। मैं चाहता हूँ कि वे अपने श्वसुर श्री के. एल. श्रीवास्तव जी तथा  पति विनय श्रीवास्तव से अनुमति ले कर वह सामग्री मुझे उपलब्ध करा दें ; ताकि मैं उनका उपयोग अपनी पुस्तक में कर सकूँ। इसके बाद हम वहाँ से विदा ले कर वापस हो जाते हैं।
दो-तीन दिनों बाद मैं लालाजी के अनुज को फोन लगाता हूँ और अपनी इच्छा प्रकट करता हूँ। वे कहते हैं वे अभी-अभी काँकेर से लौटे हैं और फिलहाल तो उनकी खुद की तबीयत ठीक नहीं है इसीलिए कुछ दिनों बाद मैं उनसे सम्पर्क करूँ। मैं उनकी बात मान लेता हूँ। किन्तु मुझे सामग्री प्राप्त करने की जल्दी है। मैं 16 मार्च को फिर से फोन करता हूँ और उनसे अगले दिन यानी रविवार 17 मार्च का समय लेता हूँ। वे सहमत हो जाते हैं।
17 मार्च 2013। तय कार्यक्रम के अनुसार मैं अपने साथी खीरेन्द्र यादव के साथ सबेरे मोटर सायकिल पर जगदलपुर के लिये निकलता हूँ। निकलने के पहले लालाजी के अनुज को फोन पर यह बता देता हूँ कि हम कोंडागाँव से निकल रहे हैं। वे, विनय जी और कल्पना जी घर पर मिल जायें तो मेरा काम हो जायेगा। वे आश्वस्त करते हैं कि वे सब घर पर मिल जायेंगे। लगभग दो घन्टे बाद हम जगदलपुर पहुँचते हैं और सीधे लालाजी के घर पर ही रुकते हैं। हमें थोड़ा-सा विलम्ब हो गया था। उनके भोजन का समय हो चला था। मैं यह जानता था इसलिये हम दोनों ने उनके कमरे में प्रवेश करने की बजाय उनके अनुज के कमरे में प्रवेश किया और कल्पना जी वहीं पर वह झोला उठा लाईं। झोले में से मैंने अपने काम की सामग्री निकाल ली और उन्हें गिन कर अपने झोले में रख लिया। इस बीच लालाजी भोजन से निवृत्त हो चुके थे। मैंने मौका अच्छा जान कर उनके कमरे में प्रवेश किया। इस बार उन्हें मुझे पहचानने में अधिक देरी नहीं लगी। मेरे प्रणाम करते ही वे मुझे पहचान गये और अपनी खटिया पर बैठने को कहने लगे। मैं बैठ गया। वे कहने लगे, आप आये आनन्द आ गया। फिर पूछने लगे, और सब ठीक है? मैंने हाँ में सिर हिलाया और जी कहा। वे कहने लगे, आप आते हैं तो आनन्द आ जाता है। आप तो हरिहर वैष्णव हैं न। अपने आदमी हैं आप। मैं आपको याद करता रहता हूँ ;  लेकिन आपके आने पर मैं हरिहर वैष्णव को भूल जाता हूँ और उस आनन्द को ग्रहण करता हूँ। मैं तो कोंडागाँव जाता रहा हूँ। फिर पूछने लगते हैं, इन दिनों क्या लिख-पढ़ रहे हैं आप? मैं कहता हूँ, आप पर केन्द्रित पुस्तक पर काम कर रहा हूँ। इसी सिलसिले में यहाँ आया था। वे कहते हैं, अच्छा, ठीक है। फिर बताने लगते हैं, मेरे परिजन मेरा बहुत ध्यान रखते हैं। मैं चल-फिर नहीं पाता। आँखें कमजोर हो गयी हैं। पढ़-लिख भी नहीं पाता। 93 वर्ष का हो गया हूँ, न। वे बोलते रहते हैं और मैं सुनता रहता हूँ। अन्त में वे कहते हैं, और सब ठीक है? मैं पुन: सिर हिला कर हाँ में जवाब देता हूँ और उन्हें प्रणाम कर बाहर निकल जाता हूँ ताकि वे आराम कर सकें। भोजन के बाद आराम करने की उन्हें आदत है, यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ।                     
इसके बाद 21 मार्च, 2013 को एक बार फिर जगदलपुर जाने का अवसर आता है। हम अपना काम निबटा कर उनके दर्शन करने उनके घर पहुँचते भी हैं किन्तु उनके परिजनों द्वारा बताया जाता है कि आज उनसे मिल पाना सम्भव नहीं होगा। मैं अपने दो साथियों हरेन्द्र यादव और उमेश मण्डावी के साथ निराश हो कर चला आता हूँ।
फिर आया 14 अगस्त, 2013 का वह दिन जिसने न केवल मुझसे मेरे साहित्यिक गुरु और धर्मपिता अपितु समग्र छत्तीसगढ़ के साहित्याकाश के चमकते सितारे साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी जी को सदा के लिए हम सब से छीन लिया। इस दिन मैं महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर के सभा-कक्ष में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा ले रहा होता हूँ, जहाँ भाई डॉ. सुधीर शर्मा लालाजी का जिक्र करते हैं। कार्यक्रम के बाद मैं अपनी बेटियों के घर बेमेतरा जाने के लिये निकल पड़ता हूँ कि रास्ते में ही रात के लगभग 8.30 से 9 बजे के बीच क्रमश: जगदलपुर से जगदीश चन्द्र दास, रुद्रनारायण पाणिग्राही, विनय श्रीवास्तव और देहरादून से राजीव रंजन प्रसाद तथा कोंडागाँव से मेरे बेटे नवनीत मोबाइल पर मुझे लालाजी के न रह जाने का दु:खद समाचार देते हैं। अगले दिन जगदलपुर से ही भाईजान एम. ए. रहीम और फिर हल्बी के अन्यतम कवि आदरणीय सोनसिंह पुजारी द्वारा भी यह समाचार मोबाइल द्वारा मुझे दिया जाता है। मैं विवशता में न तो उनकी अन्तिम यात्रा में सम्मिलित हो पाता हूँ और न कोंडागाँव तथा जगदलपुर में आयोजित शोक-सभा में। बेमेतरा में ही मैं अपनी पत्नी, बेटियों और जामाताओं के साथ उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। और फिर जब 27 तारीख को उनकी तेरहवीं पर मैं उनके घर पहुँचता हूँ तो मुझे न जाने क्या हो जाता है कि मैं यह भूल जाता हूँ कि लालाजी अब नहीं रहे। मैं उनके कमरे के ठीक सामने बरामदे में ऐसी जगह जा बैठता हूँ ; जहाँ से मैं लालाजी को देख सकूँ। तभी ध्यान हो आता है कि लालाजी तो अब नहीं रहे और यहाँ उनकी तेरहवीं का कार्यक्रम चल रहा है, जिसमें सम्मिलित होने के लिए मैं आया हूँ। तब मैं समझ  पाता हूँ कि अब मैं न तो उनसे प्रत्यक्ष मिल सकूँगा और न वे मुझसे पूछ सकेंगे, और सब ठीक है, ?
यह सही है कि अब उनसे प्रत्यक्ष भेंट नहीं हो सकती किन्तु यह भी सच है कि प्रत्यक्ष भेंट भले ही न हो किन्तु वे प्रति पल मेरे साथ हैं। उनका आशीर्वाद मेरे साथ है, उनका अथाह स्नेह मेरे साथ है। परमपिता परमेश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और न केवल उनके परिजनों अपितु हम सब साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों तथा पाठकों और प्रशंसकों को उनके न रह जाने के इस अपार दु:ख को सहने की शक्ति दे, यही कामना है।
सम्पर्क: सरगीपाल पारा, कोंडागाँव 494226, बस्तर-छत्तीसगढ़, मोबा. 76971 74308 Email- hariharvaishnav@gmail.com