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Sep 27, 2012

'सॉरी'हिन्दी दिवस पर अंग्रेजी बोली

- अविनाश वाचस्पति

प्रकाशक और अखबार छापने वाले हिन्दी लेखकों को जी भर कर लूटे जा रहे हैं। प्रकाशक लेखक से ही सहयोग के नाम पर दाम वसूलकर पुस्तकें छाप कर बेचते हैं, जिसके बदले में छपी हुई किताबें एमआरपी मूल्य पर भेंट देते हैं। 

हिन्दी दिवस है हिन्दी का जन्मदिन। जिसे मनाने के लिए हम ग्यारह महीने पहले से इंतजार करते है और फिर 15 दिन पहले से ही नोटों की बिंदिया गिनने के लिए सक्रिय हो उठते हैं। अध्यक्ष और जूरी मेम्बर बनकर नोट बटोरते हैं और उस समय अंग्रेजी बोल-बोल कर सब हिन्दी को चिढ़ाते हैं। हिन्दी की कामयाबी के गीत अंग्रेजी में गाते हैं। कोई टोकता है तो 'सॉरी' कहकर खेद जताते हैं। सरकारी कार्यालयों में हिंदी के लिए सितम्बर माह में काम करने पर पुरस्कारों का अंबार लग जाता है। जिसे अनुपयोगी टिप्पणियां, शब्दों के अर्थ-अनर्थ लिखकर, निबंध, कविताएं लिख-सुना कर लूटा जाता है। लूट में हिस्सा हड़पने के लिए सब आपस में घुलमिल जाते हैं। हिन्दी को कूटने-पीटने और चिढ़ाने का यह सिलसिला जितना तेज होगा, उतना हिन्दी की चर्चा और विकास होगा।
हिन्दी के नाम पर सरकारी नौकरी में चांदी ही नहीं, विदेश यात्राओं का सोना भी बहुतायत में है किंतु सिर्फ हिन्दी में लेखन से रोजी-रोटी कमाने वालों का एक जून की रोटी का जुगाड़ भी नहीं होता है, खीर खाना तो टेढ़ी खीर है। प्रकाशक और अखबार छापने वाले हिन्दी लेखकों को जी भर कर लूटे जा रहे हैं। प्रकाशक लेखक से ही सहयोग के नाम पर दाम वसूलकर पुस्तकें छाप कर बेचते हैं, जिसके बदले में छपी हुई किताबें एमआरपी मूल्य पर भेंट देते हैं। गजब का सम्मोहन है कि लेखक इसमें मेहनत की कमाई का निवेश कर गर्वित होता है। किताबें अपने मित्र-लेखकों, नाते-रिश्तेदारों को फ्री में बांट-बांट कर खुश होता है कि अब उसका नाम बेस्ट लेखकों में गिन लिया जाएगा।
छपास रोग इतना विकट होता है कि लेखक मुगालते में जीता है, कि जैसा उसने लिखा है, वैसा कोई सोच भी नहीं सकता, लिखना तो दूर की बात है। बहुत सारे अखबार, पत्रिकाएं, लेखक को क्या मालूम चलेगा, की तर्ज पर ब्लॉगों और अखबारों में से उनकी छपी हुई रचनाएं फिर से छाप लेते हैं। इसका लेखक को मालूम चल भी जाता है किंतु वह असहाय सा न तो अखबार, मैगजीन वाले से लड़ पाता है और न ही अपनी बात पर अड़ पाता है। लेखक कुछ कहेगा तो संपादक पान की लाल पीक से रंगे हुए दांत निपोर कर कहेगा कि 'आपका नाम तो छाप दिया है रचना के साथ, अब क्या आपका नाम करेंसी नोटों पर भी छापूं।' उस पर लेखक यह कहकर कि 'मेरा आशय यह नहीं है, मैं पैसे के लिए नहीं लिखता हूं।' 'जब नाम के लिए लिखते हैं तब आपका नाम छाप तो दिया है, रचना के साथ।' फिर क्यों आपे से बाहर हुए जा रहे हैं और सचमुच संपादक की बात सुनकर लेखक फिर आपे के भीतर मुंह छिपाकर लिखना शुरू कर देता है। इससे साफ है कि हिन्दी का चौतरफा विकास होता रहेगा और हम सब राष्ट्रभाषा के नाम पर हिन्दी का जन्मदिन मना साल भर खुशी बटोरते रहेंगे।
संपर्क- साहित्यकार सदन, 195 पहली मंजिल,  सन्त नगर, नई दिल्ली- 110065 
        मो. 9213501292  E mail nukkadh@gmail.com

संवेदनाओं से भरे कलाकार थे ए.के.हंगल

संवेदनाओं से भरे कलाकार थे ए.के.हंगल 


-  विनोद साव

हिंदी फिल्मों के चरित्र अभिनेता ए. के. हंगल का एक ऐसे दिन में उनका अवसान हुआ जब चंद्रमा पर सबसे पहले जाने वाले अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग भी यह दुनिया छोड़ गए। ए.के.हंगल ऐसे समय में कूच कर गए हैं जब हम भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष मना रहे हैं। सुपरस्टार राजेश खन्ना के साथ सबसे ज्यादा सोलह फिल्मों में अभिनय करने वाले जीवंत अभिनेता अवतार वीनित किशन हंगल, राजेश खन्ना के तुरंत बाद ही हमसे बिदा हो गए, 'शोले' में कहे गए अपने संवाद की तरह 'इतना सन्नाटा क्यों है भई।' ...और अपने पीछे वे सन्नाटा छोड़ गए। साथ ही उस सन्नाटे को बढ़ा गए जो देव आनंद और राजेश खन्ना के गुजर जाने के बाद पसरा पड़ा है। मेगा हिट 'शोले' में ए. के. हंगल की भूमिका सबसे छोटी थी, कुछ मिनटों की लेकिन सबसे यादगार असर उन्हीं के अभिनय ने छोड़ा था, अपनी खास संवाद अदायगी और भाव प्रवण चेहरे से। इस फिल्म में उन्होंने बमुश्किल तीन चार संवाद बोले हैं लेकिन उनके बोले गए हर संवाद दर्शकों के दिलों को छू गए। कुछ तो दर्शकों को रुला भी गए। जब नमाज के लिए जाते हुए उन्हें यह खबर मिलती है कि उनका नवजवान बेटा डाकुओं के हाथों मारा गया है, तब वे कहते हैं कि 'जाता हूं ... आज अल्ला से मांगूगा कि इस गांव में शहीद होने के लिए मुझे दो चार औलादें और दे दे!'
फिल्मों में ए. के. हंगल की उपस्थिति एक बेहद संवेदनशील उपस्थिति होती थी। एक ऐसी उपस्थिति जिसमें एक जिम्मेदार किरदार खड़ा होता था। एक ऐसा चरित्र जो महज एक पारिवारिक व्यक्ति नहीं है बल्कि गहन और व्यापक सरोकारों से जुड़ा हुआ जिम्मेदार इंसान है। चाहे वह शोले का मौलवी हो, नमक हराम का यूनियन लीडर हो, बावर्ची का पारिवारिक व्यक्ति हो या फिर 'शौकीन' का अपनी उम्र को दरकिनार कर रहा शौकीन इंसान हो- हर कहीं उनकी उपस्थिति दर्शकों को छू लेती थी। ऐसा लगता था कि वे अभिनय नहीं, केवल कैमरे के सामने अपने को प्रस्तुत कर रहे हों। इस मामले में रंगीन फिल्मों के दौर के दो अभिनेता ओम पुरी और ए. के. हंगल एक समान प्रभाव छोड़ते हैं। एक सामान्य और संजीदा आदमी की तरह अभिव्यक्ति देते हुए अपने चरित्रों को जी लेने की काबिलियत इनमें रही।
इसका एक बड़ा कारण यह है कि हंगल थियेटर की दुनियां से आए थे। इसलिए उनके अभिनय में एक किसम की सहृदयता दिखा करती थी। वे अपनी भूमिकाओं को हृदय से जीते थे और इसलिए एकदम स्वाभाविक अभिनय करते थे। वे पेशावर के उसी हिस्से से आए थे जिसने बम्बई फिल्म उद्योग को महान हस्तियां दी थीं।
ए. के. हंगल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, यूनियन लीडर थे, इप्टा के आजीवन सदस्य एवं अंतिम समय तक राष्ट्रंीय अध्यक्ष रहे। वे जब पेशावर से इक्कीस बरस की उम्र में मुंबई पहुंचे तब उनकी जेब में भी उतने ही रुपये थे जितनी कि उनकी उम्र थी। वे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य रहे  और अपनी आजीविका चलाने के लिए उनके लिए दर्जी का काम किया। जिस तरह का अभाव और संघर्षमय जीवन जीया वैसा ही अभिनय किया। उनकी पृष्ठभूमि और उनके व्यक्तित्व और अभिनय क्षमता को देखते हुए उनका सबसे सही उपयोग ऋषिकेश मुखर्जी ने अपनी फिल्म 'नमक हरामÓ में किया था। इसमें वे एक ईमानदार यूनियन लीडर की भूमिका में थे, जिनके साथ राजेश खन्ना की टकराहट होती है और यूनियन के चुनाव में ए. के. हंगल की हार होती है। इस फिल्म में हंगल के घर में महान श्रमिक नेताओं और विचारकों के चित्र लगे थे जिनमें माक्र्स, लेनिन के साथ व्ही.व्ही.गिरी के चित्र भी दीवालों पर टंगे दिखलाए गए हैं। गिरी देश के पहले राष्ट्रपति थे जो कभी मजदूर नेता थे। ऋषिकेश मुखर्जी जैसे विचारवान और कल्पनाशील निर्देशक ही इस तरह का फिल्मांकन कर पाते हैं। इस फिल्म की कहानी तब के यूनियन नेताओं और उद्योगपतियों के बीच टकराहट से उपजी मशीनबंदी पर आधारित थी। तब बंबई के कपड़ा मिलों में दत्ता सावंत के दौर में उपजे यूनियन आंदोलनों में कैसा बहकाव आया था और किन स्थितियों में कपड़े मिल बंद हो गए थे जिससे लाखों मजदूरों के सामने पेट भरने की कैसी विकराल समस्या आ गई थी, इन सबको आधार बनाकर रची गई कहानी का बड़ा प्रभावशाली फिल्मांकन हुआ है।
दर्शकों की संवेदना को झकझोर देने वाली अपनी भूमिकाओं के बाद भी ए.के.हंगल फिल्मों को 'शो-बिजनेस' का एक बड़ा क्षेत्र माना करते थे। अपनी आत्मकथा 'ए.के.हंगल का जीवन और समय' में उन्होंने कहा है कि 'फिल्मों को लेकर मेरी कोई बहुत महत्वाकांक्षा कभी नहीं रही किन्हीं परिस्थितियों में मैं यहां आ गया और एक लम्बा समय यहां गुजारने के बाद भी मैं यहां किसी आउटसाइडर की तरह ही रहा।' यह वही संकट है जो थियेटर की दुनियां से आए बेहद परिपक्व कलाकारों के सामने होती है। कुछ इसी तरह का संकट कलकत्ता से आए उत्पलदत्त के सामने भी था और वे अपनी जरुरतें पूरी करने के बाद बंबई फिल्मोद्योग को छोड़ फिर कलकत्ता बस गए थे और सामान्य जीवन जीने लग गए थे।
ए.के.हंगल इप्टा से जुड़े होने के कारण निरंतर सक्रिय रहे। वे प्रलेस तथा इप्टा के आयोजनों में आते जाते थे। कभी बिलासपुर आए तो कभी रायपुर पहुंचे। भिलाई इप्टा के कलाकार बताते हैं कि पिछले साल इप्टा के राष्ट्रीय अधिवेशन को मुंबई के बदले भिलाई में करवाने की पहल हंगल ने खुद की थी यह कहते हुए कि 'मुंबई महानगरी है यहां सम्मेलन अधिवेशन होते रहते हैं, इस बार अधिवेशन भिलाई में होना चाहिए।' 98 वर्षीय हंगल अस्वस्थ थे, भिलाई के अधिवेशन में वे नहीं आ सके तो उनका सचित्र संदेश आया जिसमें बोलते हुए उन्हें एल.सी.डी.पर दिखाया गया। अशक्त होने के बाद भी अपने कामरेडी जोश में वे बोल रहे थे कि 'मुझसे पहले भी यह दुनिया थी और मेरे बाद भी यह दुनिया रहेगी और एक बेहतर दुनिया के लिए हमारे लिए लड़ाई जारी रहेगी।' 
संपर्क- मुक्तनगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़, मो. 9407984014 , vinod.sao1955@gmail.com

जन्म -शताब्दी वर्ष

मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ?

- सआदत हसन मंटो
मुझसे कहा गया है कि मैं यह बताऊँ कि मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ? यह 'क्यों कर' मेरी समझ में नहीं आया। 'क्यों कर' का अर्थ शब्दकोश में तो यह मिलता है- कैसे और किस तरह?
अब आपको क्या बताऊँ कि मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ। यह बड़ी उलझन की बात है। अगर में 'किस तरह' को पेशनजर रखूं तो यह जवाब दे सकता हूँ कि अपने कमरे में सोफे पर बैठ जाता हूँ। कागज-कलम पकड़ता हूँ और बिस्मिल्लाह करके अफसाना लिखना शुरू कर देता हूँ। मेरी तीन बच्चियाँ शोर मचा रही होती हैं। मैं उनसे बातें भी करता हूँ। उनकी आपसी लड़ाइयों का फैसला भी करता हूँ, अपने लिए 'सलाद' भी तैयार करता हूँ। अगर कोई मिलने वाला आ जाए तो उसकी खातिरदारी भी करता हूँ, मगर अफसाना लिखे जाता हूँ।
अब 'कैसे' सवाल आए तो मैं कहूँगा कि मैं वैसे ही अफसाने लिखता हूँ जिस तरह खाना खाता हूँ, गुसल करता हूँ, सिगरेट पीता हूँ और झक मारता हूँ।
अगर यह पूछा जाए कि मैं अफसाना 'क्यों' लिखता हूँ तो इसका जवाब हाजिर है।
मैं अफसाना अव्वल तो इसलिए लिखता हूँ कि मुझे अफसाना लिखने की शराब की तरह लत पड़ी हुई है। मैं अफसाना न लिखूं तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं या मैंने गुसल नहीं किया या मैंने शराब नहीं पी।
मैं अफसाना नहीं लिखता, हकीकत यह है कि अफसाना मुझे लिखता है। मैं बहुत कम पढ़ा लिखा आदमी हूँ। यूँ तो मैंने 20 से ऊपर किताबें लिखी हैं, लेकिन मुझे कभी-कभी हैरत होती है कि यह कौन है जिसने इस कदर अच्छे अफसाने लिखे हैं, जिन पर आए दिन मुकद्दमे चलते रहते हैं।
जब कलम मेरे हाथ में न हो तो मैं सिर्फ सआदत हसन होता हूँ जिसे उर्दू आती है न फारसी, न अंग्रेजी, न फ्रांसीसी।
अफसाना मेरे दिमाग में नहीं, जेब में होता है जिसकी मुझे कोई ख़बर नहीं होती। मैं अपने दिमाग पर जोर देता हूँ कि कोई अफसाना निकल आए। कहानीकार बनने की भी बहुत कोशिश करता हूँ, सिगरेट फूंकता रहता हूँ मगर अफसाना दिमाग से बाहर नहीं निकलता है। आखरी थक-हार कर बाँझ औरत की तरह लेट जाता हूँ।
अनलिखे अफसाने के दाम पेशगी वसूल कर चुका हूँ। इसलिए बड़ी कोफ्त होती है। करवटें बदलता हूँ। उठकर अपनी चिडिय़ों को दाने डालता हूँ। बच्चों को झूला झुलाता हूँ। घर का कूड़ा-करकट साफ करता हूँ। जूते, नन्हे मुन्हें जूते, जो घर में जहाँ-तहाँ बिखरे होते हैं, उठाकर एक जगह रखता हूँ। मगर कम्बखत अफसाना जो मेरी जेब में पड़ा होता है मेरे जहन में नहीं उतरता और मैं तिलमिलाता रहता हूँ।
जब बहुत ज़्यादा कोफ्त होती है तो बाथरूम में चला जाता हूँ, मगर वहाँ से भी कुछ हासिल नहीं होता।
सुना हुआ है कि हर बड़ा आदमी गुसलखाने में सोचता है। मगर मुझे तजुर्बे से यह मालूम हुआ है कि मैं बड़ा आदमी नहीं, इसलिए कि मैं गुसलखाने में नहीं सोच सकता। लेकिन हैरत है कि फिर भी मैं हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बहुत बड़ा कहानीकार हूँ।
मैं यही कह सकता हूँ कि या तो यह मेरे आलोचकों की खुशफहमी है या मैं उनकी आँखों में धूल झोंक रहा हूँ। उन पर कोई जादू कर रहा हूँ।
माफ कीजिएगा, मैं गुसलखाने में चला गया। किस्सा यह है कि मैं खुदा को हाजिर-नाजिर रखकर कहता हूँ कि मुझे इस बारे में कोई इल्म नहीं कि मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ और कैसे लिखता हूँ। अक्सर ऐसा हुआ है कि जब मैं लाचार हो गया हूँ तो मेरी बीवी, जो संभव है यहाँ मौजूद है, आई उसने मुझसे यह कहा है, 'आप सोचिए नहीं, कलम उठाइए और लिखना शुरू कर दीजिए।'
मैं इसके कहने पर कलम या पैंसिल उठाता हूँ और लिखना शुरू कर देता हूँ- दिमाग बिल्कुल खाली होता है लेकिन जेब भरी होती है, खुद-ब-खुद कोई अफसाना उछलकर बाहर आ जाता है।
मैं खुद को इस दृष्टि से कहानीकार, नहीं, जेबकतरा समझता हूँ जो अपनी जेब खुद ही काटता है और आपके हवाले कर देता हूँ- मुझ जैसा भी बेवकूफ दुनिया में कोई और होगा?

अस्पृश्यता की पीड़ा को बयान करती पुस्तक

भीमायन अस्पृश्यता की पीड़ा को बयान करती पुस्तक

-दीपाली शुक्ला
भीमायन अस्पृश्यता के अनुभव यह किताब एक दस्तावेज है, जिसमें डॉ.भीमराव रामजी अंबेडकर अपनी जीवनगाथा को, जीवन में मिली भेदभाव की पीड़ा को, तिरस्कार को बयान करते हैं। आज जब जातिगत भेदभाव एक विशाल पेड़ की तरह मजबूती से समाज में अपनी जड़ें जमाये हुए है, ऐसा बहुधा सुनने को मिलता है कि अब पहले जैसे स्थितियां नहीं रहीं। पर सच्चाई यह भी है कि जातियों के बीच असमानता और तिरस्कार का भाव साफतौर पर वर्तमान में भी दिखाई देता है।
आज के युवा जातियों को लेकर आरक्षण के बारे में, निम्न जातियों के विरुद्ध किये जाने वाले अपराधों के बारे में क्या सोच रखते हैं। इन मुद्दों पर बातचीत के साथ भीमायन की शुरुआत होती है और फिर डॉ.अंबेडकर के बचपन में, स्कूली शिक्षा के दौरान मिलने वाली पीड़ाओं की परतें पन्ने दर पन्ने खुलती हैं।
इस किताब में डॉ. अंबेडकर का जीवन यानी उनके बचपन से लेकर संविधान बनाने वाली ड्राफ्टिंग कमेटी तक की खास घटनाओं को हालिया घटनाओं के साथ मिलाते हुए पिरोया गया है।
नन्हे भीम को कक्षा में बैठने के लिए बोरा घर से लाना पड़ता है। स्कूल में पीने के पानी के लिए तरसना पड़ता है। उसकी पीड़ा को इन शब्दों से समझा जा सकता है,
कुएं पर बच्चे और हौद पर जानवर,
पेट फूटने तक पी सकते हैं पानी।
पर तब गांव रेगिस्तान बन जाता है
जब प्यास बुझाना चाहूं अपनी।
भेदभाव का दंश केवल स्कूल तक ही सीमित नहीं है बल्कि हर एक छोटी- बड़ी बात में यह बना रहता है। अपने पिता से मिलने जा रहे बच्चों को मसूर स्टेशन से गोरेगांव जाने के लिए बैलगाड़ी बड़ी मुश्किल से मिलती है। अछूत होने के कारण गाड़ीवान गाड़ी चलाने से इंकार कर देता है और दोगुने किराये पर मानता है। जिस सातारा जिले में दस बरस की उम्र में भीम का सामना जात- पांत की सच्चाई से हुआ था, वहीं सन 2008 में एक दलित की हत्या इसलिए कर दी गयी, क्योंकि वह अपनी जमीन पर कुआं खोद रहा था। सवर्ण नहीं चाहते थे कि गांव में दलित की जमीन पर कुआं हो। पानी के लिए जंग में दलितों को जीवन से हाथ धोना पड़ा।
महाड़ सत्याग्रह के द्वारा डॉ. अंबेडकर ने सार्वजनिक जलस्रोतों, जैसे कुओं, हौद से दलितों को पानी मिलने के संघर्ष की शुरुआत की थी। चवडार हौज से हिंदुओं के साथ-साथ बाकी धर्म के लोगों को पानी लेने की इजाजत थी। यहां तक कि पशु-पक्षी भी पानी पी सकते थे लेकिन अछूतों को इससे वंचित किया गया था। 25 दिसंबर 1927 को दूसरे महाड़ सत्याग्रह में दस हजार लोग शामिल हुए।
अंबेडकर ता-जिंदगी एक न्यायपूर्ण समाज के लिए लड़ते रहे। वे चाहते थे कि अछूत जातियां राजनीति में उतरें, अपने हक के लिए लड़ें। वे संविधान की ड्राफ्टिंग समिति के सदस्य थे। संविधान में प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार है लेकिन इसके बावजूद भी समाज में नीची जातियों के साथ होने वाला दुव्र्यवहार जारी है।
डॉ. अंबेडकर के जीवन की घटनाओं को कथासूत्र में पिरोया है श्रीविद्याराजन और एस आनंद ने। वहीं इसके चित्र बनाये हैं दुर्गाबाई व्याम और सुभाष व्याम ने। यह ग्राफिक पुस्तक है। दुर्गाबाई व्याम और सुभाष व्याम ने गोंड-परधान शैली के चित्रों को इतनी खूबसूरती से उकेरा है कि कहानी के साथ-साथ पूरा परिवेश पढऩे वाले की आंखों में घूमने लगता है।
किताब का नाम- भीमायन
प्रकाशक- एकलव्य और नवयान
कला- दुर्गाबाई व्याम, सुभाष व्याम
कथा- श्रीविद्या नटराजन, एस आनंद
अंग्रेजी से अनुवाद- टुलटुल विश्वास
मूल्य- 210 रुपए।
भीमायन के बारे में यह जानकारी भोपाल से दीपाली शुक्ला ने भेजा है। इस किताब की जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे, उनकी इस मंशा को हम सलाम करते हैं। किताब का ऑर्डर उनके मेल पर किया जा सकता है। dplshukla9@gmail.com

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सूर्य को दीपक दिखाना

'मैं क्यों लिखता हूं' सआदत हसन मंटो एवं चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कालजयी रचना 'उसने कहा था' के बारे में कुछ लिखना सूर्य को दीपक दिखाना है। पर प्रेमचंद जी के बारे में चूक शायद 31 जुलाई के कारण हो सकती है। 'पावस' रामेश्वर काम्बोज एवं 'पानी' अख्तरी अली की कविताओं में दम है। रश्मि प्रभा के अपने ही अंदाज में ब्लॉग बुलेटिन में विविधता की अपेक्षा है। स्कूलों में शिक्षक बच्चों की सही लाइन बनवाते हैं और लाइन बनते ही बिगडऩे लगती है। जिन्दगी भर के अनुभव से नहीं सीखने का गम 'हुए जिन्दगी से जुदा, आ लगे कतार में' जवाहर चौधरी हकीकत बयान कर रहे हैं। भोजन के पोषक तत्व कहां गुम हो जाते है सामान्य ज्ञानवर्धक, तो 'बूँदों में जाने क्या नशा है...' सामान्य है। वाह भाई वाह एवं रंगबिरंगी दुनिया में पाठकों के लिए सामान्य तथा नया नहीं होता, ना भी होता तो चलता। बहरहाल जुलाई अंक कुल मिलाकर अच्छा है। 
- बालकृष्ण गुप्ता 'गुरु', बख्शी मार्ग, खैरागढ़

भावपूर्ण कविता जैसा

बूँदों में क्या नशा है... यह लेख तो भावपूर्ण कविता जैसा है। मन-प्राण को भिगोने वाला। अच्छी और जमीन से जुड़ी भाषा। गहन जीवन-अनुभव के बिना इस तरह का लेखन सम्भव नहीं। सुजाता जी को हार्दिक बधाई।
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली,rdkamboj@gmail.com

बेमिसाल

उदंती के जुलाई मास में आवरण पृष्ठ की खूबसूरती ने मोह लिया। इस माह के अंक का विशिष्ट उपहार है श्री रामेश्वर काम्बोज के पावस के सोलह तांकें। उदंती की यह खासियत है कि वह प्रकृति की पुजारी है- मौसम के अनुरूप काव्यमयी हो उठती है... सुजाता साहा के लेख बूँदों में जाने क्या नशा है ने गुदगुदा दिया, अख्तर अली की कविता पानी ने भावी संकट के प्रति सचेत करते हुए डरा दिया और जवाहर चौधरी की आ लगे कतार में ने जी भर हंसा दिया। उदंती सचमुच बेमिसाल है। बहुत- बहुत बधाई। 
- सुधा गुप्ता, काकली 120/बी, साकेत, मेरठ-3

लेखन का जुदा अंदाज

ब्लाग बुलेटिन से- कोलंबस होना अच्छा लगता है... में राज को देखना अच्छा लगा। नियम से पढ़ती हूँ उनकी हर रचना, उनके लेखन का अंदाज एकदम जुदा है...बहुत पसंद है मुझे उनकी कवितायें।   
- अनु, http://allexpression.blogspot.in/

कविता की शैली

'उदंती' का नया अंक देखा। हमेशा की तरह यहाँ आकर अच्छा ही लगा। ताँका मैं लिखती नहीं, पर भाई काम्बोज जी की कविताएँ मुझे हमेशा से बहुत पसन्द रहीं हैं। जापानी ही सही, पर ताँका है तो कविता की एक शैली ही...काम्बोज जी को उनके खूबसूरत ताँका के लिए बधाई। एक बार फिर 'उसने कहा था' पढ़ कर आनन्द मिला, आभार। पानी की सामयिक समस्या आपने बड़ी खूबी से सामने रखी है। आप के अच्छे संपादन पर मेरी शुभकामनाएँ।         
- प्रेम गुप्ता 'मानी' premgupta.mani.knpr@gmail

उत्तम अंक

उत्तम रचनाओं के साथ सहेजा गया उत्तम अंक। अपने प्रिय लेखकों रामेश्वर काम्बोज और रश्मि प्रभा के साथ-साथ अन्य लेखकों को पढऩा सुखद रहा। डॉ.रत्ना वर्मा को एक उच्च स्तर की पत्रिका के लिए बधाई और शुभकामनाएँ।
- सुशीला शिवराण, गोरेगांव, हरियाणा
http://sushilashivran.blogspot.in/

ये बूंदे...

शैतानी करे, हवा के कंधों पर
चढ़ी ये बूंदें ..., अद्भुत हैं ये ताँकें।
काम्बोज जी को बहुत बहुत बधाई। उदंती पत्रिका से पहली बार रु-ब-रु हुई शुभकामनाएं। 
- हरकीतर हीर, harkirathaqeer@gmail.com

मार्मिक ताँका

बहुत प्यारे ताँके हैं। खासतौर से यह तो बहुत मार्मिक लगा-
बैठ झरोखे, गौरैया ये निहारे
कितना पानी, नीड़ गिरा आँधी से
खो गए कहीं बच्चे।
- प्रियंका गुप्ता, priyanka.gupta.knpr@gmail.com