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May 30, 2012

31 मई तंबाकू निषेध दिवस

सिर्फ प्लास्टिक पाउच पर रोक से बात नहीं बनेगी

- पारुल भार्गव
खाने और रखने की सुविधा व जगह- जगह आसान उपलब्धता के चलते पुडिय़ों का व्यापार सातवें आसमान पर पहुंच गया। क्योंकि इसे न सुरती की तरह चूना मिलाकर हथेली पर रगडऩे की जरूरत है और न ही सुपारी काटने का झंझट। जेब में छिपी पुडिय़ा निकाली और धीमे से जहर की चुटकी भर फांक ली। इसकी बिक्री के साथ- साथ कैंसर रोगियों की संख्या भी बढ़ती चली गई।
मानव जीवन के लिए संकट बनी तंबाकू की पुडिय़ा सुप्रीम कोर्ट की बाध्यकारी फटकार के बाद खुद मुसीबत में आ गई है। पर्यावरण और वन मंत्रालय ने एक बड़े व अहम फैसले के तहत गुटखा, तंबाकू और पान मसाले को भरने, पैक करने और पुडिय़ा, पाउच में बेचने के लिए प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। इसी फैसले के साथ खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग के बाबत एक मर्तबा प्रयोग में लाई गई प्लास्टिक थैलियों के दोबारा इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी है। इसे प्रभावी बनाने की दृष्टि से पर्यावरण और वन मंत्रालय ने रीसाइकल्ड प्लास्टिक निर्माण और उपयोग नियम 1999 को बेअसर करते हुए उसके स्थान पर प्लास्टिक कचरा (प्रबंधन और रखरखाव) अधिनियम 2011 अधिसूिचत किया है।
लेकिन इस नए कानून के अमल में आने के बावजूद अभी यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार और तंबाकू व्यापार से जुड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाह में मानव सेहत के प्रति कोई जवाबदेही है। क्योंकि इस कानून में न तो बड़े पैमाने पर हो रही तंबाकू की खेती को हतोत्साहित करने के कोई उपाय रेखांकित किए गए हैं और न ही ऐसे शोधों पर अंकुश लगाने के लिए कोई प्रावधान हैं जो धुम्रपान के खतरों को कम आंकते हैं। प्लास्टिक की पुडिय़ा की जगह कागज अथवा सिंथेटिक सामग्री की पुडिय़ा हो जाने से तंबाकू की बिक्री कहां बाधित होती है?
आज स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े हर क्षेत्र में सेहत और विनाश की परवाह किए बिना व्यवसाय पर पडऩे वाले प्रभाव की चिंता ज्यादा जताई जाती है। लिहाजा जहां सरकार इस कानून पर अमल के लिए वक्त चाहती है, वहीं उद्योगपति व्यापार प्रभावित हो जाने और व्यवसाय से जुड़े लोगों के बेरोजगार हो जाने का रोना रो रहे हैं। तंबाकू व्यवसायियों के ऐसे दबावों के चलते अब तक तंबाकू उत्पाद की पुडिय़ों और सिगरेट पैकेटों पर सचित्र चेतावनी छापी जाना शुरु नहीं हुई हैं। हालांकि सरकारी विज्ञापनों में जरूर तंबाकू के वीभत्स असर को दर्शाया जाने लगा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक तंबाकू उत्पादों के सेवन से हर साल भारत में साठ हजार नए कैंसर रोगी सामने आते हैं। इनमें भी मुंह के कैंसर रोगियों की तादाद सबसे ज्यादा होती है। लेकिन सरकार अपने नागरिकों की चिंता करने की बजाय उन व्यापारियों की फिक्र ज्यादा करती नजर आती है जो मुनाफे के लिए बीमारियों के उत्पाद बेेचने में लगे हैं।
देश में उदारवादी अर्थव्यवस्था लागू होने के बाद 1990-91 से तंबाकू गुटखा व पान मसाला एक रुपए और पचास पैसे की पुडिय़ों में बेचने का सिलसिला शुरू हुआ था। खाने और रखने की सुविधा व जगह- जगह आसान उपलब्धता के चलते पुडिय़ों का व्यापार सातवें आसमान पर पहुंच गया। उद्योगपतियों के वारे न्यारे हो गए। विज्ञापनी कारोबार ने पुडिय़ों की पहुंच युवा पीढ़ी और महिलाओं तक बना दी। तंबाकू के इस व्यापार विस्तार में अहम भूमिका पुडिय़ों की रही। क्योंकि इसे न सुरती की तरह चूना मिलाकर हथेली पर रगडऩे की जरूरत है और न ही सुपारी काटने का झंझट। जेब में छिपी पुडिय़ा निकाली और धीमे से जहर की चुटकी भर फांक ली। इसकी बिक्री के साथ- साथ कैंसर रोगियों की संख्या भी बढ़ती चली गई। सेहत की इस हानि से सम्बंधित चित्र सिगरेट पैकेटों, बीड़ी के बण्डलों व तंबाकू के पाउचों पर छापने की हिदायत सुप्रीम कोर्ट ने दी भी, लेकिन इस गंभीर हिदायत की अब तक अनदेखी ही रही।
तंबाकू और धुम्रपान के खतरों से वाकिफ होने के बावजूद बहुराष्ट्रीय तंबाकू कंपनियां दुनिया के दिग्गज वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों और समाज वैज्ञानिकों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार करने में लगी हैं जो धुम्रपान की पैरवी कर रहे हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक अध्ययन कोलेरैडो की एन लैण्डमैन ने छापा है। 80 लाख दस्तावेजों का यह संग्रह लीगेसी टोबेको दस्तावेज लायब्रेरी में सुरक्षित है। इन दस्तावेजों में मनोवैज्ञानिक हैन्स आइसेन्क और दार्शनिक रॉजर स्क्रटन जैसे लोगों के लेख शामिल हैं। इन जैसे और भी कई दिग्गजों ने अपनी मंशा तंबाकू पर प्रतिबंध के खिलाफ जताई है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है तंबाकू पर रोक से कई देशों को आर्थिक हानि उठानी होगी। देशी अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर पड़ेगा। एक दस्तावेज में दलील दी गई है कि धुम्रपान व शराब का सेवन सामाजिकता के लिए जरूरी है। लोग इससे परस्पर जुड़ते हैं। हैन्स आइसेन्क ने तो यहां तक दावा किया है कि तंबाकू से जुड़ी बीमारियां तंबाकू के सेवन की बजाय वंशानुगत कारणों से पनपती हैं। रॉजर स्क्रटन ने तो 'दी टाइम्स' में अपने एक आलेख में यहां तक तर्क दिया कि धुम्रपान से जुड़े लोग स्वास्थ्य सेवाओं पर कम असर डालते हैं क्योंकि वे जल्दी मर जाते हैं। तंबाकू कंपनियां ऐसे अमानवीय कुतर्कों की रचना के लिए इन बुद्धिजीवियों को करोड़ों डॉलर दे रही हैं।
भारत जैसे देश में पुडिय़ों की प्रकृति बदलने भर से इसके सेवन में कोई विशेष कमी नहीं आने वाली है। हकीकत में तंबाकू की खेती को हतोत्साहित कर इसे नेस्तानाबूद करने की जरूरत है।
हमारे यहां तो उल्टा हो रहा है। तंबाकू का उत्पादन तो बढ़ ही रहा है, बीते कुछ सालों में तंबाकू की खेती के रकबे में भी आशातीत बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सिगरेट में इस्तेमाल होने वाले तंबाकू का बड़ा हिस्सा सिर्फ आंध्रप्रदेश में पैदा होता है। जबकि शेष उत्पादन कर्नाटक में होता है। आंध्र में 2005-06 में तंबाकू का उत्पादन 145.36 लाख टन हुआ था, जबकि 2006-07 में यह बढ़कर 171.95 लाख टन हो गया। इसी तरह 2005-06 में तंबाकू  की खेती का रकबा 17 हजार हैक्टर था जो 2007-08 में बढ़कर एक लाख 26 हजार हैक्टर हो गया। आंध्र और कर्नाटक के किसान तंबाकू की खेती से मालामाल हो रहे हैं। इसलिए जो किसान कपास व अन्य परंपरागत खेती में लगे थे वे भी अन्य किसानों की सुधरती माली हालत से उत्साहित होकर तंबाकू की खेती करने लगे हैं।
बहरहाल जब तक तंबाकू की खेती को हतोत्साहित कर इसके उत्पादन पर अंकुश नहीं लगाया जाएगा तब तक धुम्रपान में कोई कमी आएगी ऐसा नहीं लगता। अब तो सिंथेटिक धागों को कागज की लुगदी में मिलाकर ऐसा कागज बनने लगा है जो फाडऩे पर भी नहीं फटता। जल्दी ही प्लास्टिक की बजाय ऐसे कागज की पुडिय़ों में जहर बिकने लगेगा। 
(स्रोत फीचर्स)

वाह भई वाह

  • किडनी  फेल...
डॉक्टर ने मीठू से कहा-आपकी एक किडनी फेल हो गई है...
मीठू रोने लगा, और कुछ देर बाद आंसू पोंछते हुए बोला, कितने नंबर से...
  • बेटे का एक्सीडेंट...
शर्मा जी का बेटा साइकिल पर स्कूल जाते हुए एक कार की चपेट में आ गया, और लोग उठाकर उसे अस्पताल ले गए...
एमरजेंसी के डॉक्टरों ने जांच के बाद तब तक अस्पताल पहुंच चुके शर्मा जी को बताया, माफ कीजिएगा शर्मा जी, लेकिन आपके बेटे की दोनों टांगें काटनी पड़ेंगी...?
शर्मा जी ने माथा पकड़ लिया, और चुप हो गए, जैसे सांप सूंघ गया हो...
डॉक्टर ने सहानुभूति जताते हुए पूछा, अरे, आप ठीक तो हैं न...?
शर्मा जी ने माथा पकड़े-पकड़े जवाब दिया, कैसे ठीक रहूंगा डॉक्टर साहब कल ही नालायक को नए जूते दिलवाए थे...
  • लंबी दौड़ !
डॉक्टर ने टीटू से कहा अगर वह आठ किलोमीटर प्रतिदिन के हिसाब से 300 दिनों तक दौड़े तो उसका वजन 34 किलो तक कम हो जाएगा। टीटू ने डॉक्टर के कहे मुताबिक दौडऩा शुरू कर दिया।
300 दिन पूरा हो चुकने के बाद उसने डॉक्टर को फोन किया। उसने डॉक्टर को बताया कि उसका वजन तो कम हो गया है पर उसके साथ एक समस्या आ खड़ी हुई है।
क्या समस्या है? डॉक्टर ने पूछा।
मैं अपने घर से 2400 किलोमीटर दूर
आ गया हूं।

पिछले दिनों

  • सादगी की नई मिसाल
गुजरात में नर्मदा जिले के आईएएस अफसर ने सामूहिक विवाह सम्मेलन में शादी रचाकर सादगी की नई मिसाल पेश की है। अक्षय तृतीया पर साबरकांथा जिले के भिलोड़ा तहसील में एक विवाह सम्मेलन में डिप्टी कलेक्टर विजय खराडी ने सात फेरे लिए। सन् 2009 में आईएएस परीक्षा पास करने वाले विजय ने स्कूल टीचर सीमा गरासिया से विवाह किया। विजय और सीमा दोनों आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। तड़क- भड़क से दूर आयोजित इस समारोह में विजय के चंद रिश्तेदार ही मौजूद थे। उनके भाई शिरीष ने बताया कि विजय चाहते तो बड़ा समारोह आयोजित कर सकते थे। लेकिन उन्होंने बेकार के खर्चो से बचने के लिए ऐसा किया। डूंगरी गरासिया समुदाय द्वारा आयोजित इस विवाह समारोह में कुल 35 जोड़ों ने शादी रचाई।
  • चाय अब हमारा राष्ट्रीय पेय
राष्ट्रीय खेल, राष्ट्रीय पक्षी, राष्ट्रीय पशु के बाद राष्ट्रीय गौरव में एक नाम और शामिल होने जा रहा है वह है चाय। भारत सरकार ने घोषणा की है कि 17 अप्रैल 2013 से चाय राष्ट्रीय पेय बन जाएगी। असम में चाय का पहला पौधा उगाने वाले मणिराम दीवान की याद में यह एलान किया गया है। 2013 में मणिराम दीवान की 212वीं जन्मशती होगी। मणिराम दीवान जिन्हें इस इलाके में चाय की व्यावसायिक खेती शुरू करने के लिए जाना जाता है। असम से ब्रिटिश लोगों को बाहर निकालने के लिए 1857 के विद्रोह में उनके शामिल होने पर उन्हें फांसी की सजा दे दी गई थी।
आज भारत में चाय का जो सामाजिक और व्यवसायिक रूप है वो भारत में अंग्रेजों के हाथों शुरू हुई बड़े पैमाने पर इसकी खेती की देन है। अंग्रेजों ने इस देश में चाय की संस्कृति को शुरू किया और पाल पोस कर समृद्ध बनाया।
16 वीं सदी में जब पुर्तगाली व्यापारियों से यूरोप चाय मंगवाता था, तब इसे चा कहा जाता था। 1750 में चाय के जानकार चीन से एजोरस द्वीप गए और वहां चाय को जैसमीन और मैलो के साथ उगाया ताकि चाय को अलग खुशबू मिले। भारत के आदिवासी असम चाय का पौधा उगाते थे। बहरहाल अंग्रेजों की चाय की दीवानगी इसे भारत ले कर आई। उत्तर पूर्वी भारत की वादियों में इसकी खेती को व्यावसायिक रूप मिला, ब्रिटिश राज ने इससे काफी फायदा उठाया। चीन में जहां ग्रीन टी ज्यादा पी जाती है वहीं भारत में काली चाय ज्यादा पसंद की जाती है। समय के साथ इसे दूध में उबाले जाने की परंपरा शुरू हो गई।

आपके पत्र

  • रंगमय तोहफा 
मार्च अंक के मनमोहक मुखपृष्ठ की जितनी तारीफ की जाए थोड़ी है। पलाश पुष्पों में सज्जित यह अंक अपनी अद्भुत और असीमित कलात्मकता का परिचय देते हुए  वास्तव में होली का रंगीन और रसमय तोहफा बन गया है। जहां एक ओर यह चित्र मन में होली के रस और रंग की वर्षा करता है वहीं दूसरी ओर वनों में छाए इन पलाश के फूलों की मादक छवि होली के आने का  शुभ संकेत देती है। इसी चित्र जैसी अनुभूति मुझे तब होती है जब कभी मोती जैसी ओस की बूंदों से जगमगाती लाल कमल की पंखुड़ी देखने का सौभाग्य प्राप्त होता है। इस प्रकर की छबियां मेरे लिए आध्यत्मिक अनुभव होती हैं। इस अंक की अन्य सामग्री में विशेषतया महादेवी वर्मा जी की आत्मकथा, फूलबासन पर लेख तथा होली पर प्रो. अश्विनी केशरवानी की रचना भी उत्तम है। समग्र रूप में यह अंक संग्रहणीय बन गया है। हार्दिक बधाई स्वीकार करें।
-  प्रताप सिंह राठौर, अहमदाबाद, psrathaur@yahoo.com
  • टेसू का चटख रंग
उदंती के होली अंक मिला। आवरणपृष्ठ पर पलाश या टेसू का चटख रंग देख कर मन प्रसन्न हो गया, पहले ग्राम- नगर की सीमा पर पलाश के पेड़ लगे होते थे जो फाल्गुन आते ही खिल उठते थे। डॉक्टर अश्विनी का होली पर आलेख सांस्कृतिक परंपरा का अनुस्मरण है जो सदैव प्रेरक और मनोरंजक बना रहता है। कृष्ण, राम और शिव की होली के कवित्त और लोकगीत अब पढऩे सुनने में कम ही आते हैं। उदंती ने इन्हें प्रकाशित कर संस्कृति- परंपरा को विस्तार देने का प्रयास किया है जो प्रशंसनीय है। सोचता हूँ राम- सीता और उनके अनुजों को होली का अवसर कब और कितना मिला होगा पर कृष्ण की तर्ज पर होली खेलें रघुबीरा के लोकगीत भक्तों ने रचे तो हैं ही। नारी सशक्तिकरण पर अतुलजी की रिपोर्टिंग सामयिक है, इसी तरह की रिपोर्टिंग कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध कार्यरत संस्था और व्यक्ति समूह पर भी देते रहिये।
- ब्रजेन्द्र श्रीवास्तव, ग्वालियर (मप्र)
brijshrivastava@rediffmail.com
  • असाधारण आदमी
ए दीदी, कभी सोचबो की हैं कि एतना दुलार दीजिएगा त हम रक्खेंगे कहाँ... सरधा से आँख बंद करते हैं त लोर बनकर बरसने लगता है... एगो बात त हम कभी सायद बतइबो नहीं किये आप को.. आप हमको नहीं जानती थीं, मगर हम जानते थे... एक बार एगो फंक्सन में हम गए थे.. चुपचाप कोना में बइठे हुए थे.. लोग बाग रह-रह कर इस्टेज के तरफ देखता था अउर फुसफुसता था लगता है रश्मि प्रभा जी आ गई हैं... एतना बार ई नाम हम सुने कि लगा जइसे अमिताभ बच्चन के आने का इंतजार हो रहा है.. खैर, जब जतरा बना तब्बे मिले कुंभ के मेला में अलग हुए दुन्नो भाई-बहिन!!
आपका लिखला के बाद बुझाता है कि हम अति-साधारण आदमी से असाधारण आदमी हो गए हैं!
- सलिल वर्मा, पटना
http://chalaabihari.blogspot.com  (मार्च अंक में प्रकाशित ब्लाग बुलेटिन कॉलम के ब्लागर की प्रतिक्रिया, रचनाकार रश्मिप्रभा जी के लिए)
  • शानदार अंक
मार्च अंक में प्रकाशित 'बाथ टब की होली'  पढ़कर बहुत मजा आया...बाल्टी से रंग नहीं डाली गई...बाथ टब में होली खेली गई। भई, कुछ तो हुआ। 'संघर्षों में तप कर मजबूत होती आज की स्त्री' नारी जागरण के लिए सशक्त आलेख है। जेन्नी शबनम के हाइकु राग, अनुराग विरह सब कुछ वर्णन कर रहे हैं। इसी तरह ब्लॉग बुलेटिन में सलिल वर्मा का परिचय बहुत अच्छे से दिया है। जहाँ भी पटना और बिहार की बात आती है मैं टिप्पणी दिए बिना नहीं रह पाती। वर्माजी ने अपने ब्लॉग में पुष्पा आर्याणी जी का जिक्रकिया है। मैंने उनकी सिस्टर किरण आर्याणी जी से फिजिक्स पढ़ा है। सलिल जी के ब्लॉग को फॉलो करती हूँ इसलिए सारे पोस्ट पढ़ पाती हूँ।
- ऋता शेखर मधु, hrita.sm@gmail.com
उदंती में प्रकाशित 'बाथ टब की होली' परदेश जा कर अपने देश की छोटी-छोटी चीजें, चाहे वह अच्छी हो या बुरी, कितना याद आती है, रचना जी की इन यादों को पढ़ कर साफ पता चलता है...। अपनी प्यारी खुशनुमा यादों को हमारे साथ बाँटने के लिए रचना जी का आभार और बधाई। 'तुम्हारे बिना' में रंगों के त्योहार होली को इन हाइकुओं के माध्यम से आँखों के सामने फिर से सजीव कर दिया है जेन्नी जी ने...।
- प्रियंका गुप्ता,   priyanka.gupta.knpr@gmail.com
  • मानवीयता का अनुपालन
'कोख में श्मशान' लेख कटु यथार्थ को बयान करता है। हम शास्त्रों की बहुत दुहाई देते हैं, पूजा -पाठ में भी पीछे नहीं। बस पीछे हैं मानवीयता का अनुपालन करने में। पूजा पाठ के नाम पर पूरा तूमार खड़ा कर देंगे, दूसरी ओर मौका मिलते ही आज के युवक दहेज के बदले बिकने को तैयार मिलेंगे। दंगा हो फसाद हो, घर-परिवार के लोग हों चाहे रिश्तेदार, शोषण में कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता। आपका यह लेख आँख खोलने वाला है।
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु', rdkamboj@gmail.com

रंग- बिरंगी दुनिया

मौत के बाद भी उन्हें चाहिए आराम

 
दुनिया में अजूबों की कमी नहीं है तभी तो लोगों को मरने के बाद भी चैन नहीं वे मरकर भी सुकून भरी की जिंदगी चाहते हैं। ऐसी ही कुछ चाहत रखने वाले ब्रिटेन की एक दंपती ने मौत के बाद आराम फरमाने के लिए समूचा द्वीप खरीद लिया है। हर्टफोर्डशायर स्थित बीचवुड पार्क बोर्डिंग स्कूल में सूचना प्रसारण प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख पीयर्स कैसीमीर म्रौकजिंस्की (50) ने आइसले टापू के पास मैकेंजी आइलैंड नामक छोटा द्वीप इसलिए खरीद लिया ताकि वह और उनकी पत्नी पाओलिन को मरने के बाद वहां दफ्न किया जा सके। 55 हजार पाउंड यानी 88 हजार डालर से अधिक की रकम देकर उन्होंने यह द्वीप खरीदा है।
म्रौकजिंस्की ने बताया कि उन्हें तीन साल पहले पता चला कि वह अपेंडिक्स के कैंसर की बीमारी से पीडि़त हैं। उसी समय उनके दिमाग में यह विचार आया कि कोई ऐसी जगह होनी चाहिए जहां वह अपनी पत्नी के साथ सुकून से दफ्न हो सकें। यह द्वीप फिलहाल निर्जन है जिसकी वजह से म्रौकजिंस्की दंपती के आराम के लिए काफी मुफीद जगह है। गौरतलब है कि म्रौकजिंस्की ने अब तक इस द्वीप को केवल तस्वीरों और नक्शों में ही देखा है। वह खुद कभी यहां नहीं गए। उन्होंने बताया कि उन्हें समुद्र बेहद पसंद है और यह जगह समुद्र के काफी करीब होने के कारण बहुत खूबसूरत है। मरने की बाद की इस चाहत का भी जवाब नहीं।

अग्नि युद्ध की परंपरा

कर्नाटक के मैंगलोर में देवी को खुश करने के लिए जलती मशालों से जंग लडऩे की एक अजीबो- गरीब परंपरा निभाई जाती है। मैंगलोर के कटील में प्रसिद्ध दुर्गा परमेश्वरी मंदिर में आस्था के नाम पर आग से खेलने का दिल दहला देने वाला खेल परंपरा के नाम पर खेला जाता है। मंदिर के आठ दिन तक चलने वाले सालाना उत्सव के दूसरे दिन मशालों की ये जंग होती है। इलाके के लोगों के मुताबिक ये परंपरा सदियों से चली आ रही है। पिछले दिनों एक बार फिर इस परंपरा को निभाया गया।
'अग्नि केलि' नाम का ये खेल दो गांव के लोगों के बीच खेला जाता है। सबसे पहले देवी की शोभा यात्रा निकाली जाती है इसके बाद पास ही में बने तालाब में डुबकी लगाने के बाद आतुर और कलत्तुर गांव के लोग दो गुटों में बंट जाते हैं। वे अपने- अपने हाथों में नारियल की छाल से बनी मशाल लेकर एक दूसरे के विरोध में खड़े हो जाते हैं। मशालों को जलाया जाता है और फिर शुरू हो जाता है जलती मशालों को एक-दूसरे पर फेंकने का खेल। ये खतरनाक खेल करीब 15 मिनट तक खेला जाता है। इस दौरान एक शख्स को सिर्फ पांच बार जलती मशाल फेंकने की इजाजत होती है।

...और उन्होंने 55वीं मंजिल से छलांग लगा दी

कुछ लोग अपना उल्लू साधने के लिए नित नए कारनामे करते रहते हैं। ऐसा ही एक वाकया मेलबर्न के पांच सितारा होटल में हुआ। चार स्टंटबाजों ने महंगे होटल में खाना खाने की योजना बनाई लेकिन उनके पास खाने का बिल देने के पैसे नहीं थे। सो, मुफ्त में लजीज व्यंजन उड़ाने की चाहत में इन्होंने अपनी करतब बाजी को जरिया बनाया और होटल में पैराशूट भी छुपाकर ले गए। वहां इन्होंने जमकर खाना खाया और महंगी शराब पी। उसके बाद बैरे से इन्होंने बिल मांगा। जब वह बिल लेने गया तो चारों ने पैराशूट की मदद से 55वीं मंजिल से छलांग लगा दी। होटल वाले भौंचक्के रह गए और ये आराम से उतरकर चलते बने।