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Mar 23, 2012

बहुत याद आए


- रंजना सिंह
मादक मंद समीर बसंती,
छूकर तन, मन को सिहराए।
इस मोहक बेला में साथी,
आये, बहुत याद तुम आये।
नींद पखेरू,पलकों को तज,
स्मृति गगन में चित भटकाए।
इस नीरव बेला में साथी,
आये, बहुत याद तुम आये।
पूनम का चंदा ये चकमक,
छवि बन तेरा, नेह लुटाये।
इस मादक बेला में साथी,
आये, बहुत याद तुम आये।
उर चातक के स्वाति प्यारे,
तुम बिन तृष्णा कौन बुझाये।
आकर साथी कंठ लगा ले,
पाए हृदय मिलन-सुख पाए।

संपर्क: जमशेदपुर, ब्लॉग- संवेदना संसार, Email- ranjurathour@gmail.com

मेरी कर्मपत्री... खुली पुस्तक के समान है

- महादेवी वर्मा

मेरे जन्म के लिए तो बाबा और दादी ने कुलदेवी की मनौती मान रखी थी। अत: मुझे लौटाने का तो प्रश्न ही नहीं उठा वरन मुझे योग्य बनाने के ऐसे सम्मिलित प्रयत्न आरंभ हुए कि हम इन्दौर न जाते तो मुझे बचपन में ही वृद्धावस्था का सुख मिल जाता।
बाबा के उर्दू- फारसी के अबूझ घटाटोप में, पिता के अंग्रेजी- ज्ञान के अबूझ कोहरे में मैंने केवल माँ की प्रभाती और लोरी को ही समझा और उसी में काव्य की प्रेरणा को पाया।
फर्रूखाबाद के सर्वथा विपरीत संस्कृति वाले गृह में, जबलपुर में रामचरित- मानस की एक प्रति और रामजानकी- लक्ष्मण की छोटी- छोटी मूर्तियों- से सजा चाँदी का छोटा सिंहासन लेकर माँ जब पालकी से उतरीं तब उनकी अवस्था 13 वर्ष और पिताजी की 17 वर्ष से अधिक नहीं थी। यह माँ का द्विरागमन था, विवाह तो जब वे दोनों 8 और 12 के थे, तभी हो चुका था। उस परिवार ने कन्याओं को जन्म लेते ही इतनी बार लौटाया था कि फिर कई पीढिय़ों तक किसी कन्या को उस परिवार में जन्म लेने का साहस नहीं हुआ।
पर मेरे जन्म के लिए तो बाबा और दादी ने कुलदेवी की मनौती मान रखी थी। अत: मुझे लौटाने का तो प्रश्न ही नहीं उठा वरन मुझे योग्य बनाने के ऐसे सम्मिलित प्रयत्न आरंभ हुए कि हम इन्दौर न जाते तो मुझे बचपन में ही वृद्धावस्था का सुख मिल जाता।
पिता जी जब प्रयाग विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में प्रथम श्रेणी में स्थान पाकर एम.ए. परीक्षा उत्तीर्ण हुए तब तुरन्त ही वे इन्दौर के राजकुमारों के कालेज में वाइस प्रिन्सिपल नियुक्त हो गए और तीन वर्ष की अवस्था में ही माँ के साथ इन्दौर चली गयी। इस प्रकार मेरा संस्कार तथा रुचियाँ बनने का समय मध्य प्रदेश में व्यतीत हुआ। हम छावनी में रहते थे, जहाँ पशु- पक्षी, पेड़- पौधे ही हमारे संगी रहे। सेवक हमें मिला रामा जो हमारी जिज्ञासाओं के अद्भुत समाधान प्रस्तुत कर देता था। माँ के गृहकार्य तथा पूजा पाठ की मैं ही एकान्त संगिनी थी। अत: 'जागिए कृपानिधान पंक्षी बन बोले' जैसे प्रभाती- पद मैं भी गुनगुनाने लगी थी।
विद्यारंभ के उपरांत पंडित जी की कृपा से मेरा हिन्दी- ज्ञान अन्य विद्यार्थियों की क्षमता से अधिक ही हो गया था।
शीतकाल में ठंडे पानी से नहलाकर माँ अपने साथ पूजा में बैठा लेती थीं जिससे स्वभावत: मुझे बहुत कष्ट होता था। रामा से यह सुनकर कि सीधे भोले बच्चे शोरगुल नहीं मचाते, मैंने तुकबन्दी की—
ठंडे पानी से नहलाती
ठंडा चन्दन इन्हें लगाती
इनका भोग हमें दे जाती
तब भी कभी नहीं बोले हैं
माँ के ठाकुर जी भोले हैं।
इसी प्रकार तारों को देखकर मैंने तुकबन्दी की—
आओ प्यारे तारे आओ
तुम्हें झुलाऊँगी झूले में
तुम्हें सुलाऊँगी फूलों में
तुम जुगनू से उड़कर आओ
मेरे आँगन को चमकाओ।
ऐसी तुकबन्दियों को जोड़ते समय मेरी अवस्था छ: सात वर्ष से अधिक न रही होगी और 10 वर्ष तक पहुँचने तक पंडित जी मुझे समस्यापूर्ति का व्यायाम सिखाने लगे। अलंकार- पिंगल आदि का जो ज्ञान मुझे बचपन से प्राप्त हुआ, वह बड़े होने पर भी मेरे बहुत काम आया।
पिता जी सरस्वती पत्रिका मँगाते थे। अत: मैंने भी उसे पढऩे और खड़ी बोली में तुकबन्दी का प्रयास किया, किन्तु पंडित जी तो ब्रजभाषा की कविता को ही कविता मानते थे, अत: वे प्रयत्न छिपाकर ही होते रहे। पर दद्दा (राष्ट्रकवि मैथिलीशरण) का प्रभाव मुझ पर अधिक रहा।
'मेघ बिना जलवृष्टि भई है' जैसे समस्या- पूर्ति में असमर्थ होने के कारण मैंने अपने व्यवहार- गुरु रामा से पूछा और उसके कहने पर कि भगवान जी का हाथी अपनी सूँड़ में पानी भर लाता है और बरसा देता है। मैंने तुकबन्दी की—
हाथी न अपनी सूड़ में यदि
नीर भर लाता अहो
तो किस तरह बादल बिना
जलवृष्टि हो सकती कहो।
'हथिया बरसाता है' का अर्थ रामा इतना ही जानता था, क्योंकि उसे किसी हस्ती नक्षत्र का ज्ञान नहीं था। संयोग से मेरी यह तुकबंदी देखकर पंडित जी ने अप्रसन्न होकर कह था, 'यह यहाँ भी आ गए।' यह से उनका तात्पर्य दद्दा से था जिनको वे कवि नहीं मानते थे।
कुछ और बड़े होने पर मैंने पुन: दद्दा के अनुकरण पर देश के लिए लिखा—
सिरमौर सा तुझको रचा था विश्व में करतार ने,
आकृष्ट था सबको किया तेरे मधुर व्यवहार ने
नव शिष्य तेरे भव्य भारत नित्य आते थे चले
जैसे सुमन की गन्ध से अलिवृन्द आ- आ कर मिले।
कुछ दिन मुझे मिशन स्कूल में रखा गया, किन्तु उसका वातावरण मेरे अनुकूल न होने के कारण फिर एक छोटा स्कूल खोला गया, जिसमें मैं और पिता जी की अन्य मित्र शिक्षकों की बालिकाएँ पढऩे जाती थीं। फिर वह स्कूल लेडी ओडवायर गल्र्स स्कूल हुआ और अब संभवत: बड़ा कॉलेज हो गया होगा।
मेरा मनोयोग और शिक्षा के प्रति आकर्षण देख कर पिता जी को प्रयाग याद आया और मैं क्रास्थवेट गल्र्स कालेज में पढऩे आयी और यहाँ बहिन सुभद्राकुमारी चौहान मिलीं। तब खड़ी बोली में लिखने की अबाध स्वतन्त्रता मिल सकी।
उस समय देश की स्वतन्त्रता के संघर्ष के साथ हिन्दी के प्रचार- प्रसार का कार्य भी महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। अनेक पत्र- पत्रिकाएँ प्रकाशित होतीं और अनेक कवि- सम्मेलन होते थे, जिनमें बड़े लेखक अध्यक्षता करते और विद्यार्थी कविता- पाठ करने आते थे।
मेरी कविता का तुतला उपक्रम समाप्त हो चुका था और मैंने भी अनेक तुकबन्दियाँ रचीं जो अज्ञातनामा होकर जुलूसों में गायी जाती रहीं—
वन्दिनी जननी तुझे हम मुक्त कर देंगे ।
श्रृंखलाएँ ताप से उर के गलेंगी
भित्तियाँ ये लौह की रज में मिलेंगी
रक्त से अपने गुलाबों के खिला कर लाल बादल
इस तिमिर को हम उषा आरक्त कर देंगे।
ऐसे अनेक गीत लिखे गए और बिना नाम के प्रसार पाते रहे जिनमें से कुछ अब भी शेष हैं और कुछ समय के प्रवाह में बह गए हैं। उस समय कविता संग्रह करने का विचार न आना ही संभव था। इस प्रकार का प्रथम आयाम मुझे अपने गन्तव्य का बोध देकर समाप्त हुआ।
यामा में मेरी काव्य- यात्रा के चार आयाम संग्रहीत हैं। अत: मेरे ये भाव और चिन्तन- जगत की क्रमबद्धता के कारण महत्त्वपूर्ण हैं। नीहार की कुछ रचनाएँ तत्कालीन प्रकाशित लघु पत्रिकाओं—स्त्री दर्पण, मर्यादा आदि में प्रकाशित हुईं तथा सन् 22 से नियमित रूप से चाँद में भी प्रकाशित होने लगीं। तभी मैं कवि- सम्मेलनों में भी उपस्थित होने लगी और भाई सुमित्रानन्दन जी से परिचय हुआ तथा पद्मकोट में श्रीधर पाठक जी के भी दर्शन हुए। नीहार की रचनाएँ उस समय की हैं जब मैं आठवीं की विद्यार्थिनी थी और उन रचनाओं को पुस्तकाकार प्रकाशित कराने की इच्छा से अनजान थी। किंतु सम्भवत: श्रद्धेय टण्डन जी की प्रेरणा से साहित्य भवन के मैनेजर उन रचनाओं को प्रकाशनार्थ ले गये। वह प्रथम प्रकाशन इतना शुभ हुआ कि तब से आज तक प्रकाशकों ने मुझे खोजा है पर मैंने कभी प्रकाशक नहीं खोजा।
मेरी कर्मपत्री हिन्दी- जगत के समक्ष खुली पुस्तक के समान रही है। अत: अपने संबंध में अधिक कहने की आवश्यकता का अनुभव नहीं होता।

जन्म-26 मार्च, 1907 फ़र्रुख़ाबाद, उत्तर प्रदेश,
मृत्यु-11 सितम्बर 1987 प्रयाग
महादेवी वर्मा का जन्म होली के दिन 26 मार्च, 1907 को फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ था। महादेवी वर्मा के पिता श्री गोविन्द प्रसाद वर्मा एक वकील थे और माता श्रीमती हेमरानी देवी थीं। महादेवी वर्मा के माता- पिता दोनों ही शिक्षा के अनन्य प्रेमी थे। महादेवी वर्मा को आधुनिक काल की मीराबाई कहा जाता है। हिन्दुस्तानी स्त्री की उदारता, करुणा, सात्विकता, आधुनिक बौद्धिकता, गंभीरता और सरलता महादेवी वर्मा के व्यक्तित्व में समाविष्ट थी। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की विलक्षणता से अभिभूत रचनाकारों ने उन्हें 'साहित्य साम्राज्ञी, हिन्दी के विशाल मंदिर की वीणापाणि', 'शारदा की प्रतिमा' आदि विशेषणों से अभिहित करके उनकी असाधारणता को लक्षित किया। महादेवी जी ने एक निश्चित दायित्व के साथ भाषा, साहित्य, समाज, शिक्षा और संस्कृति को संस्कारित किया। कविता में रहस्यवाद, छायावाद की भूमि ग्रहण करने के बावज़ूद सामयिक समस्याओं के निवारण में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई।
महादेवी वर्मा की गिनती हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानन्दन पन्त, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के साथ की जाती है। आधुनिक हिन्दी कविता में महादेवी वर्मा एक महत्तवपूर्ण शक्ति के रूप में उभरीं। महादेवी वर्मा ने खड़ी बोली हिन्दी को कोमलता और मधुरता से संसिक्त कर सहज मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का द्वार खोला।

नीहार
(प्रथम याम:)
निशा को, धो देता राकेश
चाँदनी में जब अलकें खोल,
कली से कहता था मधुमास
बता दो मधुमदिरा का मोल।
गये तब से कितने युग बीत
हुए कितने दीपक निर्वाण
नहीं पर मैंने पाया सीख,
तुम्हारा सा मनमोहन गान।
बिछाती थी सपनों के जाल
तुम्हारी वह करुणा की कोर,
गयी वह अधरों की मुस्कान।
मुझे मधुमय पीड़ा में बोर,
भूलती थी मैं सीखे राग
बिछलते थे कर बारम्बार।

तुम्हारे बिना

- डॉ जेन्नी शबनम
1.
रंग-अबीर
मन हुआ अधीर
होली खेलो रे!
2.
फगुआ पर्व
घर पाहुन आये
मन चंचल!
3.
भंग तरंग
इन्द्र-धनुषी रंग
सब तरफ!
4.
फगुआ मन
अंग-अंग में रंग
होली आई रे!
5.
होली त्यौहार
भेद-भाव मिटाए
मन मिलाए!
6.
अंग- अंग में
फगुनाहट छाए
मनवा नाचे!
7.
घर है सूना
परदेसी सजना
होली रुलाए!
8.
कैसे मनाए
है मन तड़पाए
पी बिन होली!
9.
तुम्हारे बिना
कैसे मनाऊँ होली
न जाओ पिया!
10.
बैरन होली
क्यों पिया बिन आए
तीर चुभाए!

संपर्क- द्वारा राजेश कुमार श्रीवास्तव, द्वितीय तल ५/7 , सर्वप्रिय विहार
नई दिल्ली- ११००१६ फोन-०११-२६५२०३०३

आपके पत्र मेल बॉक्स


भविष्य के साथ खिलवाड़

उदंती के जनवरी अंक में अनकही के अंतर्गत व्यक्त आपके प्राथमिक शिक्षा के विषय में विचारों से मैं सहमत हूं। शिक्षा का इतिहास बताता है कि सबसे उपेक्षित प्राथमिक शिक्षा है। आयोग और रिर्पोट्स सिफारिशों के बंडल हैं। सबको उच्च शिक्षा की चिंता है यह देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। आपका लेख 'शिक्षा की ध्वस्त बुनियाद' आंख खोलने वाला है।
- डॉ. जय जयराम आनंद, भोपाल (मप्र)

सुरुचिपूर्ण संयोजन

हमेशा की तरह उदंती का जनवरी अंक भी सुरुचिपूर्ण संयोजन और साज- सज्जा का खूबसूरत नमूना है। बधाई स्वीकार करें। मुख पृष्ठ बहुत ही आकर्षक है। नेताजी का संदेश और पुस्तक प्रेमी सूरज प्रकाश जी का पुस्तक दान भी बहुत प्रेरणादायक सामग्री है। पंडित लोचन प्रसाद पाण्डे के साहित्यिक कृतित्व के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए धन्यवाद। उदंती के उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाएं।
- प्रताप सिंह राठौर, अहमदाबाद, psrathaur@yahoo।com

अभिनव प्रयोग


सूरज प्रराश जी द्वारा पुस्तकें बांटने का यह प्रयोग साहित्य जगत में अभिनव प्रयोग माना जायेगा। सही अर्थों में पुस्तकों का प्रचार करने वाले साहित्य प्रेमियों के लिए अनुकरणीय है। यह स्तुत्य प्रयोग है। ऐसे कार्य के लिये सूरज सा दिल भी तो चाहिए।
- अरविन्द कुमार ठाकुर, पटना

सार्थक और ख्रूबसूरत पत्रिका


'उदंती' के रूप में एक सार्थक और खूबसूरत पत्रिका निकालने के लिए बहुत -बहुत बधाई...। रचनाओं का चयन अच्छा है...। मेरी शुभकामनाएँ...। काम्बोज जी की लघुकथाएँ... बहुत भावपूर्ण हैं जो मन को छू जाती हैं। एक ओर गरीबी की विवशता तो दूसरी में माँ-बाप का दर्द...। बधाई...। सुधा जी के हाइकु ने अबकी बरस की सर्दी सजीव कर दी...बहुत सुन्दर...।
- प्रियंका गुप्ता,priyanka.gupta.knpr@gmail.com

बस्तर बैण्ड


बस्तर बैण्ड की व्यापक जानकारी देने के लिए संजीव तिवारी जी बधाई के पात्र हैं। वाद्ययन्त्रों एवं गीत -संगीत की जानकारी के साथ कलाकारों की जानकारी देकर लेख को और अधिक विश्वसनीय बना दिया है। अपनी सांस्कृतिक धरोहर की जानकारी से हम अनजान होते जा रहे हैं। उदन्ती जैसी पत्रिकाएँ इस तरह की खोजपूर्ण जानकारी देकर सामाजिक उपकार ही कर रही हैं।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' दिल्ली, rdkamboj@gmail.com

उल्लेखनीय प्रयास


किसी भी पत्रिका के प्रकाशित लेखों और विचारों के प्रस्तुतिकरण में जो आवश्यक होता है, वह इस अंक में मौजूद है। किसी एक लेख के बारे में उसकी गुणवत्ता पर लिखा जाएगा तो बाकी के साथ न्याय नहीं हो सकेगा। आपके पास श्रेष्ठ लेखकों एवं लेखिकाओं की टीम है। मैं उदंती के अंकों को पढ़ता हूं और उनका विश्लेषण करता हूं। मैंने इस पत्रिका के कई लेखों के तथ्यों एवं उनके प्रस्तुतिकरण को देखा। अच्छा नहीं, बहुत अच्छा लगा। समाज को इस तरह की पत्रिकाओं की बहुत आवश्यकता है और मैं समझता हूं कि ऐसा लेखन हर विषय वस्तु के साथ पढऩे वाले को कहीं न कहीं सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। उत्कृष्ट पत्रिकाओं को चलाना कोई आसान काम नहीं है। आपका यह प्रयास उल्लेखनीय है, ईश्वर आपकी सदैव सहायता करे।
- दिनेश शर्मा, संपादक- स्वतंत्र आवाज डॉट कॉम, info@swatantraawaz।com

संघर्षों में तप कर मजबूत होती आज की स्त्री

- डॉ. मिथिलेश दीक्षित

महिला- सुरक्षा आज भी एक बड़ी समस्या है, जबकि भारत सरकार की ओर से 'राष्ट्रीय महिला आयोग' की स्थापना की गयी है और राज्य स्तर पर भी उसका क्रियान्वयन हो रहा है। इस आयोग के अतिरिक्त महिला अधिकारों की सुरक्षा हेतु तथा उनकी भूमिका के प्रति जागरूकता हेतु विगत कुछ वर्षों से गैर सरकारी संगठन भी कार्यरत हैं।
आज भारत, पूरे विश्व में ज्ञान, विज्ञान एवं विकास के विविध क्षेत्रों में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरकर आ रहा है। अनेक क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण मानी जा रही है, भले ही सदियों से भारतीय नारी की संघर्षों में पिसने की मजबूरी रही हो, घर की चहारदीवारी में कैद रहने की मजबूरी रही हो, परन्तु अब उसे सम्मान प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है। परिवारों में जागृति आयी है और महिलाएँ अपने अधिकारों के प्रति सजग होने लगीं। उन्हें अनेक ऐसे सुअवसर मिलते गये कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनकी सहभागिता बढऩे लगी है।
प्रसिद्ध रचनाकार कृष्णा सोबती आशान्वित होकर कहती हैं- 'भारतीय समाज में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों और पारिवारिक चौखटों को लेकर एक गहरी नैतिक हलचल, दूरगामी परिवर्तन और प्रभाव लक्षित है। एक तरफ स्त्री- आरक्षण की राजनीतिक चेतना और दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर पर नयी स्त्री की उपस्थिति अपनी ऊर्जा से नये उत्साह का संचार कर रही है।'
वर्तमान समय उत्साहजनक होने के बावजूद सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए आज भी महिलाओं को अनेक क्षेत्रों में जागरूक होने की आवश्यकता है। अन्धविश्वास, मिथ्या कर्मकाण्ड, साम्प्रदायिकता आदि को दूर करने के लिए महिलाओं को पहल करनी होगी। स्वस्थ मानसिकता से कोई भी विकास शीघ्रता से होता है। 'जागृति का अर्थ उन्मुक्तता और स्वच्छन्दता नहीं है और न पुरूषों के बराबर उनके जैसा होना या उनसे आगे जाना है। स्त्री का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व भी है और उसमें प्रकृति प्रदत्त अपने विभिन्न सहजगुण भी है। साथ ही स्त्री और पुरूष दोनों जीवन के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं, जो एक- दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। जीवन के कुछ क्षेत्रों में तो स्त्री का दायित्व पुरुष से भी बढ़कर है। पूरे परिवार की व्यवस्था की वह स्वामिनी होती है। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी यह बात समझनी चाहिए कि सामाजिक बुराइयों को अब स्त्री शक्ति द्वारा पहल करने पर ही आसानी से दूर किया जा सकता है। सही रूप में आधुनिक बनने के लिए फैशन व शारीरिक सज्जा आवश्यक नहीं, विचारों में परिवर्तन आवश्यक है। जहाँ तक स्त्री- पुरुष के समानाधिकार की बात है उसके लिए कोरे उपदेश नहीं, क्रियान्वयन की आवश्यकता है।'
देश के लिए भारतीय नारी ने बड़ा से बड़ा बलिदान दिया है। नारियों के त्याग और बलिदान की एक गौरवशाली परम्परा भी रही है। भारत के स्वाधीनता- आन्दोलन में भारतीय युवतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, परन्तु प्राय: देखा गया है कि नारी- विषयक सामाजिक समस्याओं के प्रति नारी जगत में अपेक्षाकृत अधिक उदासीनता रही है। नारी- शोषण के विरोध में भी उनका स्वर दबा हुआ रहा है। जिसके लिए न केवल पुरुष दोषी है और न केवल स्त्री। इन सबके अनेक परम्परागत और मनोवैज्ञानिक कारण रहे हैं। शिक्षा का अभाव भी एक प्रमुख कारण रहा है। हमारे देश के महान चिन्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती तथा अन्य महापुरुषों के प्रयासों से स्त्री की समुचित शिक्षा का व्यापक रूप से प्रचार- प्रसार हुआ। अब तो विभिन्न शैक्षिक- शैक्षणिक क्षेत्रों में अपने देश की युवतियाँ भारत में ही नहीं, विश्व में अपना स्थान बना रही हैं। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के साथ- साथ अनेक स्वयंसेवी संस्थाएँ भी नारी कल्याण, महिला उत्थान, नारी शिक्षा और जागृति के लिए कार्य कर रही हैं। महिला साक्षरता का देशव्यापी कार्यक्रम चलाया जा रहा है। परन्तु और अधिक जागृति की आवश्यकता है। एक सच्चाई यह भी है कि नगरीय क्षेत्रों की महिलाएँ ही प्राय: विविध परिदृश्यों में अपनी भूमिका प्रत्यक्षत: निभाती आयी हैं जबकि ग्राम्य क्षेत्रों की महिलाओं में आज भी पर्याप्त जागृति नहीं आयी है। उनका पूरा जीवन घर परिवार के लिए समर्पित है, परन्तु उन्हें उनके पूरे अधिकार नहीं मिल पाते हैं। उनकी क्षमताओं का भी सही मूल्यांकन नहीं हो पाता है। उनमें जो सहज प्रतिभा होती है, वह बिखरकर नष्ट हो जाती है। अपने देश में कृषि- व्यवसाय और खाद्य- सुरक्षा में ग्रामीण महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं। यह एक बड़ा कार्य है, जिसका भारत की ग्राम्य- महिलाएँ पूरी निष्ठा से निर्वहन कर रही हैं। स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना, राष्ट्रीय रोजगार मिशन, जननी सुरक्षा योजना, राजीव गांधी किशोरी सशक्तीकरण योजना, महात्मा गान्धी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना आदि महत्वपूर्ण हैं।
ग्रामीण महिलाओं की भूमिका को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सन् 2008 में 'अन्तरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस' (15 अक्टूबर) घोषित किया गया था। सन् 1975 में अन्तरराष्ट्रीय महिला वर्ष पूरे विश्व में मनाया गया था। उसके बाद महिलाओं से सम्बन्धित अनेक संगठन बने, अनेक समितियाँ, अनेक पत्रिकाएँ प्रकाश में आयीं। स्थान- स्थान पर स्त्री- मुक्ति को लेकर समितियाँ- सम्मेलन भी होने लगे। मार्च, 1982 में प्रथम उत्तर प्रदेश महिला सम्मेलन आगरा में हुआ था, उससे बहुत प्रचार- प्रसार हुआ। नारी की भूमिका और अधिकार के लिए महिलाओं से सम्बन्धित अनेक साहित्यिक संस्थाएँ भी स्थापित होकर सक्रिय होने लगीं। उनमें से एक अखिल भारतीय कवयित्री सम्मेलन संस्था भी है, जिससे देश के सभी प्रान्तों की भारी संख्या में महिला सर्जक जुड़ी हुई हैं।
महिला- सुरक्षा आज भी एक बड़ी समस्या है, जबकि भारत सरकार की ओर से 'राष्ट्रीय महिला आयोग' की स्थापना की गयी है और राज्य स्तर पर भी उसका क्रियान्वयन हो रहा है। इस आयोग के अतिरिक्त महिला अधिकारों की सुरक्षा हेतु तथा उनकी भूमिका के प्रति जागरूकता हेतु विगत कुछ वर्षों से गैर सरकारी संगठन भी कार्यरत हैं।
नारी के व्यक्तित्व के विकास, उन्नयन, उसकी शिक्षा और जागृति आदि की नींव, वस्तुत: घर से ही प्रारम्भ होती है। पुत्री के रूप में उसका पोषण मुख्य रूप से माता के द्वारा ही होता है। घर में माता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। 'घर एक आदर्श स्थल होता है जहाँ बच्चों को सीखने के विविध अवसर मिलते हैं। माता पूरे घर की स्वामिनी होती है और बालक के वर्तमान तथा भविष्य की निर्मात्री भी। मनुष्य के चरित्र- निर्माण और व्यक्तितत्व- विकास की प्रक्रिया बाल्यावस्था से ही प्रारम्भ हो जाती है। संसार में, महापुरूषों से सम्बन्धित अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें माता की भूमिका सर्वोपरि रही है। अपनी माताओं के द्वारा दी गयी उचित शिक्षा- दीक्षा और संस्कारों के कारण अनेक व्यक्ति संसार के इतिहास में महापुरूष कहलाए और प्रसिद्धि को प्राप्त हुए। माता का जागरूक और शिक्षित होना इसलिए भी आवश्यक है, ताकि वह बच्चों में समुचित नैतिक संस्कार डाल सके। स्वस्थ विकास न होने के कारण बालक का पूरा जीवन प्रभावित होता है और जिस समाज में वह रहता है, उसमें सहयोग करना तो दूर, उसे भी दुर्बल बनाने का वह कारण बन जाता है। ...उसके सम्पूर्ण विकास की नींव माता के द्वारा ही पड़ती है और घर के वातावरण का बालक के विकास पर प्रभाव पड़ता है। प्रेमपूर्ण अनुशासित स्वस्थ वातावरण में पलकर बालक बाद में स्वस्थ व्यक्तित्व का स्वामी बनता है।'
इस प्रकार शिक्षा एवं व्यक्तित्व- विकास की प्रक्रिया घर से विद्यालय तक और विद्यालय से समाज तक होती है। इसमें घर सर्वाधिक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसका दायित्व गृहस्वामिनी या माता का होता है। आज के मशीनी माहौल में ममता का भी मशीनीकरण होने लगा है। इस ओर भी महिलाओं को अपनी भूमिका के प्रति सच्चा होना है।
रचनात्मक दिशा में भूमण्डलीकरण के बोध ने महिलाओं की शक्ति को उभारा है। हिंसा, अन्याय, शोषण, असमानता के खिलाफ महिला रचनाकारों ने अपनी आवाज उठायी है। महिलाओं की सशक्त भूमिका के लिए और उनको केन्द्रीय धारा में लाने के लिए महिला रचनाकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण पृठभूमि तैयार की है। मृदुला गर्ग, उषा प्रियंवदा, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोरा, ममता कालिया, कमल कपूर, मन्नू भण्डारी, मृणाल पाण्डेय आदि अनेक महिला रचनाकारों ने अपनी कहानियों और समीक्षा के माध्यम से नारी- अस्मिता एवं नारी- विमर्श पर प्रकाश डाला है।
साहित्य में नारी- लेखन नारी की अस्मिता और संघर्षों से जुड़ा है। महादेवी वर्मा ने नारी- जागृति की बात करते हुए स्पष्ट किया कि विकास- पथ पर अग्रसर होकर नारी पुरूष का साथ देकर उसकी यात्रा को सुगम बनाती रही है। कविता के क्षेत्र में सरोजनी नायडू, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, सुमित्रा कुमारी सिन्हा से लेकर अब तक हजारों कवयित्रियों ने काव्य की विविध विधाओं में अपनी पहचान बनायी है।
लोकतान्त्रिक दृष्टि से देखें तो हमारे देश में महिलाओं को पुरुषों के समान ही अधिकार मिले हैं, परन्तु राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत बहुत कम है। इसमें सन्देह नहीं कि राजनीति में बढ़ती हुई अभिरुचि और उनका पदार्पण देश के सामाजिक उत्थान का एक बड़ा और सकारात्मक संकेत है।
किसी राजनीतिक महिला का समाज से सीधा और बहुत समीप का नाता होता है। वह जनता की प्रतिनिधि बनकर समाज के पटल पर आती है, अत: जनता की विभिन्न समस्याओं का निराकरण करना- कराना उसका दायित्व बन जाता है। यह भी दायित्व बन जाता है कि वह जनता के दु:ख- कष्टों की तटस्थ दर्शक न होकर सच्ची साथी और सहयोगी बने। एक राजनीतिक महिला को सर्वप्रथम अपने व्यक्तित्व को प्रभावी बनाना होगा और अपनी छवि को जनता के बीच इस प्रकार प्रस्तुत करना होगा कि जनता उसे अपना हितैषी और सहयोगी समझे। साथ ही, ऐसे अनेक निर्णयात्मक पहलू हैं, जिन्हें वह धर्म-निरपेक्ष, जाति-निरपेक्ष होकर, मानवीय मूल्यों की पक्षधर होकर, लोकतान्त्रिक दृष्टि से सुलझाने में समर्थ हो सकती है। उसे अपनी दृष्टि विस्तृत कर, दिशा सुनिश्चित कर लेनी चाहिए। तभी वह राजनीतिक के साथ- साथ राजनीतिज्ञ भी बन सकती है। अभी भले ही आरक्षण उसका कवच हो, एक दिन आवश्य आयेगा, जब पंचायत स्तर पर या अन्य क्षेत्रों में उसे किसी आरक्षण की दरकार नहीं होगी और वह अपने कर्त्तव्य तथा अधिकारों के प्रति और अधिक जागरूक बन जायेगी।
अन्त में स्त्री- स्वतंत्रता या स्त्री- जागरण का यह अर्थ भी है कि उसे अन्याय, अत्याचार, अनैतिकता और शोषण का विरोध करना है। उचित, नैतिक, न्यायोचित विषय के लिए और श्रेयस्कर बातों के प्रति सहयोग और इनके विपरीत बातों के प्रति असहयोग भी करना है। इस प्रकार, अपने देश में महिलाओं की स्थिति, भूमिका और अधिकारों के लिए हम सबको मिल- जुलकर सार्थक प्रयास करना होगा जिससे देश में एक वैचारिक क्रान्ति आये और महिलाओं की सर्वांगीण उन्नति हो।
संपर्क: जी- 91, सी, संजय गान्धीपुरम, लखनऊ- 226016
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