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Jul 12, 2011

मेरे बचपन की शाम

- डॉ. राजीव श्रीवास्तव
अठखेलियां करती, खिलखिलाती,
कभी हँसाती, कभी रूलाती,
बहुत याद आती है,
मुझे मेरे बचपन की शाम।
शाम का इंतजार सुबह से ही रहता था,
क्योंकि दिन का सबसे हंसी पल होता था,
बार- बार घड़ी देखते,
और जैसे ही शाम होने का अंदेशा होता,
बाहर आते और दोस्तों को पुकारते।
एक ही पुकार में सभी जमा हो जाते,
मानो इसी का इंतजार हो,
और फिर शुरू हो जाती एक और शाम,
अपने और दोस्तों के नाम।
हमारे खेल बड़े अजीब थे,
याद आता है आम का वो पेड़,
जिस पर 'डोला-पाती' खेलते थे,
एक- डाल से दूसरी डाल पे जाते,
और पकडऩे वाले को खूब छकाते।
और वो 'गुल्ली- डंडा' का खेल,
किसी क्रिकेट से कम नहीं था,
वो डंडे का गुल्ली पर लगना,
और 'टक' की आवाज,
आज भी कानों में गूँजती है।
लूका- छुपी किसे याद नहीं
दूर- दूर भागते, और छिप जाते
फिर दबे पांव आते और
ढूँढऩे वाले की पीठ पर
जोर से मारते, ओए वो झल्ला जाता।
'पीट्ठू' क्या खेल था?,
वो पत्थरों का कीला बनाना,
जो गेंद से ढह जाता,
फिर शुरू होती जंग,
किला दुबारा बनाने की।
'कंचे' रंग बिरंगे गोल- गोल,
छोटे बड़े कई आकर के उंगली में दबा कर,
जोर से मारते, वो जा के सटीक लगता,
और कंचे हो गये अपने।
आज जब घर से बाहर देखता हूँ,
बच्चे ना जाने कौन- सा खेल खेलते हैं,
ज्यादातर बच्चे तो शाम को घर में ही रहते हंै,
क्योंकि उनका दोस्त उनके साथ ही रहता है,
अरे वो वीडियो- गेम्स, कंप्यूटर,
यही तो इनके दोस्त हैं।
इन नये अविष्कारों ने बच्चों से,
इनका बचपन छीन लिया है,
आज वैसी शाम नहीं आती,
आज वैसे खेल नहीं खेले जाते।
जब तक कपड़े गंदे ना हो,
जब तक पसीना झरने की तरह ना बहे,
तो वो खेल कैसा... वो शाम कैसी...
आज बहुत याद आती है,
मुझे मेरे बाचपन की शाम।

मेरे बारे में -

मैं पेशे से डॉक्टर हूं और लगभग 14 सालों से मेडिकल कॉलेज मैं काम कर रहा हूं। मैंने अब तक तीन पुस्तकें चिकित्सा से संबंधित लिखी हैं। मेरा एक उपन्यास प्रकाशित होने वाला है। मेरी कविताएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। कविताएं हमारे आसपास हो रही घटनाओं पर आधारित होती हैं। मेरी यही कोशिश रहती है कि कविता के माध्यम से लोगों को संदेश दे सकूं। पता- टाइप 4 के-5 मेडिकल कॉलेज कैंपस, रामपुर रोड हलद्वानी- नैनीताल।
मो. 09837068484, Email- rajivtanu2003@yahoo.co.in

अन्ना के नाम एक पत्र

- के. पी. सक्सेना 'दूसरे'
हम तो बस इतना ही कयास लगा पाये कि यह देश में व्याप्त भ्रष्टाचार नामक 'दानव' को खत्म कर देने वाला शायद वह 'तोता' है जिसमें दानव अपनी जान छुपाकर आम, निरीह और निर्दोष लोगों पर अत्याचार किया करता था। नानी तो ये भी बताती थीं कि राजकुमार को उस तोता तक पहुंचने में लोहे के चने चबाना पड़े थे तो अन्ना जी वो तो आपने चबाना शुरु ही कर दिया दिखता है।
श्रद्धेय अन्ना जी,
यह बधाई पत्र आपको देर से मिले तो बुरा मानने का नई। अब लिखना तो मैं उसी दिन चालू कर दिया था जिस दिन आपका 97वें वा घंटा होने के पूर्व सरकार ने आपकी बात सैद्धांतिक तौर पर मानकर नींबू पानी लेने को बोल दिया था- लेकिन करता क्या। जब भी लेटर पोस्ट करने को होता रास्ते में लोग क्या तो भी बता देते कि कुछ जोडऩा कुछ काटना पड़ जाता।
अब रैली में हमारे सीनियर सिटीजंस साथी, खासतौर से मेरे शहर के 'धरना स्थल' पर इसलिए गए थे कि वे भी पहचान तो लें अपने शहर की उन ईमानदार छुपी हुई छवियों को जो आपके समर्थन में धरने में बैठे थे क्योंकि अगर लोकपाल बिल आ गया तो कल को काम तो उन्हीं से कराना पड़ेगा। लेकिन अन्ना। आपने राजनीतिक पार्टियों को बहिष्कृत रख के ठीक नई किया। अब न तो मंच में बैठे लोगों को प्रैक्टिस थी भाषणबाजी की और न ही सामने खड़ी भीड़ से कोई साहस कर पा रहा था। और सामने वाले साहस करते भी कैसे। जनता, तो सिर्फ सुनने और ताली बजाने की अभ्यस्त थी। तो धरना स्थल उसी तरह नीरस होने लगा था, (आखिर लोग कब तक उन्हीं घिसे पिटे चेहरों को देखते रहते) जैसे बिना शीला की जवानी की रिकार्ड बजे- कोई उत्सव।
सभी किसी चमत्कार की आशा कर रहे थे ठीक उसी तरह जैसे कम्प्यूटर में बटन दबाते ही आपकी मनचाही साइट खुल जाती है। अब इतना तो प्राय: सभी समझने लगे थे कि ये जन लोकपाल बिल कुछ हट के है और कुछ कर गुजरेगा। लेकिन हम तो बस इतना ही कयास लगा पाये कि यह देश में व्याप्त भ्रष्टाचार नामक 'दानव' को खत्म कर देने वाला शायद वह 'तोता' है जिसमें दानव अपनी जान छुपाकर आम, निरीह और निर्दोष लोगों पर अत्याचार किया करता था। नानी तो ये भी बताती थीं कि राजकुमार को उस तोता तक पहुंचने में लोहे के चने चबाने पड़े थे तो अन्ना जी वो तो आपने चबाना शुरु ही कर दिया दिखता है।
मेरी बगल में खड़े एक बुजुर्ग, जिससे यह तसल्ली कर लेना चाहते थे कि अब कल- परसों तक उनकी उस पेंशन का निर्धारण तो हो जाएगा ना- जो टे्रजरी आफिस में दो साल से लंबित है, वो शख्स खुद अपना राशनकार्ड बनवाने के लिए तीसरी बार शपथपत्र और फोटो लिए फूड इंस्पेक्टर को तलाशता खड़ा था। मैं उनके पास से हट गया- मुझे भी घर के नल- कनेक्शन की याद आ गयी जो मुंसपल ऑफिस में इसलिए रूका पड़ा था कि अधिकारी और ठेकेदार के बीच लम्बी अनबन चल रही थी।
वहां से मैं अगले पंडाल की ओर बढ़ा जहां एक मजदूर टाइप का इंसान किसान टाइप के इंसान से पूछ रहा था -
'दाऊ, क्या सच्ची अब हमें सरकारी रेट से मजदूरी मिलेगी? मेरे बेटे को बड़े स्कूल में भर्ती कर लेंगे? राशन दुकान रोज खुलेंगी? तुम्हें बीज, खाद और पानी समय में मिलेगा? तुम अब तो घर के लोगों को अनाथ बनाने के लिए अपने चाचा की तरह पेड़ पर नहीं लटकोगे?'
इसके पहले कि अगला कुछ बोलता, एक बिना छाप (ब्रांड) के उभरते नेता जो अपनी उपस्थिति, बगैर यह परवाह किए कि आयोजन किस पार्टी का है और प्रयोजन क्या है, बोल उठे-
'अरे तुम लोग ये क्या छोटी- छोटी बातें करने लगे। यह राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन है इसमें मंत्री, प्रधानमंत्री, न्यायाधीश, उद्योगपति-कम नेता जैसी देश की महान हस्तियों का भविष्य दांव पर लगा है- और तुम्हें नून- तेल की पड़ी है।'
'तो फिर वो सरदार जी जिनके एक ही नंबर के दो ट्रक मिले हैं... वो मित्तल जी जिनके कारखाने में मिलावटी घी पकड़ा गया... वो शर्मा जी जिनकी गोदाम में आरपीएफ ने रेलवे माल जब्त किया और वो अग्रवाल जी जिनके लॉकर में बेहिसाब करेंसी नोट निकले, मंच के पास क्या कर रहे हैं।' एक नौजवान बोल उठा।
'अरे वो सब भ्रष्टाचार से त्रस्त है।' छुटभइया नेता बोला।
'कैसे?' सहसा मेरे मुंह से निकला।
'देखो वो जो ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के कर्ताधर्ता बैठे हैं उनका कहना है कि नाकों में बड़ा अनाप- शनाप पैसा वसूला जाता है। ड्रायवर पांच हजार खर्चा लेता है दिल्ली का, जबकि सरकारी पर्ची मुश्किल से डेढ़ दो हजार की कटती है। ये भ्रष्टाचार बंद होना चाहिए कि नहीं।'
'वो तो ठीक है लेकिन सुना है कि ये पासिंग से दुगुना तिगना माल भी तो भरते हैं।' एक जानकार ने अपना ज्ञान बघारा।
'तो क्या हुआ? उसका पैसा तो अलग से देते ही हैं। पर कुछ रेट तो होना चाहिए- एक दम मनमानी।' ये शायद कोई दु:खी ट्रांसपोर्टर था जिसकी पहुंच मंच तक नहीं हो पायी थी।
'रेट कैसे वाजिब हो... वहां की पोस्टिंग क्या बिना गांठ ढीली किए हो जाती है... बोली लगती है चेक पोस्ट की।' नेता ने झिड़का।
बातों की दिशा कुछ ज्यादा ही स्तरीय होती जा रही थी सो मैंने वहां से खिसक लेना ही उचित समझा। अगले दिन फिर जब पत्र रिराइट कर रहा था तो पता चला कि समिति बनाने में ही लोचा आ गया। कोई कहता है अध्यक्ष हमारा हो, कोई वंशवाद पर आपित्त कर रहा है, किसी को अल्प संख्यक तो किसी को दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व समानुपात में चाहिए। अब मेरी पत्नी भी महिला प्रतिनिधि की वकालत करने लगी। मैंने कहा किरण बेदी तो हैं। तो कहने लगी - 'वो महिलाओं की प्रतिनिधि नहीं, उपेक्षित शासकीय अधिकारियों/ कर्मचारियों की प्रतिनिधि हैं। हमारी तरफ से तो कोई ऐसी गृहणी ही होना चाहिए जिसे आटे- दाल का भाव मालूम हो।'
मैंने कहा संसद में तो तुम्हारी सुनता नहीं जहां इतनी दमदार महिलाएं बैठी हैं- अब यहां कौन तीस मार खां आ जाएगा? अभी समिति, संविधान सम्मत है कि नहीं इसी बात को लेकर कोई कोर्ट चला गया तो जो तारीख दी हुई है मानसून सत्र में बिल पारित होने की, कैसे निभ पाएगी?
लो। अभी टीवी चलाया तो यही खबर मिली की न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाने वाला है। चैनल वाला बस स्टैंड में खड़ा आम जनता के विचार पूछ रहा था। एक सज्जन जो ऑटो रिक्शा से उतरकर मीटर से भाड़ा लेने की जिद कर रहे थे ड्रायवर को लोकपाल बिल की धमकी देकर ज्योंही आगे बढ़े, एंकरर ने माइक्रोफोन उनके आगे करके पूछा- 'सर। इस जन लोकपाल बिल से क्या वाकई राम राज्य आने के संकेत मिल रहे हैं?'
'हां। अब हमें किसी भी काम के लिए निर्धारित दर से कम या अधिक पैसा नहीं लेना- देना पड़ेगा। इतने वर्षों से ये जो लोग नीचे से रूपया ले कर ऊपर जा बैठे हैं उनकी टेंट से सब ब्याज सहित वसूला जाएगा। और ये धन इतना अधिक होगा कि न केवल देश का कर्जा उतर जाएगा- सारी लंबित योजनाएं बिना किसी अड़चन या कर्ज के पूरी हो जाएंगी।' यह कोई आशावादी गांधी युग का शिक्षक या स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लगता था।
चैनल वाले ने अपने मतलब का उत्तर पाकर माइक्रोफोन एक खूबसूरत महिला की ओर बढ़ा दिया हालांकि ऑटो वाला ड्रायवर भी कुछ कहने को उतावला हो रहा था।
...तो अन्ना। यही सब कारण हैं कि पत्र अभी तक भेज नहीं पाया और शायद जल्दी भेज भी न पाऊं क्योंकि बाबा रामदेव जी वाला एपिसोड सीरियल के बीच विज्ञापन की तरह आ गया।
अब बाबा रामदेव के पास तो सबका बहीखाता रखा हुआ दिखता है। मुझे तो लगता है जरूरत होने पर डिपोजिटर भी उन्हीं से बैलेंस पूछता होगा क्योंकि वो खुद तो रिकार्ड में कुछ रख सकता नहीं। अब ये बात अलग है कि कुछ सिरफिरे बाबा से ही पूछना चाहते हैं कि बाबा 10 साल पहले तक जब आपके पास सायकल सुधरवाने के लिए पैसे नहीं हुआ करते थे अब इस अल्पकाल में विस्तारित सल्तनत का कुछ हिसाब किताब आपने भी रखा है कि नहीं। क्योंकि जनता तो जनता है। वो तो बस पीछे ही चलना जानती है उसके आगे कोई भी हो। और हां। नजर पैनी ही रखती है कि किसी आयोजन के पीछे प्रायोजक कौन है क्योंकि उसने आपके दरबार में भी सुदामा से अधिक भामाशाह पूजे जाते देखे हैं।
अरे... मैं कहां बाबाजी की तरफ बढ़ गया। अन्नाजी मैं तो बस इतना ही कहना चाहूं कि जब गांधीजी ने देश को आजादी दिलायी तो हमारी पीढ़ी का बचपन था। हम बिना कुछ जाने समझे हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को पूरे जोश से आजादी के गीत गाते हुए प्रभात फेरी करते थे और लड्डू खाते खुशी- खुशी घर चले आते थे। जब कुछ बड़े हुए... सुनने समझने की बुद्धि आई तो लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ है तभी श्रद्धेय जयप्रकाश जी आ गए- पर इस प्रक्रिया में 25 साल टूट गए। 74-75 में हमारी पीढ़ी पूर्ण युवा थी और पूरे जोश खरोश के साथ दूसरे गांधी के साथ यूं हो ली थी कि बस अब चमत्कार होने को है- किंतु सपना टूट गया। इस पर भी हम हारे या टूटे नहीं, हां निराश अवश्य हुए।
अब फिर 42 बरस से लंबित इस जन लोकपाल बिल को पास कराने की जो अलख आपने जगाई है तो अब भी हम आपके साथ हैं लेकिन पता नहीं ये लोग कब तक साथ दे, क्योंकि बैठक में जो कुछ आपके लोकपाल बिल को लेकर हुआ उससे डर ही लग रहा है। तो जो करना है जल्दी कर लें क्योंकि हम फिर 25 बरस इंतजार नहीं कर पाएंगे।
अत: हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि इस सवा अरब की आबादी वाले देश से निरपेक्ष घोटालेबाजों और निष्क्रिय सत्ताधीशों का सिंहासन हिलाने का जो बीड़ा आपने उठाया है वह शीघ्र पूरा हो - आमीन।

संपर्क: सांस्कृतिक भवन मार्ग, टाटीबंध, रायपुर 492099 (छ.ग.) मो. 9584025175

लघुकथाएँ

दुआ

वह दफ्तर में था। शहर में दंगा हो गया है, यह खबर ढाई बजे मिली। वह भागा और जिन्दगी में पहली बार शाम का अखबार खरीद लिया। दंगा उसी इलाके में हुआ था, जहाँ उसका घर था। यह जानते हुए भी कि उसके पास पैसे नहीं हैं, वह स्कूटर रिक्शा में बैठ गया। पिछली बार वह स्कूटर में कब बैठा था, उसे याद नहीं। वह हमेशा बस में सफर करता है।
दफ्तर पहुँचने में देर हो रही हो या कोई कितना भी जरूरी काम हो, न तो उसे उस बस की प्रतीक्षा से ऊब ही होती है और न लाइन तोडऩे में जिन्दगी का कोई आदर्श टूटता नजर आता है। यानी तब वह सोचता नहीं था और आज उसके पास सोचने की फुर्सत नहीं थी। वह घर पहुँचकर सबकी खैर- कुशल पाने को चिन्तित हो रहा था। बीवी तो घर पर ही होगी, लेकिन बच्चे स्कूल जाते हैं और इसी वक्त लौटते हैं। कहीं...वह सोचता जा रहा था।
स्कूटरवाले ने दंगाग्रस्त इलाके से कुछ इधर ही ब्रेक लगा दी, 'बस, इससे आगे नहीं जाऊँगा।'
'चलो, चलो यार, मैं जरा जल्दी में हूँ।'
'मुझे अपनी जान से कोई बैर नहीं है जी !' वह मीटर
देखकर बोला, 'पाँच रुपए सत्तर पैसे।'
'तुम्हें पैसों की पड़ी है और मेरी जान पर बनी हुई है।' वह जेब में हाथ डालकर बोला, 'सवारियों से बदतमीजी करते हो, तुम्हें शर्म आनी चाहिए...यह तो कोई तरीका नहीं।' वह गुस्साता हुआ उतरा और उतरते ही जेब में हाथ डाले- डाले, स्कूटरवाले की तरफ से आँख मूँदकर भागने लगा।
'ओए, तेरी तो...बे।' स्कूटरवाला कुछ देर तक उसके पीछे भागा, मगर उसे गोली की तरह दंगाग्रस्त इलाके में पहुँचता पाकर हाँफता हुआ खुद ही से बड़बड़ाने लगा, 'साला हिन्दू है तो मुसलमानों के हाथ लगे और मुसलमान है तो हिन्दुओं में जा फँसे!'
नींद

वे हो- हल्ला करते एक पुरानी हवेली में जा पहुँचे। हवेली के हाते में सभी घरों के दरवाजे बंद थे। सिर्फ एक कमरे का दरवाजा खुला था। सब दो- दो, तीन- तीन में बँटकर दरवाजे तोडऩे लगे और उनमें से दो जने उस खुले कमरे में घुस गए।
कमरे में एक ट्रांजिस्टर हौले- हौले बज रहा था और एक आदमी खाट पर सोया हुआ था।
'यह कौन है?' एक ने दूसरे से पूछा।
'मालूम नहीं,' दूसरा बोला, ''कभी दिखाई नहीं दिया मुहल्ले में।'
'कोई भी हो,' पहला ट्रांजिस्टर समेटता हुआ बोला, 'टीप दो गला!'
'अबे, कहीं अपनी जाति का न हो?'
'पूछ लेते हैं इसी से।' कहते- कहते उसने उसे जगा दिया।
'कौन हो तुम?'
वह आँखें मलता नींद में ही बोला, 'तुम कौन हो?'
'सवाल- जवाब मत करो। जल्दी बताओ वरना मारे जाओगे।'
'क्यों मारा जाऊँगा?'
'शहर में दंगा हो गया है।'
'क्यों.. कैसे?'
'मस्जिद में सूअर घुस आया।'
'तो नींद क्यों खराब करते हो भाई ! रात की पाली में कारखाने जाना है।' वह करवट लेकर फिर से सोता हुआ बोला, 'यहाँ क्या कर रहे हो?...जाकर सूअर को मारो न !'

लेखक के बारे में: 23 नवम्बर, 1950 जालन्धर (पंजाब) में जन्में स्वर्गीय श्री रमेश बतरा दीपशिखा, साहित्य निर्झर, सारिका, नवभारत टाइम्स और सन्डे मेल में सम्पादन से सम्बद्ध रहे। उन्होंने लघुकथा को सही दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। नंग- मनंग, पीढिय़ों का खून, फाटक उनके कहानी संग्रह है। फखर जमान के उपन्यास 'बन्दीवानÓ का अनुवाद किया। 15 मार्च,1999 को दिल्ली में उनका असामयिक निधन हो गया।

उपेक्षित जनकवि बिसंभर यादव 'मरहा'

- डॉ. परदेशीराम वर्मा
बिसंभर यादव मरहा जैसे योद्धा कवि का शरशैया पर लेटे रहना तथा निरुपाय एक- एक दिन गिनना हम सबको लज्जित करता है। समाज को मरहा जी जैसे कवियों ने खूब उल्लसित किया है। जीवन की संध्या में उनका उत्साह भी कम न हो यह जिम्मेदारी भी समाज की है।
जनकवि बिसंभर यादव 'मरहा' 83 वर्ष के हो गए। दो वर्ष पूर्व तक वे गांव- गांव की जन सभाओं, रामायण मेलों में सायकिल चलाकर जाते थे। बेहद गरीबी में पले बढ़े जनकवि बिसंभर यादव मरहा अनपढ़ हैं।
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जनों में वे सबसे लोकप्रिय कवि हैं। लेकिन विगत दो वर्षों से वे खाट पर हैं। गांव में टहल रहे थे कि एक बैल ने उन्हें उठाकर पटक दिया। मरहा जी यादव हैं उनके पुरखों ने बड़े से बड़े मरखंडा बैल को साधकर पोसवा बनाया। लेकिन दुखद संयोग रहा कि उन्हें एक बैल ने ही पटक दिया। जीवन भर समाज के अनुशासनहीन बैलों को कविता के सोंटे से पीट- पीट कर सीधा करते रहे। लेकिन दुर्घटना के बाद अब वे वस्त्र भी स्वयं नहीं पहन पाते। उनका बेरोजगार पुत्र उन्हें कपड़ा पहनाता है।
83 वर्षीय जनकवि अब साधनहीन हैं। पहले गांव- गांव जाकर कविता सुनाते थे तो कविता का पारिश्रमिक पा जाते थे। विगत बीस वर्ष उनके घर की गाड़ी काव्य मंचों से प्राप्त पारिश्रमिक से चली। बेटा सिंचाई विभाग में दिहाड़ी मजदूर था। शासन से गुहार लगाने के बावजूद अब घर बैठा दिया गया है।
अत्यंत गरीबी और साधनहीनता में जीवन भर संघर्ष करते हुए आगे ही आगे बढऩे वाले जनकवि बिसंभर यादव मरहा को शासन से प्रतिमाह 1500 रुपए की राशि साहित्यकार पेंशन के रूप में मिलती है। इलाज के लिए सहायता के बावजूद मरहा जी शैया सायी होकर रह गये। न केवल मरहा जी बल्कि बहुतेरे साहित्यकार जीवन की संध्या में कष्ट भोग रहे हैं। डॉ. विमलकुमार पाठक, डॉ. बलदेव लगातार शारीरिक कष्ट से उबरने के लिए संघर्षरत हैं। शासन की सदाशयता ने उन्हें संबल आवश्य प्रदान किया किन्तु 15 सौ रुपए की पेंशन बहुत कम है। सुझाव यह भी है कि राज्य शासन के मानदंडों के अनुसार जो साहित्यकार पेंशन की पात्रता रखते हैं उनका व्यापक सर्वे भी प्रतिवर्ष शासकीय स्तर पर होना चाहिए।
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा साहित्य के लिए दो लाख का एक ही पुरस्कार दिया जाता है। देश के अन्य प्रांतों में एक वर्ष में साहित्य के क्षेत्र में बीस पचीस छोटी बड़ी राशियों के सम्मान दिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी इश तरह के प्रयास किए जाएं। इससे बड़ी संख्या में साहित्यकार अपने लेखकीय श्रम के लिए सम्मान प्राप्त कर संतोष पा सकेंगे।
अभी- अभी नायडू स्मृति लाइफ टाइम सम्मान क्रिकेट के पुराने स्टार सलीम दुर्रानी को दिया जा रहा है। राशि भी पंद्रह लाख की है। साहित्य उस तरह लाभ का धंधा नहीं है जिस तरह खेल या फिल्म है। लेकिन साहित्य की अपनी महत्ता है। समाज में समरसता एवं एकता के लिए साहित्यकार जीवन भर चुपके- चुपके जो काम करता है, महसूस करने वाले ही उसकी महत्ता जान पाते हैं। इसीलिए बिसंभर यादव मरहा जैसे योद्धा कवि का शरशैया पर लेटे रहना तथा निरुपाय एक- एक दिन गिनना हम सबको लज्जित करता है। समाज को मरहा जी जैसे कवियों ने खूब उल्लसित किया है। जीवन की संध्या में उनका उत्साह भी कम न हो यह जिम्मेदारी भी समाज की है।
मरहा जी ने देशप्रेम की कविताओं का खूब सृजन किया। कुछ वर्ष पूर्व तक 'मरहा नाइट' का आयोजन भी होता था जिसमें यह अकेला कवि रात- रात भर कविता सुनाकर श्रोताओं को विभोर कर देता था।
छत्तीसगढ़ में भिन्न- भिन्न क्षेत्रों में समृद्धि के द्वीप हम देखते हैं। यह तेजी से विकसित हो रहा राज्य सबकी आंखों का तारा है। ऐसे में इस राज्य के साहित्यकार भी इसकी समृद्धि को महसूस करें, ऐसा प्रयास जरुरी हो जाता है। अभी तो स्थिति शंकर सक्सेना के इस दोहे सी है ...
'प्यासा का प्यासा रहा द्वीप नदी के बीच
सारी नदियां पी गया, सागर आंखें मींच।'
संपर्क: एलआईजी-18, आमदीनगर, हुडको, भिलाईनगर 490009, मो. 9827993494

आपके पत्र

सारगर्भित पत्रिका
उदंती के नए अंक में भूले- बिसरे कथाकार भुवनेश्वर की कहानी मास्टरनी पढऩे मिली। पाठकों के लिए यह उपलब्धि है। यह कथाकार का शताब्दी वर्ष है। कम लोग ही जान पाते हैं वे कहानीकार के अलावा महत्वपूर्ण कथाकार भी थे। हालांकि उन्होंने कम लिखा है। भाई परदेशीराम वर्मा ने उन्हें याद कर पुण्य का कार्य किया है। शेरों के साथ अशोक सिंघई का संस्मरण याद रह जाने लायक है। श्रमसाध्य कार्य में आपकी सफलता दिखलाई दे रही है। समकालीन सोच के सांचे मे ढली सारगर्भित पत्रिका आकर्षक है। बधाई।
- रवि श्रीवास्तव, भिलाई नगर
गहरा कटाक्ष
सुभाष नीरव जी की लघुकथा कबाड़ भीतर तक दहला जाती है तो दूसरी ओर धर्म- विधर्म में जीवन के दोहरे मानदण्डों पर गहरा कटाक्ष किया गया है ।
- रामेश्वर काम्बोज, दिल्ली
rdkamboj@gmail.com
कविताओं की खासियत
अरुण जी की कविताओं की खासियत है कि वो वहाँ से देखना शुरु करते हैं जहाँ कोई देखना ही नहीं चाहता और उस चीज की अहमियत इस तरीके से दर्शाते हैं कि पढऩे वाला उसी में डूब जाता है।
- वंदना गुप्ता, दिल्ली
rosered8flower@gmail.com
उनके बाल छू लेने की ख्वाहिश ...
रश्मि जी आपके बचपन की यादों के साये में गुजरा वह पल आज भी वही सजीवता लिये हुये है... पंत जी ने आपका नाम ही नहीं रखा बल्कि नाम के साथ- साथ सहजता और लेखन की विशेषता भी आपके नाम कर दी जिसे आपकी लेखनी आज सार्थक कर रही है। इस प्रस्तुति के लिये बधाई।
- सदा, रीवा (मध्यप्रदेश)
मुझे खुशी हुई है ...
रश्मि प्रभा का लेख 'उनके बाल छू लेने की ख्वाहिश ...' पढ़ते- पढ़ते मैं खुद को इर्शान्वित महसूस कर रहा हूँ ... आप कितनी खुशकिस्मत हैं कि आपको ऐसे महान व्यक्तित्व का छाँव मिला ... और खुशी भी है कि मुझे आपका छांव (आपके संस्मरण के जरिये ही सही) मिल रहा है।
कविता पर कुछ भी कहना धृष्टता होगी ... बस पढ़ रहा हूँ और सीखने की कोशिश कर रहा हूँ ...
- इंद्रनील भट्टाचार्य, उड़ीसा
रश्मि जी के लिए
आपका संस्मरण पढ़ कर मन प्रफुल्लित हो उठा नीचे की पंक्तियां आपके लिए ...
प्रभात की प्रभा, सितारों की आभा।
दीप्तिमान कर रही हर राह।
करूं शत शत नमन, हर पल यही चाह।
- मृदुला हर्षवर्धन, गोरेगांव, हरियाणा
आप दमक उठीं
पंतजी जैसे पारस ने आपको स्पर्श किया और आप दमक उठीं... आपने इतनी बड़ी हस्ती को करीब से देखा जाना...
- सोनल रसतोगी, गोरेगांव, हरियाणा
शानदार अंक
उदंती का यह अंक बहुत ही शानदार रहा.... खासकर बाघों को लेकर जो सार्थक लेख आपने शामिल किए हंै वे बहुत पसंद आए। सुभाष नीरव जी की लघु कथाएं, जहीर कुरैशी जी के $ग•ाल, नवनीत कुमार गुप्ता की पानी को लेकर चिंता.... और संपादक ने अनकही में सब कह दिया।
- लोकेन्द्र सिंह राजपूत, ग्वालियर
lokendra777@gmail.com
स्वच्छता की जरूरत
'हम सब हाथ धोकर पीछे पड़ें हैं!' लेख में जो बातें कहीं गई हैं वो बिल्कुल सत्य है लेकिन फिर भी बढ़ते प्रदूषण ने इतने सारे वाइरस रच दिए हैं कि उसके संसर्ग से बचना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए स्वच्छता की जरूरत आ पड़ी है। पहले जहां कभी दवा लेने की जरूरत नहीं पड़ती थी वहीं आज छोटे- छोटे बच्चे पेट की बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं और वह भी सिर्फ हाथ की गंदगी की वजह से। मैं मानती हूं कि स्वच्छता के बहाने आज एक नए व्यवसाय को फलने फूलने का अवसर दिया जा रहा है। लेकिन सफाई को सफाई तक ही रखना चाहिए उसको एक इशु नहीं बनाना चाहिए।
- रेखा श्रीवास्तव, कानपुर
rekhasriva@gmail.com