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Jan 29, 2011

ठाकुर जगमोहन सिंह

छत्तीसगढ़ की साहित्यिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करने वाले
ठाकुर जगमोहन सिंह
भारतेन्दु हरिशचंद्र के सहपाठी और मित्र, विजयराघवगढ़ के राजकुमार तथा सुप्रसिद्ध साहित्यकार ठाकुर जगमोहन सिंह के लिए छत्तीसगढ़ की धरती, पहाड़, जंगल और नदी- नाले वरदान साबित हुए। ब्रिटिश शासकों ने बनारस के वाड्र्स इंस्टीट्यूट से शिक्षा प्राप्त ठाकुर जगमोहनसिंह को सन 1880 में नायब तहसीलदार बनाकर छत्तीसगढ़ के धमतरी भेजा तब उनकी मंशा रही होगी कि छत्तीसगढ़ के जंगलों में वह मर खप जायेगा और अपने राज्य की ओर ध्यान नहीं दे सकेगा? मगर छत्तीसगढ़ प्रवास उनके लिए वरदान साबित हुआ।
ठाकुर साहब सन 1880 से 1882 तक धमतरी तथा 1887 तक शिवरीनारायण तहसील के तहसीलदार रहे। उन्हें यहां की सोंधी मिट्टी, नदी- नाले, जंगल और पहाड़ का प्राकृतिक सौंदर्य बहुत अच्छा लगा, उनकी रचनाएं इसकी साक्षी हंै। यहां उनका कवि मन न केवल जागा बल्कि उसे समेटने के लिए उन्हें कोरे कागजों को रंगना पड़ा। लगभग एक दर्जन पुस्तकों का न केवल लेखन बल्कि उसका प्रकाशन करके वे अमर हो गये।
उन्होंने शिवरीनारायण में बनारस के 'भारतेन्दु मंडल' की तर्ज में 'जगन्मोहन मंडल' बनाया और यहां के बिखरे साहित्यकारों को एकसूत्र में पिरोकर उन्हें लेखन की एक दिशा दी। उस काल के साहित्यकारों में पंडित मालिकराम भोगहा, पंडित हीराराम त्रिपाठी, गोविंद साव, महंत अर्जुनदास, महंत गौतमदास, शिवरीनारायण, पंडित अनंतराम पांडेय रायगढ़, पंडित मेदिनीप्रसाद पांडेय परसापाली-रायगढ़, वेदनाथ शर्मा बलौदा, पंडित पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय बालपुर, जगन्नाथ प्रसाद भानु, पृथ्वीपाल तिवारी बिलाईगढ़ के नाम उल्लेखनीय हैं।
ठाकुर जगमोहन सिंह हिन्दी के प्रसिद्ध प्रेमी कवियों रसखान, आलम, घनानंद, बोधा ठाकुर और भारतेन्दु हरिशचंद्र की परंपरा के अंतिम कवि थे, जिन्होंने प्रेममय जीवन जीया और जिनके साहित्य में प्रेम की उत्कृष्ट और स्वभाविक अभिव्यंजना हुई है। प्रेम को उन्होंने जीवन दर्शन के रूप में स्वीकार किया था। उपर्युक्त तथ्यों को ठाकुर जगमोहन सिंह की रचनाओं के संग्रह 'श्यामा' में संग्रहित और संपादित करने वाले प्रो. अश्विनी केशरवानी भी महानदी से संस्कारित पौध हैं। उन्होंने इस पुस्तक में ठाकुर साहब की शिवरीनारायण से संबंधित रचनाओं जैसे सज्जनाष्टक, प्रलय, श्यामा सरोजनी के साथ नवोढ़ादर्श और पं. रामलोचन त्रिपाठी का जीवन वृत्तांत को संग्रहित किया है। उनकी मंशा शिवरीनारायण के साथ पूरे छत्तीसगढ़ की साहित्यिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करना है। द्विवेदी कालीन अनेक साहित्यकारों ने भी उल्लेखनीय साहित्य की रचना की और राष्ट्रीय परिदृश्य में स्थान बनाया। ठाकुर जगमोहन सिंह ने शिवरीनारायण के आठ सज्जन व्यक्तियों के व्यक्तित्व का रेखांकन 'सज्जनाष्टकÓ में किया है जो सन 1884 में भारत जीवन प्रेस बनारस से प्रकाशित हुआ। उसकी एक बानगी-
रहत ग्राम एहि बिधि सबै सज्जन सवब गुन खान।
महानदी सेवहिं सकल जननी सब पय पान।।
प्रलय में 1885 में महानदी के बाढ़ और उससे होने वाली तबाही का सुंदर छंद में वर्णन है-
शिव के जटा विहारिनी बही सिहावा आय।
गिरि कंदर मंदर सबै टोरि फोरि जल जाय।।
राजिम, श्रीपुर से सुभग चम्पव उद्यान।
तीरथ शबरी विष्णु को तारत वही सुजान।।
सम्बलपुर चलि कटक लौ अटकी सरिता नाहि।
सरित अनेकन लय कटकपुरी पहुंच जल जाहि।।
हालांकि इस पुस्तक में ठाकुर साहब के बहुचर्चित उपन्यास 'श्यामा' को सम्मिलित नहीं किया गया है मगर उसके बारे में अवश्य लिखा गया है। उनकी कृतियां आज उपलब्ध नहीं हैं, मगर जो उपलब्ध हैं उसका संग्रह और प्रकाशन करना निश्चित रूप से सराहनीय कार्य है।
समीक्षक- प्रांजल कुमार, वेन, न्यू जर्सी, यू.एस.ए.
पुस्तक: श्यामा
रचनाकार: ठाकुर जगमोहनसिंह
संपादक: प्रो. अश्विनी केशरवानी
प्रकाशक: श्री प्रकाशन, दुर्ग छत्तीसगढ़
मूल्य: 200 रुपए

हाय मेरी प्याज

- राम किशन भँवर
प्याज जिनके यहां थोड़ी बहुत स्टॉक में थी, उनके कहने ही क्या। उनके दिन सुनहरे ही समझिये। मंडी का अपना विज्ञान है। भाव कब चढ़ेंगे और कित्ते दिन चढ़े रहेंगे ... यह उनका अपना गणित है।
क्या पता था कि प्याज के दिन ऐसे बहुरेंगे कि वह सौ फीसदी वी.आई.पी. हो जायेगा। प्याज खाना हैसियत वाले आदमी की पहचान बन गई है। 'क्यों भाई साब ... प्याज खा रहे हंै, वह भी सलाद में, क्या ठाठ हैं। सब्जी मंडी में प्याज के दुकानदार के चेहरें की रौनक के भी क्या कहने! अब वह पहले वाला दुकानदार नहीं है कि आप गये और बैठकर छांटने लगे प्याज। बात यही कोई एक हफ्ते पहले की है जब प्याज 50 रुपए किलो पर ठनठना रहा था। अपनी औकात और छुई- मुई शान के वास्ते आधा किलो प्याज ली, चलते वक्त रास्ते में एक प्याज गिर गई, मैंने गाड़ी रोककर उसे ऐसे सहेजते हुए उठाया, जैसे कोई गिन्नी गिर गयी हो। उन दिनों की वह खरीदी गई आधा किलो प्याज कितने दिन मेरे घर पर मुख्य अतिथि की तरह रही, इसकी गणना यह लिखते समय मेरे पास ठीक- ठीक उपलब्ध नहीं है।
अभी कल ही तो मंडी में 50 वाली 30 में छटी- बची प्याज पाने के लिए लोगों की ऐसी लम्बी लाईन थी कि टेलीविजन का चौखटा काफी छोटा पड़ गया। ... होटल में खाने की मेज पर यदाकदा सलाद की प्लेट में एक दो लच्छे दिख भर जाएं तो ऐसा लगता कि जैसे मैं आम आदमी से तुरंत खास बन गया। लोगों की नजरें चुराकर प्याज के दो छल्लों को कपोल कवलित करने के बजाएं पतलून की जेब में रख लेता हूं, घर पहुंचने पर उन छल्लों को बच्चों को दिखा कर कहता हूं कि देख लाले, यह है प्याज, हो गये न हम मोहल्लें में इने- गिने लोगों की हैसियत वाले ...। मेरा बच्चा छल्ला देखकर एक बार रोमांचित होकर बोल पड़ा था, हाय पापा, सुमित बहुत नक्शा मारता था, कि उसके पापा मार्केट से रोज प्याज लाते है। अब तो मैं भी कह सकता हूं... कि मेरे पापा दि ग्रेट...। मेरा मन अंदर से कह रहा था कि उससे कह दूं कि स्कूल के बैग में प्याज का छल्ला रख ले और फिर साथियों को दिखा कर वापस ले आना...। पर हाय मेरा मोह माया...। मन नहीं हो रहा था कि प्याज को अपने हाथ से एक पल के लिए दरकिनार करूं । प्याज तू न गई मेरे मन से... यही माकूल टाइटिल होता न, यदि दिनकर जी जिंदा होते...। दिगम्बरी भाई लोग जो तरह- तरह की रोक- टोक की बिना पर प्याज को नाकारा समझते थेे... वह भी प्याजगोशों को समझाने में लग गये है... अरे एक मुझे देखो प्याज खाते ही नहीं, प्याज न खाने वाले (महंगाई के कारण न खरीद पाने वाले) उनकी टोली में आ गये हंै।
आम आदमी के पसीने उस समय छूटने लगते हैं जब दुकानदार मुंहतोड़ जवाब फेंकता है, ओ बाबू साहेब... प्याज है प्याज, घुइयां नहीं। लेना हो तो लो, वरना आगे देखो... । प्याज जिनके यहां थोड़ी बहुत स्टॉक में थी, उनके कहने ही क्या। उनके दिन सुनहरे ही समझिये। मंडी का अपना विज्ञान है। भाव कब चढ़ेंगे और कित्ते दिन चढ़े रहेंगे... यह उनका अपना गणित है। मेरे एक परिचित आमदनी वाले विभाग में कार्यरत हंै, मैंने उनसे एक दिन कहा- भई कभी अपनी नजरें प्याजखोरों पर तिरछी कर लो । बोले -'क्या तिरछी नजरे करूं खाक, प्याज मिल रही है आगे से न सही पीछे से'।50 रुपए किलो वाली प्याज में से एक प्याज लेकर आप सुबह- सुबह सामने रखकर बैठ जाइए..., धीरे- धीरे पहले ऊपर का छिल्का उतारिये फिर आगे के छिलके उतारते चले जाइए। सावधान आप मन में सब्जी बनाने का इरादा न कीजियेगा। जो छिल्का उतार रहे हैं न, समझिये वही प्याज है। अब आप क्या पाते हंै कि प्याज है और है तो वह छिलकों में। बचा सिर्फ शून्य। यही शून्य परम् तत्व है। परम् विज्ञान है। भगवत प्राप्ति का संतसम्मत साधन। छिलकों की पर्त के संगठन का नाम प्याज है और उनके बिखराव में प्याज तिरोहित हो रही है। शून्य बच रहा है। जो दिख रहा है वो है नहीं... और जो नहीं है वो दिख रहा है। सरकार इस दिशा में किसी न किसी तरह से प्रयोग कर सकती है। एक अपील जारी कर सकती है। 'लीजिए एक प्याज और भोरहरे उठ बैठिए, प्याज साधना कीजिये... सारे मर्ज दूर। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी।'
जैसे एक सीढ़ी होती है, कोई चढ़ता है फिर उतरता है - यह एक सामान्य सा नियम है। चढ़ा है तो उतरेगा और उतरा है तो चढ़ेगा। यहीं है न। पर जरूरत की वस्तुओं के भाव मंडी में तो ऊंचान तक बड़ी देर तक रूके रहते है। चढ़ गये तो चढ़ गये, अब लखियों मनौती मनाओ... पर उतरेंगे नहीं। बस चढ़े हैं तो...। जैसे जरूरतों के बाजार में भाव मरखैना सांड़ हो गया हो...। और अपनी प्याज... चढ़ी जो चढ़ती चली गयी। पड़ोस वाले शर्माजी बोले कि येल्लो प्याज ने तो वाकई रूला दिया। अब कौन कहे कि प्याज तो वैसे ही रूलाती रहती है। मैंने सुन रखा था कि एक नन्हा सा देश था (कम आबादी वाला शायद ट्यूनीशिया), वहां पर कोयले के भाव बढ़ गये, कोयला खरीदने व न खरीदने में अमीर- गरीब का जैसे भेद पनपने लगा हो। उस देश के कुछ समझदार लोगों ने कोयले की ओर से मुंह मोड़ लिया। कोयला बाजार में होता था किन्तु इच्छाशक्ति के धनी लोग उसकी ओर देखते नहीं थे। ई मुई प्याज के साथ ऐसा हो जाता तो क्या अच्छा होता, सड़क पर पसरी रहती और लोग धत्त तेरे की कर देते।
कल के लिए कागज के पन्ने कोरे है सिर्फ यह लिखने के वास्ते बेटा वह भी समय था जब 50 रुपए किलो वाली प्याज तुम्हारें दादा जी बाजार से लाते थे। और 22 वीं सदी का लल्ला बोल उठेगा... हाऊ सच मम्मी... तब इत्ती सस्ती थी प्याज...।
लेखक अपने बारे में ....
लिखने की विधा में व्यंग्य ने मुझे अधिक आकर्षित किया। जब मैं नवीं कक्षा में पढ़ता था, यह शुरुआत थी। बाद में 'कहे कलमची' शीर्षक से एक अखबार में स्थायी स्तंभ लिखने लगा। इस स्तंभ में सौ से अधिक व्यंग्य लिखे होंगे। उस समय के कुछ व्यंग्य समाचार पत्रों में छपे भी। प्रकाशित कृतियां संपादन- काव्य निलय, आवास संदेश, आर्यवीर। पुस्तक- कृष्ण जैसा समझा वैसा पाया। नाटक- आखिर कब तक, मेहनत, नैतिक और ईमान, रहिमन पानी राखिए, आम आदमी दंगे।
पता: सूर्य सदन, सी-501/सी, इंदिरा नगर लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
मो. 09450003746, 09453046606
ईमेल ram_kishans@rediffmail.com

दुर्लभ काला तेन्दुआ

साधारण रंग के नर तेन्दुए के साथ काले रंग के मादा तेन्दुए का यह अत्यंत दुर्लभ चित्र टेलीफोटो लेन्स युक्त कैमरे से दक्षिण भारत के एक जंगल में लिया गया है। काले रंग के तेन्दुओं की अलग से नस्ल नहीं होती। ये भी पीले रंग के ऊपर काले धब्बों वाली नस्ल में ही मेलनिज़्म नामक जैविक विसंगति के कारण कभी कभार जन्म लेते हैं। तेन्दुआ अकेले जीवन- व्यतीत करने वाला प्राणी हैं। सिर्फ सहवास के लिए ही नर और मादा एक दो दिन के लिए साथ- साथ रहते हैं। मादा शिशुओं को अकेले ही पालती है। इस परिप्रेक्ष्य में काले तेन्दुए को जंगल में देख पाना दुर्लभ है और काले तेन्दुए को प्राकृतिक अवस्था में जोड़े में देख पाना तो अत्यधिक दुर्लभ अवसर है। वन्य प्राणियों के तस्करों से इन्हें सुरक्षित बनाए रखने के उद्देश्य से जंगल का नाम गुप्त रखा गया है।
अलका ने रचा इतिहास
असम के राजीव गांधी ओरंग नेशनल पार्क में अलका नाम की एक हथिनी ने जुड़वा बच्चो को जन्म दिया है। इतिहास में किसी हथिनी द्वारा जुड़वा बच्चे पैदा करने की यह अद्भुत घटना है। हाथी के ये दोनों जुड़वा बच्चे मादा हैं। अलका ने इससे पहले भी चार बच्चों को जन्म दिया है। इनमें से पांच साल की इनकी बहन अपनी दो नन्हीं बहनों को देख कर उन्हें छोड़कर जाने को तैयार नहीं थी, लेकिन मां को डर था कि नन्हें शिशुओं को कुछ नुकसान न पहुंचा दे, अत: वह उसे दूर हटाना चाहती थी। इन दोनों शिशुओं को बाघों का भी डर है इसलिए पार्क अधिकारियों ने इनकी सुरक्षा हेतु दो व्यक्ति नियुक्त किया है।

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एक टोकरी भर मिट्टी
हिन्दी की यह कहानी अद्भुत है। 1900 में छपी पहली मौलिक कहानी होने के बावजूद यह आज की कहानियों के बीच भी पूरे प्रभाव और प्रसंगिकता के साथ उपस्थित है । इस कहानी को मैंने पहली बार लगभग पचास वर्ष पूर्व चंदामामा में पढ़ा था। बाद में पहली कहानी को ले कर हुई बहसों के चलते सारिका आदि में। आपने इसका उपयुक्त चयन किया।
- जवाहर चौधरी, इंदौर,
jc.indore@gmail.com
छत्तीसगढ़ के रमरमिहा
शक्ति क्षीण करने और फूट डालने के कथन की पुष्टि शायद स्थानीय स्तर पर, रामनामियों द्वारा नहीं की जाती। वैसे बढिय़ा लेख।
-राहुल कुमार सिंह, रायपुर
rahulsinghcg@gmail.com
आशा है राजसी शादी बनी रहेगी
'सबसे महंगी शाही शादी' के कुछ वर्षों बाद सब से बड़ी सनसनी फैलाती विवाह विच्छेद के किस्से आजकल आम बात हो गई है। आशा है यह राजसी शादी बनी रहेगी उदंती का दिसंबर अंक पठनीय है, बधाई स्वीकारें॥
- सी एम प्रसाद
cmpershad@gmail.कॉम
हैं बहुत से देश, जिनमें रात होती ही नहीं
चाहकर भी सूर्य उन देशों में ढल पाए नहीं
बहुत ही सुंदर व शिक्षाप्रधान गजल पढ़वाने के लिए उदंती को धन्यवाद। जहीर कुरेशी जी की कलात्मक रचनाएं संबंधों के शिल्प से बुनी हुई हैं।
-देवी नागरानी, यूके
dnangrani@gmail.com
पर जिनका काम ही कम्प्यूटर हो?
उदंती के दिसंबर अंक में 'दो घंटे से ज्यादा कंप्यूटर खतरनाक हो सकता है।Ó यह जानकर राहत मिली कि यह बच्चों के लिए नुकसान देह है। हालांकि हम भी कहां इतना बैठ पाते हैं और जिनका काम ही कम्प्यूटर हो वे?
- डॉ. आर. रामकुमार,
rkramarya@gmail.com
गागर में सागर
नि:संदेह उदंती गागर में सागर भरने का काम कर रही है। आप एक छोटी सी पत्रिका में देश और दुनिया भर को समेट तो रही ही हैं साथ ही कालजयी रचनाओं को सामने लाने की महती भूमिका भी निभा रही हैं। हिन्दी की यादगार कहानियों का स्तंभ उन रचनाओं को फिर से पढऩे का सुख प्रदान कर रहा है जिनकी यादें कुछ धुंधली सी पड़ गई थीं। दंडकारण्य के एक संत कवि लाला जगदलपुरी से राजीव रंजन की बातचीत, अश्विनी केशरवानी का लिखा छत्तीसगढ़ के रमरमिहा तथा प्रताप सिंह राठौर का पत्र ब्रूस मिलसम की समुद्री यात्रा इस अंक की अन्य विशेष रचनाएं हैं। दिसंबर अंक में छत्तीसगढ़ की संस्कृति और साहित्य को जिस प्रमुखता और साज- सज्जा के साथ प्रस्तुत किया गया है वह काबिले तारीफ है। बधाई।
-जयवंत राही, सिहोर म.प्र.
jayraahi@gmail.com
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गर हाथों में जुम्बिश नहीं, आंखों में तो दम है। रहने दो सागरों- मीना मेरे आगे।। -गालिब
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रंग बिरंगी दुनिया

मुर्गों को पहनाया चश्मा
आपने इंसानों को चश्मा पहनते तो खूब देखा और सुना होगा, पर क्या कभी मुर्गों को चश्मा पहनते देखा या सुना है! यदि नहीं, तो हम आपको बता दें कि मुर्गे भी चश्मा पहनते हैं। अब आप कहेंगे कि भला मुर्गो को कौन चश्मा पहना सकता है, लेकिन चमत्कारों के देश चीन में कुछ भी संभव है।
जी हां ड्रैगन के देश चीन में मुर्गों को चश्मा पहनाया जाता है, ताकि वे आपस में लडऩा बंद कर दें। चीन के मुर्गी पालकों का कहना है कि ऐसा करने से मुर्गे वास्तव में आपस में लडऩा बंद कर देते हैं। दक्षिण- पश्चिम चीन के चेंगदू प्रांत में मुर्गों की आंखों पर चश्मे जैसी चीज पहना दी जाती है। वहां के एक मुर्गा पालक के मुताबिक, चीन में मुर्गे स्वभाव से बहुत लड़ाकू होते हैं। मुर्गे हमेशा एक- दूसरे पर हमला करते रहते हैं। ये कई बार गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। और जब उन्हें चश्मा पहना दिया जाता है तो वे चश्मे के कारण एक- दूसरे को ठीक से नहीं देख पाते, जिसके चलते इनमें लड़ाई की संभावना कम हो जाती है। चेंगदू प्रांत की देखा- देखी अब अन्य राज्यों के मुर्गी पालक भी अपने मुर्गों को लड़ाई से बचाने के लिए यह तरकीब अपना रहे हैं। वैसे मुर्गों को चश्मा पहनाने की परंपरा 1939 से चली आ रही है, लेकिन इन दिनों काफी लोकप्रिय हो गई है। इसे एंटीपिक्स कहा जाता है। ये चश्मे कम पारदर्शी और लाल रंग के होते हैं। इससे मुर्गों को खून नहीं नजर आता और उनका गुस्सा शांत रहता है। वैसे मुर्गों का गुस्सा शांत रखने की यह तरकीब है काफी रोचक।
71 किलो की अंगूठी
पाकिस्तान हमेशा आतंकवाद और विस्फोट की खबरों के लिए जाना जाता है। लेकिन आजकल वह एक रोचक खबर के लिए जाना जा रहा है। आप सोच रहे होंगे कि ऐसी क्या बात हो गई। दरअसल बात यह है कि पाकिस्तान में चांदी की एक अंगूठी बनाई गई है जिसका वजन 71.68 किलोग्राम है। इस अंगूठी को 10 कारीगरों ने 70 से ज्यादा दिन की मेहनत के बाद बनाया। इस विशाल और अनोखी अंगूठी को गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड्स में शामिल किया गया है।
लाहौर के पुराना शहर इलाके के रहने वाले मोहम्मद अमीन सलीम कहते हैं कि इस अंगूठी का भीतरी व्यास 85 सेंटीमीटर है। इसका निर्माण 97.83 प्रतिशत शुद्ध चांदी से किया गया है। सलीम कहते हैं, 'मैंने पहले भी 74.6 किलो की अंगूठी बनाई थी, लेकिन उसे गिनीज बुक में शामिल नहीं किया गया था। तब मैंने एक और अंगूठी बनाने का फैसला किया और मैंने गिनीज से सही विशिष्टताओं की जानकारी ली, ताकि इस बार मेरी अंगूठी बुक में शामिल की जा सके।'
अब, इसकी कीमत पर गौर फरमाइए। जरा सोचिये भारत में एक किलो चांदी कि कीमत यदि 45,195 रुपया है, तो इसकी कुल कीमत क्या होगी। इस चांदी की अंगूठी की कीमत लगभग 32,08,845 रुपए है।
चोरी के तरीके सिखाने वाली पुस्तक
जापान में एक चोर हाजिमे करासूयामा ने चोरी के तरीके सिखाने वाली एक पुस्तक लिखी है। पुस्तक का नाम है 'पेशा, चोरी, सालाना आमदनी 30 लाख येन'। इस पुस्तक की बिक्री ने धूम मचा रखी है। इसकी 10,000 प्रतियां 10 दिन में बिक गई हैं। लेखक ने पुस्तक में ताले बंद मकानों में घुसने के तरीके सिखाते हुए चोरी के बाद बिना सबूत छोड़े चोरी के माल के साथ सुरक्षित निकल जाने के अनेक तरीके सिखाए हैं। लेखक ने आगाह किया है कि वे अपने चोरी करने के कौशल की कापीराइट करवाएंगे।