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Dec 25, 2010

एक होटल जिसकी सजावट में हर साल खर्च होता है

पांच किलो सोना !
अबू धाबी के मशहूर होटल 'एमीरेट पैलेस' में हर साल पांच किलो सोना सजावट पर खर्च होता है। अब जरा सोचिए जब सजावट पर इतना खर्च तो होटल कितने में बना होगा? जी हां यह होटल तीन अरब डॉलर की लागत से तैयार हुआ है। इस होटल में कुल 1,002 झाड़ फानुस लगे हैं, जिसमें से एक सबसे भारी ढाई टन का है। होटल की वेबसाइट के मुताबिक यह होटल 100 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है।
इस होटल के साथ 1.3 किलोमीटर का समुद्री किनारा लगा हुआ है। जो इसकी खूबसूरती को और भी बढ़ाता है। इसमें 394 कमरे हैं, जिसका आकार 55 वर्ग मीटर से 680 वर्ग मीटर तक है। यही नहीं, इसके खुले सभागार में एक साथ 20,000 लोग बैठ सकते हैं। इस होटल में 49 देशों के 1,800 कर्मचारी काम करते हैं। होटल के बाग में 800 पेड़ हैं तथा पार्किंग में 800 कार खड़ी करने की जगह है। जाहिर है यहां ठहरने का किराया भी जबरदस्त होगा। आपने सही सोचा इसके एक खास कमरे का किराया 10 लाख डॉलर है, जिसे मेहमानों की जरूरतों के मुताबिक तैयार किया जाता है।
वाह भई वाह
गोरखनाथ- मेरे पास 20 हजार रुपये थे! मैंने सोचा कुत्ता रखे बिना इतना पैसे घर में नहीं रखना चाहिए।
बहादुर- फिर आपने क्या किया?
गोरखनाथ- क्या करना था 20 हजार का कुत्ता खरीद लिया।
***
मनसुख लाल अपने दो दोस्तों के साथ बाइक पर जा रहा था। सामने से पुलिस आती दिखाई दी तो मनसुख ने तुरंत गाड़ी खड़ी कर दी और दोनों दोस्तों को नीचे उतार खड़ा हो गया।
पुलिस ने बाइक पर डंडा मारते हुए रौब झाड़ा तुम्हें पता नहीं है क्या, तीन लोगों की सवारी पर फाइन लगता है।
मनसुख लाल ने छुटते ही जवाब दिया पता है सर, इसीलिए तो एक को वापस छोडऩे जा रहे हैं।

कश्मीर: अब बोलने का नहीं करने का समय आ गया है

- हुमरा कुरैशी
कश्मीर को लम्बे समय से कभी न खत्म होने वाले हिंसा चक्र के निशाने पर रखा गया है। हाल ही में सुरक्षा बलों द्वारा एक युवा प्रदर्शनकारी की मृत्यु पर जनता द्वारा सड़कों पर रोष का परिदृश्य इस लम्बे और दर्दनाक इतिहास में एक और घटना भर है, जहां कश्मीर और शेष देश के बीच का अंतर और बढ़ता जा रहा है। संघर्ष, अविश्वास और दुख के ऐसे परिदृश्य में चार महिलाएं जो अपने अलग- अलग तरीकों से क्षेत्र में कुछ बदलाव के लिए काम कर रही हैं, ने बदलाव लाने के लिए गैर हिंसात्मक तरीकों के बारे में आवाज बुलंद की है।
पिछले साल, जब दिल्ली स्थित शिक्षाविद् उमा चक्रवर्ती ने महिला समाजकर्मियों, वकीलों और एक महिला संपादक के छोटे से समूह के साथ कश्मीर की यात्रा की तो उसे स्थानीय तौर पर काफी हैरानगी हुई। वे वहां औसत सैलानियों की तरह सैर सपाटे के लिए नहीं गई थीं। वे सोफिअन, जहां कथित रूप से दो युवा महिलाओं का बलात्कार और कत्ल हुआ था, खुद अपने लिए उसके वास्तविक तथ्यों को समझना चाहती थीं। उसके बाद के महीने में समूह ने सोफिअन दुखद घटना पर संपूर्ण रिपोर्ट निकाली, जो वहां की घटनाओं पर आधिकारिक रिपार्ट से काफी विवादित थी और स्थानीय पुलिस और सीबीआई को, जानबूझ कर तथ्यों की तोड़- मरोड़ करने के लिए जिम्मेदार बताती थी। जम्मू स्थित अखबार की संपादक अनुराधा भसीन जामवाल जो उस दल का हिस्सा थीं कहती हैं, 'सोफिअन केस दर्शाता है कि यदि आरोपी कोई वर्दी वाला होगा तो सुरक्षा बल और राज्य उसे बचाने के लिए किस हद तक जा सकते हैं। दुख की बात है, न्याय के लिए एक पूरी तरह अराजनीतिक और शांतिपूर्ण अभियान के बावजूद, सरकार सोफिअन लोगों को अभी भी इससे वंचित कर रही है और सार्वजनिक रोष में घी डाल रही है।'
चक्रवर्ती इस मुद्दे पर सरकार के रवैये से काफी नाराज हैं। 'सीबीआई ने इस मुद्दे पर जिस तरह से काम किया वो हमारे लिए सबसे बड़ा धक्का था। घाटी के लोग इस 'लीपापोती' को कैसे स्वीकार कर सकते हैं? आज सड़कों पर रोष दिखाने का एक कारण यह व्यापक धोखेबाजी की भावना है।' ब्रिटिश लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता जस्टिन हार्डी, जो कश्मीर में स्वास्थ्य और काउंसलिंग सेंटर भी चलाती हैं मानती हैं कि बाहर के जो लोग कश्मीर के साथ संबंध बनाना चाहते हैं उन्हें स्थिति को समझने की जरूरत है। वे कहती हैं, 'बाहर के लोगों को कश्मीर से हमेशा ही प्यार होता रहा है। अपनी ओर से कश्मीरी सदियों से अतिथियों और आक्रमणकारियों का अनंत रूप स्वागत करते रहे हैं। यह उनके स्वाभाव का हिस्सा है। लेकिन पिछले 20 सालों से उनकी परिस्थिति के बाहर आराम से बैठे लोगों द्वारा उन्हें अपनी समस्याएं सुलझाने के लिए काफी बोला जा चुका है। अब 'बोलने' का नहीं 'करने' का समय आ गया है।' हार्डी अपने आप को कश्मीर के जादू से प्रभावित हुए उन बाहरी लोगों में देखती हैं जो बार- बार उस स्थान पर लौटती हैं जिसे उन्होंने तब से जाना है जब वे छोटी लड़की थीं। वे कहती हैं, 'जब मैं बड़ी हुई, मैंने वहां से पत्रकार के तौर पर रिपोर्टिंग की और फिर कश्मीरियों के साथ काम करना शुरू किया। इसने मुझे इंसानी स्थितियों के बारे में मेरी जिंदगी में किसी भी और चीज से कहीं अधिक सिखाया है।'
अनहद एक एनजीओ की संस्थापक सदस्य शबनम हाश्मी भी कश्मीर में लोकतंत्र, न्याय और शांति के मुद्दों पर काम करती हैं, वे मानती हैं कि समय आ गया है कि सरकार केवल बातें न बनाए 'क्या नि:शस्त्र, अहिंसात्मक नागरिकों से बातचीत करने का क्रूर बलप्रयोग के अलावा कोई और रास्ता नहीं है? और, वैसे भी इस नागरिक अशांति का मूल कारण क्या है? केंद्रीय और राज्य सरकारों द्वारा मानव अधिकार उल्लंघनों के प्रति शून्य सहनशीलता का बार- बार आश्वासन देने के बावजूद, सच अभी भी यही है कि जो घृणित और सकल हिंसाओं के लिए जिम्मेदार हैं उन्हें सजा देने के लिए शायद ही कुछ किया गया है। लोगों के बिखरे विश्वास को वापस लाने के लिए केवल बातें बनाना काफी नहीं है।' तो आगे बढऩे का रास्ता है क्या? हाश्मी का मानना है कि जरूरी है केंद्र और राज्य प्राधिकरण इस क्रूर हिंसा के लिए जो जिम्मेदार हैं उनके खिलाफ सख्त और दर्शनीय कार्यवाही करें। वे कहती हैं, 'किसी भी तरह की देर लोगों के आक्रोश और अलगाव को केवल बढ़ाएगी और घाटी में शांति प्रक्रिया को ठीक न हो सकने वाला नुकसान पहुंचाएगी।' हार्डी साफ कहती हैं, 'कश्मीर की स्थिति के लिए काफी सफाईयां दी जा चुकी हैं। एक बात जिसके बारे में ज्यादा लिखा या बोला नहीं गया है, वह यह कि हिंसा से केवल और अधिक हिंसा पैदा होती है। जब तक संयम, प्रदर्शन नियंत्रण, प्रतिविद्रोहता और विद्रोह के उन्ही तरीकों का प्रयोग जारी रहेगा बदलाव असंभव है।
एक पूरी पीढ़ी इसी धधक और वास्तविक हिंसा की निरंतर अवस्था से पैदा हुई है। अगर घाटी से कभी बाहर न जाने वाले युवाओं के लिए इकलौती वास्तविकता का उदाहरण यही है, तो वे स्वयं इससे हट कर अलग कुछ क्यों करेंगें?' हाश्मी कहती हैं कि बंदूक की नोक पर लोगों को जीता या दबाया नहीं जा सकता। वे कहती हैं, 'जम्मू और कश्मीर के लोग निश्चित रूप से भारतीय राज्य से अधिक तर्कसंगत, मानवीय, दूरदर्शी और संवेदनशील प्रतिक्रिया के हकदार हैं। शुरुआत के लिए भारत सरकार के प्रतिनिधियों को घाटी में आना आम लोगों से बात करना, सुुनना कि वो क्या कहना चाहते हैं जमीन पर वास्तविक तथ्यों को जानना शुरू करना चाहिए।'
ऐसा पहले भी किया जा चुका है और महिलाओं द्वारा ही। चक्रवर्ती इंगित करती हैं कि बहुत पहले 1950 में महान स्वतंत्रता सेनानी और समाजकर्मी मृदुला साराभाई, नृत्यांगना मल्लिका साराभाई की दादी थीं जिन्होंने आम कश्मीरी के मुद्दे को उठाया। चक्रवर्ती कहती हैं 'वो पहली गैर कश्मीरी भारतीय महिला थीं जिन्होंने शेख अब्दुल्ला जिन्हें उस समय कारावास दिया गया था के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लडऩे की हिम्मत की। उन्होंने इतने जोरदार तरीके से विरोध किया कि स्वयं उन्हें उस समय की स्थापित सत्ता द्वारा 14 वर्षों के लिए घर में नजरबंद कर दिया गया।' और हाल में 1990 में जब कश्मीर जल रहा था और सारी घाटी में हिंसा फैली हुई थी, तीन पूर्णत: महिला तथ्य- खोजी समूहों ने मुश्किल क्षेत्रों की यात्रा की। बल्कि 2001 में चक्रवर्ती स्वयं ऐसे एक समूह का हिस्सा थीं, जिसने देश को आम माता- पिता की यातना से सावधान करने में सहायता की जिनके जवान लड़के 'गायब' हो गए थे जिनमें से कईयों को सुरक्षा बलों द्वारा कथित लड़ाई के लिए पकड़ लिया गया था।
जामवाल के अनुसार, 'आज का गुस्सा मानव अधिकार दुव्र्यवहार और कश्मीर के दर्जे पर बुनियादी राजनीतिक विवाद से भरे कई सदियों के इतिहास से पैदा होता है। थोड़ा सा उकसाने से व्यापक विरोध, पत्थर फेंकना और हाथों से मारपीट शुरू हो जाती है।' उन्हें लगता है कि मुख्यधारा की राष्ट्रीय मीडिया ने राय पर नियंत्रण और केंद्र तथा राज्य सरकारों की खराब छवि को छिपा कर, कश्मीरियों और बाकी देश के बीच परिप्रेक्ष्य के अंतर को बढ़ाने में योगदान दिया है। वे कहती हैं, 'इस प्रक्रिया में जमीन की वास्तविकता खो गई और श्रोताओं तथा दर्शकों को एकतरफा गलत सूचना वाली तस्वीर मिलती है।' जामवाल का मानना है कि संघर्ष को खत्म करने का एक ही तरीका है, वह है दो स्तरीय रणनीति अपनाना। एक स्तर पर, राज्य आर्थिक पैकेजों की घोषणा, जो भ्रष्टाचार में खो जाते हैं करने की बजाय राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत करें। दूसरे छोर पर गंभीरता से वर्दी में मानव अधिकारों का उल्लंघन करने वाले दोषियों को उचित, पारदर्शी और संस्थागत प्रक्रिया के माध्यम से सजा दें।
चक्रवर्ती सहमत हैं कि पहला काम कश्मीर के लोगों तक पहुंचना और उन्हें न्याय देना है। 'मुझे याद है, 2001 में मैं घाटी में कुछ कश्मीरी महिलाओं से बातचीत कर रही थी। मैंने उनसे पूछा कि उन्हें क्या लगता है कि स्थिति कब बेहतर होगी। एक महिला ने तुरंत जवाब दिया, 'जब तुम लोग हालात बदलोगे...'।
उसका मतलब था कि जब सारा देश खड़ा होगा और मांग करेगा कि कश्मीरियों को न्याय मिलना चाहिए, संघर्ष केवल तभी खत्म होगा'। (विमेन्स फीचर सर्विस)

ब्रिटिश राजघराने में

सबसे महंगी शाही शादी
दुनिया की सबसे महंगी शाही शादी की तारीख तय हो गई है, प्रिंस विलियम और केट मिडिलटन की शादी 29 अप्रैल 2011 को वेस्टमिंस्टर ऐबी चर्च में होगी। शाही शादी में ब्रिटिश राजघराना आम लोगों को शामिल नहीं करता बल्कि उनके लिए स्ट्रीट पार्टी का आयोजन किया जाता है लेकिन प्रिंस विलियम अपनी इस खुशी में आम लोगों को भी शरीक करना चाहते हंै इसके लिए सौ लोगों को ड्रा के जरिए चुना जाएगा। लेकिन फिलहाल ये खुलासा नहीं हुआ है कि यह ड्रा कब और कैसे निकाला जायेगा।
28 वर्षीय विलियम प्रिंस चाल्र्स के बड़े बेटे हैं और पिता के बाद राजगद्दी पर बैठने का दूसरा नंबर उन्हीं का है। प्रिंस चाल्र्स और राजकुमारी डायना के बेटे विलियम की होने वाली जीवनसाथी मिडिलटन भी 28 वर्ष की हैं। विलियम और केट की मुलाकात 2001 में स्कॉटलैंड की सेंट एंड्रयू यूनिवर्सिटी में हुई जहां से दोनों ने कला इतिहास की पढ़ाई की है।
अक्टूबर में प्रिंस विलियम और मिडिलटन की केन्या में सगाई हुई जहां वे छुट्टियां मनाने गए थे। केट मिडिलटन ने सगाई में वही अंगूठी पहनी हुई थी जो कभी प्रिंसेस ऑफ वेल्स, अर्थात विलियम की मां मरहूम प्रिंसेस डायना ने पहनी थी। प्रिंस विलियम ने इसकी महत्ता बताते हुए कहा कि जाहिर तौर पर यह अंगूठी मेरे लिए खास है, जैसे अब केट मेरे लिए खास है। इसीलिए मैंने सोचा इन दोनों को एक साथ रखा जाए। ताकि मेरी मां मेरे इस विशेष दिन के उत्साह और इस खुशी से वंचित न रहे और उसे पता चले कि आने वाली जिंदगी हम साथ गुजारने वाले हैं।
वेस्टमिंस्टर ऐबी जहां यह शाही शादी होने वाली है लगभग एक हजार साल पुराना एक ऐतिहासिक चर्च है जहां महारानी एलिजाबेथ और महारानी विक्टोरिया की शादियां हुई थीं। इसी चर्च में 1997 में लेडी डायना के लिए अंतिम प्रार्थना सभा भी आयोजित की गई थी। प्रिंस विलियम ने कहा है कि 'चर्च की शानदार खूबसूरती और उसके एक हजार साल के इतिहास को देखते हुए हमने वहीं शादी करने का फैसला किया गया है।'
इस शाही शादी से ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को भी नई जान मिलेगी और वहां की अर्थव्यवस्था में एक अरब पौंड का इजाफा होगा ऐसी उम्मीद जताई जा रही है। जाहिर है दुनिया भर से लोग इस शादी में शिरकत करने इंग्लैंड पहुंचेंगे जिससे मंदी से जूझ रहे ब्रिटिश टूरिज्म उद्योग को भी टॉनिक मिलेगा।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन भी इस अवसर को लेकर काफी उत्साहित हैं वे कहते हैं कि 'यह ब्रिटेन के लिए बहुत बड़ा और खुशी का मौका है' यही वजह है कि 29 अप्रैल 2011 को देश भर में सरकारी छुट्टी की घोषणा की गई है ताकि पूरा देश इस आयोजन से जुड़ सके। जाहिर है इससे ब्रिटिश उद्योग को फायदा मिलेगा, यानी शादी के बहाने व्यापार। शाही रीति- रिवाज के मुताबिक होने वाली इस शादी का खर्च दोनों परिवार उठाएंगे लेकिन सुरक्षा और परिवहन पर होने वाला खर्च सरकार के खजाने से जाएगा।

दो ग़ज़लें


-   ज़हीर  कुरैशी
1
नए रास्ते भी मिले एक दिन,
जो खिलते नहीं थे, खिले एक दिन।
पिघलने में हिम को लगे दस बरस,
हुए खत्म शिकवे- गिले एक दिन।
जो रहते थे अपने वचन पर अटल,
वचन से वो अपने हिले एक दिन।
घटा था वो सब उनकी बेटी के साथ,
अधर इसलिए भी सिले एक दिन।
बिना नींव के थे सो गिर भी गये,
बनाये थे हमने किले एक दिन।
जहां भी मरुस्थल में पानी दिखा,
वहीं रूक गये काफिले एक दिन।
जो मेरे ही यत्नों से गतिमान थे,
हुए खत्म वो सिलसिले एक दिन।

2
अपनी भागम- भाग दिनचर्या बदल पाए नहीं,
लोग शहरों में बहुत निश्चिन्त चल पाए नहीं।
उन बहुत गहरे अंधेरों में जले थे रात भर,
नफरतों की आंधियों में दीप जल पाए नहीं।
अपने निश्चित लक्ष्य से पहले भटक जाते हैं तीर,
तीर दिल को चीर कर आगे निकल पाए नहीं।
जब भी हम अनजान रस्ते पर चले तो गिर गए।
हम अचानक ठोकरें खा कर सम्हल पाए नहीं।
उसको देखा तो उन्हें याद आई अपनी लाडली,
वे कली को, इस वजह से भी, मसल पाए नहीं।
भाव तो बाजार में दिन भर उछलते ही रहे,
हम उछलना चाहते तो थे, उछल पाए नहीं।
हैं बहुत से देश, जिनमें रात होती ही नहीं,
चाहकर भी, सूर्य उन देशों में ढल पाए नहीं।
***
जहीर कुरेशी के लेखन की मूल विधा हिन्दी गजल है। वे 1965 से लगातार लिख रहे हैं। अब तक उनके छह गजल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी गजलें विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भी शामिल की गईं हैं।
पता- समीर कॉटेज, बी-21, सूर्य नगर,
शब्द- प्रताप आश्रम के पास, ग्वालियर-474012 (मप्र)
मोबाइल- 09425790565

एक टोकरी भर मिट्टी

एक टोकरी भर मिट्टी
- माधवराव सप्रे

'जब से यह झोपड़ी छूटी है तब से मेरी पोती ने खाना- पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत समझाया पर वह एक नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चल, वहीं रोटी खाऊंगी। अब मैंने यह सोचा है कि इस झोपड़ी में से एक टोकरी भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊंगी। इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। महाराज, कृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले जाऊं।'
किसी श्रीमान जमींदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोपड़ी थी। जमींदार साहब को अपने महल का हाता उस झोपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई। विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोपड़ी हटा ले। पर वह तो कई जमाने से वहीं बसी थी।
उसका प्रिय पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोपड़ी में मर गया था। पतोहू भी एक पांच बरस की कन्या को छोड़कर चल बसी थी। अब यही उसकी पोती इस वृद्धकाल में एकमात्र आधार थी। जब कभी उसे अपनी पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दु:ख के फूट- फूट कर रोने लगती थी। और जबसे उसने अपने श्रीमान पड़ोसी की इच्छा का हाल सुना, तब से वह मृतप्राय हो गई थी।
उस झोपड़ी में उसका मन ऐसा लग गया था कि बिना मरे वहां से वह निकलना ही नहीं चाहती थी। श्रीमान के सब प्रयत्न निष्फल हुए। तब वे अपनी जमींदारी चाल चलने लगे। बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरम कर उन्होंने अदालत में उस झोपड़ी पर अपना कब्जा कर लिया और विधवा को वहां से निकाल दिया। बेचारी अनाथ तो थी ही, पास- पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी।
एक दिन श्रीमान उस झोपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बतला रहे थे कि इतने में वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहां पहुंची। श्रीमान ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे यहां से हटा दो। पर वह गिड़गिड़ाकर बोली, 'महाराज, अब तो यह झोपड़ी तुम्हारी ही हो गई है। मैं उसे लेने नहीं आई हूं। महाराज क्षमा करें तो एक बिनती है।'
जमींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा, 'जब से यह झोपड़ी छूटी है तब से मेरी पोती ने खाना- पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत समझाया पर वह एक नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चल, वहीं रोटी खाऊंगी। अब मैंने यह सोचा है कि इस झोपड़ी में से एक टोकरी भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊंगी। इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। महाराज, कृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले जाऊं।' श्रीमान ने आज्ञा दे दी।
विधवा झोपड़ी के भीतर गई। वहां जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आंखों से आंसू की धारा बहने लगी। अपने आन्तरिक दु:ख को किसी तरह सम्हालकर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठा कर बाहर ले आई। फिर हाथ जोड़कर श्रीमान से प्रार्थना करने लगी, 'महाराज, कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगाइये जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूं।'
जमींदार साहब पहले तो बहुत नाराज हुए, पर जब वह बार- बार हाथ जोडऩे लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके भी मन में कुछ दया आ गई। किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वयं टोकरी उठाने आगे बढ़े। ज्योंही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्यों ही देखा कि यह काम उनकी शक्ति के बाहर है। फिर तो उन्होंने अपनी सब ताकत लगाकर टोकरी को उठाना चाहा, पर जिस स्थान पर टोकरी रखी थी वहां से वह एक हाथ- भर भी ऊंची न हुई। तब लज्जित होकर कहने लगे, 'नहीं यह टोकरी हमसे न उठाई जाएगी।'
यह सुनकर विधवा ने कहा, 'महाराज! नाराज न हों। आप से तो एक टोकरी भर मिट्टी नहीं उठाई जाती और इस झोपड़ी में तो हजारों टोकरियां मिट्टी पड़ी हैं। उसका भार आप जन्म भर क्यों कर उठा सकेंगे? आप ही इस बात पर विचार कीजिए!'
जमींदार साहब धन- मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गये थे, पर विधवा के उक्त वचन सुनते ही उनकी आंखें खुल गईं। कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने विधवा से क्षमा मांगी और उसकी झोपड़ी वापस दे दी।
पं. माधवराव सप्रे की कालजयी कहानी
19 जून 1871 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले में स्थित गांव पथरिया में जन्में पं. माधवराव सप्रे ने छत्तीसगढ़ में साहित्य, पत्रकारिता एवं शिक्षा के क्षेत्रों में वंदनीय कार्य किया है। बिलासपुर में मिडिल तक की पढ़ाई के बाद मेट्रिक शासकीय विद्यालय रायपुर से उत्तीर्ण किया। कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीए की डिग्री लेने के बावजूद उन्होंने अंग्रेजों की चाकरी कुबूल नहीं की वे राष्ट्रभक्त एवं सेवाव्रती समाजसेवी बनकर जिये और अपनी साहित्य साधना एवं देश सेवा के लिए पूजित हुए। सप्रे जी ने 1921 में रायपुर में राष्ट्रीय विद्यालय तथा प्रथम कन्या विद्यालय जानकी देवी महिला पाठशाला की भी स्थापना की।
1900 में जब समूचे छत्तीसगढ़ में प्रिंटिंग प्रेस नहीं था तब उन्होंने बिलासपुर जिले के एक छोटे से गांव पेंड्रा से छत्तीसगढ़ मित्र नामक मासिक पत्रिका निकालकर मध्य भारत में हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत की। इसी पत्रिका में छपी उनकी कहानी एक टोकरी भर मिट्टी हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी के रूप में चर्चित हुई। सप्रेजी ने इस कहानी के लिए लोकजीवन में प्रचलित कथा- कंथली से मिट्टी लेकर उसे अभिनव स्वरूप दिया। छत्तीसगढ़ में प्रचलित डोकरी अर्थात वृद्धा से जुड़ी कथाओं का विपुल भंडार रहा है। हर कहानी में केंद्रीय चरित्र के रूप में उपस्थित वृद्धा अपनी समझदारी से विध्नों पर नकेल कसती है और आततायी को पराजित कर देती है। इस कहानी की वृद्धा भी बुद्धि- कौशल से जमींदार को झुका देती है। बुढिय़ा का व्यक्तित्व भावना से परिचालित है। भावाकुलता और चातुर्य के साथ वैराग्य के छत्तीसगढ़ी गुण को भी इस कहानी में बखूबी रेखांकित किया गया है। छत्तीसगढ़ की बूढ़ी दाई अपनी समग्र गरिमा के साथ इस कहानी में उपस्थित है।
इससे पूर्व प्रेमचंद, मुक्तिबोध एवं पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की कहानियां इस स्तंभ में प्रस्तुत की जा चुकी हैं। पढि़ए इस स्तंभ की चौथी कहानी एक टोकरी भर मिट्टी। इस कहानी को साहित्य अकादमी के लिए कमलेश्वर जी ने हिन्दी की कालजयी कहानियां शृंखला में प्रथम कहानी के रूप में छापकर इसके महत्व को रेखांकित किया है।
संयोजक- डॉ. परदेशीराम वर्मा , एल आई जी-18, आमदीनगर, भिलाई 490009, मोबाइल 9827993494