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Sep 4, 2026

किताबेंः पर्यावरण संकट का जीवंत दस्तावेज

  - रोहित कौशिक

पुस्तक - तपती धरती, बदलता मौसम और भारत: लेखक: पंकज चतुर्वेदी, ISBN: 978-81-686534-2-9, मूल्य- रु. 350.00 (हार्ड बाउन्ड ), पृष्ठः120, प्रकाशक – नयी किताब प्रकाशन, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली

प्रस्तावना: बदलते मौसम का यथार्थ और हमारी चिंताएँ

आधुनिक समय में संपूर्ण विश्व के समक्ष यदि कोई सबसे विकराल, जटिल और अस्तित्वगत संकट उपस्थित है, तो वह जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और ग्लोबल वार्मिंग का है। भारत जैसे विकासशील और विशाल देश में, जहाँ की अर्थव्यवस्था और जीवनशैली आज भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रकृति और मानसून पर निर्भर करती है, इस संकट के प्रभाव अत्यंत गंभीर रूप धारण कर चुके हैं। पर्यावरण पत्रकारिता के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित और मुखर हस्ताक्षर पंकज चतुर्वेदी द्वारा संपादित और रचित पुस्तक 'तपती धरती, बदलता मौसम और भारत' इसी सुलगते हुए यथार्थ और अनकहे सत्यों का एक अत्यंत सजीव, प्रामाणिक और वैचारिक दस्तावेज है। यह पुस्तक केवल अकादमिक आंकड़ों और कठिन वैज्ञानिक शब्दावली का कोई संकलन मात्र नहीं है, बल्कि यह धरातल पर कराहते और जूझते भारत की एक सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करती है।

पुस्तक की विषय-वस्तु और बहुआयामी आयाम

यह पुस्तक विभिन्न अनुभवी पर्यावरणविदों, विचारकों और लेखकों के चुनिंदा लेखों का एक ऐसा संग्रह है जो जलवायु परिवर्तन के बहुआयामी प्रभावों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ रेखांकित करता है। पुस्तक में भारतीय समाज के हर उस पहलू को छुआ गया है जो बदलते मौसम की मार झेल रहा है। इसके प्रमुख अध्यायों और विषयों को चार मुख्य भागों में समझा जा सकता है — खेती की चुनौतियाँ, सुलगते जंगल, हाफते शहर और इंसान-जानवरों का संघर्ष। इन चारों खंडों के माध्यम से लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि पर्यावरण संकट केवल पेड़ों के कटने या तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी जीवन-प्रणाली को तहस-नहस कर रहा है।

1. अन्नदाता का संकट: खेती और मौसम की अनिश्चितता

भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है और यहाँ का किसान सदियों से मानसून के भरोसे अपनी फसलें उगाता आया है। परंतु पिछले कुछ दशकों में मौसम का चक्र पूरी तरह से असंतुलित हो गया है। पुस्तक के इस खंड में 'असामयिक बारिश, सूखा और सिकुड़ती फसलें' जैसे विषयों पर गहराई से प्रकाश डाला गया है। कभी बेमौसम मूसलाधार बारिश और ओलावृष्टि किसानों की पसीने से उगाई गई फसल को रातों-रात बर्बाद कर देती है, तो कभी भीषण सूखा और भूजल स्तर में भारी गिरावट खेतों को बंजर बना देती है। लेखक ने बड़े ही मर्मस्पर्शी ढंग से दिखाया है कि कैसे हमारे अन्नदाता (किसान) की आजीविका अनिश्चितता के भँवर में फँस चुकी है और वह कर्ज के जाल में उलझता जा रहा है।

2. सुलगते जंगल और नष्ट होती जैव विविधता

जंगल धरती के फेफड़े कहे जाते हैं, लेकिन आज वे स्वयं आग की लपटों से घिरे हुए हैं। पुस्तक में 'सुलगते जंगल' शीर्षक के अंतर्गत बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के कारण जंगलों में लगने वाली दावानल (फॉरेस्ट फायर्स) की घटनाओं का दर्दनाक दस्तावेज प्रस्तुत किया गया है। ग्रीष्मकाल में जंगलों में लगने वाली आग न केवल अमूल्य वनस्पतियों और विशाल वृक्षों को स्वाहा कर रही है, बल्कि उस संपूर्ण जैव विविधता को भी छिन्न-भिन्न कर रही है जिस पर प्रकृति का संतुलन टिका हुआ है। मूक वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास उजड़ रहा है, जिसके कारण वे भोजन और पानी की तलाश में मानव बस्तियों की ओर रुख करने को मजबूर हैं।

3. हाफते और डूबते महानगर: कंक्रीट के तंदूर

आज के महानगरों का स्वरूप तेजी से बदला है। प्राकृतिक हरियाली, तालाब और खुले मैदानों की जगह कंक्रीट के ऊँचे-ऊँचे जंगलों और विशाल इमारतों ने ले ली है। पुस्तक में 'हाँफते शहर' खंड के तहत यह दर्शाया गया है कि कैसे हमारे महानगर कंक्रीट के तंदूर में तब्दील हो चुके हैं। शहरीकरण की अंधी दौड़ और अनियोजित विकास के कारण थोड़ी सी बारिश में भी शहर पानी-पानी हो जाते हैं, सड़कें नदियां बन जाती हैं और ड्रेनेज सिस्टम ध्वस्त हो जाता है। अर्बन हीट आइलैंड (Urban Heat Island) प्रभाव के कारण शहरों का तापमान ग्रामीण इलाकों की तुलना में काफी अधिक हो गया है, जिससे शहरी नागरिकों का जीवन दूभर हो गया है।

4. इंसान और जानवर: विस्थापन और अस्तित्व का संघर्ष

जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा मानवीय और प्राणिमात्र का संकट विस्थापन के रूप में सामने आ रहा है। नदियाँ सूख रही हैं या बाढ़ से उफन रही हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, और उपजाऊ जमीनें बंजर हो रही हैं। इन कारणों से लाखों लोगों को अपने पुश्तैनी इलाकों को छोड़कर पलायन करना पड़ रहा है। इसके साथ ही, मूक और बेजुबान जानवरों के अस्तित्व पर भी तलवार लटकी हुई है। उनके पारंपरिक गलियारे (Corridors) नष्ट हो रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।

लेखक की शैली, भाषा और प्रस्तुति

पंकज चतुर्वेदी की लेखन शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे गंभीर और जटिल पर्यावरणीय मुद्दों को भी बेहद सरल, प्रवाहमयी और बोधगम्य हिंदी में पाठकों के समक्ष रखते हैं। पुस्तक में प्रयुक्त भाषा सहज होने के साथ-साथ अत्यंत मार्मिक और विचारोत्तेजक है। यह किताब केवल बौद्धिक चर्चाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पाठक के भीतर एक आत्मिक मंथन पैदा करती है। हर लेख में प्रस्तुत तथ्य, आँकड़े और जमीनी रिपोर्टिंग इस बात का प्रमाण है कि लेखक ने केवल कमरों में बैठकर किताबें नहीं लिखी हैं, बल्कि देश के कोने-कोने में जाकर पर्यावरण की वास्तविक पीड़ा को अपनी आँखों से देखा है।

पुस्तक की प्रासंगिकता और एक आईना

जैसा कि पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर ही उल्लेख किया गया है — 'यह किताब महज आंकड़ों का पुलिंदा नहीं है, यह एक आईना है जिसमें हम अपना वर्तमान देख सकते हैं और एक मार्गदर्शिका है जिससे हम अपना भविष्य सुधार सकते हैं।' आज के दौर में जब विकास के नाम पर पर्यावरण का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, यह पुस्तक नीति-निर्माताओं, राजनेताओं, वैज्ञानिकों, छात्रों और प्रत्येक सामान्य नागरिक के लिए एक अनिवार्य पठन सामग्री बन जाती है।

यह हमें चेताती है कि यदि हमने अभी भी सँभलकर प्रकृति के साथ संतुलन बनाने का प्रयास नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियों को एक बंजर और तपती हुई धरती विरासत में मिलेगी। पुस्तक अंततः निराशा का संदेश नहीं देती, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण के प्रति जन-जागृति और सामूहिक उत्तरदायित्व का आह्वान करती है।

निष्कर्ष

संक्षेप में कहें तो, 'तपती धरती, बदलता मौसम और भारत' आधुनिक भारतीय पर्यावरण साहित्य की एक मील का पत्थर साबित होने वाली कृति है। यह हर उस नागरिक के लिए पठनीय है जो इस देश की मिट्टी, पानी, हवा और भविष्य से प्रेम करता है। पंकज चतुर्वेदी का यह संपादन कार्य न केवल वर्तमान संकटों का सटीक विश्लेषण करता है, बल्कि हमें एक स्थायी और हरित भविष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा भी देता है। यह पुस्तक हमें यह सिखाती है कि प्रकृति बचेगी , तभी मानव सभ्यता का अस्तित्व सुरक्षित रहेगा।■

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