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Aug 1, 2026

हाइबनः अगले जनम...

  -  प्रियंका गुप्ता 

आज सुबह सोकर उठी तो आँगन में दीदी की अजीब सी गुनगुनाहट आ रही थी...अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो...। आवाज़ कुछ रुँधी थी या फिर माँजे जा रहे बर्तनों और नल के पानी का शोर था, तुरन्त समझ नहीं पाई। पास जाकर देखा तो दीदी की आँखों से टपाटप आँसू गिर रहे थे। मैं घबरा गई थी...दी और आँसू...इम्पॉसिबिल...। मेरी दी तो कितनी हँसमुख हैं...हमेशा खिलखिलाने वाली...फिर आज क्या हो गया?

उनके हाथ से भगौना छीनकर मैंने किनारे डाल दिया, "बताओ दी, क्या हुआ...? रो क्यों रही...?"

कुछ बोलने की बजाय दी की सुबकियाँ बँध गई। मेरा जी घबराने लगा...कहीं किसी प्यार-व्यार का चक्कर तो नहीं? पर नहीं...अगर ऐसा होता तो दी मुझे तो ज़रूर बताती...तो फिर...?

"तुम्हें मेरी कसम दी, बताओ तो...मेरा दिल घबरा रहा है...।" मैंने अपने हाथों में उनका चेहरा लेकर जबरिया अपनी ओर घुमा दिया।

किसी तरह शान्त होकर दी ने जो बताया, उसका लब्बोलुआब ये था- कल शाम को जब दी ऑफ़िस से लौट रही थी, तो रिक्शे की तलाश करते-करते वो पैदल ही चली जा रही थी। थोड़ा झुटपुटा हो गया था, सो सावधानीवश उन्होंने सूट की चुन्नी से अपना सिर और मुँह भी लपेट लिया था। तभी जाने कहाँ से पीछे से आता एक साइकिल सवार मानो जानबूझकर उनके ऊपर गिर पड़ा। इस गिरने की एक्टिंग के दौरान उसके लिजलिज़े हाथ दी के शरीर पर जिस तरह से रेंग गए, बताते-बताते दी गिनगिनाहट से भर गई।

"तुम्हें उसे घुमाकर एक थप्पड़ देना था दी...वो कमीना भी याद रखता ज़िन्दगी भर...।" सुनकर मैं गुस्से से तमतमा गई।

"मारा था गुड़िया, उस समय मेरा भी यही इंस्टेण्ट रियक्शन था...पर जानती हो, उस बेशर्म, घिनौने इंसान ने क्या किया...? मेरा हाथ पकड़कर चूम लिया और फिर जो कहा न...वो मैं बोल नहीं पाऊँगी। मेरे मन और तन दोनों से उसके गन्दे, घिनौने स्पर्श की याद नहीं जा रही। मुझे अपने लड़की होने से नफ़रत हो रही। न मैं लड़की होती, न कोई मेरे साथ ऐसा करता। क्या जीवन में आगे बढ़ने, कुछ करने का सपना देखना एक लड़की के लिए गुनाह है...? क्या बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, जन्म से लेकर मौत तक हम सिर्फ भय में जीते रहेंगे? क्या तन-मन से जीवन भर किसी पुरुष के अधीन रहकर, उसकी चाकरी करना ही हमारी नियति है...? क्या हम इंसान नहीं...? इंसान के नाम पर हमारे समाज में खुले घूम रहे हैवानों को काबू में करने की बजाए सिर्फ हम लड़कियों पर बन्दिशें क्यों लगाई जाती हैं...? क्यों सिर्फ हमें सिखाया जाता है कि हम कैसे हँसे-बोलें, कैसे पहने ओढ़ें, कैसे घुटकर जिएँ...? क्यों नहीं लड़कों को बचपन से सिखाया जाता कि एक लड़की भी जीने का हक़ रखती है, खुली हवा में साँस लेने की चाहत होती है उसे...और सबसे बड़ी बात...एक लड़की भी इंसान है...।"

मैं तो दी की बात से निरुत्तर हूँ अब तक...आप के पास इसका जवाब है कोई...?

अगले जन्म

बेटी होकर जीना

चाहेगा कौन?

सम्पर्कः ‘प्रेमांगन’, एम आई जी- 292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या- एक, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र)


7 comments:

  1. Anonymous12 August

    मर्मस्पर्शी हाइबन। कहने को तो नारी ने बहुत प्रगति कर ली है। समय के साथ बहुत कुछ बदला है पर नहीं बदली तो पुरुष की मानसिकता, उसकी कुत्सित भावना।आवश्यकता उसे संस्कारित करने की है। मनोवृत्ति बदलने की है। सामाजिक बोध ही उसे मन से बदल सकता है । सुदर्शन रत्नाकर

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  2. Anonymous19 August

    पुरुष सत्ता अब भी हावी है
    नारी को घर के चौखट के बाहर आज़ादी से जीने की आज़ादी जाने कब मिलेगी. आए दिन ऐसी ख़बरें सुनते है पर बदलाव के नाम पर सिर्फ़ नारे ही नारे
    समाधान कोई नहीं
    देवी नागरानी

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  3. Dr.Kanak Lata19 August

    शायद हर स्त्री के जीवन में इस तरह की एक न एक वीभत्स स्मृति अवश्य होती है जो जीवन भर उसे विस्मृत नहीं होती...
    बहुत सुन्दर हाइबन....👏🏻👏🏻

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  4. Gunjan Agarwal19 August

    बेहद मर्मस्पर्शी 👌👌

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  5. Anonymous21 August

    True

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