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Jul 1, 2026

दो कविताएँः

  - गुंजन अग्रवाल ‘अनहद’ 

1. उर्मिला हूँ  मैं तुम्हारी

वेदना सहती रहूँगी।

शब्द न मुख से कहूँगी।

मैं वधू हूँ राजकुल की।

पंखुड़ी हूँ खास गुल की।

भाग्य से हूँ रुष्ट माना।

राजसी है ये घराना। 

स्वयं को समझा रही हूँ। 

कार्य में उलझा रही हूँ। 

हे प्रिये निश्चिंत रहना। 


फिक्र न करना हमारी। 

उर्मिला हूँ मैं तुम्हारी....


वेदना का मौन स्वर हूँ।

हाँ विरह का मैं नगर हूँ। 

हठ न करती वन गमन की।

अश्रुओं से नम नयन की।  

बज्र सा मन कर लिया है।

धीर भी अब धर लिया है।

धर्म जो है वो निभाओ।

भ्रात के सँग आप जाओ।

आत्म संयम रख रही हूँ,


उर में रखके बज्र भारी। 

उर्मिला हूँ मैं तुम्हारी....


तूलिका हूं मैं विरह की।

खींच लूंगी छवि गिरह की।

मैं प्रतीक्षित ही रहूँगी।

काल के नश्तर सहूँगी।

प्रीत के उन सब क्षणों को।

फैलते अंतः कणों को। 

नैन में विस्तार दूँगी।

स्वप्न में आकार दूँगी।

रोकने को रोक लेती, 


हूँ यक़ीनन एक नारी। 

उर्मिला हूँ मैं तुम्हारी....

2. अमलतास बन जाऊँगी

घूँट-घूँट पी अगन पीर की,

कुंदन बन दिखलाऊँगी ।

दग्ध हृदय के घाव छुपा के,

अमलतास बन जाऊँगी ।


इन आँखों की शुचि सरिता से,

विरह अगन की रेख मिटा । 

करुणा के संदेशों के लघु 

मेघ छटा को देख मिटा । 

अनदेखी अनजानी राहों

पर भी साथ निभाऊँगी । 

अमलतास बन जाऊँगी।


वैशाखी किरणें समेट के 

भग्न हृदय में रखूँ सदा ।

प्रणय निभाने को आ जाना,

प्रियवर तुम भी यदा- कदा । 

एक नन्हे से तृण की भाँति

वरना हृदय जलाऊँगी ।

अमलतास बन जाऊँगी।


जैसे जोगन करे तपस्या,

कड़ी धूप में ओ जोगी ।

विरह-अगन में जलती अनहद

कोई पीर पुरानी होगी ।

पीड़ाओं के सात समंदर,

हँसकर पी दिखलाऊँगी । 

अमलतास बन जाऊँगी।

दो लघुकथाएँः

  - आनंद हर्षुल

1- ईश्वर की खाँसी

       ईश्वर खाँस रहा है और पृथ्वी हिल रही है। मनुष्य हजारों हजार बरसों से महसूस कर रहा है कि ईश्वर जब भी खाँसता है तो पृथ्वी हिलने लगती है।

    इधर, ईश्वर लगभग रोज खाँसने लगा है और पृथ्वी रोज हिल रही है…ईश्वर के खाँसने से मनुष्य ईश्वर की खाँसी से परेशान है।

मनुष्य, पानी पी रहा है, और अचानक ईश्वर को आ जाती है खाँसी, ईश्वर की खाँसी से हिलने लगती है पृथ्वी, पानी छलक पड़ता है…मनुष्य के चेहरे पर, मनुष्य खा रहा है खाना और हिलने लगती है पृथ्वी खाना बिखर जाता है धरती पर, मनुष्य कई बार चलते-चलते गिर पड़ता है, हिलती पृथ्वी के साथ, वह अपना संतुलन नहीं बना, रख पाता है। खेत की निंदाई, कोड़ाई, जोताई…सभी मुश्किल लगती है, जब ईश्वर की खाँसी से हिलती है पृथ्वी, दरअसल, ईश्वर की खाँसी से इन दिनों मनुष्य की  दैनंदिन की सभी क्रियाएँ प्रभावित हो रही है। पानी से पेशाब तक भोजन से मल त्याग तक प्रेम से संयोग तक।

   बहुत बूढ़ा हो गया है ईश्वर, ईश्वर, इतना बूढ़ा हो गया है कि एक बूढ़े मनुष्य से ज्यादा बूढ़ी हो चुकी है- बूढ़े ईश्वर की खाँसी, हजारो-हजार बरस पुराना है ईश्वर ईश्वर के फेफड़े हैं, हजारों हजार बरस पुराने। ईश्वर के पुराने फेफड़े अब जवाब दे गए हैं। खाँस रहे हैं लगातार।

लगातार हिल रही है पृथ्वी…ईश्वर की खाँसी से पुराने और जर्जर फेफड़ों की, यह इतनी भयावह खाँसी है कि मनुष्य को डर लग रहा है कि ईश्वर की खाँसी से हिलते-हिलते, कहीं नष्ट न हो जाए यह पृथ्वी।

2- बच्चों की आँखें

    बहुत बड़ा बगीचा है। बगीचे में बहुत से पेड़ है पेड़ों पर बहुत सी चिड़ियाँ है। पौधे है। बहुत से फूल हैं, पौधों पर फूलों पर बहुत सा पराग है, पराग पर, बहुत सी तितलियाँ हैं। इन सब के साथ, बहुत से बच्चे हैं बगीचे में। हरी बेंचों पर  बैठे, बैठे, एक दूसरे से सटे-सटे एक-एक हरी बेंच पर, चार-चार पाँच-पाँच बगीचे में जितनी हरी बेंच हैं, यहाँ-वहाँ छिटकी-सी रखी, उन पर यहाँ-वहाँ छिटके से बैठे हैं बच्चे सिर झुकाए सबके हाथों में मोबाइल है, मोबाइल की स्क्रीन पर एक गेम चल रहा है, जिसमें जंगल में युद्धरत एक योद्धा है-चपल ओर तीव्र अपने आस-पास का, सबकुछ तहस-नहस करता योद्धा। बगीचे की बेंचों पर बैठे सारे बच्चे युद्धरत है जंगल में। मोबाइल की स्क्रीन के जंगल में, भटक रहे हैं सारे बच्चे। सारे बच्चे मोबाइल-स्क्रीन के भीतर युद्धरत हैं।

     मोबाइल-स्क्रीन के जंगल में, नकली पेड़ हैं, चिड़ियाँ है, नकली, नकली पौधे हैं, नकली, नकली तितलियाँ है, फूलों पर पराग हैं नकली, जंगल में नकली घास है जो युद्धरत नकली योद्धा के पैरों तले, बार-बार कुचली जा रही है।

   मोबाइल स्क्रीन में उभर रही सारी नकली चीजों को देखतेी, बच्चों की आँखें भर असली हैं। असली आँखों से, वे मोबाइल की स्क्रीन में, रची गई नकली दुनिया को देख रहे हैं।

            बगीचे में बैठे बच्चों के जीवन में अनुपस्थित है वह बगीचा, जिसमें बैठे हैं बच्चे, बगीचे के असली, पेड़ पौधे, चिड़ियाँ तितलियाँ, फूल….दुखी हैं कि उनके लिए नहीं है बच्चों की आँखें।

लघुकथाः उजली दुनिया

- अन्तरा करवडे

“मम्मी, आज स्कूल से आऊँगी, तब तक मेरा वो सफेद फ्रॉक तैयार रखना।”

“सफेद फ्रॉक? वो नीली लेस वाला?” मैंने जान बूझकर “नीली लेस” पर जोर दिया। जानती थी, वह थोड़ी हैरान होगी। कितनी मुश्किल से मैने शटल की वह लेस बुनी थी, और फ्रॉक भी सिला था, एकदम सफेद झक। लेकिन उसने “ये तो किसी डिटर्जेण्ट पाउडर की एड जैसा लगता है।” कहकर उसे पहनना टाला ही था।

“हाँ ना मम्मी। आप बस उसे निकाल देना बाहर,” कहकर बिटिया स्कूल चली गई।

आज पता नही क्यों इसे याद आ गया वह फ्रॉक? मैं उधेड़बुन में अपना काम निपटाती रही। बीच-  बीच में आकर उसके बिस्तर पर रखे उस फ्रॉक की लेस पर जतन से हाथ फेरती रहती। स्कूल से लौटकर उसने बिना कोई हल्ला- गुल्ला किये सब समेटा, फिर नीली लेस वाला सफेद फ्रॉक पहनकर, बड़े ज़िम्मेदारी के से भाव ओढ़कर कहने लगी, “मम्मी, मैं और मिनी थोड़ी देर से आते हैं। आज पिंकी से मिलने जाना बहुत ज़रुरी है।” और वह निकल गई। मैंने ज़रा बाहर जाकर टोह लेनी चाही, तो मिनी भी, खूब सोच समझकर एक सफेद पोषाक पहने हुए, दुःखी चेहरे से बिटिया का इंतज़ार करती खड़ी दिखी। दोनों ने आपस में संक्षिप्त बातचीत की और किसी मिशन पर जाने समान चाल से पिंकी के घर चली गई। पिंकी हमारी कामवाली बाई की बिटिया है। हमउम्र होने के नाते आना – जाना और खेल कूद साझे थे। लेकिन ऎसे कभी उसके घर जाने का कार्यक्रम बनने लायक अपनापा तो नहीं था।

खैर उसकी वापसी तक मन बहलाती रही।

ज़्यादा प्रतीक्षा नही करनी पड़ी मुझे। घंटे भर में ही हमेशा की तरह उछलती कूदती, शोर मचाती बिटिया घर में दाखिल हो चुकी थी। आनन फानन में कमरे में जाकर अपनी पसंदीदा बदरंग सी पोषाक पहनकर बाहर आई और सामने रखे नाश्ते पर टूट पड़ी। अब मैडम को खेलने जो जाना था।

“लेकिन किया क्या पिंकी के घर जाकर? वो भी सफेद फ्रॉक में!” मेरे सब्र का बाँध टूट चुका था।

“अरे मम्मी, कल ना पिंकी का पिल्ला शेरू एक गाड़ी के नीचे आकर मर गया था। मैं और मिनी उसके घर बैठने गए थे। आखिर वो दुःखी थी ना! फिर ऎसे दुःख में तो सफेद ही पहनते हैं ना?”

बिटिया की भोली बातें सुनकर, हाल ही में पड़ोस में हुई एक असमय मृत्यु, उनके दुख बाँटने को लेकर हमारा बैठने जाना और सफेद वस्त्रों का रहस्य मेरी समझ में आने लगा।

पिंकी के पिल्ले के न रहने पर उसका दुःख और बिटिया की संवेदनाएँ मुझे अंदर तक भिगो गई।

बिटिया तो खेलने जा चुकी थी। उसके कमरे में जाकर देखा, तो वह सफेद फ्रॉक बेतरतीब सा पड़ा था। दरी पर बैठने के कारण थोड़ा धूल- धुसरित भी था। पता नही किस झोंक में आकर मैंने उस भींचकर गले लगा लिया और दो आँसू गिर पड़े। मेरे हाथों में वह फ्रॉक नही, बिटिया की उजली दुनिया जो थी।

किताबेंः अनादि समर : छावा के बलिदान से जाग उठा हिन्दू

  - डॉ. लोकेन्द्र सिंह

पुस्तक : अनादि समर, लेखक : गिरीश अवधूत जोशी, प्रकाशक : अर्चना प्रकाशन, भोपाल, मूल्य : 80 रुपये

लेखक गिरीश जोशी की पुस्तक ‘अनादि समर’ छत्रपति शंभूराजे की जीवनी मात्र नहीं है बल्कि यह भारतीय इतिहास के उस महत्त्वपूर्ण कालखंड का विश्लेषण है, जिसे सही ढंग से सामने नहीं लाया गया है। इस पुस्तक की पृष्ठभूमि की जानकारी मुझे ज्ञात है, इसलिए बताना चाहूँगा कि जब सुपरहिट फिल्म ‘छावा’ आई थी, तब छत्रपति शंभूराजे अर्थात् संभाजी महाराज के बारे में जानने की इच्छा लोगों के मन में अत्यंत प्रबल थी। यह एक सहज जिज्ञासा थी कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान के बाद क्या हुआ होगा? क्योंकि फिल्म की पटकथा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए छत्रपति शंभूराजे के बलिदान पर खत्म हो जाती है। उस समय लेखक गिरीश जोशी जी को यह दायित्वबोध हुआ कि फिल्म जहाँ खत्म होती है, उसके आगे की कहानी वे सुनाएँगे। लोगों को यह अवश्य ही जानना चाहिए कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान ने किस प्रकार हिन्दुत्व की ज्वाला को और तीव्र किया। ‘अनादि समर’ के माध्यम से लेखक गिरीश जोशी ने छत्रपति शंभूराजे के मुगलों के साथ संघर्ष, उनके बलिदान और उस बलिदान के परिणामस्वरूप उपजे ‘लोकयुद्ध’ के वास्तविक इतिहास को सामने लाने का साधु कार्य किया है।

पुस्तक ‘अनादि समर’ की शुरुआत यवन आक्रांताओं, विशेषकर औरंगजेब की क्रूरता और छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा ‘हिंदवी स्वराज्य’ की स्थापना की पृष्ठभूमि से होती है। छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद हिन्दवी स्वराज्य पर पुर्तगालियों, जंजीरा के सिद्दी, अंग्रेजों और मुगलों ने एक साथ नजरें गड़ाईं। ऐसे में हिन्दवी स्वराज्य की बागडोर छत्रपति शंभूराजे ने सँभाली। बाहर की टेढ़ी नजरों के साथ-साथ उन्होंने दरबारी षड्यंत्रों का भी डटकर सामना किया। पुस्तक में जंजीरा किले को जीतने के लिए समुद्र में रास्ता बनाने की योजना और पुर्तगालियों को घुटने टेकने पर मजबूर करने जैसे प्रसंग छत्रपति शंभूराजे के सैन्य कौशल को दर्शाते हैं। लेखक ने स्पष्ट किया है कि संभाजी महाराज केवल एक वीर योद्धा ही नहीं थे, बल्कि 13 भाषाओं के ज्ञाता, उत्कृष्ट विचारक और ‘बुधभूषण’ जैसे संस्कृत ग्रंथ के रचयिता भी थे। अर्थात् लेखक ने छत्रपति शंभूराजे के बहुआयामी व्यक्तित्व को भी सामने लाने का सफल प्रयास किया है।

जिस पराक्रमी योद्धा को आमने-सामने की लड़ाई में परास्त करना संभव नहीं था, उसे पकड़ने के लिए मुगलों ने छल का जाल बिछाया। संगमेश्वर में अपने ही साले गणोजी शिर्के की गद्दारी के कारण छत्रपति शंभूराजे मुगलों की कैद में आ गए। उसके बाद हम सब जानते हैं कि क्रूर औरंगजेब ने इस्लाम कबूलने का दबाव डालने के लिए छत्रपति शंभूराजे को घोर शारीरिक यातनाएँ दीं। उनकी आँखें फोड़ दीं, जीभ खींच ली, जख्मों पर नमक छिड़का; औरंगजेब जितनी क्रूरता दिखा सकता था, उसने दिखाई। इसके बावजूद वह धर्मवीर शंभूराजे को झुका नहीं सका। छत्रपति शंभूराजे ने फाल्गुन अमावस्या (11 मार्च, 1690) को धर्म के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

‘अनादि समर’ इससे आगे की कहानी हमें सुनाती है। अत्याचारी औरंगजेब को लगा था कि इस हत्या से हिन्दू समाज दहल जाएगा: लेकिन इसका उल्टा असर हुआ। छत्रपति शंभूराजे के बलिदान ने प्रत्येक हिन्दू नागरिक को सैनिक बना दिया। राजाराम, महारानी ताराबाई, संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव के नेतृत्व में मुगलों की जो दुर्दशा हुई, उसका वर्णन कम ही किया जाता है। दक्खन जीतने के लिए आया औरंगजेब यहाँ ऐसा उलझा कि वह जिंदा आगरा नहीं लौट सका। मराठा शूरवीरों ने दक्खन में ही उसकी कब्र खोद दी। लेखक गिरीश जोशी ने औरंगजेब की हताश मृत्यु का बहुत सटीक और विस्तृत वर्णन ‘अनादि समर’ में किया है।

लेखक ने ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ वास्तविक इतिहास लिखा है। ऐतिहासिक पत्रों को मूल रूप में शामिल करके पाठकों को उनका विश्लेषण करने का अवसर भी दिया गया है। संकट के समय समर्थ रामदास स्वामी द्वारा छत्रपति शंभूराजे को लिखा गया प्रेरक पत्र (मूल मराठी एवं हिंदी अर्थ सहित) और शंभूराजे द्वारा आमेर के राजा राम सिंह को लिखा गया संस्कृत पत्र, सबको पढ़ना चाहिए। यह पत्र उनके व्यापक दृष्टिकोण और स्वधर्म निष्ठा को उजागर करते हैं। इसके साथ ही, लेखक ने मराठों की युद्धनीति और साहस को वर्तमान संदर्भों से जोड़ते हुए, छत्रपति शिवाजी महाराज और शंभूराजे के पराक्रम की तुलना आधुनिक भारतीय सेना की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की परंपरा से की है।

वामपंथी एवं मुस्लिम इतिहासकारों ने एक बड़ा झूठ यह स्थापित किया कि अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत पर मुस्लिम बादशाह का शासन था। यह बहुत बड़ा झूठ है। यह पुस्तक इस तथ्य को मजबूती से स्थापित करती है कि भारत का शासन अंग्रेजों ने मुगलों से नहीं, बल्कि मराठों से लिया था। स्मरण रहे कि अंग्रेजों ने मराठों के साथ 1818 में तीसरे युद्ध में जीत के साथ भारत पर अपना प्रभाव जमाया था। उस समय कथित मुगल बादशाह तो मराठों का पेंशनभोगी मात्र था। लेखक ने विदेशी यात्रियों (जैसे निकोलाओ मनुची) और मुगल इतिहासकारों (जैसे भीमसेन सक्सेना और साकी मुस्तैद खान) के उद्धरणों का उपयोग करके औरंगजेब की छावनी में फैली भुखमरी, बीमारी और गंदगी का यथार्थवादी चित्रण किया है।

कहना होगा कि लेखक गिरीश जोशी की लेखन शैली अत्यंत प्रवाहपूर्ण, देशभक्तिपूर्ण और ओजस्वी है। वे पाठकों के मन में छत्रपति शंभूराजे के प्रति श्रद्धा और उनके बलिदान के प्रति सम्मान जगाने में पूरी तरह सफल रहे हैं। भाषा का प्रवाह सरल-सहज है, जिससे यह इतिहास आम जनमानस तक आसानी से पहुँच सकता है। ‘अनादि समर’ जैसी पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि किसी राष्ट्र की नींव को मजबूत करने के लिए कैसे एक ‘छावा’ (शेर के बच्चे) को अपना सब कुछ मिटाकर नींव का पत्थर बनना पड़ता है। इतिहास के विद्यार्थियों, युवाओं और राष्ट्रप्रेमियों के लिए यह एक अत्यंत पठनीय और प्रेरणादायक पुस्तक है।

समीक्षक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।

सम्पर्क: मध्यप्रदेश राज्य शूटिंग अकादमी के सामने, बिशनखेड़ी,भोपाल (मध्यप्रदेश) - 462044 मो. 09893072930, www.apnapanchoo.blogspot.in

कविताः कुछ और...

 - रमेश कुमार सोनी

लोगों की दुनिया 

आज सिमटी हुई है-

दड़बों जैसे फ्लैटनुमा मकानों में 

जहाँ से उसकी दौड़ 

कार्यालयों तक में खप जाती है

संचार उपकरणों के साथ

झुंझलाकर लौटता है वह

बाज़ार की महँगाई को कोसते हुए।


थक गया है वह

इसी चकरघिन्नी- सी दौड़ में

और फँस चुका है

नमक,शक्कर और दिल के रोगों से,

इ एम आई की दौड़ 

बहुत थका चुकी है-शहरों को 

लोग अब तलाश में है-

अमराई की छाँव और

माँ के आशीर्वाद की।


रिश्तों की पाठशाला में भी

अब उसके नाम की

नारियल भी कोई बाँधता नहीं

डराता है उसे समाचारों का मकड़जाल

वह सत्य की खोज में निकलना चाहता है

बुद्ध बनने की राह में

लेकिन जिम्मेदारियों का झोला

उसका बेताल हो चुका है।

 

लोग कुछ और हैं और

बनना कुछ और चाहते हैं लेकिन

दिखना कुछ और के साथ जी रहे हैं

यस सर और यस मैडम के साथ 

ख़त्म हो जाती है उनकी दुनिया एक दिन

श्मशान प्रतीक्षा में है सदा से 

इस ख़त्म होती दुनिया में,

उन चार लोगों की भीड़ लौट रही है

कुछ ज़रूरी फाइल निपटाने।

सम्पर्कः 24 कबीर नगर 2, रायपुर,  छत्तीसगढ़-492099, मो. 7049355476