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Mar 1, 2026

लघुकथाः कुत्ते का खाना

  - दर्शन मितवा

आयकर अधिकारी को तीन–चार मातहतों के संग अपनी दुकान की ओर आता देख दुकानदार ने अपनी ऐनक ठीक की और तेजी से गद्दी से उठकर खड़ा हो गया। हाथ जोड़कर उसने नमस्ते की और उनको बिठाने के लिए अपनी धोती के पल्लू से कुर्सियाँ साफ करने लगा। जब तक वे लोग कुर्सियों पर सजे, तब तक खाने के लिए काजू और पीने के लिए फलों का जूस आ गया। खाने- पीने के उपरांत, आयकर अधिकारी ने अपनी मूँछों पर हाथ फिराते हुए दुकानदार से हिसाब- किताब की किताबें लीं और औपचारिकतावश उनको उलटने- पुलटने लगा। एक पन्ने पर उसकी नजर अटक गई। वह हैरान भी हुआ और मुसकुराया भी। उसने वह पन्ना अपने मातहतों को दिखाया। वे भी मुसकुराए बिना न रह सके, ‘‘कैसे–कैसे लोग हैं जो आयकर बचाने के लिए कुत्ते को डाली गई रोटी का खर्च भी किताबों में डाल देते हैं।’

खुले हुए पन्ने पर खर्च वाली लाइन इस प्रकार लिखी हुई थी, ‘‘तारीख 17.2.89 कुत्ते का खाना–पचास रुपये।’’

खर्च की लाइन पढ़कर दुकानदार भी ही- ही करता हुआ उन सबके साथ हँसने लगा।

थोड़ी देर बाद, वे सब चले गए। दुकानदार ने अपने हिसाब- किताबवाली किताब खोली। काजू से लेकर जूस का सारा खर्च जोड़ा और किताब में उसने एक नई लाइन लिखी–तारीख 29.8.89 कुत्तों का खाना- एक सौ पचास रुपये।

कहानीः अकालग्रस्त इलाका

 - प्रेम गुप्ता ‘मानी’/ प्रियंका गुप्ता

चंद लम्हों पहले ही तो आसमान एकदम साफ़ था। उसकी आसमानी नीली चादर पर काले बादलों के कुछ नन्हे टुकड़े तैर रहे थे, पर पल भर बाद हवा के झोंके उन्हें कहीं दूर धकेल देते, तो लगता, सब कुछ ठीक है...। मौसम विभाग कहीं-न-कहीं गड़बड़ा गया लगता है...उसके अनुसार तो तेज़ बारिश की संभावना है। 

यद्यपि, हफ्ते भर पहले ही तेज़ आँधी के बाद इतनी ज़ोर की बारिश हुई थी कि बहुत कुछ अस्त-व्यस्त हो गया था। धूल-भरी आँधी ने घर के नक्शे को इस कदर बेरंग कर दिया था कि सफ़ाई करने का सोचकर ही मैना घबरा गई थी। आँधी के कारण पूरे इलाके की बत्ती जो गुल हुई, सो अलग... उस पर बला की गर्मी...?

उस समय उलझन के एक अजीब माहौल ने सबको जकड़ रखा था कि तभी बादलों की तेज़ गड़गड़ाहट के साथ धरती पर झमाझम गिरती बारिश की बूँदों ने जैसे सबको एकदम निहाल कर दिया था। घर की साफ़-सफ़ाई के बाद मैना भी उस सकून से भर गई थी। 

उस दिन जमकर पानी बरसा। लगा, जैसे आकाश उसी दिन अपना पूरा भरा घड़ा खाली कर देगा...। सड़कें घुटने-घुटने पानी से भर गई थीं, तिस पर जहाँ-तहाँ कीचड़...गंदगी...। शुक्र था कि उस दिन इतवार था। सब घर पर ही थे। मौसम का मज़ा लेने के लिए मैना ने ढेर सारी बेसन की पकौड़ियाँ बनाई थीं और साथ में गर्मागर्म चाय भी...। बड़े इत्मीनान से सबने खाया। 

पकौड़ियों का मज़ा बरसात के मौसम में ही तो है, पर उसके बाद हफ्ते भर तक कुछ भी नहीं...। अपना घड़ा एक ही दिन में खाली करके आकाश तो शांत हो गया था; पर नीचे धरती पर सारे जीव कुलबुला उठे थे। कितनी अजीब बात थी...बारिश की ठंडी-ठंडी बूँदें धरती का ताप कम कर देती हैं, पर उसके थमते ही धरती फिर झुलसने लगती है...। मैना को वैसे भी गर्मी बहुत लगती है, तिस पर गोकुल की ज़िद, “एसी नहीं चलेगा...बिजली का बिल बहुत ज़्यादा आता है...।”

इधर मैना की उलझन...पंखे की गर्म हवा किसी तरह दिन में तो झेल लेती है, पर रात में...?

पंखे की गर्म हवा राहत देने की बजाय उसे बेचैन कर देती। पूरा बदन अजीब तरह से चिपचिपा उठता। ऐसे में नींद कैसे आती? इस चिपचिपी उमस भरी रात में गोकुल पता नहीं कैसे सो जाता और वह पूरी रात बालकनी में काट देती। एसी लगे होने के बावजूद वह कुछ नहीं कर पाती। एक-दो बार जबरिया उसने एसी चलाया भी, लेकिन गोकुल ने झुँझलाते हुए उसे बंद कर दिया। गर्मी का मौसम वैसे भी उसके लिए काल बन जाता है, तिसपर गोकुल से रोज-रोज रात को उलझना...। ज़िद में आकर वह दूसरे कमरे में सोने को भी तैयार नहीं होता था। हारकर उसे ही चुप रहना पड़ता था। 

आज भी खाना-पीना निबटाकर वह बालकनी में बैठी ही थी कि अचानक आसमान पर काले बादलों के विशाल टुकड़ों ने हमला बोल दिया। पहले तो वे पूरे ज़ोर से गरजे और फिर बरस पड़े...पर उनका यह गरजना-बरसना भी बस चंद घंटों के लिए ही था, लेकिन यह वक़्त भी उसके लिए बेहद सकून भरा था। 

सकून से भरी वह आराम करने की सोच ही रही थी कि तभी उसका मोबाइल कुनमुना उठा...कोई अनजान नंबर था। आमतौर पर वह कोई अनजान नंबर रिसीव नहीं करती, पर इस समय...?

पता नहीं क्या सोचकर उसने मोबाइल उठा ही लिया। उधर की आवाज़ सुनते ही वह चौंक गई। पूरे साल भर बाद यह क्या...? रीमा को उसकी याद कैसे आ गई? इतने समय से तो जैसे रीमा ने उससे सारे रिश्ते-नाते ही तोड़ लिये थे। उसने यह भी नहीं सोचा कि माँ के जाने के बाद मैना ने बड़ी बहन का ही नहीं, बल्कि एक माँ का भी फ़र्ज़ अदा किया था। उसे जब भी कोई ज़रूरत पड़ती, मैना तुरंत हाज़िर हो जाती...। हारी-बीमारी में उसके पास पहुँच ही जाती थी। अपने खर्चे से कटौती करके, गोकुल से छिपाकर पैसे-रुपये से भी उसकी मदद करती, लेकिन यह रीमा...? 

रीमा को इन सबसे जैसे कभी कोई सरोकार रहा ही नहीं। वह कहाँ से और कैसे उसकी मदद कर पाती है, यह जानने की उत्सुकता उसमें कभी थी ही नहीं। कभी भूले-भटके बातों के दौरान अगर मैना अपनी तकलीफ़ों का ज़िक्र करना भी चाहती, तो अगले ही पल रीमा किसी-न-किसी बहाने फोन काट देती। ऐसे में मैना को हल्की कोफ़्त भी होती थी। कितनी अजीब और मतलबपरस्त लड़की है...अपनी जरूरतों और कष्टों की रामकहानी सुना डाली; लेकिन उसकी बारी आई तो बस्स...अच्छा दीदी, थोड़ा काम है, बाद में बात करती हूँ...कहकर कॉल रख दिया? कई बार मैना का दिल भी करता, अगली बार जब यह अपना दुखड़ा रोएगी तो वह भी ऐसे ही काम का बहाना करके फोन रख देगी...न तो उसका दुखड़ा सुनेगी, न उसकी मदद करने के लिए खुद को परेशानी में डालेगी। लेकिन मैना तो बस मैना थी...। माँ-बाप के दिए संस्कारों का सबसे ज़्यादा असर शायद उसी पर हुआ था, तभी तो किसी की परेशानी सुनी नहीं कि सबसे पहले सहायता करने को तैयार...। जब बाहरी लोगों के साथ मैना ऐसी थी तो रीमा तो फिर भी अपनी सगी छोटी बहन ही थी न...। उसकी मदद से भला वो कैसे पीछे हट सकती थी। 

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आज भी फोन उठाते ही रीमा का चिर-परिचित लहजा...हम हैं...मानो उसके इस ‘हम’ में समस्त ब्रह्मांड समाया हो। मैना अक्सर उसके इस तरीके पर चुटकी ले चुकी थी, पर उसकी तमाम दूसरी बातों की तरह रीमा इस बात को भी हमेशा अनसुना करके निकल जाती थी। 

‘यह किसका नंबर है?”

“अरे, यह मेरे मोहल्ले की पार्लर वाली का नंबर है। एक शादी में जाना है, तो बाल-आइब्रो सब करवाने आए हैं। दीदी, मेरे मोबाइल का रिचार्ज खतम हो गया है, ज़रा पाँच सौ वाला करवा दो...। वहाँ जाएँगे तो ज़रूरत पड़ेगी न...। अच्छा, सुनो, हम फटाफट सब करवा लें, नहीं तो पहुँचने में बहुत लेट हो जाएगा। बाद में बात करते हैं।”

इससे पहले कि मैना कुछ कह-सुन पाती, रीमा ने फोन काट दिया। कुछ पल के लिए मैना फोन वैसे ही हाथ में पकड़े सन्नाटे-सी अवस्था में बैठी रह गई। साल भर बाद फोन किया भी तो अपने मतलब से...? न हाल, न चाल, बस रिचार्ज करा दो। मन हुआ, अभी पलटकर उसे इसी नंबर पर कॉल करे और खरी-खरी सुना दे। तुम्हारा ठेका ले रखा है क्या? अपने आदमी से जो पैसा पार्लर के लिए लेकर आई हो, उससे खुद रिचार्ज कराओ...। कौन सा पहले की तरह मेरे रिचार्ज करने के बाद मुझसे बात करने वाली हो?

पर मन की बात मन में ही रखते हुए मैना ने एक लंबी साँस भरते हुए खुद को संयत किया और दस मिनट बाद ही रिचार्ज के लिए रीमा का नंबर सेलेक्ट कर लिया। क्या पता, कहाँ जा रही हो। कम-से-कम पास में हाड़े-गाढ़े काम आने के लिए मोबाइल चालू तो रहना चाहिए न। हाँ, इतना ज़रूर पक्का था कि इस बार वो सबसे कम कीमत का ही रिचार्ज कराएगी। बस इतना भर कि कहीं भी बात कर सके। 

रिचार्ज होने के बाद भी रीमा की तरफ से कोई कॉल, तो कौन कहे, एक मैसेज तक नहीं आया। हमेशा की तरह बस एक चुप्पी...जो जाने कितने दिनों तक चलेगी। 

मैना अभी भी बालकनी में बैठी थी। बारिश थम चुकी थी, लेकिन रेलिंग से बूँदें थोड़ा-थोड़ा करके रिस रही थी...। मैना को लगा, ये बारिश की बूँदें नहीं, बल्कि उसका रिश्ता हो जो धीरे-धीरे रिसता जा रहा था। 

मैना ने मोबाइल मेज पर रखा और चाय का प्याला उठा लिया। इतनी देर में चाय पूरी तरह ठंडी हो चुकी थी, पर फिर भी उसकी इच्छा नहीं हुई उसे गरम करने की..। एक साँस में ही वह ठंडी चाय गटक गई। 

कुछ देर यूँ ही बैठी वह आसमान ताकती रही, फिर पता नहीं क्या सोचकर मोबाइल उठाकर रीमा का नंबर डायल कर दिया। लगातार बजती घंटी सुनकर वह फोन रखने ही वाली थी कि तभी रीमा ने कॉल उठा लिया, “रिचार्ज हो गया दीदी...बताया था न कि अभी इनके एक फ्रेंड के यहाँ शादी में जा रहे हैं, तो पार्लर आए हैं तैयार होने...बाद में बात करते हैं...और हाँ, अगली बार ज़्यादा नेट वाला रिचार्ज कराना...यह एक जीबी बहुत जल्दी खत्म हो जाता है...ठीक है? चलो रखते हैं...।”

इससे पहले कि मैना कुछ कह-सुन पाती, रीमा ने फोन रख दिया। मैना को लगा, वह अंदर तक आसमान में घिरे काले बादलों की तरह भारी हो गई है...अगर जल्दी ही ना बरसी तो फट जाएगी। 

पर बरसे भी तो कहाँ जाकर...? माँ-बाप हैं नहीं, मायके के नाम पर एक भाई-भाभी, पर वे भी बस अपनी दुनिया में मस्त...और रीमा...? उसके जैसी मतलबपरस्त इंसान से तो कोई उम्मीद रखना ही बेमानी था। कहने को पति के रूप में गोकुल उसके साथ थे, पर वे भी अति-व्यावहारिक और आत्मकेंद्रित...संवेदना शायद अंश-मात्र भी नहीं थी उनमें...। दुनिया के लिए वे बेहद व्यवहारकुशल व्यक्ति थे; लेकिन उनके साथ भावात्मक संवाद कर पाने की गुंजाइश कहीं से भी नहीं थी। ऑफिस, पैसे की चिंता और घर एक निश्चित बजट में चलाने तक ही उनकी दुनिया सीमित थी; इसलिए गर्मी में एसी ना चलाने देने की ज़िद हो या सर्दियों में हीटर और गीज़र के लिए होने वाली बहसें हों, मैना हर परिस्थिति में सामंजस्य बैठाने का प्रयत्न करती। वह जानती थी, फालतू की लड़ाइयों में कुछ नहीं रखा। हरेक बात पर लड़ना जितना आसान होता है, चुप रहकर निभा ले जाना उतना ही कठिन...। वैसे भी वह रिश्तों को निभाने में यकीन रखती थी, सो अधिकतर चुप ही रह जाती। 

अचानक ही मैना की आँखों के सामने जैसे रीमा की पूरी ज़िंदगी घूम गई। उसके स्कूल में रहते ही पहले पापा, और फिर माँ का जाना...। भाई-भाभी को तो तब भी कोई खास फ़र्क नहीं पड़ा था, पर रीमा के लिए अगर वो दुखद घटनाएँ थीं, तो मैना के लिए तो जीवन-भर का खालीपन और अकेलापन था। रीमा का बोझ उठाने के लिए भाभी तैयार नहीं हुई तो बेहद चिरौरी करके मैना ने किसी तरह गोकुल को मनाया था, रीमा को अपने साथ रखने के लिए...। संवेदनाओं से कोसों दूर रहने वाले गोकुल जाने कैसे उस घड़ी थोड़े द्रवित होकर उसकी बात मान गए थे, यह मैना आज भी नहीं समझ पाई; पर जो भी हो, गोकुल की सहमति से मैना के दिल से जैसे बहुत बड़ा बोझ उतर गया था। 

गोकुल पैसे को दाँत से पकड़ने वाले लोगों में से थे; इसलिए रीमा के पालन-पोषण के लिए मैना ने खुद पार्ट-टाइम नौकरी कर ली। उसके कालेज के फॉर्म भरने से लेकर उसकी नौकरी लगने और शादी तक की सारी ज़िम्मेदारी मैना ने बड़ी बहन बनकर नहीं, बल्कि माँ की तरह पूरी शिद्दत से निभाई। 

डेढ़ साल पहले उसकी एक बड़ी बदतमीजी पर जब मैना ने उसे यही सब याद दिलाकर समझाना चाहा था, तब रीमा ने बड़ी तल्खी से और उल्टा जवाब दे दिया था, “दीदी, तुमने जो भी किया, अपनी मर्ज़ी से किया था। मैंने नहीं कहा था तुमसे कि मेरी ज़िम्मेदारी उठाओ...। खुद की यह महानता अपने पास रखो। अपनी औलाद नहीं थी, तो मुफ़्त में मेरी माँ बनने की कोशिश न करो। अपने मन से किए गए कामों के लिए मुझ पर अहसान न जताओ...” कहते हुए रीमा ने फोन पटक दिया था। 

मैना अवाक्-सी चुप रह गई थी। रीमा की बातों के हंटर से उसका दिल छलनी हो गया था। कुछ देर के लिए मानो उसके दिल-दिमाग पर लकवा मार गया। जब ऑफिस से आए गोकुल ने कई बार आवाज़ देने के बाद उसे झिंझोड़ा, तो जैसे उसे होश आया। गोकुल चाहे जैसे रहे हों, पर शादी के इतने सालों बाद भी औलाद न हो पाने का कोई तंज या दोषारोपण उन्होंने उस पर नहीं किया। पर रीमा...? 

मैना अक्सर अपने जीवन में संतोष अपने आसपास ही ढूँढती थी...पड़ोस की बिल्लियों को दूध डाल देना, मंदिर की सफाई में हाथ बँटाना, या कॉलोनी की बस्ती की लड़कियों को खाली समय में पढ़ा देना। ये सब काम उसे सुकून देते थे, जैसे वह अपने भीतर की रिक्तता को भर रही हो। पर उस दिन रीमा की बातों की वजह से उसका मन इन सबसे भी उचाट-सा हो गया। क्या फायदा किसी के लिए कुछ करके अपने अंदर सुकून और शांति महसूस करने का...?

इस घटना के लगभग चार-पाँच महीने बाद रीमा का फोन आया भी तो अपनी बदतमीजी के लिए माफी माँगने नहीं, बल्कि अपने पति की आर्थिक सहायता के लिए...। मैना ने जैसे ही अपनी असमर्थता जताई, रीमा ने फिर फोन काट दिया और आज लगभग एक साल बाद फिर अपने मतलब के लिए ही फोन किया। 

मैना का दिल तो चाहा था, वो भी कटी-कटी सुना दे और रिचार्ज करने से साफ इंकार कर दे, पर उसके अंदर की ममता ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। वैसे भी रीमा पहले ही एक-दो बार बता चुकी थी कि उसका पति जाने क्यों उसका फोन रिचार्ज करने में बड़ी आनाकानी करता है। आज भी मैना को हमेशा की तरह लगा, रात में निकलेगी, कम-से-कम सुरक्षा के लिए मोबाइल में बैलेंस तो होना ही चाहिए। 

अचानक मैना की आँखें भर आईं। वह गोकुल के सामने ऐसे रोने से बचती है। पिछली बार रीमा के इतने दिनों से संपर्क न करने की बात कहकर रो दी, तो गोकुल ने इस बात पर तो कटाक्ष कर ही दिया था, “तुम उसकी बड़ी बहन थोड़े न हो...तुम तो उसकी एटीएम हो, जब चाहेगी, तुमसे पैसे निकाल लेगी। अपनी तनख्वाह से करती हो; इसलिए नहीं बोलता, वरना मैं तो कब का ऐसे मतलबी लोगों को लात मारकर अपनी ज़िंदगी से बाहर कर चुका होता...।” 

गोकुल ने कुछ गलत तो नहीं कहा था; लेकिन मैना को तब भी हल्का अपमानित-सा महसूस हुआ। कुछ भी हो, रीमा थी तो उसका ही खून...उसके मायके का एक हिस्सा...। यही कारण था कि मैना कभी भी अपने भाई-भाभी या रीमा से जुड़ी कोई भी बात गोकुल से शेयर नहीं करती थी। 

अचानक से बारिश फिर शुरू हो गई। आसपास का वातावरण भीगा हुआ था...। सामने के पार्क का हरेक पेड़-पौधा हरा-भरा था। मैना की नज़र अपनी बालकनी में रखे गमलों पर गई। उन पर हवा के साथ उड़कर आई बारिश की कुछ बूँदें ही पड़ी थी, जिन्हें गमलों की भुरभुरी-सूखी मिट्टी ने पल भर में सोख लिया था और अब भी वे वैसे ही सूखे और प्यासे थे। उनमें लगे पौधे मुरझा रहे थे। 

मैना को लगा, उसका मन भी तो उसी मिट्टी की तरह है...जिसके आसपास अगर कहीं से रिश्तों, भावनाओं और अपनेपन की बारिश की बौछारें पड़ती भी हैं तो भी उसे पूरी तरह भिगो नहीं पाती। बाद में बस वही सूखापन...वही सूनापन...। वह भी तो इन्हीं पौधों की तरह मुरझाती जा रही है। बाहर की बारिश के साथ-साथ उसकी आँखों से भी बरसात शुरू हो गई थी। 

उसके मन में उठा तूफ़ान धीरे-धीरे थम रहा था, लेकिन भीतर की सूखी धरती अब भी हरियाली से महरूम थी। सहसा, पता नहीं क्या सोचकर मैना एक झटके से उठ खड़ी हुई। एक-एक करके सूखे गमलों को उठाकर उसने रेलिंग के पास रख दिया। अभी बारिश की बूँदों से उनको जितना जीवन मिल सकता है, मिलने देगी...वरना कल सुबह वह खुद उनको पानी से नहलाकर फिर से ज़िंदगी जीने का एक मौका ज़रूर देगी। 

मैना ने अपने अंदर एक नई ऊर्जा महसूस की। जरूरी तो नहीं कि इन फूलों को खिलने-खिलाने के लिए बारिश का ही मुँह ताका जाए। अपने चारों तरफ पनप गए उस अकालग्रस्त इलाके में हरियाली लाने जितना पानी तो उसके पास भी मौजूद है ही न...।

 000 (स्व. प्रेम गुप्ता मानी जी की अधूरी कहानी को उसी संवेदनशीलता के साथ पूरा किया है उनकी बेटी प्रियंका गुप्ता ने )

 सम्पर्कः ‘प्रेमांगन’, एम.आई.जी- 292, कैलाश विहार, आवास विकास- एक, कल्याणपुर, कानपुर- 208017 (उ.प्र)

ईमेल- priyanka.gupta.knpr@gmail.com, ब्लॉग- www.priyankakedastavez.blogspot.in


लघुकथाः ताज

  - आरती स्मित 

शाम ढलने को आतुर थी। धूल ने आसमान का नीलाभ ढक दिया था। मेले में आए लोगों की आस्था से बाज़ार गर्म था। कुछ बहुरूपिये भिखारियों की जेबें भी। इन बातों से बेखबर, मंदिर की सीढ़ियों के ऊपरी चबूतरे के एक कोने पर पिछले आठ घंटे से पिता के साथ बैठा वह नन्हा बालक पुरानी मैली कुचली टोपी से कानों और उतने ही मैले जैकेट से थरथराती देह को भुलावा देता हुआ अपने नन्हें हाथों की जादूगरी नगाड़े और ढोलक पर बिखेरता रहा। पिता की शहनाई के साथ नगाड़े पर छड़ी से स्वर लहरी बिखेरता वह बीच-बीच में सिर उठाकर देख लेता कि कोई कद्रदान उन्हें सुन भी रहा है या नहीं। भीड़ सेल्फी लेती हुई सीढ़ियाँ चढ़ती जाती। कोई पल भर को रुकता भी तो लोक कलाकार की कलाकारी पर मुग्ध न होता। क्षण भर को रुककर उसने पपड़ाते होंठों पर जीभ फेरी और  काम में लगा रहा। 

    अँधेरा छाने लगा। अब तक कुछ सिक्के सामने आ गिरे थे। नगाड़ा बजाता हुआ वह सामने पड़े सिक्के देखकर सोचने लगा, 'लोग सिक्के फेंककर क्यों देते हैं, जैसे कि उस भिखारन को? कोई ताली भी नहीं बजाता। 

    उसने सिर घुमाकर पिता की तरफ़ देखा जो बगल में खड़ी एक युवती की आँखों में अपनी कला का मान देखकर तन्मय होकर बजा रहे थे। वह युवती कुछ देर खड़ी रही, फिर झुककर कुछ सिक्के दोनों के सामने रख दिए। उसने देखा, वह अब उसकी बगल आ खड़ी हुई और उसे देखती हुई ध्यान से सुन रही है। उसे अच्छा लगा। रोटी-प्याज भूलकर वह साज बजाने में लीन होने लगा। अचानक उसने अपने सिर पर झुके हाथ के साथ ही पहले हल्की ठंड, फिर गर्माहट महसूस की तो हैरान हुआ। वह युवती अब सीधी खड़ी होकर मुस्कुरा रही थी। पुरानी टोपी उसकी गोद में पड़ी थी। उसने सिर पर हाथ फेरा। उसके हाथ में नरम, मुलायम नग जड़ी नई सुनहरी टोपी मुस्कुरा रही थी।

     उसकी आँखों में झिलमिलाते बल्ब जल गए। उसने उसे देखा, आँखों से धन्यवाद दिया और उसके इशारे पर नई टोपी पहन ली। युवती आगे बढ़ी, झुककर उसे गले लगाया और बुदबुदाई,  “नन्हे कलाकार! तुम्हारे हाथ में जादू है। काश! किसी मेहरबान की नज़र तुम पर पड़े और तुम मंच पर हुनर दिखलाओ।”  वह चुप हो गई। उसे लगा, उनकी आँखों में पानी उमड़ आया है। उसके सिर पर हाथ फेरकर वह जल्दी से खड़ी हो गई। चबूतरा अँधेरे में डूबने लगा मगर उसकी खुशी नगाड़े  पर पड़ती हर चोट से तरंगित होती हुई रोशनी फैला जाती। पहली बार उसे अपने कलाकार होने पर गर्व का अनुभव हुआ। टोपी उसे सिर पर सजा ताज लगने लगी।

 सम्पर्क : मोबाइल : 8376836119  ईमेल : dr.artismit@gmail.com


लघुकथाः हैप्पी फ़ैमिली

  - आशा शर्मा

“त्योहारी सीजन आने वाला है। इस साल उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए कोई धमाकेदार ऑफर की स्कीम बनाओ।” घरेलू सामान बनाने वाली कंपनी के मालिक ने अपनी बिजनस टीम के मुखिया से कहा।

“आम तौर पर त्योहार लोग अपने परिवार के साथ मनाते हैं। क्यों न इस साल हम “हैप्पी फैमिली कांटेस्ट” आयोजित करें? हमारे उत्पाद खरीदने वाले ग्राहकों से उनके खुशहाल परिवार की तस्वीर मंगवाते हैं और बेस्ट तस्वीर वाले परिवार को उपहार स्वरूप एक फैमिली होलीडे ट्रिप देने की घोषणा करते हैं।” गहन अध्ययन के साथ एक सप्ताह बाद मुखिया ने अपना प्रस्ताव पेश किया।

“तुम्हें क्या लगता है, नई पीढ़ी के लोगों को यह प्रस्ताव पसंद आएगा?” मालिक से संशय से पूछा।

“अरे सर, आजकल की पीढ़ी को इस तरह के चोंचले बहुत भाते हैं।” आप देखिएगा, युवा इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेंगे।” मुखिया ने दावे से कहा।

स्कीम लॉन्च की गई और जैसा कि अनुमान था, कंपनी के रिकॉर्ड उत्पादों की बिक्री हुई और ढेरों तस्वीरें प्राप्त हुई। निर्णायक बेस्ट हैप्पी फैमिली की तस्वीर को चुनने में दुविधा में थे क्योंकि अधिकांश तस्वीरों में पति-पत्नी के साथ उनके पालतू कुत्ते या बिल्ली थे, माता पिता या बच्चे नहीं।

सम्पर्कः इंजी. आशा शर्मा, A-123, करणी नगर (लालगढ़), बीकानेर- 334001

व्यंग्यः पाला बदलने की कला

  - डॉ. हरि जोशी

मेरे गाँव से उठकर दुनिया भर में कबड्डी खेल पाँव पसार चुका है। पाला बदलना दुनिया का दुनिया का सबसे लाभदायी खेल हो गया है। कबड्डी से ही पाला बदलने वाली सीख दुनिया भर में ली गई है। इधर उखड़ रहे हों तो पाला बदला कर उधर जम जाएँ।

कबड्डी भारत के गाँवों से चलकर विश्व स्तरीय खेल कैसे बना, और क्यों ? इस एक खेल में अनेक खेल जो निहित रहते हैं? टंगड़ी मार सकते हैं, इकलंगा या कैंची भी लगा सकते हैं।

थोड़ी बहुत राजनीति सीखकर प्रत्येक खिलाड़ी येन केन प्रकारेण पाला मारना सीख ही लेता है। मेरे गांव में फसलों को अधिक ठण्ड पड़े तब ही पाला मारता है। नै नै

नैतिकता की, स्वस्थ समाज की, अनुशासन की फसल, भले ही चौपट हो जाए, राजनीति के खिलाड़ियों को क्यों चिंता करना,वे तो धन की गर्मी सहित गर्म रहते हैं, उन्हें तो पाला मारना है ।

देश भी बेचारा क्या करे, ऐसे ही लोगों से उसका पाला पड़ता है।

  कबड्डी में आधे खेल के बाद एक बार पाला बदलना अनिवार्य होता है । इसमें एक दो खिलाड़ी सदस्य नहीं, पूरी की पूरी टीम पाला बदलती है। आजकल जो घाघ खिलाड़ी होता है वह टीम से छिटककर खुद या एक दो को साथ लेकर पाला बदलता है। इस तरह बार- बार पाला बदलने का रिवाज़ शुरू हो गया है । जिधर मलाई दिखी उधर का पल्ला पकड़ा। तब टीम का कोई चतुर से चतुर खिलाड़ी भी, बीच में, दल बदलकर इधर से उधर नहीं जाता था। अब शिक्षा बढ़ गई है, मेरी एक कविता है, “पहली से दूसरी योजना में शिक्षा बढ़ी , हम सब की लूटने खसोटने की इच्छा बढ़ी।”

साहित्य के अनेक खिलाड़ी भी पाला मारने में उस्ताद हैं, बिना कुछ काम किए बड़े- बड़े सम्मान हस्तगत कर पुरस्कृत होते रहते हैं।

पाला बदलकर अच्छे अच्छों को खो कर देने की कला में कई विश्व स्तरीय घाघ  निपुण हैं।

आज कई खिलाड़ी या कलाकार विश्वास में लेकर अपने हितैषी को ही टंगड़ी मार देते हैं ? अच्छा अवसर देखते ही इधर से उधर कूद जाते, पाला बदल लेते हैं । सही  कलाकार या सचमुच के खिलाड़ी, उसी टीम में घुसते हैं जो हमेशा जीतती ही है। विजयी टीम के खिलाड़ी होने में जिस गर्व की अनुभूति होती है, वह पराजित टीम में रहने से कहाँ? कुछ भी करना पड़े, जीतना ही है? विजयी टीम को सम्मान, पद, पैसा, मलाई सब उपलब्ध जो रहते हैं।

रमानाथ अवस्थी की पंक्तियाँ जीवन में क्यों उतारें “हार जीत तो जीवन भर के साथ है, इसमें रोने धोने की क्या बात है?”

यह सोच चिंतन या साहित्य का हो सकता है, राजनीति के खिलाड़ी को तो येन केन प्रकारेण हमेशा जीतना ही है। कुछ भी ऊला- ढाला करना पड़े, पाला बदलना पड़े, जीतकर ही मानेंगे । एक संसद से पूछा गया- आप सत्ताधारी दल में क्यों आए? उन्होंने उत्तर दिया- चुनाव होने वाला था, जिस पुराने दल में था उसके जीतने की सम्भावना नहीं थी; इसलिए मैं इस दल में आ गया, और देखिए मेरा निर्णय ठीक रहा, मैं संसद सदस्य हूँ। हर खेल में राजनीति, हर राजनीति में खेल। राजनीतिज्ञ कभी हार नहीं मानते । लफंगई करें, लट्ठ चलाए, मतदाता को रिश्वत बाँटें पर हमेशा जीती हुई टीम का पल्लू पकड़े रहेंगे। जिधर बम उधर हम, क्यों पालें नैतिकता का वहम ?